वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

त्रिवेणी शताब्दी में लिए गए संकल्प से ब्रेक लेकर आद संध्या जी द्वारा प्रस्तुत किये गये कंटेंट पर आधारित लेख श्रृंखला का दूसरा लेख 

गुरुदेव की अदुभुत रचना “यज्ञ पिता-गायत्री माता” में समाहित अद्भुत ज्ञान का स्वध्याय करके आदरणीय संध्या बहिन जी हम सबके लिए 100 पन्नों के ज्ञान का निचोड़ 20 पन्नों में प्रस्तुत किया है। इसी संक्षिप्त ज्ञान को परिवार के मंच पर प्रस्तुत किया गया है। आज इस श्रृंखला का दूसरा लेख प्रस्तुत किया गया है।

शब्द सीमा सीधा लेख को ओर चलने को कह रही है। 

***************     

सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी सभी यज्ञीय-कर्म  का पालन करते हुए  सृष्टि का पोषण, रक्षण और विकास कर रहे हैं । समुद्र, मेघ, पर्वत, नदियाँ, वनस्पतियां ,वृक्ष आदि सभी यज्ञीय अनुशासन से बंधे हैं। पशु- पक्षी, कीट-पतंग भी अपनी-अपनी क्षमता अनुसार प्रकृति के सहयोग में  लगे रहते हैं । समुद्र मे अथाह जल भरा हुआ है किन्तु उस जल का प्रयोग वह अपने लिए नहीं करता है, उदारता पूर्वक बादलों को दे देता है, बादल भी उसे जहाँ तहां ढोकर ले जाते हैं एवं बरसाने का श्रम करते हैं। वृक्ष एवं वनस्पतियां अपने अस्तित्व का लाभ दूसरों को ही देते हैं, फल-फूल दूसरों के लिए ही पैदा होते हैं। पशुओं के दूध (यहाँ तक कि चर्म भी) का लाभ मनुष्य को ही मिलता है । 

“त्याग और बलिदान की यह यज्ञीय  भावना न हो तो संसार का अस्तित्व ही खतरे मे पड़ जाए। 

तभी तो उपनिषद में कहा गया है कि 

“यज्ञ ही संसाररुपी  चक्र की धुरी (केंद्र) “ है। जिस प्रकार साइकिल की धुरी टूट जाने से साइकिल का चलना असंभव है उसी प्रकार समर्पण,परस्पर सहयोग, त्याग बलिदान आदि के बिना संसार का कोई भी कार्य चलना अस्मभव है। 

यज्ञ शब्द का अर्थ बताते हुए गुरुदेव बताते हैं कि इसका अर्थ  देवपूजन, संगतिकरण  और दान है । अपनी समझी जाने वाली वस्तुओं को दिव्य ईश्वरीय शक्तियों की आराधना, उपासना और सक्रियता एवं संगतिपूर्ण अर्पण करना ही “यज्ञ की आध्यात्मिक प्रक्रिया” है । यज्ञ के प्रैक्टिकल  रूप को वर्णित करते हुए गुरुवर कहते हैं कि बड़ों का सम्मान, बराबर वालों का सहयोग, संगति, मैत्री तथा अपने से छोटों को एवं  अपने से कमज़ोर को दान आदि देकर सहायता करना ही यज्ञ है ।

यज्ञ की व्यापक व्याख्या करते हुए गुरुदेव बता रहे हैं कि “यज्ञ सामुहिकता का प्रतीक है।”  बाकी उपासनायें  एवं कर्मकांड अकेले भी किए जा सकते हैं लेकिन यज्ञ के लिए अन्य लोगों का सहयोग लेना, उनको एक परिवार की भांति इक्क्ठा करना बहुत ही आवश्यक  होता है। वैसे तो अकेले में भी यज्ञ करने में कुछ अनर्थ नहीं होने वाला लेकिन  जब मनुष्य अकेले में यज्ञ कर रहा होता है तब भी वोह अकेला नहीं होता, अनेकों सूक्ष्म शक्तियां उसका सहयोग कर रही होती हैं। सामूहिक होकर किये गए यज्ञ का व्यापक प्रभाव परिवार पर एवं पड़ोसियों पर भी होता है। 

यज्ञ को “भारतीय संस्कृति का पिता” कहा गया है क्योंकि भारत में  प्रत्येक शुभकार्य, पर्व-त्योहार,संस्कार आदि यज्ञ के साथ ही संपन्न होते हैं । गुरुवर कहते हैं कि प्रारम्भ से ही होली,दीपावली,दशहरा, रक्षाबंधन आदि हमारे चारों वर्णों के प्रमुख त्योहार इसी यज्ञीय  संगतिकरण की सामुहिकता की शिक्षा से समाज को जाग्रत रखने के लिए किए गए थे । होली श्रमिक वर्ग की एकता का प्रतीक है। सब लोग एक रंग में रंगे हुए, आपस के लड़ाई-झगडे, क्रोध, वैमनस्य को होलिका की लपटों में भस्म कर परस्पर गले लग जाते हैं। दीपावली  वैश्य वर्ग का त्योहार है, दीपकों का  यज्ञ है, इसके माध्यम से मिल-जुल कर, विचार-विमर्श करते हुए समाज के उत्कर्ष के लिए व्यापारिक प्रगति की ओर  अग्रसर हुआ जाता था लेकिन आधुनिक समय में संगतिकरण की भावना लुप्तप्राय होती जा रही है। हर कोई Self-centered, अकेले ही सब कुछ करने में समर्थ समझ रहा है लेकिन इस अकेलेपन का दुष्प्रभाव व्यक्ति एवं समाज पर स्पष्ट दिख रहा है । दशहरा क्षत्रिय वर्ग का पर्व था, समाज की रक्षा का दायित्व क्षत्रिय वर्ग के  कँधों पर था, इस यज्ञ मे अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती थी, तथा समाज रक्षा हेतु उनका उपयोग किया जाता था, समाज को जागरूक रखने हेतु, वीरता का पाठ पढ़ाने के लिए  रामलीला एवं अन्य नाटकों का आयोजन किया जाता था, किन्तु आज स्वयं  के वर्चस्व दर्शाने के लिए शस्त्रों का प्रयोग या संचय किया जाता है। दशहरे की यज्ञीय  भावना संगतिकरण, सामुहिकता विलुप्त हो चुकी है । श्रावणी ब्राह्मण वर्ग का त्योहार था, उस दिन ब्राह्मण यानि  श्रेष्ठ कर्म करने वाले व्यक्ति सारे समाज मे उत्कृष्ट विचारों को फैलाने का कार्य करते थे किंतु आज जो जाति से ब्राह्मण बने बैठे हैं, केवल धन कमाने में  लगे हैं।   

परम पूज्य गुरुदेव ने श्रम को ही यज्ञ बताते हुए कहा है कि श्रम भी यज्ञ ही है, और जिस परिवार,समाज एवं राष्ट्र में  सभी व्यक्ति श्रमशील होते हैं समाज  सुखी एवं समृद्ध होता है। अतः श्रमदान सर्वश्रेष्ठ दान है। आज हमारे देश की दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण श्रम से मुँह मोड़ना ही है। कामचोरी, आलस्य, प्रमाद के कारण लोगों का चरित्र निम्न स्तर का हो गया है। 

जापान से सम्बंधित श्रमदान के निम्नलिखित उदाहरण ने हमें इतना प्रेरित किया कि गूगल भाई साहिब की सहायता से हमने जापान के कितने ही किस्से आत्मसात कर लिए:

एक बार स्वामी रामतीर्थ जी धर्म प्रचार करते हुए जापान देश पहुँचे, वह एक उद्योगपति के घर ठहरे थे, शाम को उनका प्रवचन था। दिन में  वह एक फैक्ट्री देखने गए, उन्होंने देखा कि सभी  कर्मचारी अपने-अपने कार्यों  में व्यस्त  थे, कोई भी प्रश्न  पूछने पर शांति से प्रश्नकर्ता को  बता देते लेकिन काम में ज़रा सा  भी व्यवधान नहीं आने देते। शाम को  स्वामी जी ने अपने प्रवचन में कहा कि भाइयों! मुझे यहाँ धर्म प्रचार करने को कहा गया है किन्तु मेरी समझ में  यहाँ हर व्यक्ति पूरी तरह से धार्मिक है। “जीवन यज्ञ में कर्म एवं श्रम की आहुति देना ही सबसे बड़ा धर्म है। आप सभी श्रम की महत्ता को भलीभाँति जानते हैं, कोई  भी अपने काम से जी नहीं चुराता है, पूरी निष्ठा से काम के प्रति समर्पित हैं, “जीवन यज्ञ” का उत्कृष्ट आचरण यही है,यही  सच्चा धर्म है। स्वामी विवेकानंद, गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी जैसे कितने ही महापुरुषों ने  “Work is worship, काम ही मेरी पूजा है” जैसे सन्देश विश्व के कोने-कोने में पंहुचाने का लगातार प्रयास किया है।  

इसी सन्दर्भ में गुरुदेव कहते हैं  कि अफसोस है कि हमारे देश में  ऐसा Work culture नहीं है। कर्मचारी बिना किसी कारण  हड़ताल करके काम बंद कर देते हैं, जबकि जापान में यदि कभी  हड़ताल की जरूरत पड़ती भी है तो कर्मचारी ज्यादा काम करते हैं, हड़ताल से काम पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है, उल्टे और ज्यादा काम होता है। यही कारण है कि सारा प्रशासन ही कर्मचारिओं की समस्याओं का निराकरण करने में  जुट जाता है ।

यज्ञीय भावना को समझाने के लिए गुरुवर और स्पष्टता से बता रहे हैं कि

इस संदर्भ मे गुरुवर राजा महेन्द्र प्रताप सिंह  का उदाहरण वर्णित करते हुए कहते हैं कि, उनके कोई संतान नहीं थी, उन्होंने अपने राज्य के सभी बच्चों को अपनी संतान के रूप में  अपनाया तथा बच्चों के लिए एक महाविद्यालय बनवाया, जिसका नामकरण महामना मालवीयजी ने “प्रेम महाविद्यालय” रखा।  आज भी यह महाविद्यालय, मथुरा-वृंदावन मार्ग पर स्थित है, जो राजा महेन्द्र प्रताप के त्याग-बलिदान की यज्ञीय  भावना का स्वर्णिम उदाहरण है । इस विद्यालय से सम्बंधित X (twitter) से एक वीडियो एवं कुछ जानकरी मिली है जिसे साथिओं के साथ शेयर करना अपना कर्तव्य समझते हैं। 

इसी प्रकार जमनालाल बजाज जी का त्याग समर्पण भी सदैव याद रहेगा, उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में  उपयोग करने के लिए अपना सारा धन महात्मा गाँधीजी को यह कहते हुए समर्पित कर दिया कि मैं भी तो आपका ही बेटा हूँ । इसी तरह के समर्पित व्यक्तित्व में  ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी भी हैं।  उन्हें 450 रुपये सैलरी मिलती थी, वह 50 रुपये में  अपना खर्च चलाते तथा 400  रुपये गरीब विद्यार्थियों पर खर्च कर देते थे, गुरुवर कहते हैं कि  त्याग-बलिदान की भावना ही यज्ञ की असली प्रेरणा है।

अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी अपनी प्रतिभा क्षमता का उपयोग करें, यही  देवपूजन है,यही दान है।  यज्ञ देवता को हम जो भी अर्पण करते हैं, उसे वे वायुभूत (Evaporate) करके  सारे वायुमण्डल में  बिखेर देते हैं तथा उसे हजारों गुना बढ़ाकर वापस कर देते हैं।  हमें भी यही  गुण अपनाना चाहिए, समाज से जो कुछ मिला है, जो कुछ मिलता रहा है और मिलता रहेगा, उसे जितना सम्भव हो वृद्धि करके करके समाज को वापस करने की बात सोचें

इसे ही आगे बढ़ाते हुए गुरुवर कहते हैं कि जीवन का अर्थ यह कदापि नहीं है कि “लूटो और खाओ”,अपने व्यक्तिगत जीवन का उदाहरण देते हुए गुरुवर कहते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी था उसे हमने समाज के खेत में  बो दिया, समय आने पर काटा और बांट दिया।  इस यज्ञीय  भावना से ही तो इतना बड़ा, विशाल संगठन खड़ा हो सका है और चारों तरफ विचार क्रांति का शंखनाद गूँज रहा है।

गुरुवर आगे बता रहे हैं कि यज्ञ से दिव्य शक्तियों का विकास होता है । ऋगवेद मे यज्ञाग्नि को पुरोहित कहा गया है। यज्ञ की शिक्षाओं  पर चल कर लोक-परलोक दोनों सुधरते हैं। 

ये शिक्षायें  इस प्रकार हैं: 

(1) यज्ञ पुरोहित अपने आचरण द्वारा हमें सिखाता है कि अपनी शिक्षा, समृद्धि, प्रतिभा आदि विभूतियों का उपयोग अपने लिए न्यून एवं जन-कल्याण के लिए अधिकतम होना चाहिए। इस बात को समझने के लिए हवनकुंड का उदाहरण दिया गया है जहाँ हम बहुमूल्य पदार्थ अग्नि को समर्पित करते हैं,अग्नि उन्हें अपने पास संग्रह न करके सर्वसाधारण के लिए वायुमंडल मे बिखेर देती है। 

(2) जिस प्रकार अग्नि अपने संपर्क मे आने वाली सभी वस्तु का संस्कार कर अपने में  आत्मसात करके  अपने जैसा बना लेती है, उसी तरह हमें भी समाज के पिछड़े, दीन-हीन,दुःखी, दलित, पीड़ित आदि को अपने मे आत्मसात करके,अपने समान बनाने का आदर्श निभाना चाहिए। 

(3) अग्नि की ही भांति सदैव ऊपर की ओर उठने का प्रयास होना चाहिए। प्रलोभन,भय आदि कुछ भी क्यों न हो, संकल्प और मनोबल अग्निशिखा की तरह ऊंचा ही होना चाहिए l 

(4) जब तक अग्नि जीवित है,उष्णता और प्रकाश की अपनी विशेषताएं नहीं छोड़ती है, उसी प्रकार हमें गतिशीलता की गर्मी तथा धर्म परायणता की रोशनी को कभी भी घटने नहीं देना चाहिए।  जीवनभर पुरुषार्थी एवं कर्तव्यनिष्ठ रहना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी जिंदादिली का ही तो नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं ?

(5) यज्ञाग्नि की पावन भस्म  मस्तक पर लगाते हुए हमें सीखना चाहिए कि मानव जीवन का अंत मुट्ठी भर भस्म के रूप में ही तो  है। यज्ञ की  भस्म को याद करते हुए तथा अपने जीवन के अंत को स्मरण रखते हुए, अपने जीवन का  सदुपयोग करना चाहिए। हमारे गुरुदेव ने तो हर दिन नया जन्म, हर रात नई मृत्यु का सन्देश भी दिया है। 

कल तक के लिए मध्यांतर, जय गुरुदेव 


Leave a comment