हमारी आदरणीय बहिन संध्या कुमार जी ने “यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक का स्वाध्याय किया,100 पृष्ठों के ज्ञान को कुछ ही पन्नों में Summarize किया, इस Summarized कंटेंट पर चार ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किये गए लेकिन पुस्तक के 27 चैप्टर बार-बार कह रहे थे कि यह अति उत्कृष्ट ज्ञान है, इसे पूरे विस्तार से समझना चाहिए। फिर क्या था, गुरुदेव से निर्देश हुआ और हमने पुस्तक का एक-एक शब्द पढ़ना और सरल करना शुरू कर दिया। बहिन जी द्वारा भेजे गए कंटेंट पर आधारित 4 लेखों के बाद आरम्भ हुई लेख श्रृंखला का आज 7वां लेख प्रस्तुत किया गया है।
इस छोटे से परिवार का लगभग हर कोई सदस्य गायत्री उपासना कर रहे है, यदि आज के इस सरल लेख को समझ लिया जाये तो उसे ऐसी सहायता मिलने की सम्भावना है जिसे शब्दों में वर्णन करना असंभव है।
आने वाले लेख दिखने में ऐसे लगेगें कि बिलकुल ही साधारण से हैं, हम तो इन्हें पहले से ही जानते हैं,लेकिन विश्वास रखिये बहुत उच्च कोटि का ज्ञान लिए हुए हैं।
आइए लेख का अमृतपान करें।
********************
पंडित लीलपत शर्मा जी ने गुरुदेव से गायत्री मंत्र के भावार्थ को समझाने का आग्रह किया । पूज्यवर ने अपनी धीर-गंभीर वाणी में गायत्री मंत्र का उच्चारण किया और फिर बोले,
“यह बड़ा ही विलक्षण मंत्र है । समूचे वेद वाङ्मय में इसकी टक्कर का कोई दूसरा मंत्र नहीं है । जितना गूढ़ है उतना ही सरल,छोटा सा दिखने के बावजूद ऐसा ज्ञान तत्व लिए हुए है कि कोई थाह ही नहीं ।
सबसे पहले “गायत्री” शब्द का अर्थ समझने की आवश्यकता है। “गायत्री शब्द” दो शब्दों के मेल से बना है। ये दो शब्द हैं-गय और त्राण। गय का अर्थ प्राण और त्राण का अर्थ रक्षा करना होता है। गायत्री मंत्र वह मंत्र है जो प्राणों की रक्षा करता है।
मंत्र अति सरल है लेकिन गूढ़ ज्ञान लिए हुए है।
प्राण से ही तो जीवन है। यदि प्राण नहीं तो फिर क्या बचा। प्राणहीन मनुष्य तो शव हो जाता है। अतः जो प्राणों की रक्षा करे वह तो सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा ही लेकिन यह सब कैसे होता है?
अति सरल विश्लेषण:
प्राण कहते हैं चैतन्यता (चेतना!!, Consciousness)को, जागरूकता को, जाग्रति को,जीवित को। हमारे भीतर जो गति,क्रिया,विवेक,विचारशक्ति एवं जीवन धारण करने वाला तत्व है, वही प्राण है। इसी प्राण से हम जीवित हैं। मनुष्य में जो शक्ति है वह हाड़, मांस, रक्त की नहीं “प्राण की शक्ति” है। जब प्राण निकल गया तो जीवन का अंत हो जाता है। हाड़, मांस, रक्त तो वैसे ही रहते हैं लेकिन प्राणरहित देह का कुछ भी प्रयोजन नहीं। प्राण निकलते है देह शव बन जाती है, निष्प्राण हो जाती है।
प्राणवान और निष्प्राण के बीच भी एक स्थिति होती है जिसे न्यूनप्राण कहते हैं । इसमें प्राण तो होता है लेकिन वह निर्बल पड़ा होता है। यह स्थिति मनुष्य जीवन की सबसे अनोखी स्थिति है। बाहर से देखने में तो शरीर ठीक-ठाक दिखाई देता है लेकिन भीतर से खोखला हो जाता है।
लीलपत जी ने जिज्ञासा प्रकट की कि यह स्थिति उसी तरह की है जैसे तपेदिक या अन्य गंभीर बीमारियों में हो जाती है?
गुरुदेव ने कहा,“अरे नहीं बेटे ! इस स्थिति का शारीरिक बीमारी से कोई लेना देना नहीं, यह तो मन की निर्बलता है। आलस्य, प्रमाद, निराशा की छाया में चिंतातुर, निस्तेज, प्रभावहीन चेहरा, न कुछ करने में मन लगता है और न परिस्थितियों से जूझने का साहस ही जागता है। ऐसे व्यक्ति न्यूनप्राण होते हैं। उनमें प्राण तो है लेकिन उस प्राण की शक्ति बड़ी ही कमज़ोर होती है। मां गायत्री इस प्राणशक्ति की, प्राणबल की, प्राणवायु की रक्षा करती है अर्थात उसे शक्ति प्रदान करती है, उसका अभिवर्धन करती है। इससे नस-नस में उत्साह की तरंगें प्रवाहित होती हैं। हृदय में दृढ़ता, साहस, धैर्य, आशा एवं स्फूर्ति की भावनाएं गूंजती हैं। प्राणबल के आधार पर मनुष्य ऐसे-ऐसे कार्य कर दिखाता है कि लोग दांतों तले उंगली दबा लें। डेढ़ हड्डी के गांधी बाबा तो लाखों करोड़ों पर भारी पड़ गए थे क्योंकि गायत्री माता ने उनके प्राण-बल को उत्कृष्ट स्तर तक प्रदीप्त कर दिया था। प्राणशक्ति के साथ-साथ “ऋतंभरा बुद्धि की अद्भुत शक्ति” का भी विकास होता है । इसके दिव्य प्रकाश में तत्व और अतत्व का, सत्य और असत्य का, श्रेय और अश्रेय का निर्णय करना सुलभ हो जाता है। यह तय करना आसान हो जाता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं !
गायत्री उस बुद्धि का नाम है जो “सतोगुणी दैवी तत्वों” से आच्छादित होती है। सात्विक विचार और कार्यों को अपनाने से मनुष्य की प्रत्येक शक्ति की रक्षा और वृद्धि होती है। उसकी प्रत्येक क्रिया उसे अधिक पुष्ट, सशक्त एवं सुदृढ़ बनाती है और वह दिनोंदिन अधिक शक्ति संपन्न बनता है। इसके विपरीत अँधेरे से ढकी बुद्धि द्वारा उत्पन्न हुए विचार और कार्य हमारी प्राणशक्ति को दिनोंदिन घटाते हैं। भोग प्रधान कार्यों से शरीर कमज़ोर हो जाता है। स्वार्थ प्रधान विचारों से मन अथाह पाप की दलदल में फंसता जाता है। इस प्रकार जीवनरुपी बर्तन के तले में असंख्य छेद हो जाते हैं और सारी उपार्जित शक्ति उन छेदों में से निकल कर नष्ट हो जाती है। ऐसे व्यक्ति अपनी बुद्धि को दौड़ाकर चाहे जितना भी धन कमा लें, तृष्णा,स्वार्थपरता,भय,अहंकार, लोभ आदि के कारण मन सदा दुःखी ही रहता है और मानसिक शक्तियां नष्ट होती रहती हैं।
सतोगुणी,ऋतंभरा विवेक बुद्धि हमारे शारीरिक आहार-विहार को भी सात्विक रखती है। संयम,ब्रह्मचर्य,श्रमशीलता,सादगीमय प्राकृतिक जीवन दिनचर्या होने से बल वीर्य बढ़ता है,शरीर सक्रिय रहता है और मनुष्य दीर्घजीवी होता है। मन में परमार्थ,सेवा,त्याग,सहिष्णुता,दया, सहानुभूति,मैत्री,करुणा,नम्रता,श्रद्धा,आस्तिकता आदि की भावना जाग्रत होती है। मन सदैव प्रफुल्ल और चेतनामय रहता है। शरीर और मन दोनों की सात्विक उन्नति होने से प्राणशक्ति सुरक्षित रहती है और उसकी अभिवृद्धि भी होती है।
इस प्रकार माँ गायत्री सद्बुद्धि देकर हमारे प्राणों की रक्षा करती है ।
संसार में जितने भी योगी हुए हैं, सभी ने मुक्त कंठ से माँ गायत्री की प्रशंसा की है। विश्वामित्र, याज्ञवलक्य, वसिष्ठ, भारद्वाज सभी ने गायत्री की महिमा का बखान करते हुए कहा है कि इससे बढ़कर और कुछ भी नहीं है। महर्षि चरक ने तो आयुर्वेद शास्त्र में यहां तक कहा है कि जो भी स्त्री पुरुष एक वर्ष तक आंवले का रस पीकर प्रतिदिन, प्रात:काल गायत्री का जाप करता है उसकी आयु निःसंदेह 116 वर्ष की हो जाती है ।
गायत्री मंत्र की शक्ति असीमित है। यह हमारे अंत:करण को,मन, बुद्धि,चित्त,अहंकार को पवित्र रखती है। इससे हमारे लोक परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
गुरुदेव लीलापत जी को कहते हैं कि यह तो गायत्री के शाब्दिक अर्थ को थोड़ी सी व्याख्या की है। इसकी तीनों व्याहृतियों भूः भुवः स्वः में तथा तीनों चरणों में, उनके नौ शब्दों (1.तत सवितुः र्वरेण्यं, 2.भर्गो देवस्य धीमहि, 3.धियो योनः प्रचोदयात) और चौबीस अक्षरों में गूढ़ भाव समाहित हैं । इस महामंत्र के अक्षरों में बीज रूप में मानवी संस्कृति एवं आदर्शवादिता के सारे सिद्धांत समाहित हैं।
ओंकार (ॐ) तो संसार के सारे ज्ञान को अपने भीतर समेटे हुए है। इन सबकी व्याख्या करने से पहले महाभारत की एक बात सुनो। महाभारत के अनुशासन पर्व की यह कथा है।
एक बार युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से प्रश्न किया: हे पितामह वह मंत्र कौन सा है जिसका जाप करने से सदैव धर्म का लाभ होता हो,जिसको चलते-फिरते,उठते-बैठते, आते-जाते, किसी कार्य के प्रारंभ व अंत में ध्यान से किया जा सकता हो, जिसके जाप से आनंद, शांति व सुख मिलता हो, धन, संपत्ति और राज्य मिलता हो, भय का नाश होता हो और जो वेद के अनुकूल हो।
यह प्रश्न युधिष्ठिर ने पूछा जो स्वयं ही धर्मराज और बड़े भारी विद्वान थे लेकिन भीष्म पितामह उनसे भी अधिक विद्वान थे। उन्होंने प्रश्न सुनकर कहा:
“युधिष्ठिर ! जो भी गायत्री का जाप करते हैं उन्हें हाथी,घोड़े,रथ, विमान सब मिलते हैं। उन्हें देश और विदेश में यश प्राप्त होता है। राजा, राक्षस, शत्रु, सर्प, विष कोई भी हानि नहीं पहुंचा सकता। उससे शांति मिलती है। जहां गायत्री का जप होता है वहां अग्नि भी कोई क्षति नहीं पहुंचा सकती, सर्प वहां से भाग जाते हैं, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती,गौओं की संतान में वृद्धि होती है।आते-जाते, कार्य करते,हर समय इस मंत्र का जाप किया जा सकता है।”
भीष्म पितामह ने इस मंत्र की इतनी महिमा बताई।
इसी मंच से अभी कुछ दिन पूर्व ही गायत्री मंत्र को “गुरुमंत्र” कहने के विषय पर चर्चा हुई थी। चारों वेदों में लगभग 20000 मंत्र हैं लेकिन गायत्री मंत्र इन सभी मंत्रों का गुरुमंत्र है। यजुर्वेद, ऋग्वेद और सामवेद में तो इस मंत्र की बार-बार महिमा गायी गयी है लेकिन अथर्ववेद ने तो इसकी प्रशंसा में कमाल ही कर दिया है।
कैसा प्यारा मंत्र है:
ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयंता पावमानी द्विजानाम। आयुः, प्राणं, प्रजां, पशुं, कीर्तिं, द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यम दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम॥
भगवान इस मंत्र में कहते हैं कि मेरे द्वारा स्तुति की गई, द्विजों को पवित्र करने वाली वेदमाता गायत्री आयु, प्राण, शक्ति, पशु, कीर्ति धन,ब्रह्मतेज प्रदान करे और यह सब देकर हमें ब्रह्मलोक की ओर ले चले। यहाँ प्रयोग किये गए सभी शब्द बहुत ही कॉमन हैं लेकिन द्विज का अर्थ समझना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। द्विज का अर्थ “दो जन्म लेने वाला” होता है। मनुष्य का एक जन्म तो माँ के पेट से होता है और दूसरा यज्ञोपवीत धारण करने से होता है।
वेद कहता है कि माँ गायत्री सर्वप्रथम आयु देती है लेकिन यह कैसी आयु प्रदान करती है? रोगी को रोगमुक्त करके आयु देती है? नहीं,गायत्री साधना से ऐसी आयु प्रदान होती है जिसमें प्राण हो। शरीर में प्राण होने का अर्थ Immunity से समझा जाना चाहिए। Strong immune system वाले तो बिमारी तक को खदेड़ देते हैं, प्राणवान मनुष्य की यही विशेषता है। इतना ही नहीं, वेद कहता है कि गायत्री संतान भी देती है, पशु, घोड़े, गाय, बैल, धन, भूमि, अन्न, फल आदि सब कुछ देती है। यदि यह सब कुछ मिल भी जाए तो क्या मनुष्य की इच्छा पूरी हो जाती है? नहीं। सब कुछ प्राप्त होने के बाद भी मनुष्य को एक और भूख सताने लगती है: कीर्ति की इच्छा, विज्ञापन की इच्छा ,ढिंढोरे की इच्छा,यश की इच्छा। माँ गायत्री कीर्ति भी देती है, यश भी देती है,ब्रह्मवर्चस भी देती है।ओजस,तेजस,वर्चस सब कुछ देती है।
लेकिन यह सब कुछ कैसे प्राप्त होता है?
सबसे बड़ा, मिलियन डॉलर प्रश्न स्वतः ही उठता है कि माँ गायत्री यह सब कैसे देती है ? क्या केवल जाप करने से, माला फेरने से ? गुरुदेव कहते हैं: नहीं,चाहे जितनी भी माला फेर लो, कुछ भी मिलने वाला नहीं है। उपरोक्त वर्णित सब कुछ प्राप्त करने के लिए गायत्री मंत्र के एक-एक अक्षर के भावार्थ को भलीभांति हृदयंगम करना होगा। उसके अर्थ को अपने आचरण में उतारना पड़ेगा,उसी के अनुसार जीवन जीना पड़ेगा, यज्ञमय जीवन जीना पड़ेगा,संसार के विशाल यज्ञरुपी खेत में अपने जीवन की आहुतियां देनी पड़ेंगीं। गुरुदेव बता रहे हैं कि ऐसे यज्ञमय जीवन के साथ अगर गायत्री उपासना हो तो सोने पे सुहागा होना सुनिश्चित है।
अपने दिल पर हाथ रख कर,सच्चे मन से कमेंट करके बताएं कि ऐसा जीवन जीने के लिए कितने साथी तैयार हैं?
आज के लेख का समापन आदरणीय ओंकार जी की क्रांतिकारी वाणी में “यज्ञमय जीवन” वाले प्रज्ञागीत से कर रहे हैं।
