वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का चौथा लेख- गायत्री मंत्र के वैज्ञानिक पक्ष पर कुछ और बेसिक जानकारी  

आज के लेख में गायत्री मंत्र के “ज्ञान पक्ष” और “विज्ञान पक्ष” के अंतर् को समझने का प्रयास किया गया। इस अंतर् को समझने के लिए, सरल बनाने के लिए, जिन-जिन रिसर्च पेपर्स की सहायता ली गयी है उनका विवरण देना हमारे लिए असंभव है। उद्देश्य केवल एक ही है: गायत्री उपसना समझ कर की जाए न कि अन्धविश्वास के साथ। जब हम सविता देवता को प्रार्थना करते हैं कि हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें, हमें सद्बुद्धि प्रदान करें तो हमारा शरीर कैसे Respond करता है और हम क्या अनुभव करते हैं। सूर्य की शक्ति अपने अंदर धारण करने की क्या वैज्ञानिक प्रक्रिया है, आज का लेख इन छोटे-छोटे महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देरहा है। 

हमारा विश्वास है कि हमारा प्रयास साथिओं के लिए लाभदायक सिद्ध होगा। 

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गायत्री मंत्र में “ज्ञान पक्ष” का संबंध आत्मिक उन्नति, बुद्धि के विकास और सत्य की अनुभूति से है, जबकि “विज्ञान पक्ष” का संबंध मंत्र की ध्वनि तरंगों के शारीरिक, मानसिक और भौतिक प्रभावों से है।

ज्ञान पक्ष (आध्यात्मिक और बौद्धिक पहलू) हमें ईश्वर (सविता/सूर्य) के दिव्य प्रकाश का ध्यान करने और हमारी बुद्धि (प्रज्ञा) को सही मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना सिखाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय करना, अंतरात्मा का परिष्कार (शुद्धिकरण) करना और परम शांति या मुक्ति प्राप्त करना है। ज्ञान पक्ष हमें जीवन के परम सत्य, सदाचार और सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। विज्ञान पक्ष (भौतिक और शारीरिक पहलू) ध्वनि और कंपन (Acoustics) से सम्बंधित है।  गायत्री मंत्र के 24  अक्षरों का उच्चारण शरीर की 24  ग्रंथियों (Endocrine glands) और ऊर्जा केंद्रों (Chakras) को प्रभावित करता है। इसके लयबद्ध जाप से मस्तिष्क के केंद्र (जैसे हाइपोथैलेमस) सक्रिय होते हैं, जिससे स्ट्रेस  कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है, और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह विज्ञान की तरह कार्य करता है, जो मनुष्य के भौतिक जीवन को सुखी, निरोगी और समृद्ध बनाने में मदद करता है। 

संक्षेप में कहें तो, गायत्री मंत्र का ज्ञान पक्ष हमें “सत्य और सद्बुद्धि” देता है, जबकि इसका विज्ञान पक्ष उस ज्ञान को धारण करने के लिए “शारीरिक और मानसिक ऊर्जा व क्षमता” प्रदान करता है।

“गायत्री”, भगवान का नारी रूप है। माता के रूप में भगवान् की उपासना करने से, उच्चारण किये शब्द  कुएं की आवाज़ की तरह हमारे पास वापिस गुंजन करते हैं, Echo करते हैं। गायत्री को “भूलोक की कामधेनु” कहा गया है। गायत्री को ‘सुधा’ भी कहा गया है, क्योंकि वह  जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से परिपूर्ण हैं। गायत्री को ‘पारसमणि’ कहा गया है, क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अंत:करणों का शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को ‘कल्पवृक्ष’ कहा गया है, क्योंकि इसकी छाया में बैठकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिए उचित एवं आवश्यक है। श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का आंचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणपरक होता है। गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है, क्योंकि गायत्री साधना किसी की भी निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता है।

लेकिन यह सभी लाभ तभी सम्भव हैं यदि गायत्री मंत्र से ज्ञान पक्ष के समझा जाए, उनका पालन किया जाए। 

गायत्री मंत्र  का अर्थ है उस परम सत्ता की महानता की स्तुति जिसने इस ब्रह्माण्ड को रचा है । यह मंत्र  उस ईश्वरीय सत्ता की स्तुति है जो इस संसार में ज्ञान और जीवन का स्त्रोत है, जो अँधेरे से प्रकाश का पथ दिखाती है। गायत्री मंत्र लोकप्रिय यूनिवर्सल मंत्र के रूप में जाना जाता है। यह  मंत्र किसी भी धर्म या एक देश के लिए नहीं है, यह पूरे ब्रह्मांड के अंतर्गत आता है। यह अज्ञान को हटा कर ज्ञान प्राप्ति की स्तुति है । 

“मंत्र  विज्ञान” के ज्ञाता अच्छी तरह से जानते हैं कि मनुष्य द्वारा बोले गए शब्द, मुख के विभिन्न अंगों जैसे जिह्वा, गला, दांत, होठ और जिह्वा के मूलाधार की सहायता से उच्चारित होते हैं । शब्द उच्चारण के समय मुख की सूक्ष्म ग्रंथियों और तंत्रिकाओं में खिंचाव उत्पन्न होता है जो शरीर के विभिन्न अंगों से जुडी हुई हैं । योगी इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि मानव शरीर में सैंकड़ों  दृश्य-अदृश्य ग्रंथियां(Glands) होती हैं  जिनमें  अलग-अलग प्रकार की अपरिमित उर्जा छिपी है। अतः मुख से उच्चारित हर अच्छे और बुरे शब्द का प्रभाव अपने ही शरीर पर पड़ता है । पवित्र वैदिक मंत्रो को मनुष्य के आत्मोत्थान के लिए इन्हीं  नाड़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार रचा गया है। 

हम यह भी जानते हैं कि मनुष्य शरीर में सात उर्जा बिंदु( Energy points ) हैं: मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहद चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र एवं सहस्त्रार चक्र।  ये सभी सुषुम्ना नाड़ी से जुड़े हुए है । गायत्री मंत्र  में 24  अक्षर हैं जो शरीर की 24 अलग-अलग ग्रंथियों को प्रभावित करते हैं। गायत्री मंत्र  के उच्चारण से मानव शरीर के 24  बिन्दुओं पर एक सितार जैसा  कम्पन होता है जिनसे उत्पन्न ध्वनि  तरंगे ब्रह्माण्ड में जाकर पुनः हमारे शरीर में लौटती है जिसका सुप्रभाव और अनुभूति दिव्य व अलौकिक है। 

ॐ की शब्द ध्वनि को “ब्रह्म” माना गया है । ॐ के उच्चारण  की ध्वनि  तरंगे संसार को, एवं 3  अन्य तरंगें  सत, रज और तमोगुण क्रमशः ह्रीं श्रीं और क्लीं पर अपना प्रभाव डालती हैं।

गायत्री मंत्र  के 24  अक्षरों का संयोजन और रचना सकारात्मक उर्जा और परम प्रभु को मानव शरीर से जोड़ने और आत्मा की शुद्धि और बल के लिए रचा गया है । गायत्री मंत्र  से निकली तरंगे ब्रह्माण्ड में जाकर बहुत से दिव्य और शक्तिशाली अणुओं और तत्वों को आकर्षित करके उनके साथ जुड़ जाती  हैं और फिर पुनः अपने उदगम पर  लौट आती है जिससे मानव शरीर दिव्यता और परलौकिक सुख से भर जाता है । ब्रह्माण्ड और मानव के मन को शुद्ध करने की यही मंत्र प्रक्रिया है। दिव्य गायत्री मंत्र  की वैदिक स्वर रचना के प्रभाव से जीवन में स्थायी सुख मिलता है और आसुरी  शक्तियों का विनाश होने लगता है । गायत्री मंत्र  जाप से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। गायत्री मंत्र  से जब आध्यात्मिक और आतंरिक शक्तियों का संवर्धन होता है तो जीवन की समस्याए सुलझने लगती है,जीवन  सरल होने लगता है । हमारे शरीर में सात चक्र और 72000 नाड़ियाँ है, हर एक नाड़ी  मुख से जुडी हुई है और मुख से निकला हुआ हर शब्द इन नाड़ियों पर प्रभाव डालता है । 

गायत्री महामंत्र का देवता सविता या सूर्य है। गायत्री मंत्र  की शक्ति सूर्य पर ही निर्भर है। गर्मी, प्रकाश और रेडिएशन सूर्य की स्थूल शक्ति है इसके अलावा समस्त प्राणियों की उत्पति, पोषण और अभिवर्धन करने की जीवनी-शक्ति उसकी सूक्ष्म शक्ति है।

आध्यात्म विज्ञान में “प्रकाश की साधना और प्रकाश की याचना” की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश किसी बल्ब, बत्ती, दीपक,सूर्य या चन्द्र से निकलने वाला प्रकाश नहीं बल्कि परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना बन कर जगमगा रही है। गायत्री के उपास्य सविता भी इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतंभरा (metaphysical) प्रतीक के रूप में सृष्टि के कण-कण में हैं। जिस मनुष्य के अंदर जितनी ऋतंभरा की मात्रा होगी, उसमें उतना ही दिव्य अंश आलोकित होगा।

हमारे बुज़ुर्ग अँधेरा होते ही जब लाइट ऑन करते थे तो हाथ जोड़कर नमन करते थे, याचना करते थे क्योंकि वोह बल्ब के प्रकाश को परम ज्योति का प्रतीक मानते थे।   

गायत्री महामंत्र का देवता सूर्य महाप्राण है जो जड़ जगत में परमाणु और चेतन जगत में चेतना बन कर तरंगित है। सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वला महाप्राण ईश्वर  का वह अंश है जिससे इस अखिल सृष्टि का संचालन होता है।

सूर्य का सूक्ष्म प्रभाव शरीर  के इलावा मन और बुद्धि को भी प्रभावित करता है। इसीलिए गायत्री मंत्र द्वारा बुद्धि को सत्मार्ग की ओर  प्रेरित करने की प्रार्थना सूर्य से की जाती है।

गायत्री मंत्र एक महामंत्र है जो प्रत्येक मंत्र जप रहे साधक और मंत्र के अधिष्ठाता  सूर्यदेव  के मध्य एक अदृश्य सेतु का कार्य करता है। जब हम गायत्री मंत्र का क्रमबद्ध, लयबद्ध और वृताकार क्रम से जाप करते हैं तो ब्रह्माण्ड और मनुष्य के माध्यम में एक विशिष्ट प्रकार की असाधारण तरंगें उठती हैं जो स्प्रिंगनुमा पथ (Spiral -Circulatory path) का अनुगमन करती हुई सूर्य तक पहुँचती हैं और उसकी प्रतिध्वनि( Echo,गूँज)  BOOMERANG या प्रत्यावर्ती – बाण के पथ के समान  लौटते समय सूर्य की दिव्यता, प्रकाश, तेज, ताप और अन्य आलोकिक गुणों से युक्त होती हैं और साधक को इन दिव्य अणुओं से भर देती है।  

गायत्री मंत्र  द्वारा हम अपने अन्दर के काले, मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य, तेजस्वी, सदाचरण, शांति और प्रसन्नता  की वृद्धि करने वाले मानव-अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्व, पिंड या गृह-नक्षत्र की सांझेदारी होती है। जैसे गायत्री मंत्र  की उपासना से हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणु को हटाने और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भरने का माध्यम गायत्री का देवता सविता अर्थात सूर्य होता है।

सूर्य परब्रह्म की प्रत्यक्ष प्रतीक प्रतिमा है। यह जड़ और और चेतन के अस्तितिव को बनाये रखता है। पञ्च प्राण उसी से आते है। उसकी आराधना से हम अपने आन्तरिक चुम्बकत्व संकल्प शक्ति से अभिष्ट मात्र में अभिष्ट स्तर के प्राण आकर्षित और धारण कर सकते हैं।

गायत्री उपासना से सूर्य के विद्युत-चुम्बकीय प्रवाह से पीनल ग्रंथि (Pineal gland) का सम्बन्ध जुड़ जाता है और सूर्य तेज के कण हमारे शरीर में प्रवेश करते चले जातें है | इस प्रकार प्राण शरीर विकसित होता  जाता है और सूर्य प्रकाश के समान  हल्का, दिव्य और तेजस्वी होता जाता है।

सबसे पहले भ्रूमध्य यानि दोनों भोहों के बीच प्रकाश का अनुभव होता है  । कुछ समय बाद व्यक्ति की नींद और भूख में क्रमशः कमी आना शुरू होती। मन स्वतः ही शांत होता है। लम्बे समय के जाप के बाद स्वर, दोनों नाड़िओं इड़ा  और पिंगला का साथ-साथ चलते हैं। गायत्री मंत्र  द्वारा विचार संशोधन और भावनात्मक परिष्कार होता है |

स्थूल शरीर में सूर्य की किरणें आरोग्य, तेज, बल ,स्फूर्ति,ओज, उत्साह, आयुष पुरषार्थ बलवर्धन करती हैं। शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंग सविता की किरणों द्वारा लाभान्वित होते हैं। सभी परिपुष्ट और क्रियाशील बनतें हैं। 

सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) में सूर्य की किरणों के प्रवेश से बुद्धि, वैभव और प्रज्ञा, उत्साह,स्फूर्ति,प्रफुल्लता,साहस,एकाग्रता,स्थिरता,धेर्य,संयम अनुदान की वर्षा होती  है।

कारण शरीर यानि ह्रदय में भावना, श्रद्धा, त्याग, तपस्या, श्रद्धा, प्रेम, उपकार, विवेक,दया और विश्वास और सद्भावना की वृद्धि होती है।

जैसे गाय सब पशुओं में, गंगा सब नदियों में, तुलसी सब औषधियों में विशेष लाभकारी है वैसे ही गायत्री शक्ति समस्त ईश्वरीय देव-शक्तियों में अधिक उपयोगी है।

यद्धपि किसी भी मंत्र  की शक्ति को न्यून तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन “महामंत्र गायत्री” के लिए यह कहना पड़ता है कि  यह सर्वोपरी मंत्र  विपुल शक्ति संपन्न है, अपने में एक विशेष विलक्षणता रखता है।

जय गुरुदेव 


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