वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का 6वां लेख-गायत्री मंत्र के ज्ञान पक्ष की अति सरल व्याख्या,दूसरा एवं समापन भाग

वर्तमान लेख श्रृंखला में गायत्री मंत्र के वैज्ञानिक एवं ज्ञान पक्ष को समझने का प्रयास किया जा रहा है क्योंकि यदि किसी ज्ञान का समझ कर अभ्यास किया जाए तो परिणाम अनेकों गुना होता है।

गायत्री साधना के वैज्ञानिक पक्ष पर की गयी चर्चा पाठकों को इतनी  पसंद आई कि इन पंक्तियों के लिखने समय तक 70,000 लोग केवल फेसबुक पर ही देख चुके हैं एवं अभी भी देखे जा रहे हैं, कमेंट कर रहे हैं, शेयर कर रहे हैं। 

आज प्रस्तुत किये गए ज्ञानप्रसाद लेख में ज्ञान पक्ष की दूसरी तीन धाराओं की बात हो रही है:

1.श्रद्धा, 2.परिष्कृत व्यक्तित्व, 3.दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं

तो आइये गुरुचरणों में समर्पित होकर,गुरुवर की धरोहर भाग 1 पर आधारित आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें। 

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गुरुवर कहते हैं:

हमारे बच्चे हमारे द्वारा की गयी रिसर्च  के बारे में जानना चाहते हैं। वोह हमारे द्वारा की गयी रिसर्च  से प्राप्त हुए निष्कर्ष के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। लोगों का कहना सही है कि हर कोई न तो इतना बड़ा तप कर सकता है, न ही सारा जीवन कठिन साधना में गँवा देना चाहता है और न ही इतनी उच्चस्तरीय  रिसर्च  कर सकता है। उसे तो बना-बनाया पकवान चाहिए। उसके पास न तो समय है और न ही श्रम की शक्ति, उसे तो सब कुछ इंस्टेंट चाहिए। 

तो लीजिये बतातें हैं अपने निष्कर्ष: 

गायत्री मंत्र का जप करने वाले अक्सर धारणा बनाए बैठे हैं कि इससे मनोकामनाएं पूरी होती हैं, असंभव भी संभव हो जाता है, अविश्वसनीय तक घटित हो जाता है। ऐसे लोग न जाने कैसी-कैसी धारणाएं एवं  अन्धविश्वास पाले बैठे हैं। 

बीज से नन्हां सा पौधा और फिर पौधे से वृक्ष बनने के लिए उपजाऊ भूमि,पानी, खाद,हवा आदि की आवश्यकता होती है। अगर यह चीजें न होंगी तो बीज पल्लवित ही नहीं हो सकता। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही तथ्य है। यदि गायत्री मंत्र के साथ तीन चीजें (श्रद्धा,परिष्कृत व्यक्तित्व,दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं) मिला दी जाएँ, तभी उसके ठीक परिणाम निकलने सम्भव हैं। 

आज के लेख में उन्हीं तीन Ingredients की चर्चा की गयी है।  

1.श्रद्धा :

गुरुदेव बताते हैं कि गायत्री उपासना के सम्बन्ध में हमारा लम्बे समय का जो अनुभव है वह यह है कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं,जो सामान्य पुस्तकों में लिखे हुए हैं लेकिन किसी को फलित और किसी को न फलित होने का मूल कारण है कि लोग “उन तीन तत्वों का समावेश करना लोग भूल जाते हैं।” यह तीन पॉइंट किसी भी उपासना के प्राण हैं। विद्यार्थी अगर श्रद्धा से कार्य न करे, उसका व्यक्तित्व रिफाइंड न हो एवं उसका दृष्टिकोण क्लियर न हो तो उसकी पढाई केवल एक कर्मकांड ही बनकर रह जाएगी। विद्यार्थी के लिए पढाई कहाँ किसी साधना से कम है? श्रद्धा अपनेआप में ही अटूट शक्ति लिए हुए है। आप किसी के प्रति श्रद्धा दिखा कर तो देखो, वोह आपका दास न बन जाए तो कहना। बिजली की शक्ति,भाप की शक्ति, आग की शक्ति की तरह श्रद्धा भी एक शक्ति है। सच्ची श्रद्धा हो तो पत्थर में से भी भगवान् प्रकट हो जाते हैं, साँप भी रस्सी बन जाती है। श्रद्धा के आधार पर न जाने क्या-क्या हो जाता है। अगर आप किसी मंत्र, जप,उपासना पर अटूट विश्वास,प्रगाढ़ निष्ठा और श्रद्धा रखते हैं तो मेरा अब तक का अनुभव यही है कि साधक को “चमत्कार” होता दिखना ही चाहिए, उपासना के लाभ सामने आने ही चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा के बिना उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा रहित केवल कर्मकाण्ड ही सम्पन्न किए हैं, केवल जीभ की नोक से जप किए हैं,अँगुलियों से मालाएँ ही घुमाई हैं, बहुत प्रयास के बाद भी ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर सके, विश्वास उत्पन्न न कर सके,ऐसे लोग खाली ही रहेंगे।

2.परिष्कृत व्यक्तित्व(Refined personality):

रिफाइंड ऑयल बनाने के लिए उसकी ब्लीचिंग की जाती है,बदबू निकाली जाती है और सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि रिफाइंड आयल से खाना बनाने पर High temperature पर गर्म करने पर  भी धुँआ पैदा नहीं होता।

उपासना को सफल बनाने के लिए इसी प्रकार की Refining की जरूरत होती है।

परिष्कृत व्यक्तित्व का अर्थ यह है कि जिस प्रकार तेल को केमिकल  प्रक्रियाओं से रिफाइन किया जाता है उसी प्रकार मनुष्य की सामाजिक और आध्यात्मिक प्रक्रियाओं से पिटाई और कुटाई होती है। बार बार पिटाई से समाज इतना कुछ सिखा देता है कि एक चरित्रवान, लोकसेवी, सदाचारी,संयमी व्यक्तित्व का जन्म होता है। इसी रिफाइनिंग की प्रक्रिया से जीवन श्रेष्ठ और समुन्नत होता है। दृष्टि दौड़ा कर देखें तो संसार में ऐसे श्रेष्ठ लोगों को ही सफलताएँ मिली हैं। समाज के High temperature के थपेड़े भी उनका धुआँ नहीं निकाल (संयम) पाए हैं ।

पर क्या करें, मनुष्य कि दृष्टि इतनी संकीर्ण है कि उसे केवल अपना, व्यक्तिगत,अपने आस पास का ही दिखता है, वोह विस्तृत कहां देख पाता  है?

अध्यात्म को समझने,इसका स्वयं लाभ पाने और दूसरों को दे सकने में केवल वही साधक सफल हुए हैं जिन्होंने जप, उपासना के कर्मकाण्डों के साथ अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन,समुन्नत,श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार द्वारा फ्रेम किए गए मानवीय मूल्य इसी रिफाइनिंग प्रक्रिया की रिफ्लेक्शन हैं।

संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करते हैं, उपासना करते हैं, उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी मनुष्य,दुष्ट मनुष्य, नीच,पापी और पतित मनुष्य भगवान का नाम लेकर यदि पार होना चाहें तो पार नहीं हो सकता। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि मनुष्य के व्यक्तित्व में बदलाव हो,विचार  शुद्ध हों।अच्छे विचारों से ही उत्तम व्यक्तित्व निकलते हैं। 

विचार क्रांति अभियान का बेसिक सूत्र ही व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण,समाज निर्माण है। 

यदि किसी व्यक्ति की उपासना उसे  शुद्ध और समुन्नत बनाने में असफल रही है तो समझ लेना चाहिए कि उपासना की विधि में कोई बहुत भारी चीज़ मिसिंग है। राम का नाम तो तोते की तरह रट लिया, पीले कपडे भी पहन लिए,श्रीनाथ-श्रीनाथ का खूब ढिंढोरा पीटा, घण्टियाँ बहुत बजाईं,मालाएँ भी अनेकों जप लीं लेकिन लाभ कुछ न मिला। इसका अर्थ तो साफ यही निकल कर आ रहा है कि कार्यशैली दूषित रही। 

परिष्कृत व्यक्तित्व, मनुष्य की बातचीत में,चाल चलन में यहां तक कि इस मंच से संबंधित लेखनी में भी रिफ्लेक्ट होना चाहिए। बड़े हर्ष एवं गर्व के साथ  कह सकते हैं कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथियों के कमेंट परिष्कृत व्यक्तित्व के साक्षी हैं। इस मंच के लगभग सभी साथिओं का मूल्यांकन उनकी लेखनी से ही हुआ है। ज्ञानप्रसाद लेख पढ़ने,उनका चिंतन करना और कमेंट करना एक Addiction बन चुका है, ठीक उसी तरह जैसे किसी नशेड़ी को नशा न मिलने पर भटकन होती है।  

3.दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं :

उच्चस्तरीय जप और उपासनाएँ तभी सफल होती हैं जब दृष्टिकोण और महत्त्वाकांक्षाएँ ऊँची हों। घटिया उद्देश्य,निकृष्ट कामनाएँ,वासनाएँ लेकर देवताओं का द्वार खटखटाया जाए तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों को जानने के बजाए उद्देश्य जानने की कोशिश करते हैं। अगर परिश्रम को छोड़ कर, सरल और सस्ते तरीके से उद्देश्य पूरा कराने के लिए देवताओं का द्वार खटखटाया जाता है तो देवता समझ जाते हैं कि यह कोई स्वार्थी मनुष्य है और स्वार्थ पूरा करने के लिए सहायता चाहता है। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन उससे पहले सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी  सहायता का उपयोग कहाँ और कैसे किया जाएगा। ऊँचे उद्देश्यों के लिए देवताओं ने हमेशा ही  सहायता की है।

मंत्रशक्ति और भगवान की शक्ति केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित रही है, जिनका दृष्टिकोण ऊँचा रहा है। जिन्होंने किसी अच्छे काम के लिए, ऊँचे काम के लिए भगवान की सेवा और सहायता चाही है, उनको बराबर सेवा और सहायता मिली है। 

गुरुदेव बता रहे हैं कि हमने इन तीनों सूत्रों का प्राणपण से पालन किया और हमारी गायत्री उपासना में प्राण-संचार होता चला गया। इसी प्राण-संचार से हर कोई हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है। गुरुदेव ने चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण किए। 

“एक वर्ष में 24 लाख गायत्रीमंत्र का अर्थ है एक दिन में लगभग 6500 मंत्र, 60 मालाएं।”

हमारी उपासना में जितना कर्मकाण्डों का स्थान है, उससे कहीं अधिक  स्थान इस बात का  है कि हमने उन तीन बातों को जो आध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश की है। गायत्री माता के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा रख कर ही परिणाम पाया है। जहाँ तक संभव हुआ व्यक्तित्व को भी परिष्कृत करने की पूरी कोशिश की है। भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उसमें किसी तरह से कमी न आने पावे, उसमें पूरी-पूरी सावधानी बरतते रहे हैं। अपने आपको धोबी के तरीके से धोने में और धुनिए के तरीके से धुनने में हमने आनकानी नहीं की। 

हमारी उपासना को फलित और चमत्कृत बनाने का यह एक बहुत बड़ा कारण रहा है। उद्देश्य हमेशा से ऊँचा रहे, उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा। पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिए, देश-धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं,अनुष्ठान करते हैं, भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान ने हमारी नीयत समझ ली। भागीरथ की नीयत को देखकर गंगाजी स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गई थीं और शंकर भगवान् उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गए थे। हमारे सम्बन्ध में भी वैसा ही हुआ। ऊँचे उद्देश्यों को सामने रख करके चले तो दैवी-शक्तियों की भरपूर सहायता मिली। केवल बीज बोना ही सार्थक नहीं है,इतने से ही फसल नहीं आ सकती। जिस प्रकार बन्दुक से निशाना लगाने के लिए बन्दुक,कारतूस और अभ्यास चाहिए,मूर्ति बनाने के लिए पत्थर,छैनी-हथोड़ा और कलाकारिता चाहिए,लेखन के लिए कागज़,कलम-स्याही,शिक्षा एवं अनुभव चाहिए,ठीक उसी प्रकार  उपासना के चमत्कार देखने के लिए श्रद्धा,परिष्कृत व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं होनी चाहिए। गायत्री को कामधेनु कहा जाता है, गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है,गायत्री को पारस कहा जाता है, गायत्री को अमृत भी कहा जाता है। यह सब सही है लेकिन सही उसी हालत में हैं जब गायत्री रूपी कामधेनु को चारा खिलाया जाए, पानी पिलाया जाए, उसकी रखवाली की जाए। गाय को चारा खिलाएँ नहीं और दूध पीना चाहें, यह कैसे सम्भव होगा? पानी पिलाएँ नहीं, ठंड से उसका बचाव करें नहीं, तो कैसे सम्भव होगा? गाय दूध देती है, यह सही है, लेकिन साथ-साथ में यह भी सही है कि इसको परिपुष्ट करने के लिए गाय की सेवा भी करनी पड़ेगी।

धन्यवाद्, जय गुरुदेव


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