ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं ने आज के लेख का शीर्षक नोटिस कर लिया होगा, जो पिछले चार लेखों से अलग है। इस बदलाव के कारण जहाँ हम आदरणीय संध्या बहिन जी से क्षमाप्रार्थी हैं वहीँ उनका ह्रदय से आभार भी व्यक्त करते हैं कि “यज्ञ पिता-गायत्री माता” पुस्तक से परिचय हो पाया। इस पुस्तक के 100 पन्नों में समाहित ज्ञान इतना विस्तृत,उत्कृष्ट एवं ज्ञानवर्धक है कि एक-एक टॉपिक की भरपूर चर्चा होनी उचित रहेगी। उचित रहेगा कि गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के बीच हुए दिव्य संवाद पर आधारित अगले 13 टॉपिकस पर संक्षेप के बजाए विस्तृत चर्चा की जाए। हमारी तरह अनेकों पाठक समझते होंगें कि इन विषयों पर बार-बार चर्चा हो चुकी है, कुछ भी नया नहीं है लेकिन हम गलत थे। यह तो ऐसे विषय हैं जिन्हें जितनी बार समझने का प्रयास किया जाए, उतने ही डूबते जाते हैं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल में स्थित दिव्य ज्ञान मंदिर की घंटियां ब्रह्मुहुर्त से पहले ही बजना शुरू हो जाती हैं, हम सभी बच्चे भाग-भाग कर सबसे आगे गुरुचरणों में समर्पित होने का प्रयास करते हैं,तो उठो पाठको आप भी आगे बढ़ो, कहीं देर न हो जाये।
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श्रद्धेय लीलापत जी ने निवेदन किया:
“गुरुदेव ! आपने यज्ञ के बारे में तो बहुत ही विस्तार से बता दिया था और हमारी सभी शंकाओं का समाधान कर दिया था। अब कृपया गायत्री माँ के बारे में भी ऐसे ही समझाने का उपकार करें । सबसे पहले तो यही बड़ा विचित्र लगता है कि हम गायत्री देवी को माता क्यों कहते हैं?”
गुरुदेव ने पूछा, “क्यों, इसमें विचित्र क्या है ?”
पंडित जी ने पूछा,”गुरुदेव ! माता तो वह होती है जो हमें जन्म देती है, इसने तो हमें जन्म नहीं दिया तो फिर यह माता कैसे हुई ? उसे तो हम देख भी नहीं सकते, गुरुदेव ! गाय को भी माता कहते हैं, पृथ्वी को भी माता कहते हैं। आखिर हमारी कितनी माताएं हैं ?”
लीलापत जी की बात सुनकर गुरुदेव जोर से हंसे और कुछ देर मौन रहने के बाद उन्होंने वंदनीया माताजी की ओर इशारा करके पूछा, “बता बेटा ! ये कौन बैठी हैं।”
पंडित जी ने उत्तर दिया,”ये तो हमारी माताजी हैं ।”
गुरुदेव ने पूछा,”यह तुम्हारी माता कैसे हो गईं, इन्होंने तुम्हें जन्म तो दिया ही नहीं और फिर ये उम्र में भी तुम से छोटी हैं। इन्हें तुम माताजी क्यों कहते हो ?”
पंडित जी, “जी….जी….गुरुदेव …!” कहते हकलाने लगे और माताजी भी यह देखकर मुस्कराने लगीं ।
गुरुदेव ने कहा,”बेटा ! जो तुम्हारे मन में अटक रहा है, शब्दों में व्यक्त नहीं हो पा रहा है, वही तो तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है । यह महिला (वंदनीया माताजी) तुम्हें स्नेह करती है, तुम्हारी सुख-सुविधा का, खाने-पीने का ध्यान रखती है, तुम्हें कोई कष्ट हो, बीमारी हो तो हर प्रकार से सेवा करके तुम्हारे दुःख दूर करती है और कभी हम नाराज़ भी होते हैं तो यह महिला ढाल बनकर तुम्हारी रक्षा करने के लिए हमसे भी टक्कर लेने लगती है। तभी तो तुम इन्हें माताजी कहते हो।”
इतना कहकर गुरुदेव ठठाकर हंस पड़े। माताजी भी इस बात पर ज़ोर से हंसने लगीं। लीलापत जी से कुछ कहते न बन पाया तो पूज्यवर ने ही बात को आगे बढ़ाया।
गुरुदेव ने बताया:
“बेटा ! हमारे ऋषियों ने गहन चिंतन के बाद गायत्री को माता की पदवी पर सुशोभित किया है । गायत्री ने तुम्हें या हमें ही नहीं, सारे संसार को जन्म दिया है। सारी सृष्टि,सारा ब्रह्मांड ही गायत्री से उत्पन्न हुआ है। वही सबका पालन पोषण करती है,अन्न-जल की व्यवस्था करती है,औषधियां प्रदान करती है,कष्ट में हमारी रक्षा करती है, हम सब पर कोटि-कोटि अनुदानों- वरदानों की सतत वर्षा करती है । तभी तो वह सारे संसार की माता है,जगन्माता है,विश्वमाता है ।
आस्तिक नास्तिक,साकार,निराकार के झगड़े में न भी जाएँ तो भी यह तो निश्चित ही है कि विराट सृष्टि, ब्रह्मांड का नियंता परमेश्वर असीमित शक्ति का भंडार है, सार्वभौमिक है, सार्वलौकिक है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन के माध्यम से सृष्टि- संचालन का चक्र चला रहा है। जड़-चेतन सभी में उसी ईश्वरीय शक्ति का विद्युत प्रवाह तरंगित हो रहा है। ब्रह्मा द्वारा ही सृष्टि की रचना हुई है, 84 लाख योनियों के चक्र में जीवधारियों को बांधा गया है । विष्णु उन सबका पोषण करते हैं । महाकाल शंकर संहार और परिवर्तन द्वारा इस सृष्टि चक्र को गति प्रदान करते हैं।
इन सबसे भी ऊपर गायत्री की महिमा है। गायत्री सद्बुद्धि की, सद्विचारों की देवी है। इसके बिना तो कुछ संभव नहीं है। ब्रह्मा-विष्णु महेश भी यदि सद्बुद्धि से काम न करें,आपस में उचित तालमेल न रखें तो महाप्रलय में क्या देर लगेगी? इसीलिए तो कहते हैं कि गायत्री से ही सृष्टि की रचना हुई है। वही इसकी पोषक है,नियामक है,नियंत्रक है। तभी तो माता की पदवी पर आसीन है ।
मां स्नेह व श्रद्धा का अटूट संगम होती है। उसके हृदय से अपने बच्चों के लिए प्रेम व वात्सल्य की अजस्र धारा प्रवाहित होती रहती है । उसके लिए तो “कुटिल,कपटी,कपूत” भी आंख के तारे और जिगर के टुकड़ों के समान हैं।बच्चों को भी मां की गोद में ही सारे संसार का सुख मिलता है। उसके आंचल तले अपूर्व आत्मबल जाग्रत होता है। मां का ध्यान करते ही मन में स्नेह, श्रद्धा के झरने फूटने लगते हैं। मां के साथ स्नेह- बंधन कितना अटूट व पवित्र है इसका बखान करना संभव ही नहीं है । तुम्हें अर्जुन के जीवन की एक घटना सुनाते हैं। अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुधर था, बल व पौरुष में उस जमाने में कोई भी उसकी टक्कर का नहीं था। उस सजीले पुरुष पर उर्वशी नामक अप्सरा मोहित हो गई। वह भी उस समय की सर्वश्रेष्ठ सुंदरी थी। उसने अर्जुन पर बहुत डोरे डाले, उससे कहा कि वह उसके समान पुत्र की मां बनना चाहती है। अर्जुन ने कहा, “देवि ! आप इस चक्कर में न पड़ें, इसमें भारी कष्ट उठाने पड़ते हैं । फिर यह भी निश्चित नहीं है कि पुत्र ही हो । जो भी हो वह मेरी तरह न होकर कायर और कुरूप भी हो सकता है। इसलिए आप मुझे ही अपना पुत्र समझें। मैं तो पहले ही आपको माता मानता हूँ। यह कहते हुए अर्जुन ने उसके चरणस्पर्श करके आशीर्वाद की कामना की ।
तो यह होती है मातृवत दृष्टि जो हमारी भावनाओं को श्रद्धा और पवित्रता से ओत प्रोत कर देती है। पूजास्थली में स्थापित गायत्री माता की प्रतिमा से हमें यह प्रेरणा लेनी चाहिए कि प्रत्येक कन्या को माता के समान ही समझें जैसे अर्जुन ने समझा था । हम तो तुम्हारी माताजी को भी माताजी ही कहते हैं ।”
गुरुदेव ने आगे बताया:
“इस पृथ्वी पर महाशक्ति का प्रथम अवतरण वेदमाता के रूप में ही हुआ था। मनुष्य को जिस ज्ञान और विज्ञान की आवश्यकता थी उसका प्रकटीकरण चार वेदों के रूप में इसी गायत्री महामंत्र से हुआ। इस प्रकार वेदमाता का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। उसकी प्रखरता और परिपक्वता का परिचय देवमाता के रूप में सामने आया। सृष्टि का आरंभिक काल “वेदमाता स्वरूप” प्रगति के मध्यकाल में “देवमाता” बन गया । इस काल को देवयुग और सतयुग के नाम से पुकारा जाता है।
गुरुदेव जिस काल की बात कर रहे हैं, उन दिनों की परिस्थितियां इतनी सुसंपन्न और सुखद थीं कि समृद्धि से लदी भारतभूमि को संसार भर में एक स्वर से स्वर्गादपि गरीयसी (स्वर्ग से भी बढ़कर) कहा जाता था। स्वर्गदपि गरीयसी का वर्णन भगवान् राम और लक्ष्मण संवाद में भी आता है, कभी उचित समय पर इस दृष्टान्त पर भी चर्चा करनी होगी। भारतवर्ष ने अपनी उत्कृष्टता को समस्त संसार में बिखेरा था और जगद्गुरु,विश्वगुरु कहलाने का श्रेय पाया था।
गायत्री भारतीय संस्कृति की भी जननी है। भारत की भूमि से ही देव संस्कृति की ऋतंभरा प्रज्ञा का,ओजस-तेजस-वर्चस का संदेश विश्व के घर-घर में, जन-जन तक पहुंचता था। उस काल में विचारणा का स्तर जिस ऊंचाई तक जा पहुंचा था उसे ब्रह्मलोक कहते हैं। उत्कृष्ट चिंतन की झलक मनुष्य के आदर्श कृत्यों में होती है, भारत में कुछ ऐसा ही वातावरण था,चारों ओर स्वर्गीय सुख-शांति दृष्टिगोचर होती थी ।
गुरुदेव कह रहे थे कि आज की गई-गुजरी स्थिति में भी उस गौरव भरे अतीत की चर्चा करते हुए हमारी छाती गर्व से फूल जाती है। यही वेदमाता, देवमाता गायत्री महाशक्ति, जगत्माता,विश्वमाता की सुविस्तृत भूमिका भी निभा रही है। समाज में फैले हुए विष को केवल विश्वमाता गायत्री ही समाप्त कर सकती है और कर भी रही है क्योंकि वही सद्बुद्धि की देवी है, इसी ने उलटे हुओं को उलट कर सीधा करना है।
गायत्री माता पर पंडित जी की शंका का समाधान करने के बाद गुरुदेव ने पंडित जी के दूसरे प्रश्न, “पृथ्वी और गाय को माता क्यों कहते हैं?” का निम्नलिखित उत्तर दिया:
अथर्व वेद का एक बहुत ही दिव्य श्लोक है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या” जिसका अर्थ है भूमि मेरी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। श्लोक के विराट आध्यात्मिक भावार्थ को देखकर पृथ्वी और पर्यावरण के प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है। यह श्लोक इतना फिलोसोफिकल और आध्यात्मिक है कि इसे समझने के लिए उच्चस्तरीय ज्ञान की आवश्यकता है। गुरुदेव जितना बता रहे हैं उतना ही बेसिक सा समझ लें तो बहुत है।
पृथ्वी हमें धारण करती है, हमारा पालन-पोषण करती है, हम सब उसके बेटों के समान हैं। वहां कोई भेदभाव नहीं है। संसार के समस्त प्राणी उसके आश्रय, स्नेह, दुलार की अजस्र धारा में गोते लगाकर आनंदमय होते हैं। इन्हीं कारणों से यह धरती माँ है,जन्मभूमि है,मातृभूमि है और मातृवत (माँ जैसी) श्रद्धा की अधिकारिणी है।
गाय तो सचमुच गौमाता ही है, इसके अंदर देवताओं का वास होता है। अमृत जैसे दूध से हमारा पोषण होता है। गोमूत्र व गोबर औषधि के रूप में प्रयुक्त होते हैं। मरने पर अपनी चमड़ी भी हमारे लाभ के लिए दे जाती है । इतना तो अपनी सगी मां, हमें जन्म देने वाली मां भी नहीं करती। हमारे ऋषियों ने इसी कारण गौमाता के पवित्र संबोधन से उसकी आराधना की है।
गुरुदेव ने पंडित जी को पूछा कि बेटा अब तो तुम्हारी सब शंकाओं का समाधान हो गया होगा “
पंडित जी बोले गुरुदेव मेरा समाधान तो हो गया है लेकिन रोना तो यही है कि वर्तमान में सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा है । हमारी देवसंस्कृति में गायत्री,गाय और पृथ्वी को ही नहीं बल्कि प्रत्येक नारी को माता कहा गया है। “परदारेषु मातृवत” की पवित्र दृष्टि से हर कोई नारी माँ के समान है लेकिन विदेशी सभ्यता ने नारी को मात्र एक भोग विलास की वस्तु बनाकर रख दिया है। हर ओर नारी को अश्लील रूप में ही देखा और प्रस्तुत किया जाता है। विज्ञापनों में तो उसे अर्धनग्न दिखाने का फैशन ही चल पड़ा है। लोग खुलेआम एक दूसरे की पत्नियों की कमर में हाथ डालकर नाचते हैं, न पति को एतराज है और न पत्नी को। न जाने इस विदेशी सभ्यता की नकल हमारे देशवासियों को अभी और कितना भटकाएगी?
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से एवं इस ज्ञानप्रसाद लेख का एक ही सन्देश है:
“माँ गायत्री सबको सद्बुद्धि का दान प्रदान करे।”
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
