वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

परम पूज्य गुरुदेव की साधना के 100 वर्ष को समर्पित एक दिव्य लेख श्रृंखला का दूसरा लेख- “त्रिपदा गायत्री” को समझने का अति सरल प्रयास 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में यथासंभव प्रयास करके “बहुचर्चित त्रिपदा  गायत्री” के अर्थ को समझने का प्रयास किया गया है। यह एक ऐसा फ़िलॉसफिकल लेख है जिसे समझने के लिए कई प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता है। 

लेख को समझने के लिए इसकी पृष्ठभूमि समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है। 

परम पूज्य गुरुदेव एवं पंडित लीलापत शर्मा जी के संवाद पर आधरित 100 पन्नों की पुस्तक “यज्ञ पिता-गायत्री माता” में 1400 शब्दों का “त्रिपदा गायत्री” शीर्षक से एक चैप्टर उपलब्ध है। आज का ज्ञानप्रसाद लेख इसी चैप्टर पर आधारित है। 

हमारी आदरणीय बहिन संध्या जी ने उत्कृष्ट कला दिखा कर पूरे चैप्टर को मात्र कुछ ही शब्दों में समाहित किया जिसके लिए हम सदैव आभारी रहेंगें।

त्रिपदा गायत्री जैसा विषय इतना विस्तृत और जटिल  है कि इसे समझने के लिए, अंतःकरण में उतारने के लिए अलग-अलग तरह के ज्ञान से (संक्षिप्त सा ही सही) परिचित होना आवश्यक है। हम जैसों के लिए इतना ही पर्याप्त है कि थोड़ा-थोड़ा करके, जितना समझ आता रहे उसका पालन करते हुए आगे बढ़ते जाएँ। औरों की तो बात ही छोड़ दें, केवल गुरुदेव ने ही त्रिपदा गायत्री विषय पर विशाल ग्रंथ लिखा हुआ है। सितम्बर 2021 में हमने इसी विषय पर कुछ लेख लिखे थे जिनका आधार श्रेध्य डॉक्टर प्रणव पंड्या जी की रचना गुरुवर की धरोहर पार्ट 1 था। आज के लेख को समझने के लिए उन लेखों को शामिल करना भी अनुचित नहीं होगा। 

लेख के साथ “त्रिपदा गायत्री” शीर्षक से एक स्लाइड अटैच  की गयी है जिसकी तरफ साथिओं का ध्यान केंद्रित करवाना अपना कर्तव्य समझते हैं।  इस स्लाइड को डिज़ाइन करने में लगभग 10 बार प्रयास करना पड़ा, लेख में वर्णन किये गए  ज्ञान को अधिक से अधिक, पॉइंट फॉर्म में  शामिल करने का प्रयास था। विद्यार्थी जीवन से देखते आ रहे हैं कि विस्तृत एवं कठिन ज्ञान को यदि किसी आकर्षक चित्र में Summarize कर दें तो समझने में बड़ा सहयोग मिल पाता  है। 

आइए इसी भूमिका के साथ ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल में स्थित गुरु मंदिर में गुरुशिष्यों के साथ गुरुचरणों में समर्पित होकर, आज के  गुरुज्ञान का अमृतपान करें। 

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परम पूज्य गुरुदेव ने पंडित लीलपत शर्मा जी के साथ गायत्री महामंत्र पर चर्चा प्रारंभ करते हुए कहा: गायत्री महामंत्र के तीन चरण मिलकर त्रिवेणी संगम बनाते हैं। इसे त्रिपदा (त्रि अर्थात 3 और पाद अर्थात पाँव, चरण) गायत्री कहते हैं । 

तीर्थराज प्रयाग में गंगा,यमुना,सरस्वती की तीन धाराओं का त्रिवेणी संगम है। गोस्वामी तुलसीदास ने निम्नलिखित चौपाई में कहा है कि इस त्रिवेणी संगम में स्नान करने का पुण्यफल तत्काल मिल जाता है: 

गुरुदेव ने पंडित जी से पूछा: 

क्या फल मिलता है ? कौए कोयल हो जाते हैं? बगुले हंस बन जाते हैं? ऐसा कहना केवल अलंकारिक (सजावटी, प्रतीकात्मक) वर्णन है। बेटे ऐसा कहने का  तात्पर्य है कि लोगों की आकृति, रंग-रूप तो ज्यों का त्यों रहती है लेकिन प्रकृति( नेचर) बदल जाती है। 

गायत्री  की त्रिवेणी में स्नान करने से साधक का आध्यात्मिक कायाकल्प होता है। 

गायत्री मंत्र का शुभारंभ ओंकार (ॐ कार) से होता है। 

ॐ में स्थित (ओम-अ,उ,म) तीनों का विस्तार तीन व्याहृतियों के रूप में हुआ है जिन्हें भूः भुवः स्वः के साथ जोड़ा गया है। इन तीनों व्याहृतियों की विवेचना गायत्री के तीन चरणों में हुई है। पाठकों से निवेदन है कि गायत्री महामंत्र के तीनों चरणों को देख लें, देख क्या लें, रट लें:

-पहला चरण: तत् सवितु र्वरेण्यं  जिसका अर्थ है कि  हम उस सृष्टिकर्ता (सूर्य/परमेश्वर) के श्रेष्ठ, दिव्य और प्रकाशमान तेज का वरण  करते हैं।

-दूसरा चरण: भर्गो देवस्य धीमहि जिसका अर्थ है कि हम उस दिव्य प्रकाशमान परमात्मा (देवता) के तेज (भर्ग) का ध्यान करते हैं।

-तीसरा चरण: धियो यो नः प्रचोदयात अर्थात (ईश्वर) हमारी बुद्धि को सन्मार्ग (अच्छे विचारों और कर्मों) की ओर प्रेरित करें।

प्रत्येक चरण में तीन-तीन शब्द हैं, इस प्रकार तीनों के मिलकर नौ शब्द होते हैं जिनका प्रतीक यज्ञोपवीत के नौ धागे हैं।

पंडित जी एक नन्हें बालक की भांति एकदम बोलते हैं: यह तो तीन का पहाड़ा ( Table of 3) हो गया। 

हां बेटे ! तभी तो इसे त्रिपदा गायत्री कहते हैं क्योंकि यह Multiply होता जाता है।

यहां पर तीन की बहुत महिमा है। आइए इस महिमा को समझने का प्रयास करें:

इन तीनों चरणों को  परब्रह्म का निरूपण करते हुए ईश्वर की तीन सर्वोच्च विशेषताओं सत-चित-आनंद के रूप में पुकारा गया। मानव जीवन में इसकी झांकी ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ के रूप में होती है । इसके तत्वज्ञान में यदि और विस्तार से जाएं तो इसे कर्मयोग,ज्ञानयोग, भक्तियोग भी कह सकते हैं। हमारे स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों को पवित्र एवं परिष्कृत बनाने में जिस दृष्टि, नीति और मर्यादा की आवश्यकता है उसी को कर्म,ज्ञान और भक्ति कहते हैं। 

यह तीन की महत्ता यहीं नहीं रुकती। व्यवहार में यह त्रिवेणी धार्मिकता, आध्यात्मिकता और आस्तिकता के रूप में प्रकट होते हैं। अध्यात्म फिलॉसफी के यही तीन खंड हैं।

धार्मिकता का वास्तविक अर्थ कर्तव्य परायणता से भी जुड़ता है। धार्मिकता अर्थात धर्म, कर्म से जुड़ कर एक ही तथ्य के दो नाम हैं। किसी मनुष्य को धर्मनिष्ठ, कर्मयोगी कहें यां कर्त्तव्यपरायण कहें, बात एक ही है लेकिन आधुनिक समय में लोग धर्म की न जाने कैसी-कैसी विचित्र व्याख्या करते हैं कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है। 

अपने लिए श्रेयस्कर मार्ग का चयन करना, विवेकपूर्ण रीति-नीति का निर्धारण करना आध्यात्मिकता है। 

मनुष्य कर्मफल  पर विश्वास करता है। इसका रिजल्ट यही होता है कि मनुष्य का  मन स्वतः ही पाप कर्मों से बचने का प्रयास करता है और सुखी रहने के लिए सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित होता है। भक्ति का सही अर्थ ईश्वर से प्रेम करना होता है। आस्तिक व्यक्ति ईश्वर के  बनाए पदार्थों का सदुपयोग करता है। ईश्वर द्वारा रचे गये सभी प्राणियों के साथ सद्व्यवहार करता है। संक्षेप में कहा जाए तो उदारता, करुणा, दया, सेवा, सहायता जैसी सद्भावनाओं को ही सच्ची भक्ति यानि आस्तिकता कहते हैं ।

समस्त संसार गायत्रीमय है। तीनों लोक इसी की परिधि में आते हैं । त्रिपदा गायत्री की तत्व दृष्टि यही है कि सर्वत्र उसी दिव्य शक्ति को संव्याप्त देखा जाए और संपूर्ण जड़-चेतन सृष्टि के साथ सद्व्यवहार किया जाए। इसे अपनाकर मनुष्य हर घड़ी कण-कण में प्रभु दर्शन का आनंद करता रह सकता है ।

हमारे आगे पीछे, ऊपर नीचे, दाएं बाएं जहां तक भी नज़र जा सकती है, इसी को विराट ब्रह्म ‘भूः भुवः स्वः’ कहा गया है । यही भूलोक पाताललोक और स्वर्गलोक है।

जीव-जगत के क्षेत्र भी तीन हैं:जीव, प्रकृति और ब्रह्म। इनकी संचालन शक्ति भी तीन प्रकार की है: क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और भावशक्ति । गायत्री मंत्र की तीन व्याहृतियों में इसी जीव-चेतना का वर्णन है । शक्तियों का विवेचन करते हुए इन्हीं तीन आधारों को सरस्वती, लक्ष्मी और काली कहते हैं। ये तीनों ही गायत्री महाशक्ति की तीन धाराएं हैं। हमारे तीनों शरीरों में जो प्राणशक्ति दौड़ रही है, वह ओजस, तेजस और वर्चस है । 

आइए ओजस, तेजस और वर्चस के अंतर को समझने का प्रयास करें

शारीरिक सुंदरता, बलिष्ठता, सक्रियता, दक्षता जो हमारे शरीर को प्रतिभासंपन्न एवं आकर्षक बनाता है उसे ओजस कहते हैं। ओजस की कमी से चेहरे पर मुर्दनी  (Deadly) छाई रहती है, आलस्य घेरे रहता है और आधा अधूरा काम भी बड़ी कठिनाई से हो पाता है। 

मानसिक प्रखरता का नाम है तेजस है जो हमारे सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करता है। इस क्षमता से संपन्न व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि, सूझबूझ वाले, दूरदर्शी, विवेकवान होते हैं। 

मनुष्य का कारण शरीर वर्चस से ही प्रकाशित होता है। वर्चस से ही आत्मबल, आत्मतेज बढ़ता है । उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, श्रद्धा, श्रमशीलता जैसी विशेषताएं वर्चस से ही प्रस्फुटित होती हैं।वर्चस ही देवत्व है। 

ओजस-तेजस-वर्चस को प्रदान करके ही त्रिपदा गायत्री अपना अनुग्रह दिखाती है। गायत्री साधना से यही चमत्कार और वरदान  प्राप्त होते हैं, साधक निहाल हो जाता है।

अक्सर लोग गायत्री साधना से चमत्कार ढूंढने की बातें करते देखे गए हैं, चमत्कार कोई जादू की छड़ी की तरह नहीं होते, उनके लिए सभी नियम पालन करते हुए साधना करनी बड़ी आवश्यक है।

पूज्य गुरुदेव ने  वाणी को थोड़ा विश्राम दिया तो पंडित जी अपने को  बोलने से रोक न सके। उन्होंने कौतूहलवश पूछा:

गुरुदेव ! त्रिपदा गायत्री की महिमा तो बहुत व्यापक है, विस्तृत है।यह  तो तीनों लोकों में, कण-कण में व्याप्त दिखाई दे रही है ।

गुरुदेव ने एक बार फिर एक नन्हें बालक की भांति उन्हें शांत करते हुए कहा:

अरे अभी और भी सुनो। हमारे शरीर के तीन भाग है:सिर, धड़ और पैर, इसके पोषण के लिए आहार रूप में हमें अन्न, जल और वायु की आवश्यकता होती है। प्राणियों की प्रकृति भी तीन ही प्रकार की होती है, सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी। प्रकृति का यह त्रिधा अस्तित्व त्रिपदा गायत्री का ही क्रीड़ा क्षेत्र है। इसी त्रिपदा गायत्री से  वेदों की उत्पत्ति हुई है। वेदों का ज्ञान भी तीन प्रकार पर बसा है: विज्ञान,कर्म और उपासना है। यही ज्ञानयोग,कर्मयोग और भक्तियोग है। इनके आधार पर ही हमारी विपत्तियों के तीनों कारण; अशक्ति,अभाव और अज्ञान का निवारण होता है। किसी को “आशक्ति” (शक्तिहीन) की चिंता है, किसी को “अभाव” की चिंता खाए जा रही है तो “अज्ञान” के वशीभूत मनुष्य, जानवरों से भी बदतर हुआ जा रहा है। राजा, महाराज, राजनेता तो बड़े लोग होते हैं, वोह तो शक्तिहीनों का दामन करते ही हैं, साधारण मनुष्य, साधारण से समाज में भी शक्तिशाली कैसे गरीबों का शोषण करते हैं हम सब अक्सर देखते रहते हैं।

विपत्तियां भी तीन प्रकार की होती हैं। आधिभौतिक जो हमारी अनुपयुक्त क्रियाओं एवं अनाचरण से उत्पन्न होती हैं। आधिदैविक जो प्रारब्धवश अप्रत्याशित रूप में दुर्घटनाओं के रूप में आती हैं, उन पर  हमारा कोई वश नहीं होता और  तीसरी आध्यात्मिक विपत्तियां जो मनुष्य के अज्ञान से प्रभावित चिंतन के फलस्वरूप मनोविकारों की प्रतिक्रिया बनकर सामने खड़ी रहती हैं । त्रिपदा गायत्री की दिव्य शक्ति से ही इन तीनों का निवारण संभव होता है। महाकाल के त्रिशूल में भी तीन नोकें हैं। शिव के नेत्र भी तीन हैं। इनमें पाप, ताप और अभिशाप तीनों के विनाश की परिपूर्ण शक्ति है। समय को काल भी कहते हैं, वोह भी तीन प्रकार के होते हैं: भूत, वर्तमान और भविष्य। भूतकाल की संचित, वर्तमान की उपार्जित और भविष्य की संभावित परिस्थितियों को संतुलित बनाने की क्षमता त्रिपदा गायत्री में ही समाहित है। आयु की भी तीन Stages हैं: बचपन, यौवन और बुढ़ापा। इन तीन Stages की परिस्थितियां, समस्याएं और आवश्यकताएं एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं त्रिपदा गायत्री अपनी अनुकंपा से यथासमय उपयुक्त प्रकाश देकर आनंद से परिपूर्ण कर देती है ।

तो बेटे, तू देख रहा है न कि त्रिपदा गायत्री तीन चरण वाली है। तीन शरीर,तीन लोक,तीन गुण,तीन देव,तीन शक्ति, तीन काल के रूप में इसका विस्तार है। 

मनुष्य की परख उसके गुण,कर्म और स्वभाव के आधार पर ही होती है। इसकी उपासना के फल भी तीन हैं: अमृत, पारस और कल्पवृक्ष। ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करते ही मृत पाठक जीवित हो उठता है। पारस को छूते ही लोहा सोना बन जाता है और कल्पवृक्ष की छाँव से तो कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है।

गुणों की त्रिपदा को निष्ठा, प्रज्ञा और श्रद्धा कहा गया है। निष्ठावान व्यक्ति ही कर्तव्य के प्रति जागरूक होता है, दृढ़ता को प्रज्ञा और विवेकशीलता को दूरदर्शिता कहते हैं।

गुरुदेव ने पूछा: देखा बेटे ! इस गायत्री महामंत्र का, त्रिपदा गायत्री का विस्तार कितना व्यापक है।

हां गुरुदेव ! यह सब सुन कर तो हमारे ज्ञानचक्षु ही खुल गए । पंडित जी ने  निवेदन किया ।

हां बेटे ! त्रिपदा गायत्री की विशालता को मापना किसी के बस की बात नहीं है। जो कुछ हमने तुम्हें बताया है वह तो उस शक्तिपुंज का एक अंशमात्र ही है। यह अनेकानेक सूक्ष्म शक्तियों का स्रोत है। गायत्री महाशक्ति के दो रूप हैं। एक ज्ञानपक्ष और  दूसरा विज्ञानपक्ष। ज्ञानपक्ष को उच्चस्तरीय तत्वज्ञान की, ब्रह्मविद्या की ऋतंभरा प्रज्ञा की संज्ञा दी जा सकती है। यह आस्था और आकांक्षा को उच्चस्तरीय बनाने का साधन है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन की गतिविधियां इसी के निमित्त चलती हैं । ज्ञानयज्ञ, विचारक्रांति बौद्धिक उत्कृष्टता के साधन इसी आधार पर जुटते हैं ।

गायत्री का दूसरा पक्ष है विज्ञानपक्ष है। उपासना एवं साधना की अनेक प्रथा-पद्धतियों के रूप में इसका विधान है। यह वह साधन है जिससे मनुष्य अपनी प्रसुप्त चेतना को जगाने,साधने और सदुपयोग करने में समर्थ होता है । 

प्रसुप्त का जागरण(सोए हुओं को जगाना) ही  इसका उद्देश्य है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में इसी पर सारा काम चल रहा है। परम पूज्य गुरुदेव ने 3200 से ऊपर पुस्तकें लिखकर एक विशाल साहित्य की रचना करके हम पर उपकार किया। इस अति सरल साहित्य को समझना तो दूर,पढ़ने के लिए भी अनेकों जन्मों  की आवश्यकता है। इसी साहित्य के छोटे-छोटे भागों को, ज्ञानरथ परिवार के सभी साथी एक दूसरे की सहायता के साथ,समझने का प्रयास कर रहे हैं।

इस साहित्य को समझना भी मनुष्य की महानता को सुधारने, उभारने और उछालने के तीन प्रयोजन पूरा करता है। इसी के सहारे भौतिक प्रगति के अनेक आधार खड़े होते हैं।

परम पूज्य गुरुदेव ने यह कह कर कि बेटे आज तो बहुत समय हो गया। अब कल इस “महामंत्र का अर्थ” समझाएंगे।

हम भी अपनी लेखनी को कल तक के लिए विराम देते हैं।

जय गुरुदेव


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