वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का पांचवां लेख-गायत्री मंत्र के ज्ञान पक्ष की अति सरल व्याख्या,पहला भाग

सभी साथिओं को हम ह्रदय से  बधाई देते हैं कि कल वाले लेख को फेसबुक पर 35000 लोगों ने देखा और 115 लोगों ने कमेंट किए।  

परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचा गया दिव्य साहित्य इतना विस्तृत है कि उसे समझने और स्वाध्याय के लिए अनेकों जन्म चाहिए।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का सदैव प्रयास रहता है कि इस साहित्य को इतना सरल बनाया जाए कि अधिक से अधिक पाठक इसका लाभ उठा सकें।

वर्तमान लेख श्रृंखला में गायत्री मंत्र के वैज्ञानिक एवं ज्ञान पक्ष को समझने का प्रयास किया जा रहा है क्योंकि यदि किसी ज्ञान का समझ कर अभ्यास किया जाए तो परिणाम अनेकों गुना होता है।

कल वाले लेख में गायत्री साधना के वैज्ञानिक पक्ष पर चर्चा की गई थी,अब ज्ञान पक्ष की बात होगी।

ज्ञान पक्ष के लिए गुरुदेव निम्नलिखित  तीन-तीन धाराओं की बात करते हैं   

1.आस्तिकता, 2.आध्यमिकता,3. धार्मिकता

1.श्रद्धा, 2.परिष्कृत व्यक्तित्व, 3.दृष्टिकोण और महत्वकांक्षाएं

गुरुदेव अपने अनुभव से बता रहे हैं कि जो कोई भी इन पक्षों को  प्राप्त कर सकता हो, गायत्री मंत्र की कृपा से निहाल हो  सकता है और ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त करके इसी लोक में स्वर्ग और मुक्ति का अधिकारी बन सकता है।

आज के लेख में पहले तीन पॉइंट्स पर चर्चा होगी लेकिन उससे पहले गायत्री मंत्र को गुरुमंत्र कहने का कारण जानना उचित रहेगी।

सनातन धर्म और वैदिक परंपराओं में गायत्री मंत्र को ही सबसे प्रमुख “गुरुमंत्र” माना जाता है। 

प्राचीन काल से ही जब किसी शिष्य को गुरु दीक्षा दी जाती है या उसका यज्ञोपवीत (जनेऊ संस्कार) होता है, तो गुरु उसे सबसे पहला मंत्र गायत्री मंत्र ही देते हैं।

इस मंत्र के माध्यम से गुरु अपने शिष्य को सांसारिक विद्या के साथ-साथ ईश्वर से “सद्बुद्धि” प्राप्त करने का मार्ग दिखाते हैं।

इस मंत्र को वेदों का सार और सबसे शक्तिशाली बीज (Seed) मंत्र माना गया है, इसलिए माँ गायत्री को “वेदमाता” भी कहते हैं।

परम पूज्य गुरुदेव अपने बारे में बताते हैं:

हमारा सम्पूर्ण जीवन केवल एक ही काम में लगा रहा है और वह है:

भारतीय धर्म और संस्कृति का बीज है,गायत्री मंत्र। इस छोटे से 24 अक्षरों के मंत्र में वह ज्ञान और विज्ञान भरा हुआ पड़ा है, जिसके विस्तार में भारतीय तत्त्वज्ञान और भारतीय नेतृत्व विज्ञान दोनों को खड़ा किया गया है। ब्रह्माजी ने चार मुखों से गायत्री का व्याख्यान चार वेदों के रूप में किया। वेदों के ज्ञान से अनेकों अन्य धर्मग्रंथ बने। हम चाहें तो समस्त  ज्ञान की मूल जड़ गायत्री मंत्र में देख सकते हैं। इसीलिए गायत्री मंत्र का  नाम गुरुमंत्र रखा गया है, बीजमंत्र रखा गया है। 

हमारा विश्वास है  कि सारे भारतीय धर्म और विज्ञान को समझने से बेहतर है कि धर्म के बीज (गायत्री मंत्र) को ही समझा जाए। जिस प्रकार मुनि विश्वामित्र ने घोर तप करके गायत्री मंत्र के रहस्य को जानने का प्रयत्न किया ठीक उसी प्रकार हमारा पूरा जीवन इसको जानने में लग गया। हमने इस मंत्र का स्वयं अपने ऊपर परिक्षण किया और जो परिणाम प्राप्त हुए उसे अपने साहित्य  के माध्यम से सार्वजानिक किया। जीवन के जो बचे हुए दिन हैं, उनमें भी हमारा प्रयत्न यही रहेगा कि हम इसी की शोध, अन्वेषण और परीक्षण में अपनी बची हुई जिंदगी लगा दें। 

परम पूज्य गुरुदेव बताते हैं  कि गायत्री के तीन चरणों  में तीन शिक्षाएँ भरी हैं और ये तीनों शिक्षाएँ ऐसी हैं कि अगर मनुष्य उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन में समाविष्ट कर सके तो धर्म और अध्यात्म का सारे का सारा रहस्य और तत्त्वज्ञान उसके जीवन में समाविष्ट होना सम्भव है। त्रिपदा गायत्री के तीन ज्ञान पक्ष हैं: आस्तिकता, आध्यात्मिकता और  धार्मिकता। इन तीनों को मिला कर त्रिवेणी संगम बन जाता है। आइये इन तीनों के महत्व को जानने का प्रयास करें:

1.आस्तिकता:

गायत्री मंत्र  का प्रथम ज्ञानचरण है आस्तिकता। आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर में विश्वास। भजन-पूजन तो लगभग सभी कर लेते हैं लेकिन ईश्वर-विश्वास का अर्थ यह है कि सर्वत्र जो भगवान समाया हुआ है, उसके सम्बन्ध में यह दृष्टि रखें कि उसका न्याय का पक्ष, कर्म फल देने वाला पक्ष इतना समर्थ है कि उसका कोई बीच-बचाव हो ही नहीं सकता। भगवान सर्वव्यापी है, सर्वत्र है, सबको देखते हैं, अगर यह विश्वास हमारे भीतर स्थापित हो तो मनुष्य के लिए पाप कर्म करना सम्भव नहीं होगा। हम हर जगह भगवान को देखेंगे और समझेंगे कि उनका  न्याय एवं उस न्याय की निष्पक्षता हमेशा शाश्वत रही है। इसलिए आस्तिक का, ईश्वर-विश्वासी का पहला

क्रियाकलाप यह होना चाहिए कि  कर्म का फल मिल कर ही रहेगा, इसलिए भगवान से डरने के इलावा अन्य कोई विकल्प है ही नहीं। जो मनुष्य भगवान से डरता है, उसको संसार में अन्य किसी से डरने की जरूरत नहीं होती। आस्तिकता ही चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा का मूल है। आस्तिकता का अंकुश हर इंसान  को ईमानदार बनने के लिए,अच्छा बनने के लिए प्रेरणा देता है,प्रकाश देता है।

ईश्वर की उपासना का अर्थ है ईश्वर जैसा महान बनने के लिए प्रयास करना,स्वयं को ईश्वर के साथ मिलाना। यह “विराट् विश्व” भगवान का ही रूप है और हम इसकी सेवा करें, सहायता करें और इस विश्व-उद्यान को समुन्नत बनाने की हर संभव कोशिश करें, क्योंकि हर जगह भगवान समाये हुए हैं। सर्वत्र भगवान विद्यमान हैं,यह भावना रखने से ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ (अपनी तरह सबको देखना) की भावना  पैदा होती है। जिस प्रकार  गंगा  अपना समर्पण व्यक्त करने के लिए समुद्र की ओर चल पड़ती है ठीक उसी प्रकार  आस्तिक व्यक्ति, ईश्वर का विश्वासी व्यक्ति स्वयं को भगवान में समर्पित करने के लिए इस विश्वरुपी सागर में विलय होने का प्रयास करता है। ऐसा करते ही भगवान की इच्छाएँ मुख्य हो जाती हैं। ईश्वर के संदेश, ईश्वर की आज्ञाएँ ही मनुष्य के लिए सब कुछ होनी चाहिए। हमें अपनी इच्छा भगवान पर थोपने की अपेक्षा, भगवान की इच्छा को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। 

पूजा स्थली में मनुष्य भगवान पर अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए तरह-तरह की मांगें करता है,भगवान को उलाहने देता है,यहाँ तक की डांट भी देता है। लेकिन समर्पण के बाद भगवान को कहता है “तेरा तुझको अर्पण,क्या लागे मेरा।”

आस्तिकता के यह बीज हमारे अन्दर जमे हुए हों तो जिस तरीके से वृक्ष से लिपटकर बेल उतनी ही ऊँची हो जाती है जितना कि ऊँचा वृक्ष, उसी प्रकार भगवान से लिपट कर हम भगवान  की ऊँचाई के बराबर ऊँचे चढ़ सकते हैं। जिस प्रकार पतंग अपनी डोरी बच्चे के हाथ में थमाकर आसमान में ऊँचे उड़ती जाती है,कठपुतली के धागे बाजीगर के हाथ में बँधे रहने से कठपुतली अच्छे से अच्छा नाच-तमाशा दिखाती है, उसी प्रकार  ईश्वर का विश्वास,ईश्वर की आस्था  स्वीकारने से,अपने जीवन की दिशा-धाराएँ भगवान के हाथ में सौंप देने से हमारा जीवन उच्चस्तरीय बन सकता है और हम इस लोक में शांति और परलोक में सद्गति प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं।

2.आध्यात्मिकता :

गायत्री मंत्र का दूसरा ज्ञानचरण है आध्यात्मिकता। आध्यात्मिकता का अर्थ होता है-आत्मबोध,स्वयं का बोध, स्वयं को जानना। अपनेआप को न जानने से हम बाहर भटकते रहते हैं। कई अच्छी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, अपने दुःखों का कारण बाहर तलाशते फिरते हैं। हम जानते ही नहीं कि हमारी मनःस्थिति के कारण ही हमारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अगर हम यह जान लें तो अवश्य ही स्वयं को सुधारना सरल हो जाएगा। स्वर्ग-नर्क हमारे भीतर ही हैं। हम अपने ही भीतर स्वर्ग दबाए हुए हैं,अपने ही भीतर नर्क दबाए हुए हैं। हमारी मनःस्थिति के आधार पर ही परिस्थितियाँ बनती हैं। हिरण चारों तरफ कस्तूरी की खुशबू की तलाश करता फिरता था, लेकिन जब उसको पता चला कि वह तो नाभि में ही है,तब उसने इधर-उधर भटकना त्याग दिया और अपने भीतर ही ढूँढ़ने लगा।

फूल जब खिलता है तब भौंरे आते ही हैं, तितलियाँ भी आती हैं। बादल बरसते तो हैं लेकिन जिसके आँगन में जितना पात्र होता है, उतना ही पानी देकर जाते हैं। चट्टानों के ऊपर बादल बरसते रहते हैं,लेकिन घास का एक भी  तिनका  पैदा नहीं होता। छात्रवृत्ति उन्हीं को मिलती है जो अच्छे नंबर से पास होते हैं। संसार में सौंदर्य तो बहुत हैं,लेकिन देखने के लिए आँख भी तो होनी चाहिए। संगीत-गायन तो बहुत हैं,शब्द बहुत हैं, लेकिन सुनने के लिए कान भी तो हों। ज्ञान-विज्ञान तो बहुत है, लेकिन  मस्तिष्क न हो तो उसका क्या मतलब? ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है,जो अपनी सहायता आप करते हैं। इसलिए आध्यात्मिकता का संदेश है कि हर मनुष्य को अपनेआप को पहचानने का,समझने का,सुधारने का भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। अपनेआप को हम जितना सुधार लेते हैं, उतनी ही परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनती चली जाती हैं,कुछ भी बुरा, गलत नहीं दिखेगा, तभी तो कहते हैं:नज़रें बदलते ही नज़ारा बदल जाता है।

3.धार्मिकता:

गायत्री मंत्र  का तीसरा चरण है धार्मिकता। धार्मिकता का अर्थ होता है,कर्तव्यपरायणता, कर्तव्यों का पालन करना। मनुष्य और पशु में केवल इतना ही अन्तर है कि पशु किसी मर्यादा से बँधा हुआ नहीं है। मनुष्य के ऊपर लाखों मर्यादाएँ और नैतिक नियम बाँधे गए हैं, जिम्मेदारियाँ लादी गईं हैं। ज़िम्मेदारियों को, कर्तव्यों को पूरा करना मनुष्य का कर्तव्य है। शरीर के प्रति हमारा कर्तव्य है कि हम इसे  निरोग रखें। मस्तिष्क के प्रति हमारा कर्तव्य है कि इसमें नेगेटिव विचारों को न आने दें, यानि इसको भी निरोग रखें,स्वस्थ रखें। पॉजिटिव विचार हमारे मस्तिष्क का सबसे अधिक पोषण करते हैं। हमें अच्छी नींद आती है,हम हर समय ऊर्जावान  रहते हैं और कर्तव्यों का पालन करते हैं। अगर हम सद्गुणी होंगें तो ही परिवार को,समाज को सद्गुणी बना सकते हैं । देश,धर्म,समाज और संस्कृति के प्रति हमारा कर्तव्य है कि उन्हें भी समुन्नत बनाने के लिए भरपूर ध्यान रखें। लोभ और मोह से अपनेआप को छुड़ा कर जीवात्मा का उद्धार करना भी हमारा कर्तव्य है। भगवान ने जिस काम के लिए हमको इस संसार में भेजा है, जिस काम के लिए मनुष्य योनि में जन्म दिया है, उस काम को पूरा करना भी हमारा कर्तव्य है। धार्मिकता के लिए  इन सारे  कर्तव्यों का पालन करना हमारा दाइत्व है।

उपरोक्त सारी व्याख्या में गुरुदेव का मार्गदर्शन मिल रहा है उसी को आगे बढ़ाते हुए गुरुदेव कह रहे हैं कि हमने अपने सारे जीवन में गायत्री मंत्र के बारे में जितना भी विचार किया, शास्त्रों को पढ़ा, सत्संग किया, चिंतन-मनन किया, उसका सारांश यह निकला कि 

जय गुरुदेव 

ज्ञान पक्ष के दूसरे तीन पॉइंट्स की चर्चा कल होगी।


Leave a comment