वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

त्रिवेणी शताब्दी में लिए गए संकल्प से ब्रेक लेकर आद संध्या जी द्वारा प्रस्तुत किये गये कंटेंट पर आधारित लेख श्रृंखला का तीसरा  लेख 

गुरुदेव की अदुभुत रचना “यज्ञ पिता-गायत्री माता” में समाहित अद्भुत ज्ञान का स्वध्याय करके आदरणीय संध्या बहिन जी ने हम सबके लिए 100 पन्नों के ज्ञान का निचोड़ 20 पन्नों में प्रस्तुत किया है। इसी संक्षिप्त ज्ञान को ज्ञानप्रसाद लेखों के माध्यम से ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा  है। आज इन दिव्य लेखों की श्रृंखला का  तीसरा लेख प्रस्तुत किया गया है।

आज के लेख में यज्ञोपैथी,पर्यावरण आदि की बात तो हो ही रही है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वोह भाग है जिसमें भांति-भांति के यज्ञों को परिभाषित किया गया है। पुत्रेष्ठी यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ,पितृ मेध यज्ञ आदि अनेकों यज्ञों का बहुत ही संक्षिप्त वर्णन दिया गया है।

परिवार के लिए इस अद्भुत ज्ञान को लाने के लिए आदरणीय संध्या बहिन जी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। आने वाले दिनों में और भी रोचक एवं ज्ञानवर्धक लेख संकलित करने की सम्भावना है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल में सूक्ष्म रूप से चल रही दैनिक ज्ञान कक्षा में सभी गुरु शिष्यों का स्वागत है, आओ गुरुचरणों में समर्पित होकर गुरुज्ञान का अमृतपान करके अपने जीवन को दिव्य दिशा की ओर केंद्रित करें।  

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यज्ञ से अनेक भौतिक लाभ भी होते हैं, प्रत्यक्षत: पर्यावरण का पोषण, सँभाल तो होता ही है एवं आज यह बहुत ही गंभीर विषय है। मानव ने स्वार्थवश प्रकृति का जिस हद तक नाश कर दिया है उससे प्रकृति का रुष्ट होना स्वाभाविक है। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा हुआ है जिसके फलस्वरूप मानव को अति गर्मी,अति सर्दी,अति वर्षा तथा भूस्खलन आदि का सामना करना पड़ रहा है। रोज़मर्रा के दिख रहे विनाश के बावजूद मानव “मैं न मानूँ की अड़ियल प्रवृति” लेकर बैठा हुआ है, अपनी मनमानी एवं मूर्खता से शुद्ध वायु, शुद्ध जल के लिए तरस रहा है। कुछ समय पहले डॉक्टर शुद्ध वायु, शांत वातावरण के लिए पहाड़ों  पर जाने की सलाह देते थे लेकिन आज तो वहां भी शुद्ध वातावरण दुर्लभ हो चुका  है क्योंकि मानव ने स्वार्थ सिद्ध करने हेतु उनका संतुलन भी बिगाड़ दिया है। 

यज्ञकुंड का धूम्र पूरा विस्तार लेता हुआ वातावरण को शुद्ध करता है तथा हवन कुंड मे डाले गए पदार्थों के सूक्ष्म कण (Microparticles/ Nanoparticles) वातावरण में फैल जाते हैं और  यह साँस के माध्यम से जीवधारीयों के शरीर में  प्रवेश करते हैं, पेड़-पौधे भी इस धूम्र से प्रभावित होते हैं।  हवन की इस गैस में अनेक उपयोगी रासयनिक  तत्व होते हैं।  

कई लोग नकारात्मक विचार फैलाते हैं  कि हवन के धुएँ में  कार्बन मानो ऑक्साइड (CO) या कोई अन्य  विषाक्त गैस होती है।  इन नकारात्मक विचारों का शमन करते हुए गुरुवर कहते हैं कि सच्चाई यह है कि हवनकुंड से उठ रही गैस इन जहरीले तत्वों से फ्री है, यदि कोई विषैला अंश रह भी जाए तो देसी घी की Evaporation  उसे नष्ट करके लाभकारी बना देती है । यह लाभकारी गैस बादलों के साथ मिलकर वर्षा के रूप में धरती पर बरसती है, जिससे जल स्त्रोत भी Detox हो जाते हैं।  कृषि में  भी हवन की गैस लाभकारी होती है, मिट्टी की उपजाऊ  शक्ति बढ़ जाती है। यज्ञ का धूम्र गन्ध के कारण भारी होता है और धरती के धरातल पर ही बहता है, इस प्रकार यज्ञ के हवन के Microparticles को पृथ्वी सोख लेती है जिससे कृषि की उपज कई गुना बढ़ जाती है।

संत रामदास एवं संत कबीर बड़े घनिष्ठ मित्र थे, दोनों ही प्रकांड विद्वान थे।  एक बार कबीरदास जी ने रामदास जी को एक रुपया देते हुए कहा कि इससे अपनी जमात को भोजन करा देना।  रामदास ने सूझ से काम लिया, उन्होंने जमात के लिए बन रही दाल में  घी और जीरे का तड़का लगवाकर पूरी  जमात को खिला दी । अब रामदास जी की बारी थी, उन्होंने कबीर दास जी को चवन्नी देते हुए कहा कि इससे पूरे विश्व को भोजन करा देना।  कबीरदास जी सोच में पड़ गए कि इससे पूरे विश्व को भोजन कैसे कराया जाए। उन्हें एक तरकीब सूझी, उन्होंने उस चवन्नी से घी, सामग्री, मिष्ठान लेकर यज्ञ कर दिया, सभी पदार्थ यज्ञाग्नि में Evaporate  होकर सारे वायु मण्डल में  फैल गए, इस प्रकार यज्ञ के माध्यम से एक चवन्नी से सारे विश्व को भोजन करा दिया।

गुरुवर कहते हैं कि यज्ञीय  धर्म-क्रियाओं में  भाग लेने से आत्मा पर  चढ़े कषाय-कल्मश दूर होते हैं। साधक में ईश्वरीय प्रकाश जगता  है । यज्ञ से आत्मा में ब्रह्मत्व ,ऋषित्व की वृद्धि होती जाती है और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य अति सरल हो जाता है। जिस प्रकार घी, शक्कर, मेवा, औषधियाँ आदि बहुमूल्य वस्तुएँ यज्ञ प्रयोजनों में अर्पित किये जाते हैं उसी प्रकार यज्ञ से सीख लेते हुए मनुष्य को अपनी प्रतिभा, बुद्धि, समृद्धि, सामर्थ्य को लोकहित के लिए  समर्पित करना चाहिए।  इस नीति को अपनाने वाले व्यक्ति न केवल समाज का बल्कि अपना भी सच्चा कल्याण करते हैं। जिस समाज से मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है, उसके प्रति भी उसकी अनेक जिम्मेवारियां होतीं हैं, जिन्हें यज्ञीय  भावना से पूरा करना चाहिए। 

यज्ञीय कृत्य से एक साधारण मानव कैसे देवमानव बन जाता है, इसका उदाहरण देते हुए गुरुवर कहते हैं कि गुजरात में जलाराम बापा नाम के एक साधारण किसान रहते थे, छोटी सी जमीन पर खेती करते थे, उसी खेती से जो आमदनी होती उसी से जो राहगीर उधर आता उसे आश्रय देते एवं उनकी पत्नि राहगीर को खाना पकाकर देती।  पति पत्नी का यह उपक्रम लगातार चलता रहा, वह त्याग और बलिदान की मूर्ति बन गए, उनके जीवन काल में  ही उनकी देवता की भाँति पूजा होने लगी तथा वीरपुर में उनके नाम का मंदिर बना, मंदिर के भोजनालय में लाखों का भोजन करते हैं, हर ओर जलाराम की जय जयकार सुनाई देती है।  लोग अपने होटलो, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों का नाम उनके नाम पर रखते हैं । जलाराम बापा की कहानी हम अपने किसी पूर्वप्रकाशित लेख में भी कर चुके हैं, साथी निम्नलिखित लिंक से गुजरात की इस विभूति के बारे में Revision कर सकते हैं।

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE

विभिन्न प्रयोजनों एवं कामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष यज्ञ, विशेष प्रकार की समिधाओं  व औषधि युक्त सामग्री द्वारा किया जाता है।  इसी तरह का “पुत्रेष्टि यज्ञ” होता है, हवन, मंत्रों व औषधियों के प्रभाव से प्रजनन शक्ति को उत्प्रेरित करके गर्भ धारण करवाया जाता है । राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ के परामर्श पर लोमेश ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि से “पुत्रेष्टि यज्ञ” करवाया था, उन्हें राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी । श्रंगी ऋषि पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करने के कारण पुत्रेष्टि यज्ञ कराने में सक्षम थे ।

प्राचीन वैदिक काल में ऋषियों-मनीषियों ने गहन शोध करके यज्ञों की विस्तृत रूपरेखा बनाई थी और समयानुसार उनके प्रयोग होते थे। इन्हीं यज्ञों का संक्षिप्त सा विवरण निम्नलिखित दिया गया है : 

(1) देव-वृत्तियों के विकास के लिए “देवयज्ञ”, मनुष्यों व अतिथियों को सम्मान देने के लिए “नर यज्ञ”, अगणित जीव-जंतुओं के पोषण के लिए “भूत यज्ञ”, “बलि वैश्य यज्ञ” 

(2) पोषक प्रवृतियों के विकास के लिए “विष्णु यज्ञ”, मानसिक जागरण के लिए “रुद्र यज्ञ”, अनाचार दमन के लिए “चंडी यज्ञ” 

(3) उपयोगी पशु धन संवर्धन के लिए “गोमेध यज्ञ”,”अजमेध यज्ञ” 

(4) वसंत और शरद ऋतु में  नवीन अन्न से यज्ञ किए जाते हैं, उन्हें “आग्रयन यज्ञ” कहते हैं 

(5) इंद्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है वह “सौत्रामणि यज्ञ” है

(6) सभी प्रकार की वनस्पतियों और अन्नों से किया जाने वाला हवन “सर्वमेध यज्ञ” होता है 

(7) मृत पित्रादि का अस्थिदाह यज्ञ, “पितृ मेध यज्ञ” है 

(8) समाज मे सतप्रवृत्तियों के संवर्धन के लिए “वाजपेय यज्ञ”

(9) राजनीतिक अनुशासन स्थापित करने के लिए “राज सूय यज्ञ”

(10) समग्र राष्ट्र को प्रगतिशील बनाने के लिए “अश्वमेध यज्ञ” का विधान किया गया है ।

गुरुदेव स्पष्टतः बता रहे हैं कि वैज्ञानिक परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि रासायनिक खाद (Chemical fertilizers) के विपरीत यज्ञ मे पैदा होने वाली गैसों में  ऐसे कोइ भी विषैले तत्व नहीं होते हैं जो मिट्टी की उर्वरक शक्ति को नुकसान पहुंचायें  बल्कि वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुका है कि इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है । आज पर्यावरण विसंगतियां अपने चरम पर हैं, यहाँ तक कहा जा रहा है कि Ozone layer deplete (कम) हो  रही है और सूर्य की बढ़ती हुई गर्मी एवं नाशकारी UV रेडिएशन्स से पृथ्वी नष्ट हो सकती है। सब तरफ प्राकृतिक असंतुलन बढ़ रहा है, ऐसे में  यज्ञ की उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है, जिस तरह लोहे को लोहा काटता है उसी प्रकार हानिकारक वायु को यज्ञ के धुएँ से ही शुद्ध किया जा सकता है।

गुरुवर कहते हैं कि शास्त्रों में दैनिक यज्ञ का विशेष विवरण है, इससे यज्ञशाला मे बैठने वालों तथा आस-पास रहने वालों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है, यज्ञीय  उष्मा से शरीर गर्म होता है और रक्त संचार बढ़ जाता है, इसी के साथ यज्ञ धूम्र की चादर शरीर को ढंक लेती है, ऐसे मे अनेक पौष्टिक और सुगंधित पदार्थ साँस के द्वारा लाखों रोम छिद्रों के द्वारा शरीर मे प्रवेश करते हैं। 

चिंतन-चरित्र, आहार-विहार की पवित्रता के साथ-साथ यह यज्ञोपचार (Yagya therapy,Yagyopathy) सर्वतोमुखी सुख-शांति व स्वास्थ्य का पथ प्रशस्त करता है । इस प्रक्रिया से शरीर को इतना सबल बना लिया जाता है (Immunity) कि उस पर रोग का प्रभाव न हो सके। एक तरफ यज्ञीय  ताप शरीर की प्रतिरोधक शक्ति  को बढ़ाता है, वहीं वह यज्ञ से प्रभावित क्षेत्र के रोग कीटाणुओं को भस्म कर देता है तथा कीट-पतंगो को भी समाप्त कर देता है। इससे यह नहीं  समझा जाना चाहिए कि यह तो हिंसा हुई, गुरुवर इसके सकारात्मक पहलू को बताते हुए कह हैं कि रोग फैलाने वाले कीटाणुओं , कीट-पतंगों  का शमन न्यायकारी है, वैसे ही जैसे अवतारी सत्ता द्वारा असुरों का संहार। 

यज्ञ के चतुर्मुखी लाभ हैं। यज्ञ के प्रभाव को समझाते हुए गुरुवर कहते हैं कि चूर्ण, गोली, इंजेक्शन आदि से भी अति शीघ्र स्पीड से यज्ञ द्वारा  रोगों का इलाज सम्भव है। ऐसा इसलिए है कि यज्ञ का धुआँ साँस द्वारा सीधे शरीर में  प्रवेश करता है। विज्ञान प्रमाणित कर  चुका है वायुरूप (Vapour form) औषधियाँ जितना काम करतीं हैं उतना औषधि खाने/पीने से नहीं होता है। जिन रोगिओं का हाजमा खराब हो गया है, जो कुछ भी खाद्य पदार्थ हजम नहीं कर सकते उनके लिए Yagya Therapy वरदान सिद्ध हुई है। 

एक उदाहरण द्वारा गुरुवर इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए बुहारी बाबा का किस्सा सुनाते हैं। बाबा किसी प्रकार का भोजन नहीं खाते  थे, प्राणवायु के सहारे ही स्वस्थ  जीवन जीते थे। बुहारी बाबा का कहना था कि वायुमण्डल मे अनेक पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं,कोई भी व्यक्ति साधना द्वारा ऐसी शक्ति प्राप्त कर सकता है कि उन तत्वों  को साँस द्वारा शरीर में खींच ले। यही तथ्य यज्ञ के धूम्र के लिए भी अप्लाई होता है। 

कल तक के लिए मध्यांतर, जय गुरुदेव 


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