वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का तीसरा लेख- गायत्री मंत्र का अति सरल विज्ञान

कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में जानने और समझने के लिए इतना कुछ था कि ज्ञान के भवंडर से निकलना कठिन हो सकता था लेकिन हमारे अनेकों साथिओं ने कमेंट करके अद्भुत ज्ञान को और भी सरल बना दिया। ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं। 

विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण बार-बार यही जिज्ञासा उठती रहती है कि जो हम लिख रहे हैं क्या यह सच में सही है? कहीं कोई भ्र्म तो नहीं है? क्योंकि बिना जाने, टेस्ट किये ली गयी दवा घातक भी सिद्ध हो सकती है। 

गायत्री मंत्र की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रमाणिकता  को समझने की जिज्ञासा को शांत करने के लिए ही आज का ज्ञानप्रसाद लेख एवं अगले दो ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किये जा रहे हैं। 

आज के लेख में “गायत्री मंत्र की वैज्ञानिक व्याख्या” को समझने के लिए बहुत ही बेसिक लेवल के विज्ञान का प्रयोग किया गया है। युग निर्माण योजना नवंबर 2020 के अंक में प्रकाशित लेख पर आधरित आज का ज्ञानप्रसाद अनेकों पाठकों का मार्गदर्शन कर सकता है। 

आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में समर्पित होकर आज के  गुरुज्ञान का अमृतपान करें 

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आज के लेख के एक-एक अक्षर पर चिंतन मनन करने की आवश्यकता है। अगर हम ऐसा कर पाए तो गायत्री महामंत्र के प्रतक्ष्य परिणाम देखने में अधिक समय नहीं लगेगा 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के लगभग सभी साथी माँ गायत्री के उपासक हैं और सभी ने किसी न किसी समय गायत्री मंत्र  का जाप अवश्य किया होगा। गायत्री मंत्र  के विषय को लेकर कितने ही लेख ,पुस्तकें ,वीडियो ,ऑडियो इस समय उपलब्ध है लेकिन फिर भी ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और इसका दिन प्रतिदिन विकास ही होता जाता है। “यह एक अटल सत्य है” जिसको झुठलाना असंभव ही है।

आज के लेख में कुछ बेसिक साइंस के नाम प्रयोग किये गए हैं वैसे तो हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारे पाठक इन सबको जानते ही होंगें लेकिन फिर भी हम सरलता लाने का प्रयास करेंगें।

गायत्री-उपासना द्वारा आत्मसाक्षात्कार (Self-realisation) प्राप्त किया जा सकता है। आत्मसाक्षत्कार काअर्थ होता है, अपने बारे में जानना, जीवात्मा और परमात्मा के सम्बन्ध के बारे में जानना। इस सम्बन्ध को जान लेने के बाद साधक की आत्मिक शक्ति में ऐसी वृद्धि और विकास हो जाता है कि वह महामानव बन सकता है। 

परम पूज्य गुरुदेव का उदाहरण हमारे समक्ष है जिन्होंने अपना समस्त जीवन ही माँ गायत्री के चरणों में समर्पित कर दिया। इस समर्पण में एक अति विशिष्ठ तथ्य यह है कि लोग अक्सर अपने लिए मांगते हैं लेकिन हमारे गुरु ने तो अपने लिए कुछ भी नहीं माँगा। स्वामी विवेकानंद माँ काली के समक्ष बार-बार नतमस्तक हुए लेकिन अपने लिए कुछ भी नहीं मांग पाए। ऐसे ही समर्पण नरेंद्र से विवेकानंद बन पाते हैं, आंवलखेड़ा जैसे गाँव से जन्मा बालक परम पूज्य गुरुदेव बन सकता है।  

आइए विज्ञान की दृष्टि से देखें, परखें की यह दावा कितना सत्य है ?

गायत्री मंत्र भगवान सूर्य भगवान को आमंत्रित करने का,सम्मानपूर्वक बुलाने का मंत्र है। एक बार भगवान् से सम्पर्क स्थापित हो गया, Connectivity establish हो गयी तो गायत्री मंत्र का उच्चारण करते ही,स्थूल सूर्य से (जिसे हम प्रतक्ष्य देख रहे होतें हैं) प्रकाश की एक शक्तिशाली झलक साधक पर पड़ना शुरू हो जाती है। यह कोई ज़रूरी नहीं है कि यह क्रिया सूर्योदय के समय (जब सूर्य दिख रहा है) ही होती हो। समय चाहे मध्याह्न का हो, सूर्यास्त का हो, चाहे आधी रात का हो, जिस दिशा में सूर्य होगा उसी तरफ से झलक आएगी। रात्रि के समय यह झलक पृथ्वी (ग्लोब) को भेदकर आती है। यहाँ यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि घूम तो पृथ्वी रही है, सूर्य तो स्थिर है, एक ही स्थान पर खड़ा है। हैं न बिलकुल ही प्राइमरी कक्षा का ज्ञान ?

सूर्य भगवान से प्राप्त होने वाली यह झलक श्वेतवर्ण (White) की होती है। जब साधक का कनेक्शन बन जाता है तो वह श्वेत झलक इंद्रधनुष के सात रंगों में बाहर निकलती है। Rainbow के सात रंगों से तो हर कोई परिचित है। जप करने वाले के सामने जो कोई होता है उस पर उसका शुभ प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव केवल जप करने वाले के हृदय से ही बाहर नहीं निकलता बल्कि उसकी आभा (Aura) में से भी अर्द्धचंद्र (Half-moon) के आकार में निकलता है। प्रत्येक किरण त्रिकोणाकार और जीवनी-शक्ति (प्राण ऊर्जा) से भरी होती है। उस किरण के सामने जो मनुष्य बैठा हो अथवा सामने से आता हो तो यह किरण उसके हृदय और मस्तक को स्पर्श करती है और इन अंगों के दोनों चक्रों को कुछ समय के लिए जाग्रत करती है। प्रत्येक किरण एक नहीं, अनेक मनुष्यों पर प्रभाव डालने में समर्थ होती है और ऐसी किरणें संख्या में सात (इंद्रधनुष के की सात किरणें) होने के कारण उनका असर अनगिनत मनुष्यों पर पड़ सकता है।

Aura को समझने के लिए हम जलते हुए बल्ब को देख सकते हैं, दीपक को देख सकते हैं यां फिर सूर्य के इर्द गिर्द एक सर्किल (Circle of bright light) देख सकते हैं  और इसे हम कुछ दूर तक अनुभव कर सकते हैं। गुरुदेव के बारे में भी ऐसा सुनने में आया है कि जब लोग गुरुदेव के पास चरण स्पर्श को जाते थे तो एक “अद्भुत तेज़” का अनुभव होता था। इसे ही Aura कहते हैं।

कल वाले लेख में “ओजस,तेजस और वर्चस” की बात हुई थी, इन्हें इंग्लिश में Vitality,Mental clarity और Aura ही कहा जाता है। सभी एनर्जी की ही किस्में हैं।  

विज्ञान बताता है कि “यदि एक साधारण मनुष्य की आभा उसके शरीर से 18 इंच बाहर तक फैलती हो, तो उसकी आभा द्वारा जो किरणें निकलेंगी, उनके नीचे का भाग 9 फीट लंबा और 5 फीट चौड़ा होगा। जिस मनुष्य का अधिक विकास हो चुका है, उसकी आभा यदि हर तरफ 50 गज़ तक फैलती हो, तो उसका प्रभाव क्षेत्र बहुत फैला हुआ  होगा। 

मनुष्य की ऐसी आभा उसकी वासना तथा मानसिक प्रकृति की बनी होती है और उसकी देह में ओत-प्रोत रहती है। यह आभा मस्तक से जितने ऊपर तक जाती है, उतनी ही पैरों के नीचे पृथ्वी के भीतर भी फैलती है। गायत्री मंत्र या कोई और मंत्र  जप करने वाले की आभा जितनी अधिक फैली होगी उसका  उतना ही अधिक प्रभाव पड़ेगा। और उससे भी बड़ी बात यह है कि यदि एक बड़ा समुदाय गायत्री मंत्र (सामूहिक गायत्री मंत्र) का उच्चारण कर रहा हो तो उससे बहुत बड़ी शक्ति (Power) उत्पन्न होती है। इससे मंत्र का उच्चारण करने वाले सब एकरूप हो जाते हैं। इसीलिए सामूहिक यज्ञों और मंत्रोउच्चारण को प्राथमिकता दी जाती रही है। जब सामूहिक मंत्रोउच्चारण होता है तो सभी करने वालों से सात-सात किरणें निकलती हैं। ये किरणें कितने विशाल क्षेत्रफल में फैलेंगी और उनका प्रभाव कितना अधिक होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है।

मॉडर्न साइंस  ने भी यह पता लगा लिया है कि संसार में कोई शब्द या विचार नष्ट नहीं होता। Wave theory के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी बोलता है, सोचता है, वे एक तरंग के रूप में आकाश में फैल जाती है  और हजारों-लाखों वर्ष तक आकाश मंडल (ब्रह्माण्ड) में व्याप्त रहती हैं। इसीलिए कहा जाता है कि हमारे विचार/कथन सकारात्मक होने चाहिएं। नकारात्मक प्रवृतिओं से मनुष्य कैसे ब्रह्माण्ड को दूषित किये जा रहा है, सभी जानते हैं, कोई शंका वाली बात नहीं है। 

आप इस समय आराम से बैठे हैं,स्थिर होकर ज्ञानप्रसाद का अमृतपान कर रहे हैं, उसकी एनर्जी से ऊर्जावान हो रहे हैं ,अचानक किसी फ़ोन काल ने आपको न केवल डिस्टर्ब ही किया बाकि नकरात्मक भी कर दिया। इस अनजान प्राणी को न आपने देखा,न कभी मिले, मीलों दूर बैठे उसने क्या कर दिया कि ज्ञानप्रसाद में विश्वास  को छोड़ आप अपसेट से हो गए। 

इसमें भी कोई शंका नहीं होनी चाहिए,  Energy ही तो है और Law of Conservation of Energy यही तो कहता है। उस प्राणी ने अपनी नेगेटिव एनर्जी आपको दे दी और स्वयं Cool हो गया, उसने पॉजिटिव एनर्जी Gain कर दी। अक्सर कहते हुए सुना गया है: मैंने अपनी सारी Frustration उस पर निकाल दी।    

वैज्ञानिकों ने यहाँ तक कल्पना की है कि हम 2000-4000  वर्ष पुराने समय में कही गई बातों की तरंगों को यंत्र द्वारा फिर से ज्यों-की-त्यों सुनकर उनका रिकॉर्ड बना सकते हैं। वैज्ञानिकों के लिए इस कल्पना को व्यावहारिक रूप देना चाहे अभी असंभव हो,लेकिन  जो भारतीय योगी त्रिकाल की बातें जान लिया करते थे, वे इस शक्ति से संपन्न अवश्य थे। विशुद्धानन्द जी त्रिकालदर्शी थे,इस मंच के एक पूर्वप्रकाशित लेख में हमने देखा ही है उन्होंने गुरुदेव के बारे में कैसी चेतावनी दी थी और हम सबको सतर्क रहने को कहा था। 

तो हम नेगेटिव एनर्जी को पॉजिटिव एनर्जी में चेंज क्यों नहीं करते ?  

यही बात ज्ञान के बारे में भी कही जा सकती है। जिस प्रकार मंत्र की अपनी एनर्जी  है, ज्ञान भी एक प्रकार की एनर्जी ही है। जिसके पास ज्ञान होता है उसकी आभा कुछ अद्भुत ही होती है। इसीलिए कहा गया है कि  ज्ञानी महापुरुष  के पास बैठने से कुछ अद्भुत अनुभव होता है। और जब ज्ञान का विस्तार होता है तो अनेकों का जीवन बदल जाता है। 

बहुत बार कहा जा चुका  है कि ज्ञान ही एक ऐसा धन है जो जितना खर्च करो उतना ही बढ़ता है। मंत्र जाप करने वाले को तो फल मिलता ही है जिसके लिए किया जाता है उसका भी कुछ (?) अंश जाप करने वाले को प्राप्त होता है। हमारे साथी इस प्रथा से भी परिचित ही होंगें कि श्रम और समय से भागने वाले लोग, धन को Show off  करते हुए पंडों से 1 लाख,2 लाख यां करोड़ों के मंत्र करवाते हैं, उन्हें उपरोक्त चर्चा समझनी चाहिए।  

ज्ञान से मनुष्य का अपना परिष्कार तो होता ही है, वितरण से कितने ही और लोग परिष्कृत होते जाते हैं यह हम सब जानते हैं। इसीलिए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक साथी गुरुज्ञान के वितरण के लिए उत्सुक रहता है। उसकी तो आँख भी ज्ञानप्रसाद और उस पर प्रतिक्रिया (कमैंट्स)  से खुलती है। यह एक Chain reaction है। गुरुदेव ने बार-बार ज्ञान प्रसार पर ज़ोर दिया है। यदि 100 परिजनों में गुरूदेव के विचार जाते हैं तो जो विचार पहुंचा रहा है उसे खुद ब खुद ही लाभ मिल रहा है। विश्व कल्याण के साथ उसका भी कल्याण हो रहा है। 

आज के युग में यह कार्य तो बहुत ही सरल हो गया है,केवल कॉपी-पेस्ट, शेयर का बटन ही तो दबाना है। एक गुरुदेव का समय था जब माताजी के साथ, एक-एक के घर जाकर अखंड ज्योति देकर आते थे। फिर कुछ दिन बाद लेने जाते थे, पैदल जाते थे,साइकिल पर जाते थे आदि आदि। आज इंटरनेट के युग में अगर हम कुछ न कर सकें तो हमारी ही कमज़ोरी है,साधन तो पर्याप्त हैं ही।

इति श्री


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