आज के ज्ञानप्रसाद लेख के साथ 3 स्लाइड्स अटैच की गयी हैं जिनमें लेख के कंटेंट को चीटशीट की भांति दिखाया गया है। प्रयास करेंगें की आने वाले दिव्य संदेशों में इन चीटशीट को शामिल किया जाये।
शब्द सीमा के कारण आज सीधा लेख की और ही रुख करना होगा।




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गुरुदेव के जीवन में माताजी एक वरदान की तरह आईं:
भगवान के वरदान की तरह ही माताजी हमारे जीवन में आयीं। उनके बिना मिशन के उदय और विस्तार की कल्पना तक करना कठिन था। गुरुदेव की इन बातों से माताजी के प्रति उनके दृष्टिकोण का सहज अहसास तो हो जाता है लेकिन यह वरदान उनके जीवन में न तो अचानक आया और न ही एकदम आ उतरा। गुरुदेव को इस वरदान की वर्षों पूर्व जानकारी थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने अपने प्रथम दर्शन के दिन ही इसका संकेत करते हुए कहा था:
“तुम्हारे विवाहित होने से मैं प्रसन्न हूँ। इसमें बीच में व्यवधान तो आएगा, लेकिन पूर्व जन्मों में तुम्हारे साथ रही सहयोगिनी एक बार फिर पत्नी के रूप में मिलेगी, जो आजीवन तुम्हारे साथ रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पिछले दो जन्मों में तुम्हें सपत्नीक रहना पड़ा है। यह कभी भी मत सोचना कि इससे कार्य में बाधा पड़ेगी, वस्तुतः इससे आज की परिस्थितियों में सुविधा ही रहेगी एवं युग परिवर्तन के प्रयोजन में भी सहायता मिलेगी।”
यह पंक्तियाँ गुरुवर की बहुचर्चित पुस्तक “हमारी वसीयत और विरासत” में वर्षों पहले प्रकाशित हो चुकी थीं, उसका स्क्रीनशॉट संलग्न है।
भगवान की कृपा और विधान एक ही है। इस सत्य को बहुत कम लोग अनुभव कर पाते हैं। यह अनुभूति कड़वी-मीठी कैसी भी हो लेकिन औषधि की तरह गुणकारक अवश्य ही होती है।
गुरुदेव की प्रथम पत्नी सरस्वती देवी जी का देहावसान, भगवान के अटल विधान की तरह उनके जीवन में घटित हुआ। लगभग इसी समय उनके पुराने सहयोगी मिशन के नैष्ठिक कार्यकर्ता बद्रीप्रसाद पहाड़िया जी (इन्हीं पहाड़िया जी को गुरुदेव ने प्रथम दीक्षा दी थी) की धर्मपत्नी का भी निधन हुआ था। पहाड़िया जी ने पत्र लिखकर यह दुःखद सूचना पूज्यवर को दी, जिसका जवाब देते हुए उन्होंने लिखा:
“पत्र में तुम्हारी पत्नी के निधन के बारे में पढ़कर दुःख हुआ। इसे नियति का खेल समझ कर सहन कर जाओ। मेरी पत्नी की मृत्यु भी इन्हीं दिनों हुई है। वर्तमान में हम दोनों को एक सा दुःख झेलना पड़ रहा है। मैं तो दूसरी शादी करूंगा क्योंकि इसका संबंध मिशन के भविष्य से है, मार्गदर्शक का आदेश ही कुछ ऐसा ही है लेकिन तुम शादी मत करना।”
अपनी गुरुसत्ता के आदेश को शिरोधार्य करते हुए गुरुदेव माताजी के साथ दाँपत्य सूत्र में बँधे। उन दिनों वह व्यस्तताओं और विवशताओं से घिरे थे। स्वतंत्रता आँदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण स्वजनों का भरपूर विरोध था। चौबीस पुरश्चरणों की उग्र तपश्चर्या को कुछ लोगों ने पागलपन घोषित कर दिया था। भावनात्मक आघातों का सिलसिला जारी था।
गुरुदेव को उस समय टूटी-कुचली भावनाओं को फिर से पोषण देने की ज़रुरत थी। माताजी ने अपने आगमन के पहले दिन से ही इस काम को बखूबी से सँभाल लिया। इस सम्बन्ध में गुरुदेव कहते हैं :
“माताजी ने अपने आने के पहले दिन से ही स्वयं को तिल-तिल गलाने का व्रत ले लिया था। विरोध का तत्व तो उनमें जैसे था ही नहीं। यदि वह चाहतीं तो साधारण स्त्रियों की तरह मुझ पर रोज़ नयी फरमाइशों के दबाव डाल सकती थीं। ऐसे में न तपश्चर्या बनती, न लोकसेवा के अवसर हाथ लगते, फिर जो कुछ आज तक हो सका उसका कहीं नामोनिशान न होता।”
माताजी के आने के बाद गुरुदेव के जीवनक्रम में एक नया निखार आया। अखण्ड ज्योति का प्रकाशन पहले से ही चल रहा था लेकिन अभी तक यह प्रयास केवल “एक पत्रिका” भर के प्रकाशन का था। सामान्यक्रम में पत्रिका और पाठक के रिश्ते, पढ़ने-पढ़ाने तक ही सीमित रहते हैं। माताजी की उपस्थिति के साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका ने “अखण्ड-ज्योति परिवार” का रूप ले लिया। पत्रिका को पढ़ने वाले उनके अपने आत्मीय हो गए। इस क्रम में लोगों का घर आने-जाने, ठहरने, खाने-पीने का सिलसिला चल पड़ा। आने वाले किसी व्यक्ति को उन्होंने स्नेह और ममत्व की कमी न महसूस न होने दी।
इन पंक्तियों के लिखते समय हमें ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का स्मरण हुए जा रहा है। इस परिवार में भी ज्ञान की गंगा का अवतरण तो हुआ ही है, हमारे समर्पित साथी ज्ञानप्रसाद के अमृतपान से धन्य तो हो ही रहे हैं, उनका कायाकल्प भी हो रहा है लेकिन पारिवारिक रिश्ते भी मज़बूत हो रहे हैं। कमैंट्स/काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया,फ़ोन टॉक्स/ वीडियो कॉल्स आदि से भी बढ़कर साथिओं के पारिवारिक सम्बन्ध भी स्थापित हो रहे हैं, सड़कों की दूरियां छोड़कर दिलों की दूरियां स्थापित करने के लिए लोग समय की परवाह न करते हुए आपस में प्रेम-आत्मीयता-सम्बन्ध स्थापित कर रहे हैं। क्या हम ऐसे साथिओं का धन्यवाद् किये बिना रह सकते हैं? कदापि नहीं।
चलिए आगे चलते हैं।
उन दिनों अखंड-ज्योति पत्रिका से जुड़े एक परिजन ने अपनी यादों की पुलकन उड़ेलते हुए बताया:
अहा! वे भी क्या दिन थे। मैंने अखण्ड-ज्योति नयी-नयी पढ़ी थी। एक दो महीने पत्रिका पढ़ने के बाद मन में विचार आया कि लिखने वाला तो बड़े कमाल का आदमी है, उससे मिलना चाहिए। बस फिर क्या था, मथुरा के लिए रवाना हो गया। मथुरा पहुँचते-पहुँचते 11:00 बज गए। जैसे-तैसे घर ढूँढ़ा, दरवाजा खटकाते हुए मन बहुत हिचका, इतनी रात में अजनबी घर का दरवाजा कैसे खुलवाए। लेकिन दूसरा कोई उपाय भी नहीं था। मथुरा में किसी और को जानता भी नहीं था। हिम्मत करके कुण्डी खटखटाई। माताजी ने दरवाजा खोला। पूछने पर पता चला कि गुरुदेव कहीं बाहर गए हुए हैं। उन्होंने बहुत मना करने पर भी रात 12:00 बजे के लगभग पराठा-सब्जी बनाकर खिलाई। खाने के बाद एक गिलास दूध भी पीने को मिला। सारी रात उनके ममत्व की छाँव में कटी। सुबह उठकर जब जाने लगा तो अनुभव हुआ कि शरीर से तो जा रहा हूँ लेकिन मन माँ के पास ही छूट रहा है।
यह अनुभूति किसी एक की नहीं,उन सैकड़ों-हजारों की है जो वंदनीय माताजी के ममत्व से पोषित हुए। इन्हीं ममता के धागों से मिशन का विस्तार बुना गया। तभी तो गुरुजी ने एक स्थान पर लिखा है:
“मिशन को आगे बढ़ाने में माताजी ने हमारे बांए या दांए हाथ की तरह नहीं, हृदय की भूमिका निभाई है। उन्हीं की भावनाओं के संचार से मिशन पलता और बढ़ता रहा है। औरों की तरह हम भी उनका प्यार-दुलार पाकर धन्य हुए हैं। इतने आघातों के चलते न जाने हम कब टूट-बिखर कर चकनाचूर हो गये होते।”
एक अन्य स्थान पर गुरुदेव कहते हैं:
“वह भावमयी हैं, प्यार तो जैसे उनके रोम-रोम में बसता है। उन्हें हमारी तरह बातें-बनाना तो नहीं आता लेकिन ममत्व लुटाने में वह हमसे बहुत आगे हैं। भले हमारी तरह वह बौद्धिक चातुर्य की धनी न हों लेकिन ममता की पूँजी उनके पास हमसे कई गुना अधिक है। इसी कारण हम उन्हें सजल श्रद्धा कहते हैं। मिशन के प्रत्येक परिजन ने उन्हें इसी रूप में अनुभव किया है।”
इसी विश्वास के सहारे गुरुदेव ने सन् 1950 एवं 1961 में लंबे समय तक हिमालय में अज्ञातवास किया। उन्हें यह भरोसा था कि उनके चले जाने पर माताजी मिशन की साज-सँभाल कर लेंगी। किसी को उनका अभाव न खटकेगा,हुआ भी यही। परिजनों से मिलना,पत्रों के जवाब लिखना, लिखवाना, पत्रिकाओं को संपादित, प्रकाशित करना, इन सारे कामों को वह अकेले सँभालती रही। गुरुदेव के वापस लौटने पर सब कुछ पहले से अधिक अच्छा मिला। परिजन माताजी का गुणगान करते थकते न थे। कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला:
“गुरुदेव तो मध्याह्न के प्रचंड सूर्य हैं, उनकी ओर तो आँखें उठाकर देख पाना भी संभव नहीं है। माता जी चंद्रमा की तरह शीतल हैं। भले वह सूर्य से ही ऊर्जा प्राप्त करती हैं लेकिन वह सारी गर्मी अपने अंदर पचाकर हम बच्चों को शीतल प्रकाश देती रहती हैं।”
इन सब बातों को सुनकर गुरुदेव और भी प्रसन्न हुए। समय बीतता गया। इतने में हिमालय की ऋषिसत्ता ने अपना तीसरा बुलावा भेज दिया। इस बार तो वापस लौटने के आसार नजर नहीं आ रहे थे। माताजी को स्थाई रूप से मथुरा छोड़कर शाँतिकुँज में रहना था। उस समय शाँतिकुँज के आसपास का क्षेत्र एक जंगल था। शहर छोड़कर जंगल में बसने की बात तो सोची जा सकती थी लेकिन बच्चों का मोह छोड़ पाना किसी माँ के लिए कितना कठिन होता है, इसे तो माँ ही समझ सकती है।
इस विकट स्थिति को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो:
“यह माताजी की अग्नि परीक्षा थी। बेटी शैल की शादी हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। मृत्युँजय के विवाह को भी अधिक समय न गुजरा था। उनके सभी सगे संबंधी भी मथुरा के आस-पास ही रहते हैं। वह इन सभी का, बेटे, बेटी, बहू का मोह इतनी आसानी से छोड़कर हरिद्वार के जंगल में बसने के लिए तैयार हो जायेंगी, इसका मुझे भी विश्वास न था। मैंने अपने मन के असमंजस को छुपाते हुए उनसे जब शाँतिकुँज में तप साधना की बात कही, तो वह बिना एक पल की देर लगाए तुरंत तैयार हो गईं। हमें भी उनके इस साहस भरे समर्पण को देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई।”
बात शाँतिकुँज में रहने तक सीमित न थी, इसके साथ अनेकों जिम्मेदारियाँ थीं जिनमें कठोर साधनात्मक प्रक्रियाएँ भी शामिल थीं जिन्हें निभा लेना सरल नहीं था लेकिन माताजी, वह तो जैसे कठिन कार्य के लिए ही जन्मी थीं।
गुरुदेव इसे बड़ी मार्मिक भाषा में अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं:
“रिश्ते में तो वह हमारी धर्मपत्नी लगती हैं लेकिन अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं। उनमें मातृत्व की इतनी उदात्त गरिमा भरी पड़ी है कि अपने वर्तमान परिवार को भरपूर स्नेह दे सकें। हमारा अभाव किसी आत्मीयजन को खटकने न पाए, स्नेह के अभाव में कोई पौधा कुम्हलाने न पाए, यह भार उन्हीं के कंधों पर डाल दिया गया है।
हमारे जाने के बाद वे हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच सात ऋषियों की तपस्थली जहाँ गंगा की सात धाराएँ प्रवाहित हुई हैं, अपने छोटे से शांतिकुंज नामक आश्रम में निवास करेंगी। जिस प्रकार हमने 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण संपन्न किए थे उसी प्रकार वे भी करेंगी। अखण्ड घृत दीप मथुरा से उन्हीं के पास चला जाएगा। अपनी तपश्चर्या की उपलब्धियों से वे लोगों के उस दुःख कष्ट निवारण के क्रम को जारी रखेंगी, जिसे हम जीवन भर निबाहते रहे हैं। हमारे चले जाने पर कोई अपने को असहाय न समझे। अपने बाल-परिवार की साज-सँभाल करने के लिए हम माताजी को छोड़े जाते हैं। वे अपनी तपश्चर्या इसी प्रयोजन में लगाती, खर्च करती हमारी परंपरा को जीवित रखेंगी। (1) नवनिर्माण अभियान का प्रत्यक्षतः मार्गदर्शन (2) हमारी बौद्धिक एवं सर्वसाधारण को अवगत कराते रहने का माध्यम (3) अखण्ड दीपक एवं गायत्री पुरश्चरणश्रृंखला को गतिशील रखकर कष्ट पीड़ितों की सहायता, यह तीन काम माताजी के जिम्मे हैं।”
माताजी ने यह जिम्मेदारी किस तरह निभाई, यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है। इस दायित्व को स्वीकारने,निभाने का क्रम गुरुदेव के हिमालय से वापस लौट आने के बाद भी चला व अंतिम श्वास 1990 तक चलता चला गया।
शताब्दी वर्ष 2026 में वंदनीय माताजी के प्रति यही हमारी सच्ची श्रद्धाँजलि है।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव