जब भी हम माह के अंतिम शनिवार को “अपने साथिओं से अपनी बात” के इस विशेष सेगमेंट को लिखने बैठते हैं तो जो हमने सोचा होता है अधिकतर बदल ही जाता है। पूरा माह हम जब-जब,जैसे-जैसे जो-जो विचार आते जाते हैं उन्हें अपनी फाइल में बनाए स्पेशल पृष्ठ पर लिखते रहते हैं। यह विचार कहीं से भी आते रहते हैं, ज्ञानप्रसाद लेख से, सहकारिओं के कमैंट्स से, उन कमैंट्स पर प्राप्त हुए काउंटर कमैंट्स से,व्हाट्सप्प पर प्राप्त हुए किसी विशेष सन्देश से,आदरणीय चिन्मय भैया के किसी उद्बोधन से,किसी साथी के साथ हुई फ़ोन वार्ता से आदि आदि। हम तो कहेंगें की सोते-जागते, चलते-फिरते,खाते-पीते जो भी कोई नया विचार आ गया, भूल जाने के रिस्क का सामना करने के समाधान के लिए एकदम नोट कर लेते हैं क्योंकि स्मरणशक्ति की भी अपनी सीमा है, कुछ ही समय के लिए मस्तिष्क में बनी रहती है, उसके बाद नए विचार उसे नीचे दबा देते हैं। यही कारण है कि यदि किसी से पूछा जाए कि कल नाश्ते में क्या खाया था तो उसे दो बार सोच कर, मस्तिष्क पर दबाब डाल कर कुरेदना पड़ेगा क्योंकि पिछले 24 घंटे में न जाने कितने ही विचार आ जाते हैं। फ़ोन नंबर न याद रह पाना बहुत ही कॉमन हो चुका है।
हर बार की भांति आज भी आगे बढ़ने से पहले इस विशेष सेगमेंट के लिए अपनी नियमित एवं आदरणीय साथी,शब्दों एवं विशेषणों की मलिका, हमारी सबकी प्रिय बहिन सुमनलता जी के सुझाव एवं सभी साथिओं के समर्थन के लिए धन्यवाद् करते हैं। सुझाव एवं समर्थन का ही प्रतिफल है कि माह में केवल एक ही दिन प्रकाशित होने वाले इस सेगमेंट को न केवल सम्मान मिलता है बल्कि प्रेमवश कई दिन पहले से ही इसके प्रकाशन की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है, हम जैसे प्राणी के लिए यह एक बहुत बड़ा इनाम होता है। साथिओं के कमेंट इस तथ्य के साक्षी हैं। हम कहेंगें तो अपनी स्वयं की बढ़ाई होगी,जिससे हम सदैव ही नज़रे चुराते रहते हैं, अपनी सराहना करना अपने DNA में ही नहीं है।
जब हम बहिन सुमनलता जी को शब्दों और विशेषणों की मलिका कह रहे हैं तो ऐसे वैसे नहीं कह रहे हैं। नीचे दी गयी सूची में कुछ एक को छोड़कर,हमारे लिए प्रयोग किये गए सभी विशेषण बहिन जी के ही दिए हुए हैं।
1. संस्थापक, 2. गुरु स्वरूप, 3. गुरु जी, 4. अन्वेषक,5.प्रधानाध्यापक, 6. शिष्य शिरोमणि, 7. मनीषी, 8. संयोजक, 9. प्रकाशक, 11. सेलिब्रिटी, 12. अध्यक्ष, 13. व्यवस्थापक,14. निर्माता , निर्देशक, 15. कमेंटेटर, 16. संजय, 17. ज्ञानदाता, 18. लेखक, 19. प्रस्तोता, 20 समन्वयक,21 जीवनदानी, 22 निष्काम कर्मयोगी, (संध्या जी ने लिखा -अरुण भाई साहिब गोवर्धन उठाए हैं,हम तो मात्र छड़ी थामे हैं। ) ,23. मनस्वी-लेखक, 24. शिक्षक,25. प्राचार्य,26. ज्ञानमंदिर के पुरोहित , 27.आविष्कारक,28. सारथी, 29. ज्ञान शिक्षक,30.सचेतक 31.सुपर मास्टरशेफ,32.गुरुवर के योग्य प्रतिनिधि-संध्या जी, 33.गुरुदेव के अग्रदूत-अरुण वर्मा, 34.कमांडर इन चीफ, संध्या और नीरा जी, 35.जौहरी जो ज्ञान रत्न चुन कर लाते हैं-संध्या जी, 36.आध्यात्मिक शिक्षक,37.ब्रांड एंबेसडर-संजना बेटी ,38. OGGP के जादूगर, शैली का कमाल, 39.संपादक,40. मूवी थियेटर के संचालक, 41 गुरुदेव के संदेशवाहक, 42. लेखमाला के रचनाकार, 43. लेखमाला के मालाकार,44. बागवान,45. एडिटर, 46. गुरुदेव के वीरभद्र, 47.कथालेखक, 48.कथाकार, 49.भक्त, लेखक, 49.संरचनाकार, 50.आचार्य, फरिश्ता रूपी संचालक-संध्या जी 51.दिग्दर्शक, 52.सूत्रधार, 53.संकलन कर्ता, 54. गुरुदेव माताजी के वरिष्ठ पुत्र। 55.गुरुसत्ता के अग्रदूत,57. दिव्य मंच के सितारे
जब भी बहिन जी ने हमारे लिए कोई विशेषण प्रयोग किया, हमने अपने पास सेव तो किया ही, इसलिए नहीं कि हम फूल-फैल कर उड़ने लगे बल्कि इसलिए कि जो हमें इतना सम्मान दे रहे हैं, उन्हें Acknowledge करना Netiquette की requirement है। हम न केवल सेव ही करते रहे बल्कि अपनी समझ के अनुसार रिप्लाई भी करते रहे। इन अलंकारों को प्राप्त करके जहाँ हमारे भीतर एक पॉजिटिव ऊर्जा का संचार होता रहा है, वहीँ एक बहुत बड़ी चुनौती भी मुँह फाड़कर खड़ी हो उठती है कि बहिन जी तो हमें नया अलंकार दे दिया,पाठक तो कई तरह के प्रश्न उठा रहे होंगें कि क्या हम सच में अच्छे लेखक हैं? अच्छे संयोजक हैं ? अच्छे अध्यापक है? आदि आदि। इनको अलंकारों को साबित करने के लिए हमें और अधिक परिश्रम करना होगा-यही हमारी चुनौती होती है।
आगे बढ़ने से पहले कहना चाहते हैं कि यह अलंकारों की सूची बड़ा साहस बटोर कर परिवार के समक्ष रख रहे हैं, कहीं साथी यह धारणा न बना लें कि हम अपना विज्ञापन कर रहे हैं। हम तो आदरणीय सरविन्द भाई साहिब से, बिलकुल सरल भाषा में , बिना किसी भारी भरकम शब्दों के प्रयोग के,वर्षों पहले लिखने का निवेदन कर चुके हैं। सराहना किसे अच्छी नहीं लगती लेकिन सराहना के बोझ को सहन करने की शक्ति भी तो होनी चाहिए। हम तो पहले से ही इस छोटे से परिवार के साथिओं के बोझ से दबे पड़े हैं, कैसे ऋणमुक्त होंगें, गुरुदेव ही जानते हैं।
आइये आगे चलते हैं।
कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख पर बहिन सुमनलता जी ने निम्नलिखित कमेंट किया, हमने उसी समय संक्षिप्त सा रिप्लाई कर दिया और लिखा कि आपके कमेंट का रिप्लाई स्पेशल सेगमेंट में शिफ्ट हो गया है। आदरणीय चिन्मय जी की 19 मिंट की वीडियो में सारा समय लग गया और समय भाग रहा था और हमें भी भागना पड़ा, बहिन जी से करबद्ध क्षमाप्रार्थी है :
“हमारे ज्ञानरथ के संचालक न केवल लेखनी के धनी हैं , बल्कि एक प्रबुद्ध पाठक भी है। क्योंकि यदि लेखक , पाठक नहीं होगा तो उसका चिंतन विस्तृत नहीं हो सकता । इस दृष्टि से देखा जाए तो आदरणीय संयोजक भाई साहब में दोनों ही गुण समाहित है। हमारा नमन अभिनंदन है , ऐसे अपनी लेखनी से मार्गदर्शन करने वाले मार्गदर्शक के लिए ।”
जब हमने कमेंट को स्पेशल सेगमेंट में शिफ्ट करने की बात की तो हम लगभग 66 वर्ष पीछे चले गए थे, न जाने कौन-कौन से वृतांत आँखों के आगे घूमते चले गए। यह कुछ ऐसे वृतांत थे जिनका “हमें आजतक कोई भी उत्तर नहीं मिल पाया है।”
1.पहले बहिन जी के कमेंट में दिए गए “लेखक और पाठक” की ही बात कर लेते हैं:
वर्ष 1985 के दिनों की बात रही होगी, हमने Wipro कंपनी से अपने रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए, पुराने टीवीओं के आकार का, बड़े साइज का नया-नया डेस्कटॉप कंप्यूटर खरीदा था। इंटरनेट कनेक्शन तो था नहीं, कंप्यूटर केवल डेस्कटॉप प्रिंटिंग/पब्लिशिंग आदि के लिए ही प्रयोग होता था। खूबसूरत हैंडराइटिंग, रंग बिरंगें स्लोगन लिखने की लत तो माता पिता से विरासत में मिली थी, दोनों का हैंडराइटिंग ऐसा था कि क्या कहें!!! कंप्यूटर तो हमारे लिए तो बहुत रोचक हॉबी थी। अलग- अलग स्लोगन टाइप करने, अलग-अलग कलर में प्रिंट करना एक passtime था। बहिन जी के कमेंट ने निम्नलिखित स्लोगन को स्मरण करा दिया:
A teacher can never truly teach unless he is still learning himself.
आज इस स्लोगन को देखकर हम इतने आचम्भित इसलिए हो रहे हैं कि न तो हमारे पास इंटरनेट था, न हमने किसी से पूछा था, केवल खीज थी कि “हमारे साथी टीचर” लेक्चर देने से पहले तैयारी क्यों नहीं करते? अपने वर्षों पुराने लेक्चरों को अपडेट क्यों नहीं करते? अपडेट करने के लिए पढ़ना पड़ता है, पढ़ने के लिए समय निकालना पड़ता है, वोह किसी के पास है नहीं ,हाँ वाईस चांसलर की चुगली के लिए घंटों का समय है।
खैर आगे चलते हैं,
नोबेल प्राइज विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जी का यह स्लोगन हमारे दिमाग में कैसे आया, न केवल हमारे दिमाग में विचार यां सेंस आयी बल्कि Exact same शब्द भी लिखे गए। यह कैसे हो पाया? इसका उत्तर हमें आज तक नहीं मिल पाया। शायद किसी उच्चस्तरीय मनोवैज्ञानिक विश्लेषक के पास इसका उत्तर हो।
2.जिस 66 वर्ष पुरानी घटना की बात का रेफरन्स हम ऊपर दे आये हैं, उस समय हम एक छोटे से गाँव में कक्षा चार के विद्यार्थी थे। 1960 की बात होगी, हमारे छोटे भाई साहिब को ट्यूशन देने के लिए पिताजी ने (खुद टीचर होने के बावजूद) एक मास्टरजी लगाए हुए थे। भाई साहिब ने कितना ज्ञान प्राप्त किया, कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन मास्टरजी ने हमारे साथ एक ही मुलाकात में हमारा इंटरव्यू ले लिया। स्मरण तो नहीं आ रहा कि चर्चा कैसे शुरू हुई लेकिन हमें आज भी इतना स्मरण है कि हमने मास्टरजी को खाना खाने से लेकर पखाना करने तक Food chain में कौन-कौन से केमिकल रिएक्शन होते हैं सब बता दिए थे, मुँह में Saliva, 32 दाँतों में Biting teeth, Chewing teeth,Gastric juice, Pancreatic juice,Bile आदि न जाने क्या-क्या कुछ बता दिया था। अंग्रेजी भाषा के Alphabets तो हमने 6वीं कक्षा में सीखे थे । पिताजी हेडमास्टर थे,दीवार की तरफ मुँह करके सारी क्लास खड़ी हो जाती थी और alphabets के गीत गए जाते थे, तो यह Biological reactions कैसे बोल पाए, इसका कोई भी उत्तर न मिल पाया।
3.वर्ष 1973 की बात है,हम Msc Previous के विद्यार्थी थे। डॉ AC Jain हमारे HOD थे और हमें Organic केमिस्ट्री पढ़ाते थे। Indian Institute of Science Bangalore (IISc) जिसे Tata institute भी कहते हैं, में एक Symposium होना था, 50 विद्यार्थिओं की क्लास में से डॉ जैन द्वारा हमारा चयन होना,हमें वहां भेजना, न कोई रिसर्च पेपर (MSc में कहाँ रिसर्च होती है?), केवल Symposium में भाग लेना !!!
कैसे संभव हो पाया? कोई उत्तर न मिल पाया। शायद Prof CNR Rao, सुप्रसिद्ध केमिस्ट के दर्शन करने थे, टाटा इंस्टिट्यूट की पावन भूमि को चूमना था, Again मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का विषय !!!
4. वर्ष 1986 में सिलेक्शन के लिए इंटरव्यू के कुछ ही घण्टे पहले हमारे घर में डॉ दलीप सिंह दरवाज़ा खटखटाते हैं और मात्र इतना ही कहकर चले जाते हैं कि “इंटरव्यू से पहले एक बार वाईस चांसलर साहिब को अवश्य मिल लें।” कौन थे डॉ दलीप सिंह, कहाँ से आये थे, हमने पहली और अंतिम बार देखे थे, हमारे बार-बार आग्रह करने पर भी घर के अंदर नहीं आये थे। बस इतना ही कह कर चले गए थे। आज तक इस गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए हैं, शायद इसका उत्तर मिल पाए।
5.वर्ष 2017 में वर्षों के वनवास के बाद, एक बार फिर हम नए-नए गायत्री परिवार से जुड़े थे। डॉ चिन्मय जी के इंटरव्यू, 108 कुंडीय यज्ञ, किंग्स्टन में 4 दिवसीय आयोजन आदि की न जाने कितनी ही वीडियोज़ बनाकर अपने चैनल पर अपलोड करने का भूत सवार था। एक वीडियो जिसका लिंक नीचे दे रहे हैं इसके शीर्षक के बारे में आज भी उत्तर ढूंढ रहे हैं। https://youtu.be/QfG2ioqUzSE?si=5AMYcSJfogQyi3Ek
पता नहीं इस शीर्षक में आध्यात्मिक सैनिटोरियम शब्द जोड़ने का विचार किसने दिया था। संलग्न चित्र में दिए गए विवरण को जब वर्षों बाद देखा तो दाँतों तले ऊँगली दबाने के सिवाय हमें कुछ भी नहीं सूझा!!! शायद कुछ दिव्य तो अवश्य ही है,
प्रभु की माया, मेरे गुरु की माया वही जानें, हम तो मात्र उनके हाथ की कठपुतली हैं जैसा नाच कराएंगें, सहर्ष करते ही जाएंगें, बस इतना ही कह कर विराम देते हैं “तेरा तुझको अर्पण ,क्या लागे मेरा ?”
यहीं पर विराम एवं जिन साथिओं के प्रकाशन न हो पाए, उनके लिए क्षमाप्रार्थी हैं।