ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं। 88 (?) पन्नों का यह स्मृति विशेषांक 40 पन्नों में ब्लैक एंड वाइट चित्र लिए हुए है, चित्रों की क्वालिटी Low होने के बावजूद बहुत सी जानकारी दर्शा रहे हैं।
हमारे साथी देख सकते हैं आज के ज्ञानप्रसाद लेख की भूमिका में 88 के आगे प्रश्न-चिन्न(?) अंकित किया गया है। प्रश्न-चिन्न अंकित करने का कारण है कि जो स्कैन कॉपी हमारे पास उपलब्ध है उसमें “अपनों से अपनी बात” वाले चैप्टर के आरंभिक पृष्ठ मिसिंग हैं। साफ़ दिख रहा है कि स्कैन करते समय इन (कुछ) पृष्ठों को स्कैन किया ही नहीं। टेक्स्ट कॉपी में यह चैप्टर एवं पन्नें साफ दिख रहे हैं ।
खैर, जो भी हो कहीं भी त्रुटि हो ,जब भी दिखे, उसे बताना हमारा परम कर्तव्य है, प्रवृति है।
मातृशक्ति को समर्पित आज प्रस्तुत किये गए 11वें लेख में परम पूज्य गुरुदेव हमें परम वंदनीय माताजी की शक्ति के बारे में बता रहे हैं। वैसे तो लेख का शीर्षक ही Self-explanatory है लेकिन उससे भी बढ़कर लेख में सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा, विद्या-अविद्या आदि शब्दों को समझने का प्रयास किया गया है। हमने अपनी अल्पबुद्धि से, अल्पज्ञान से यथासंभव लेख को अधिक से अधिक सरल बनाने का प्रयास किया है ताकि हमारे साथिओं को समझने में कोई भी कठिनाई न हो, हम कितना सफल हो पाए हैं, आपके कमेंट ही बता पायेंगें।
आइए सभी गुरुशिष्य, गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर उस गुरुज्ञान का अमृतपान (मृत को भी प्राणशक्ति प्राप्त हो सकती है) करें जिससे जीवन जीने की कला सीखने का सौभाग्य हो रहा है।
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परम वंदनीय माता जी की स्मृति में,अखंड ज्योति 1995 के फरवरी अंक को “मातृशक्ति विशेषांक” कह कर प्रकाशित किया गया था। इस अंक के स्वाध्याय में लगातार आद्यशक्ति का स्मरण आता है एवं अनुभव होता है कि शक्ति का लीला समूह कितना अद्भुत है जो दृश्य रूप में, देखने में कुछ भी समझ नहीं आता। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि देखने में तो माताजी एक अति साधारण सी महिला हैं। आद्यशक्ति जिसे आदिशक्ति भी कह सकते हैं इसका अर्थ प्रथम, बेसिक एवं मूल शक्ति होता है, आदि और अंत में भी आदि का अर्थ प्रथम ही होता है।
अब स्थूल में न दिख पड़ने के बावजूद, माताजी और भी व्यापक विस्तार में अपना कार्य कर रही हैं। आवश्यकता है तो केवल माताजी की शक्ति को अनुभव करने की, उस दृष्टि से देखने की जिससे यह जाना जा सके कि माताजी आखिर हैं क्या? सूक्ष्म वृतांतों से मिली जानकारी से ज्ञात होता है/विश्वास होता है कि हम किस महान शक्ति स्रोत से जुड़े थे व अब भी जुड़े रहकर उस शक्ति तो लगातार पाने के अधिकारी हैं।
परम पूज्य गुरुदेव ने स्थान-स्थान पर “शक्ति की आराधना” की बात लिखी है व गायत्री महाविद्या द्वारा अशक्ति (Weakness) से मुक्ति, अज्ञान से मुक्ति, अभावों से मुक्ति का वर्णन किया है। ध्यान से देखा जाए तो शक्ति केवल एक ही है। साकार भाव को प्राप्त परब्रह्म की ही मूर्ति, देवी भाव में स्थित होकर सीता, राधा, सरस्वती, लक्ष्मी, महेश्वरी आदि विविध रूपों में विभिन्न उपासकों के द्वारा पूजित होती आ रही है।
रामकृष्ण परमहंस ने उसी को “माँ काली” के रूप में पूजा था व उसी के दर्शन अपने प्रिय शिष्य नरेन्द्रनाथ दत्त को कराकर साक्षात आद्यशक्ति के दर्शन कराये थे। महर्षि अरविंद ने महाचेतना के रूप में सुपर चेतन जगत में विद्यमान सत्ता से अवतरित हो रही सावित्री महाशक्ति के रूप में उसी आद्यशक्ति की व्याख्या की एवं “श्रीमाँ” के माध्यम से उसका बहिरंग रूप विश्व को दिखाया। परम पूज्य गुरुदेव शक्तिमत के प्रचारक थे या किसी अन्य सिद्धाँत के, इस विवाद में न पड़ कर हम यही विचार करें कि उन्होंने हमारे समक्ष आद्यशक्ति का मातृ-स्वरूप, एक तेजस्वी रूप रखा जो स्नेह, ममत्व, करुणा, पोषण, लालन-पालन, सुधार-दुलार सभी का समन्वित रूप बन “माता भगवती देवी” के रूप में हम सबके बीच में आयीं।
गायत्री महाशक्ति एक मंत्र छंद के रूप में वेदों में विद्यमान हैं, यदि मानें तो उनमें किन गुणों को देखें, गुरुदेव ने यह सब परम वंदनीय माताजी के रूप में साक्षात् प्रतिबिंबित कर दिखाया।
शक्ति के दो परस्पर विरोधी रूप:
सभी जानते हैं कि शक्ति के दो परस्पर विरोधी रूप होते हैं। एक रूप “विद्या’ का ईश्वरोन्मुख” रूप होता है, जिसे संस्कृत में विद्या कहते हैं तथा दूसरा “संसार प्रधान” रूप होता जिसे संस्कृत में ‘अविद्या’ कहते हैं। पहली विद्या मोक्ष और आनंद देने वाली है और दूसरी बंधन और दुःख का कारण है। दूसरी का आवरण पहली पर चढ़ा रहता है। उसे हटाकर ही शक्ति के वास्तविक स्वरूप को देखा जा सकता है। जगत-जननी के उपासक यही कहते हैं कि हे देवि! हम तुम्हारी अविद्या शक्ति से मोहित होकर तुम्हें भूल जाते हैं और संसार के तुच्छ पदार्थों में सुख का अनुभव करने लगते हैं लेकिन जब हम तुम्हारी पूजा करते हैं, तुम्हारे प्रति अपनी श्रद्धा आरोपित करते हैं, तुम्हारी शरण में आ जाते हैं तब तुम हमें अज्ञान से एवं संसार की आसक्ति (तृष्णा,भूख,मोहमाया) से मुक्त कर देती हो और अपने विराट परिवार के बच्चों को सुख-शांति प्रदान करती हो।’
शक्ति के इन दो आयामों (विद्या और अविद्या) को समझ कर बहिरंग “अविद्या’ वाले स्वरूप” से नहीं, विद्या वाले स्वरूप को भलीभाँति समझ कर यदि शक्ति को समर्पण किया जाय तो वह सब मिल सकता है जो पत्थर की मूर्ति में विद्यमान महाकाली से गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को मिला था। वास्तविकता यही है कि मातृशक्ति रूपी दिव्य सत्ता के प्रति जिस स्तर की श्रद्धा विकसित हुई है व्यक्ति को उसी अनुपात में मिलता चला गया।
परम पूज्य गुरुदेव ने अगस्त 1979 की अखंड ज्योति (प्रज्ञावतार अंक) में स्पष्ट लिखा है कि युगशक्ति का अवतरण श्रद्धा और विवेक के संगम के रूप में होने जा रहा है। अगले दिनों मनुष्य की सबसे बड़ी संपदा एवं उपलब्धि “ऋतंभरा प्रज्ञा” मानी जाएगी। ऋतंभरा वह जिसमें विवेक और श्रद्धा का समुचित समावेश हो। इसमें श्रद्धा की परिभाषा करते हुए गुरुदेव ने कहा है कि श्रद्धा उस आस्था का नाम है जो “उत्कृष्ट आदर्शवादिता” को अधिक से अधिक प्यार करे और उस स्तर के चिंतन तथा कर्तृत्व से भाव भरे रसास्वादन का आनंद प्राप्त करे। विवेक और श्रद्धा का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है, वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्में,पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाते चले जाते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव “प्रखर प्रज्ञा” के, विवेक के, बुद्धि के उत्कृष्टतम स्तर के प्रतीक के रूप में, अवतारी सत्ता के रूप में, हम सबके बीच में आए। परम वंदनीय माताजी “सजल श्रद्धा” के रूप में, शक्ति के स्वरूप में हम सबके बीच उनकी पूरक सत्ता के रूप में आयीं। दोनों के सम्मिलित पुरुषार्थ से प्रज्ञावतार की युगाँतरीय चेतना ने जन्म लिया तथा सर्वप्रथम सुसंस्कारिता के जागरण, तत्पश्चात् संकल्पशक्ति व साधना समर्पण के माध्यम से देव संस्कृति विस्तार की प्रक्रिया के निमित्त गीता के 18 अध्याय की तरह, मात्र दो वर्षों की अवधि में 18 दिग्विजयी पुरुषार्थ अश्वमेधों के रूप में संपन्न हो गए।
यही है शक्ति का प्राकट्य, जो पहले स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता, फिर अपनी शक्ति का झंझावाती आभास देकर सूक्ष्म में विलीन हो, प्रखर-शक्तिशाली रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है।
गुरुदेव ने स्थान-स्थान पर, परम वंदनीय माताजी के प्रति विचार दिए हैं किंतु सबसे बड़ी उपमा जो गुरुदेव जैसी महाकाल सत्ता ने माताजी को सतत् दी है वह है “सजल श्रद्धा रूपी शक्ति” की, जिनसे गुरुदेव को युग परिवर्तन का कार्य कर सकने की ऊर्जा मिली। परम वंदनीय माताजी के लिए ऐसे विचार, मात्र कृतज्ञता नहीं हैं बल्कि एक संक्षिप्त सा परिचय है। यह उस आद्यशक्ति का परिचय है जो हम सबके बीच आयीं, सीमित अवधि की सामान्य सी दिखने वाली, असामान्य जीवनचर्या को जीती हुई देखते-देखते हमारे बीच से ओझल हो गयीं। यदि हम माताजी के सही रूप को समझ पाये, तो “महाकाल के सहचर महाकाली के रूप” में उन्हें समझना होगा। एक ही महाकाल पुरुष की 10 शक्तियों में सर्व प्रसिद्ध प्रथम स्थान पर महाकाली का नाम है। अर्धनारीश्वर की उपासना का मौलिक रहस्य इसी फिलॉसॉफी में छिपा है कि हम उन्हें एक दूसरे का पूरक मानें तथा इस मर्म को समझते हुए अपनी श्रद्धा, अपना समर्पण अभिव्यक्त करते हुए माँ से एक ही प्रार्थना करें:
माँ! विद्या की ओर, सद्बुद्धि की ओर ले चल। हमारी तेरे प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि यही हो कि हम तेरे सच्चे स्वरूप को पहचान कर सुपथ पर चलने को प्रेरित हों।
अखंड ज्योति फरवरी 1995 का मातृशक्ति विशेषांक इसी भावना के साथ मातृसत्ता के युगल चरणों में समर्पित किया गया था।
