वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

त्रिवेणी शताब्दी में लिए गए संकल्प से ब्रेक लेकर आद संध्या जी द्वारा प्रस्तुत किये गये कंटेंट पर आधारित लेख श्रृंखला का चौथा लेख 

गुरुदेव की अदुभुत रचना “यज्ञ पिता-गायत्री माता” में समाहित अद्भुत ज्ञान का स्वध्याय करके आदरणीय संध्या बहिन जी ने हम सबके लिए 100 पन्नों के ज्ञान का निचोड़ 20 पन्नों में प्रस्तुत किया है। इसी संक्षिप्त ज्ञान को ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है। आज इन दिव्य लेखों की श्रृंखला का  चौथा लेख प्रस्तुत किया गया है।

आज के लेख में जो प्रैक्टिकल ज्ञान समाहित है उसके लिए आदरणीय संध्या बहिन द्वारा प्रस्तुत कंटेंट के इलावा परम पूज्य गुरुदेव की ओरिजिनल पुस्तक “यज्ञ पिता-गायत्री माता” एवं कुछ ऑनलाइन सोर्सेज की सहायता ली गयी है। यज्ञ करते समय वस्त्रों के कलर का क्या महत्व है, यज्ञ में प्रयोग होने वाले पदार्थों (घी,हवन सामग्री आदि, समिधाएं) पर चर्चा की गयी है। आज के लेख का सबसे आकर्षक भाग  “यज्ञ भगवान् की प्रार्थना” का एनालिसिस है। गुरुदेव द्वारा पंडित लीलापत जी के साथ की गयी इस चर्चा को हम सबको गाँठ बाँध लेना चाहिए, तभी हमारा प्रयास सफल हो पायेगा। 

आइये चलें ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में जहाँ मंत्र उच्चारण के साथ घंटियों की दिव्य ध्वनि हमें आमंत्रित कर रही है। 

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यज्ञ के समय पहनने वाले वस्त्रों का अपना प्रभाव होता है । यज्ञ या पूजा में पीत वस्त्र  पहनने का कारण मन की शुद्धता, सकारात्मक ऊर्जा, और आध्यात्मिकता है। पीला  रंग भगवान विष्णु को  प्रिय है और इसे ज्ञान, सात्विकता, और शुभता का प्रतीक माना जाता है

धार्मिक और मानसिक दृष्टिकोण से पीत वस्त्र पहनने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

पीला रंग सूर्य के प्रकाश का प्रतीक है, जो यज्ञ की अग्नि के समान ऊष्मा और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यह मन में सात्विक भाव लाता है।

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को ‘पीतांबर’ (पीले वस्त्र पहनने वाले) कहा जाता है। यज्ञ में विष्णु जी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पीले कपड़े शुभ माने जाते हैं। 

ज्योतिष एवं पुरातन मान्यताओं के अनुसार, पीला रंग बृहस्पति ग्रह (गुरु) से जुड़ा है, जो ज्ञान और बुद्धि के प्रतीक हैं। पीले वस्त्र धारण करने से मस्तिष्क शांत और एकाग्र रहता है, जिससे पूजा या यज्ञ में ध्यान लगाने में मदद मिलती है।

हिंदू धर्म में पीले रंग को अत्यंत पवित्र, शुद्ध और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है।  

यज्ञ करते समय हमें अपने शरीर को ऐसी  परिस्थिति में रखना चाहिए कि यज्ञ कुंड की वायु हमारे रोम छिद्रों के द्वारा आसानी से हमारे शरीर में प्रवेश कर सके । इसके लिए ढीले-ढाले वस्त्र ही पहनने चाहिए । पुरुषों को तो केवल कटि वस्त्र (कमर के नीचे) धोती ही पहननी चाहिए । यदि आवश्यक हो तो कंधे पर हलका दुपट्टा डाल लें । इस प्रकार यज्ञ ताप से शरीर को अधिकतम गर्मी प्राप्त होगी और रोम छिद्र भी खुले रहकर धुंए से पौष्टिक तत्वों को आसानी से खींच लेंगे ।

आध्यात्मिक के इलावा पीले वस्त्र पहनने का वैज्ञानिक आधार भी है। पुरातन ऋषियों ने जो भी निर्देश दिए हैं वह गहन रिसर्च  पर आधारित है। कपड़ों के रंग का हमारी मनोभूमि तथा स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है । 

अफ़सोस से कहना पड़ रहा है कि भारतीय संस्कृति का आधार जो पूरी तरह से वैज्ञानिक है, आधुनिकता की भागदौड़ ने उसे आज विस्मृति के गर्त में फेंक दिया गया है, लेकिन इसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। पूरे विश्व में हो रहे  व्यापक अनुसंधान से जो तथ्य एकत्रित किए गए हैं उनसे प्रकट होता है कि सीधे-सादे शालीन वस्त्र ही स्वास्थ्य के लिए हितकर होते हैं । भड़कीले तथा चमकदार रंग के कपड़े मच्छरों तथा हानिकारक, रोगजनक कीड़े-मकोड़ों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कीड़ों की तो बात ही छोड़ दें, भड़कीले एवं अर्धनग्न वस्त्र बलात्करिओं को भी आकर्षित करते हैं। सूरज की किरणें जब भड़कीले और चमकदार वस्त्रों  पर पड़ कर प्रत्यावर्तित होती हैं तो कीट पतंग आकर्षित होकर मनुष्य के शरीर की तरफ दौड़ पड़ते हैं । ये वस्त्रों को तो हानि पहुंचाते ही हैं, मनुष्य के शरीर पर भी रोग कीटाणुओं का आक्रमण कर देते हैं। कई जगह जहरीले कीड़े काटकर चर्म रोग उत्पन्न कर देते हैं। छोटे बच्चों के कोमल शरीर पर तो इसका दुष्प्रभाव बहुत जल्दी पड़ता है । इस रिसर्च  से यह भी पता चलता है कि श्वेत, पीले, गेरुए व केसरिया रंग के कपड़ों के प्रति कीट-पतंग आकर्षित नहीं होते, न वे कपड़ों को हानि पहुँचाते हैं और न ही पहनने वाले के स्वास्थ्य को। 

यह तो कोरा भ्रम है कि भड़कीले रंग के कपड़ों से शारीरिक शोभा बढ़ती है। उल्टे उनसे राजसिक मनोवृत्ति, कामुकता, पशुता आदि का प्रदर्शन होता है । ये आत्मिक, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं । आज तो फैशन की डायन समाज को खा चली है ; न जाने कैसे-कैसे चटकीले भड़कीले वस्त्रों प्रचलन है कि पहनने वाले के व्यक्तित्व की झलक भी नहीं मिलती । केवल फैशन के नाम पर दिमागी दिवालियापन ही दिखाई देता है।

यज्ञ के लिए जितना महत्व भेषभूषा का है उतना ही यज्ञशाला का ही है। इसके लिए सबसे जिज्ञासाभरा प्रश्न उभरकर सामने आता ही कि यज्ञशाला  का के छत पिरामिड की तरह क्यों होता है। मंदिरों, गुरुद्वारों यहाँ तक कि मस्जिदों के छत  भी पिरामिड आकार  के होते हैं।    

धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

पिरामिड रूपी छतों का यज्ञ की आहुतियों से सीधा संबंध है। यज्ञ के दौरान दी जाने वाली आहुतियों से पैदा होने वाली सकारात्मक ऊर्जा  ढलान वाली छत से टकराकर नीचे की ओर वापस रिफ्लेक्ट होती है।

विशेष आकार (डिफ्यूज़र प्रभाव) के कारण यज्ञ का धुआं बिना रुके, धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठकर हवा में घुलता है, जिससे वेंटिलेशन बेहतर रहता है।

भारतीय वास्तुकला में ऐसे शिखरों को आकाश तत्व का प्रतीक माना जाता है। यह ऊंचे स्थान पर होने के कारण आध्यात्मिक ऊर्जा को आकर्षित करने और उसे ब्रह्मांड से जोड़ने में सहायक माने जाते हैं।

पाठकों को स्मरण कराना अपना कर्तव्य समझते हैं कि वर्तमान लेख श्रृंखला परम पूज्य गुरुदेव एवं पंडित लीलपत शर्मा जी के परस्पर संवाद पर आधारित है।

वैसे तो यज्ञ करते समय अनेकों बातों का ध्यान रखना आवश्यक है लेकिन भेषभूषा, यज्ञस्थली के बाद आइए देखें कि यज्ञ में प्रयोग होने वाले पदार्थों का क्या महत्व है।

यज्ञ में प्रयोग होने वाले पदार्थ  और समिधाओं (लकड़ियों) का अपना विशेष महत्व होता है । इनके निम्नलिखित चार भाग किए जा सकते हैं:

(1)औषधियों का सम्मिश्रण 

(2)घृत 

(3)समिधाएं 

(4) पूर्णाहुति में अर्पित किए जाने वाले विशिष्ट पदार्थ।

इन चारों के अलग-अलग गुण एवं प्रभाव हैं। हवन सामग्री में नमकीन पदार्थों का निषेध है क्योंकि नमक (सोडियम क्लोराइड) फटकर क्लोरीन गैस पैदा करता है, जो कि कीटाणुओं के साथ-साथ मनुष्यों के लिए भी हानिकारक होती है । 

पूर्णाहुति के तीन भाग होते हैं (1) स्विष्टकृत  के लिए शक़्कर  युक्त अन्न जैसे खीर, हलुआ, मिठाई आदि की आहुति दी जाती है।  इनके पोषक तत्व हमारे शरीर के लिए लाभदायक होते हैं l (2) पूर्णाहुति में  लकड़ी फॅमिली के पदार्थ, सुपारी, नारियल आदि का प्रयोग किया जाता है। (3) वसोधारा में घृत की धार छोड़ी जाती है अर्थात् उसकी मात्रा बढ़ाई जाती है, इससे यह लाभ होता है कि यज्ञ के बाद बचे हुए हवन सामग्री आदि पदार्थ  तुरन्त ज्वलनशील हो जाते हैं तथा इससे हमारे शरीर को चिकनाई और स्निग्धता की वह मात्रा मिल जाती है जो स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। 

यज्ञ के बाद यज्ञावशिष्ठ  को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। गुरुदेव ने  इस प्रकार यज्ञ के  आध्यात्मिक, दार्शनिक, आयुर्वेदिक एवं भौतिक सभी दृष्टि से लाभों के बारे में भली भांति समझाते हुए इस विषय का समापन किया। 

पंडित लीलापत जी ने गुरुदेव का धन्यवाद् करते हुए कहा:

“गुरुदेव, हम आपके अत्यंत आभारी हैं कि आपने इतनी सुंदर व्याख्या करके यज्ञ के सभी पक्षों को उजागर कर दिया है । हमारे ज्ञानचक्षु खुल गए हैं।” 

गुरुदेव ने  कहा:

“बेटे, आभार हमारा नहीं यज्ञ भगवान का मानो जिनकी कृपा से इस चर्चा का अवसर उत्पन्न हुआ है। अच्छा, ज़रा “यज्ञ भगवान की प्रार्थना” तो गाओ जो रोज यज्ञ के बाद गाते हो। 

गुरुदेव के आदेशानुसार प्रार्थना बोलना आरंभ किया। वहां उपस्थित अन्य लोग भी तन्मय होकर गाने लगे । गुरुदेव ने भी भाव विभोर होकर साथ दिया।

यज्ञ रूप प्रभो हमारे भाव उज्जवल कीजिए । 

छोड देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिए । 

वेद की बोलें ऋचाएं, सत्य को धारण करें । 

हर्ष मे हों मग्न सारे, शोक सागर से तरें । 

अश्वमेधादिक रचाएँ यज्ञ पर उपकार को । 

धर्म मर्यादा चलाकर लाभ दें संसार को । 

नित्य श्रद्धा भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें । 

रोग पीड़ित विश्व के संताप सब हरते रहें । 

भावना मिट जाए मन से, पाप अत्याचार की ।

कामनाएं पूर्ण होवें, यज्ञ से नर-नारी की । 

लाभकारी हो हवन, हर जीवधारी के लिए । 

वायु जल सर्वत्र हो शुभ गन्ध को धारण किए । 

स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो । 

“इदमं न मम” का सार्थक, प्रत्येक मे व्यवहार हो । 

हाथ जोड़ झुकाए मस्तक, वंदना हम कर रहे । 

नाथ करुणा रूप करुणा, आपकी सब पर रहे । 

यज्ञ रूप प्रभो हमारे, भाव उज्जवल कीजिए । 

छोड देवें छल कपट को, मानसिक बल दीजिए ।

प्रार्थना पूरी होने के बाद भी गुरुदेव काफी देर तक आंखें बंद किए हुए कुछ गुनगुनाते रहे, फिर धीरे-धीरे चेतनावस्था में आकर जैसे स्वयं से ही कहने लगे, 

अपने लिए केवल मानसिक बल, जिससे हमारे भाव उज्ज्वल हों और हम छल-कपट को छोड़ने में समर्थ हों । बस, और कुछ भी नहीं । अरे देवता तो सब कुछ दे सकते हैं । हमने यज्ञ किया है, घी, समग्री, मिठाई आदि क्या-क्या खर्च किया है । इतनी रिश्वत देकर तो देवता से कुछ भी मांगा जा सकता है। गुरुदेव पंडित जी एवं अन्य लोगों को कह रहे थे अरे, मांगो-मांगो, यज्ञ देवता ! आज हमारी लाटरी निकाल देना, कम से कम एक लाख की। लड़के की नौकरी नहीं लगती। वह पढ़ा लिखा नहीं है, नालायक है। तो क्या हुआ, तुम तो लायक हो, जल्दी से उसकी नौकरी लगवा दो। वेतन चाहे कम हो,ऊपरी आमदनी अच्छी हो। अगर आपने हमारा काम कर दिया तो अगली बार  जब हवन करेंगे तो देसी घी के लड्डू से स्विष्टकृत आहुति देंगे।”

गुरुदेव ने आंखें खोलकर पंडित जी की  ओर देखा और बोले 

“क्यों ठीक है या नहीं ? आज हर व्यक्ति यही सब मांगता है। यज्ञ की प्रार्थना तो करता है लेकिन उसके भाव उसकी समझ में नहीं आते । अरे, मांगा तो केवल “मानसिक बल” ही जाता है । जब आत्मबल/मानसिक बल  मिल गया तो सब कुछ मिल गया । कितनी सुंदर प्रार्थना है । अपने लिए केवल आत्मबल और साथ ही यह बंधन भी कि हम सदैव वेद की भाषा ही बोलें और सत्य आचरण करें । वाह वाह ! आज चारों ओर झूठ, मक्कारी, चालबाजी का राज है और हम केवल सत्य आचरण करें । कितना कठोर बंधन है । एक अन्य बंधन भी है कि हम नित्य यज्ञ करते रहें । केवल दिखावे के लिए नहीं, वाहवाही के लिए नहीं, बल्कि पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ यज्ञ करें । श्रद्धा नहीं होगी, भावना नहीं होगी, विश्वास नहीं होगा तो यज्ञ करने से क्या लाभ ? क्रिया के साथ भावना भी चाहिए। वह तो अत्यंत आवश्यक है । हम भक्तिपूर्वक नित्य यज्ञ भी करें, अश्वमेध आदि यज्ञ भी रचाऐं। इस प्रार्थना में यह बंधन भी हम अपने ऊपर ले रहे हैं।मांगा तो कुछ भी नहीं, उल्टे अपने ऊपर कठोर बंधन और लगा लिए ।

लेकिन यह यज्ञ हम क्यों करें ? हमारा अपना व्यक्तिगत क्या लाभ होगा?  वेद और सत्य का आचरण क्यों करें ? इस प्रार्थना में यह भी बता दिया गया है कि “सब पर उपकार करें। संसार में जितने भी जीवधारी हैं सभी हर्ष में मग्न हों और उनके शोक संताप सब दूर हो जाएं। चारों ओर धार्मिक मर्यादाओं का पालन हो जिससे संसार में सभी को लाभ हो। विश्व में कोई भी रोग पीड़ित न रहे । किसी के भी मन में एक दूसरे के प्रति पाप या अत्याचार की भावना न आए । सारी दुर्भावनाऐं मिट जाएं। सभी नर-नारियों की कामनाएं पूर्ण हों । हम सभी में प्रेम प्रभाव हो, एक दूसरे के प्रति सहयोग सद्भाव की भावना हो । आपस में किसी भी प्रकार का स्वार्थभाव न रहे ।

इतना ही नहीं। यह यज्ञ हम केवल मनुष्यों के भले के लिए ही नहीं कर रहे हैं । यह सभी जीवधारियों को लाभ पहुंचाए। पशु-पक्षी, कीट-पतंग, पेड़-पौधे आदि सभी को इस यज्ञ का लाभ मिले । वायु और जल भी शुद्ध व पवित्र हों, सुगंधित हों। चारों ओर उत्तम वातावरण हो । हम इसी से यज्ञ भगवान के समक्ष नमन-वंदन करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि भगवान की करुणा सब पर रहे । भगवान की कृपा करुणा केवल हम पर ही न रहे बल्कि सभी को उसका लाभ मिले। सबमें हम भी तो आ ही जाते हैं ।

बेटे यही है सच्ची यज्ञीय फिलॉसफी। इस प्रार्थना को समझो, मन की गहराई में उतारो और इसी भावना से यज्ञीय जीवन का आनंद लो । 

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः ।सर्वे सन्तु निरामयाः ।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।

मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥ अर्थात सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय बनें और कोई भी दुःख का भागी न बने।”

यज्ञ के संबंध मे आवश्यक बातें बताते हुए गुरुवर कहते हैं कि यज्ञ के संबंध मे सफाई, निर्मलता, स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना होता है, यज्ञ का स्थान स्वच्छ एवं पवित्र होना चाहिए, साथ ही स्थान का आच्छादित (ढका हुआ) होना भी आवश्यक है, इससे यज्ञ-हवन धूम्र देर तक टिका  रहता है, इसके विपरीत ऊपर खुला रहने से गर्म हवा ऊपर चली जाएगी और वायु वेग से इधर-उधर बिखर जाएगी, इससे उसकी ताप ऊर्जा एवं पौष्टिक तत्वों का अधिक लाभ यज्ञ आयोजकों को नहीं मिल पाएगा, बंद या ढंके स्थान पर यज्ञ का लाभ अधिकतम मिलेगा । यज्ञ का सर्वोत्तम समय ऊषा काल (सूर्य उदय से पहले) का है, चारों ओर शांत वातावरण मे जब यज्ञ धूम्र फैलता है और मंत्रों की ओजस्वी ध्वनि गूँजती हैं, तो सभी के तन मन में उल्लास एवं आल्हाद की एक लहर दौड़ जाती है। 

कल तक के लिए मध्यांतर, जय गुरुदेव 


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