वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

त्रिवेणी शताब्दी में लिए गए संकल्प से ब्रेक लेकर आद संध्या जी द्वारा प्रस्तुत किये गये कंटेंट पर आधारित लेख श्रृंखला की प्रस्तावना 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा के समर्पित गुरु शिष्य भलीभांति जानते हैं कि इस मंच से परम वंदनीय माता जी के अवतरण, परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। गुरुसत्ता के आशीर्वाद से, उनके मार्गदर्शन में जनवरी 2026 से आरम्भ हुए इस दिव्य संकल्प को मई 2026 तक के 119 दिन निभाया गया लेकिन हमारी नियमित एवं समर्पित साथी आदरणीय संध्या कुमार जी के प्रयास को सम्मान न देने का दुष्ट कार्य हमारे लिए कितना असहाय होता शब्दों में वर्णन करना कठिन है। शब्दों की लीपा-पोती करके कुछ चाटुकारिता कर भी लेते (जो हमारी प्रवृति के बिल्कुल विरुद्ध है) लेकिन अपनी आत्मा को कैसे समझा पाते? 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक साथी  केवल व्यावहारिक संबंधों से नहीं बल्कि आत्मिक संबंधों से जुड़ा हुआ है, आत्मिक संबंधों  के लिए शब्दों की कहाँ कभी आवश्यकता रही है ? इसलिए आवश्यक हो जाता है कि बहिन जी द्वारा किया गया प्रयास गुरुकक्षा में प्रस्तुत किया जाये एवं इसके समापन के बाद वर्ष 2026 में लिए गए संकल्प पर फिर से वापिस आया जाये।  

अपने साथिओं को बताना चाहेंगें कि आदरणीय संध्या बहिन जी की प्रस्तुति परम पूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के आपस में किये गए संवाद से उठे महत्वपूर्ण प्रश्नों के निवारण का संग्रह है। यह संवाद गायत्री तपोभूमि में स्थित दिव्य गायत्री मंदिर की सीढ़ियों  पर बैठे गुरु-शिष्य का दिव्य वार्तालाप है। साथिओं से करबद्ध अनुरोध है कि  यदि आप इस दिव्य कंटेंट का सही मायनों में लाभ उठाना चाहते हैं तो अपनेआप भी मंदिर की उन्हीं सीढ़ीओं पर बैठे अनुभव करें, इससे कम में बात नहीं बनने वाली। अगर इस भावना से इस ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करेंगें तो अवश्य ही आपके ह्रदय में उठने वाले विचार विस्तृत कमेंट में परिवर्तित होंगें, आपको मास्टरपीस कमेंट लिखने को प्रेरित करेंगें, ऐसे कमेंट जिनसे अनेकों का कायाकल्प होना सुनिश्चित है  न कि मात्र “जय गुरुदेव”, इस क्षण की फील के लिए हमने अपनी लाइब्रेरी में से चुन कर एक प्रतीकात्मक चित्र संलग्न किया है,अवश्य ही चित्र  में दिखाए गए पुरुष लीलापत जी नहीं हैं। 

अपने साथिओं के समक्ष बहिन जी द्वारा संकलित कंटेंट लाने से पहले न जाने हमने कितनी ही बार पढ़ा, समझा, एडिट किया, तब कहीं निर्णय बना कि हाँ अवश्य ही यह उत्कृष्ट ज्ञान का भंडार है एक ऐसा ज्ञान जिसे समझना बहुत ही ज़रूरी है। जब तक हमने ध्यान से पढ़ा नहीं था, मूर्खों की भांति यही समझ रहे थे कि “यज्ञ पिता-गायत्री माता” जैसे विषय पर क्या होगा। कुछ कर्मकांड होंगें, गायत्री उपासना होगी, और क्या होगा लेकिन इस कंटेंट के कुछ एक आरंभिक पन्नें ही  पढ़ने पर अनुभव हुआ कि  यह कुछ और ही है, इसने  तो आदरणीय ओंकार जी की वाणी में “हे प्रभु जीवन हमारा यज्ञमय कर दीजिये” को सार्थक कर दिया। बहिन जी द्वारा भेजे गए कंटेंट के मात्र 400 शब्द ही प्रयोग किये हैं, गुरुदेव ने हमसे बाकि का क्या लिखवा लिया हम स्वयं नहीं जानते। 

पुस्तक के पृष्ठ 6 पर यज्ञ के बारे में दिया गया निम्नलिखित ज्ञान एक ऐसा  Eye opening ज्ञान है कि जिसे  पढ़ने के बाद कोई भी यज्ञ को मात्र  कर्मकांड न मान कर, जीवन के हर पहलु से जोड़ पायेगा। 

हमारी अल्प बुद्धि ने, जहाँ-जहाँ जितना संभव हो पाया इस यज्ञीय प्रक्रिया को जीवन से जोड़ने का प्रयास किया है।         

गुरुदेव कहते हैं कि “साधारणतः लोग यज्ञ का मतलब ही नहीं समझते । कहीं भी हवन कुंड में थोड़ी सी लकड़ियां रखीं, आग जलाई, सामग्री डाल दी,कुछ मंत्र बोल लिए तो हो गया यज्ञ। हवन कुंड न मिला तो कढ़ाई, तवा रख लिया या ऐसे ही जमीन पर रखकर हवन कर दिया । इसी को लोग हवन समझ लते हैं। यह तो सचमुच एक मखौल जैसा ही हो गया ।”

लीलापत जी ने निवेदन किया, “गुरुदेव ! ऐसा ही है । लोग तो इसे ही यज्ञ समझते हैं और कहते हैं कि इससे क्या लाभ ? बेकार में घी व अन्य सामान को आग में जलाकर बरबाद करने से तो अच्छा है कि उसे खा लें । इस मंहगाई के जमाने में कुछ तो शरीर में लगेगा ।”

“यही तो भ्रम है बेटा ! पहले यज्ञ का अर्थ तो समझो । यह एक साधारण क्रिया नहीं है । जो हो रहा है वह तो उसके क्रियात्मक पक्ष का भी बिगड़ा हुआ रूप है। अरे, यज्ञ तो विज्ञान है, एक प्रैक्टिकल  विज्ञान है। यज्ञ सारे संसार के पर्यावरण को संतुलित रखता है, रोग निवारण करता है, उत्कृष्ट दैवी तत्वों का संवर्धन करता है । यज्ञ, मात्र अग्नि के साथ, अग्नि के समक्ष किया जाने वाला कर्मकांड ही नहीं है, वह तो स्रष्टा के अनुशासन में भावना, विचारणा, पदार्थ एवं क्रिया के संयोग से उत्पन्न होने वाला “एक अद्भुत पुरुषार्थ” है । तभी तो जन्म से मृत्यु तक, बल्कि जन्म से भी पहले पुंसवन संस्कार से अंतिम संस्कार तक सभी षोडश संस्कारों पर, पर्व-त्यौहारों पर यज्ञ का आवश्यक विधान किया जाता है। 

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आज के दिव्य ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारंभ आदरणीय संध्या बहिन जी के ही निम्नलिखित शब्दों से करना उचित समझते हैं। बहिन जी का नाम ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की उस सूची में शामिल है जिसमें न केवल परिवार द्वारा डिजाइन किए गए “मानवीय मूल्यों” को पालन करने वाले सहकारी शामिल हैं बल्कि बहिन जी अनेकों के लिए उदाहरणीय भी हैं। 

त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित संपूर्ण 2026 वर्ष में से कुछ समय निकाल कर आज आरम्भ हुए टॉपिक पर केंद्रित करने में गुरुसत्ता की आज्ञा तो है ही, उन्हीं का आशीर्वाद अवश्य ही है:

आदरणीय भाई जी इस दिव्य रचना को संक्षिप्त करते हुए मैंने यह लेख लिखने का प्रयास किया है, आशा करती हूँ कि आपका एवं समस्त परिवार का स्नेह,सहयोग प्राप्त होगा। यह दिव्य रचना परम पूज्य गुरुदेव एवं आदरणीय पंडित लीलापत शर्मा जी के परस्पर संवाद पर आधारित है। 

महान भक्तवत्सल गुरु एवं अति समर्पित शिष्य के मध्य हुए संवाद बेहद ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक एवं रोचक हैं एवं दोनों के प्रगाढ़ संबन्धों को दर्शाते हैं। 

समस्त परिवारजनों से विनम्र निवेदन है कि वर्तमान लेख श्रृंखला के दैनिक ज्ञानप्रसाद लेखों के अमृतपान के साथ-साथ पंडित लीलापत शर्मा जी की दिव्य रचना पढ़कर भी आनन्द एवं लाभ अवश्य उठाएं। 100 पन्नों की पुस्तक जिसका शीर्षक “यज्ञ पिता-गायत्री माता” है, 27 अलग-अलग विषयों पर इतनी सरल और महत्वपूर्ण जानकारी देती है जिसे हम सबको समझना अति आवश्यक है।   

यज्ञ के संबंध में गुरुवर कहते हैं कि यज्ञ के लिए मनुष्य को ही प्रेरित क्यों किया जाता है, सृष्टि में अनेकों तरह के अन्य प्राणी भी हैं, उन्हें तो यज्ञ करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर  ने मनुष्य को एक “विशेष प्रतिभा” का अनुदान दिया है एवं मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो प्रकृति का सबसे अधिक प्रयोग करता है। वह न केवल प्रकृति का सबसे अधिक प्रयोग ही करता है इसका भरपूर  नाश भी करता है। इसलिए सृष्टि एवं प्रकृति को  बचाकर रखना भी उसकी ही ज़िम्मेवारी है, कर्तव्य है। गुरुदेव बताते हैं कि यज्ञ करते समय “यज्ञीय  भावनाओं” के अभिवर्धन पर, बढ़ाने पर बल दिया गया है। यज्ञ से सम्बंधित दो समिधाएं “स्वाहा और स्वधा” को गुरुदेव मनुष्य के जीवन-यज्ञ से जोड़ते हुए कहते हैं कि “स्वाहा का अर्थ है आत्मत्याग” और स्वयं से युद्ध करने की क्षमता, स्वधा का अर्थ है जीवन व्यवस्था में  “आत्मज्ञान” को धारण करने का साहस ।

गुरुवर सचेत करते हुए बता रहे हैं कि यज्ञ “भावना प्रधान” होना चाहिए। भावनाओं के बिना किया गया यज्ञ, मात्र एक कर्मकांड ही रह जाएगा। इस तरह किये गए यज्ञ का प्रभाव उतना ही रह जाएगा जितना  अग्नि में अर्पित किये जाने वाले अन्य पदार्थों का होता है। 

यज्ञ का पूरा लाभ प्राप्त करने  के लिए भावना, श्रद्धा, सक्रियता तीनों आवश्यक हैं । यज्ञ से तात्पर्य देव पूजन, दान, त्याग, बलिदान व संगतिकरन है  । यज्ञ में हम स्वादिष्ट, प्रिय खाद्य पदार्थ तथा मूल्यवान, सुगन्धित द्रव्य अर्पित करते हैं।  यह दान की भावना से प्रेरित है एवं  यज्ञ की मूल भावना है जो कि संसार के सभी क्रियाकलापों में  दृष्टिगोचर होती है। 

जीवन-यज्ञ के साथ जोड़ते हुए, यज्ञ का सही रूप समझाते हुए गुरुवर कहते हैं कि माता-पिता के त्याग एवं  बलिदान से ही शिशु का जन्म होता है एवं पालन पोषण होते हुए उसका जीवन संवरता है। अतः मूल भावना (Basic emotion) त्याग एवं बलिदान की  होती है। सही अर्थों में “यज्ञीय भावना” समर्पण की ही भावना है। सन्धिच्छेद करने पर पता चलता है कि “स्वाहा” शब्द सु (अच्छी तरह) और आह (कहा हुआ) अर्थात ठीक उच्चारण के साथ समर्पित की जाने  वाली वस्तु के लिए प्रयोग किया जाता है। जब भी कोई आहुति दी जाती है तो स्वाहा बोल कर यह माना जाता है कि वह सामग्री सीधे देवताओं को अर्पित (समर्पित) की जा रही है। अर्पित की गयी सामग्री को ब्रह्माण्ड में व्याप्त दिव्य शक्तिओं/देवताओं आदि तक पँहुचाने के लिए अग्नि एक मीडियम का रोल निभाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही आहुति स्वीकार करके देवताओं तक पँहुचाते हैं। यहाँ यह जानना बहुत ही ज़रूरी है कि जिस प्रकार “स्वाहा के उच्चारण से” अर्पित की गयी वस्तु अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पंहुचती है ठीक उसी तरह “स्वधा के उच्चारण से” अर्पित किये गए पदार्थ पितरों तक पंहुचते हैं।

आज का मानव इसी समर्पण,त्याग, बलिदान के सिद्धांत को भूल चुका है, उसका वरण करने से भागता फिरता है।  प्रजनन, पालन पोषण आदि में माता पिता अपना सर्वस्व त्याग करते हुए बलिदान कर देते हैं। आज की युवा-पीढ़ी ऐसे बलिदान, समर्पण, त्याग आदि के लिए कहाँ तैयार होती है? कहाँ राज़ी होती है? कुछ समय पहले एक/दो बच्चों का सन्देश बहुत प्रचलित हुआ था लेकिन आज तो No child का स्लोगन चल रहा है। एक तो विवाह देर से होने,उसके बाद अपने मनोरंजन आदि को बलिदान कौन करना चाहता है। आज की पीढ़ी को “यज्ञीय भावना” का लेक्चर देना,समझाना कितना कठिन है इन पंक्तियों को पढ़ रहे सभी साथी जानते हैं। बलिदान आदि की कहाँ बातें की जाती है? आज का युग तो Eat,drink and be merry का युग है लेकिन चाहे जो कुछ भी कर लें इस तथ्य को न केवल समझना होगा बल्कि Accept भी करना ही पड़ेगा कि  ब्रह्मांड की सारी क्रियाएं यज्ञवृति पर ही आधारित हैं। 

मनुष्य ब्रह्माण्ड का ही एक महत्वपूर्ण यूनिट है एवं  सृष्टि के विधान से, उसके बनाए नियमों से अलग कैसे रह सकता है। जहाँ भी उसने सृष्टि से, प्रकृति से, पर्यावरण से खिलवाड़ करने का प्रयास किया, उसका खुद का ही विनाश हो गया। 2004 की सुनामी किसको भूली होगी जब कुछ सेकण्ड्स में ही 2 लाख से भी अधिक लोगों का पता तक नहीं चला था, अंडेमान निकोबार द्वीपों में से कुछ स्थानों का तो नामोनिशान ही मिट गया था। प्रकृति के साथ पंगा? अरे मुर्ख समझ जा, तू चाहे मुझे  भूल जा, सर्वशक्तिवान बन जा लेकिन मैं समय-समय पर अपनी शक्ति दिखाने  के लिए प्रकट होता ही रहूँगा क्योंकि मैं तेरा बाप हूँ,भला संतान भी कभी अपने जन्मदाता से अधिक शक्तिशाली हो सकती है। 

बहुत ही भावनात्मक, रोचक विषय है, मन कर रहा है कि इसी में डूब जाएँ लेकिन इसके आगे की बात कल करेंगें,अपने सहपाठिओं को सुनामी से सम्बंधित वीडियो के साथ छोड़ कर जाने की आज्ञा चाहते हैं। 

धन्यवाद्, जय गुरुदेव 


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