शब्द सीमा की बेड़ियाँ आज भी ज्ञानप्रसाद लेख सम्बन्धी Opening remarks/भूमिका/Main points आदि लिखने को रोके बैठी हैं। बस इतना ही कहकर आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करेंगें कि यह समय है नींद से उठने का, अपनी माँ, माता भगवती देवी शर्मा जी की शक्ति को पहचानने का, समझने का एवं औरों को बताने का। यदि ऐसा नहीं होता तो समझा जायेगा कि इस नाचीज़ की लेखनी, उसका अथक प्रयास निष्फल रहा।
आइये चलें, माँ को चरण स्पर्श करें, अंतर्मन में उतारें और उनकी शक्ति को जानें।
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परम पूज्य गुरुदेव का समग्र जीवन एक खुली किताब के रूप में सबके सम्मुख रहा। गुरुदेव अपने बारे में यां तो स्वयं बहुत कुछ लिख गये यां औरों के माध्यम से अपनी जीवन गाथा बता गए । लेकिन परम वंदनीय माताजी, जिन्होंने उनके पूरक के रूप में शिव-शक्ति के आधे भाग के रूप में निरंतर काम किया,उनका जीवन तो असंख्य परिजनों के लिए अंत तक एक रहस्यमयी कथा गाथा के रूप में ही रहा। माताजी के बहिरंग में सामान्य सा दिख पड़ने वाला व्यक्तित्व उस हिमखंड की तरह था जिसका एक छोटा सा भाग जो जल के ऊपर होता है उससे कई गुना हिस्सा जल मग्न होता है। जो लोग माताजी के बहुत करीब रहे, वे जानते हैं कि वह कितनी विशाल शक्ति का सागर थीं। सामान्य सी दृष्टिगोचर होने वाली सत्ता जिसे हम सब माताजी कह कर संबोधित कर रहे हैं, उनकीअलौकिक रहस्यमय सिद्धियों के अनेकों वर्णन हम पढ़ रहे हैं, आगे भी पढेंगे।
जिन Units के मिलने से एक पर्सनेलिटी बनती है, उसकी पूर्णता का क्या स्वरूप हो सकता है, व्यावहारिक अध्यात्म जीवनचर्या में कैसे जिया जाता है तथा एक विराट हृदय वाली माता कैसी होती है, किस प्रकार समान रूप में सब पर स्नेह/ममत्व लुटाती रहती हैं, इसका जीता जागता नमूना हम मातृसत्ता परम वंदनीय माताजी के जीवन में देखते हैं।
जब परम पूज्य गुरुदेव स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते घर छोड़ कर गए थे तब बड़ी विषम परिस्थितियाँ थीं। जब गुरुदेव घर से निकले तो इतनी बड़ी जमींदारी, वैभव से भरे घर को छोड़ते समय उनकी गुरुसत्ता ने कहा था:
“जब स्वराज्य प्राप्त हो जाय तो राजा बनकर,हाथी पर बैठ कर, घर में घुसना।”
हमारे गुरुदेव जन्म से ही वैरागी थे, एक लोहे का तसला व एक लोटा (यह मुहावरा एक फकीर को परिभाषित करता है) लेकर घर से निकल पड़े थे।
आगरा से प्रकाशित होने वाले “दैनिक सैनिक समाचार पत्र” के संपादन सहयोगी के रूप में गुरुजी को जो वेतन मिलता उससे उन्होंने पहले आगरा में और बाद में 10 रुपए मासिक राशि पर मथुरा में माता जी के साथ तीन बार घर बदला, उसके बाद घीआ मंडी स्थित अखण्ड ज्योति संस्थान में घर बसाया गया।
माताजी की सादगी:
माताजी जिस परिवार से आती थीं उसकी अमीरी के बारे में अनेकों स्थानों पर लिखा गया है। जिस महिला ने कभी सूती-खादी के सामान्य कपड़े न पहने हों, वह राशन की दुकान से मिलने वाली धोती में गुजारा करे एवं चेहरे पर एक भी शिकन न आए, यह अपनेआप में ही बहुत बड़ा, चिंतन वाला विषय है। मथुरा में आसपास रहने वाले लोग ताने कसते लेकिन माताजी के मन में कोई मलाल नहीं। अंदरूनी हिम्मत इतनी कि कोई आँख से आँख न मिला सके। एक फकीर के साथ निर्वाह करना कोई आसान काम नहीं है। गुरुदेव किसी के भी कंधे पर हाथ रखे घर ले आते, घर में कुछ है भी कि नहीं, उन्हें कोई ध्यान नहीं था। पत्रिका का चंदा आया, कोई दान आदि की राशि आयी, गुरुदेव माताजी के हाथ में पकड़ा देते। यह देखना माताजी की ही जिम्मेदारी थी कि एक लोहे के तसले व एक लोटे से वे गृहस्थी कैसे चलायें, कैसे आतिथ्य का सामान जुटायें तथा हर आने वाले को भोजन करायें।
पूज्यवर जानते थे कि उनकी गुरुसत्ता ने माताजी को उनकी सहयोगिनी बनाकर भेजा है, वह सामान्य नहीं हैं, साक्षात अन्नपूर्णा हैं ।
माताजी ने तरह-तरह की कटौतियाँ की होंगी स्वयं कितनी बार भूखी रही होंगी लेकिन किसी को पता नहीं लगने दिया तथा किसी को भी खाली पेट नहीं जाने दिया।
यही तो लीलापुरुषों के सामान्य दिखने वाले क्रियाकलापों का “आँकल्ट Occult” (जादुई) पक्ष होता है।
माताजी सारे महीने का हिसाब खर्चा स्वयं ही रखती थीं। साथ ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका की हाथ से बने कागज पर छपाई व सिलाई स्वयं करती थीं। रिश्तेदारों व उनके बच्चों की देखरेख, पढ़ाई का ध्यान व उनसे भी खाली समय में काम करा लेना, पूज्यवर के पास आने वाली नित्य की डाक को खोलकर पढ़ते चले जाना व पूज्यवर द्वारा उनका हाथों-हाथ जवाब लिखते चले जाना, यही सब नित्य नैमित्तिक दिनचर्या थी। न जाने कितने बच्चे जो आज बड़ी-बड़ी पोस्टों पर मैनेजर हैं, अधिकारी हैं उनके ऋणी हैं कि यदि माताजी ने उन्हें आत्मनिर्भर न बनाया होता तो शायद आज वे वह न होते जो बन पाए हैं।
द्रोणाचार्य ने अश्वत्थामा को आटे का घोल पिलाया था:
द्रोणाचार्य की कथा सबको याद है कि कभी उनके पुत्र ने दूध पीने की जिद की थी। उनकी स्थिति एक भिक्षाधारी ब्राह्मण मात्र की थी, उनकी पत्नी ने आटे का घोल बनाकर दूध पिलाया था व बच्चा अश्वत्थामा संतुष्ट हो गया था।
इस युग में ऐसा ही एक घटनाक्रम फिर से दोहराया गया। एक दिन जब सब अतिथि भोजन करके चले गए तब माताजी ने मात्र नमक-मिर्च मिले पानी के साथ आधी रोटी खा ली व सोने की तैयारी करने लगीं। उनके पुत्र व पुत्री ने जिद की कि वे तो हलुआ खायेंगे। उस समय कहाँ से सामान आता व हलुआ कैसे बनता? माताजी ने आटे का घोल बनाकर, उसमें गुड़ मिलाकर दोनों बच्चों (शैल व सतीश) को हलुआ खिला दिया।
प्रेमवती, जो साथ रहती थीं, सब देख रही थीं। बोली मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि तुम व तुम्हारी संतानें इतनी संतोषी हैं। ऐसा हलुआ तो मैंने आज देखा है। उन्होंने हँसकर उसे सुला दिया। आज भी माताजी के बेटी/बेटे को उस हलुए का स्वाद याद है जिसे खाकर संतुष्ट हो वे सो गए थे।
अपने निज के जीवन में कटौती, कठोरता से बरती गयी। माताजी ने बच्चों को उनके परिश्रम के बदले पुरस्कार रूप में पैसे देना आरंभ किया यह पुरस्कार एक पैसे से शुरू किया गया । उन पैसों को कोई चाहे तो मिठाई/कुलचे/ बर्फ के गोले खाकर भी नष्ट कर देता लेकिन माँ की सीख तो 24 घंटे काम करती है। उन्हीं पैसों से बच्चों ने अच्छी-अच्छी किताबें खरीदीं व जुड़े हुए पैसों से शादी के समय कुछ पहनने लायक कपड़े बनवाए।
माताजी की यही शिक्षा एवं क्रियापद्धत्ति हरिद्वार में विशाल शाँतिकुँज बनने तक भी चली। जैसा अखण्ड-ज्योति संस्थान में होता था, यहाँ आने वाला भी कोई साधक भूखा नहीं रहा। प्रश्न यह नहीं है कि पैसे का अभाव है या किसी के पास साधन नहीं है। साधन न्यूनतम होते हुए भी अपने ब्राह्मणत्व के सहारे व्यक्ति बड़े से बड़े अवरोधों से जूझता हुआ चल सकता है व लोकमंगल के निमित्त एक बड़े से बड़ा निर्माण कर सकता है।
शाँतिकुँज का गुरुद्वारा एवं उस का लंगर, माता भगवती भोजनालय, जलाराम बापा का स्मरण करा देता है। इन पंक्तियों के लिखते समय जलाराम बापा जी को जानने की जिज्ञासा हुई, गूगल सर्च से इतना कुछ प्राप्त हुआ कि इस एक लेख में शामिल करना असम्भव सा है।पाठकों से निदेवन है कि स्वयं ही जलाराम बापा जैसी विभूति को गूगल सर्च करके जानने का प्रयास करें।
माताजी साक्षात् अन्नपूर्णा ही थीं :
माताजी साक्षात अन्नपूर्णा ही थीं व संभवतः उनके पास द्रौपदी की तरह का कोई अक्षयपात्र था, ऐसा सोचने में किसी प्रकार का संदेह मन में नहीं आता। यह इस कारण कि लोहे का एक तसला घर से लेकर चला ब्राह्मण जो इस राष्ट्र की स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए उसे लेकर निकला था व जिसे उसने अपनी भार्या को विवाह उपहार रूप में सौंपा, वह उसने अंत तक अपने पास ही रखा।
स्वयं ओढ़ी हुई गरीबी व्यक्ति को बदले में अनेक गुनी धन-संपत्ति देती है। यदि परमार्थ के लिए जीवन जिया गया हो तो उसका प्रत्यक्ष नमूना शाँतिकुँज है जहाँ माताजी को दी जाने वाली वस्तु एवं कोई भी भेंट की बहुमूल्य वस्तु वापस लौटाकर सबमें समान रूप से इस विशाल कुटुँब में बाँट दी जाती है, उसके बदले में उतना ही अधिक पुनः आ जाता है।
राजकोट भावनगर का यज्ञ :
एक बार परम वंदनीय माताजी व पूज्यवर एक यज्ञ में एक साथ राजकोट, भावनगर आदि की यात्रा पर गए। जिस घर में पूज्यवर आए हों,वहाँ भक्तजनों का आना स्वाभाविक है। माताजी ने स्वयं चौके में जाकर देखा कि 8-9 व्यक्तियों के लिए ही खाना बना था। उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति इतनी ही थी लेकिन घर के सामने मैदान में प्रणाम करने वालों की तो भीड़ लगी थी। सबको भोजन कराए बिना माँ अन्नपूर्णा स्वयं भोजन कैसे करें? बड़े ही असमंजस की स्थिति थी। माताजी ने गुरुदेव की ओर मुस्कराकर देखा और कहा कि पहले सब भोजन के लिए बैठ जायँ तब हम करेंगे। गुरुदेव भी मुस्कुरा दिए। माताजी ने चौके में जाकर जहाँ राशन रखा था,एक दीपक प्रज्वलित कर दिया और घर की मालकिन से कहा कि अब वे रोटी बनाना चालू करें, सब्जी तैयार करती रहें। खाना लगातार बनता रहा। उसी भोजन सामग्री में 200 से अधिक व्यक्तियों ने भोजन कर लिया। जब सभी लोगों ने गुरुदेव और माताजी के दर्शन कर लिए उसके बाद ही उन्होंने भोजन किया। इतना बड़ा लंगर खुलने के बाद भी घर वालों के अतिरिक्त आठ व्यक्तियों के लिए भोजन बचा था।
इस दिव्य प्रसंग को वंदनीय माता की, माँ अन्नपूर्णा की लीला न कहें तो और क्या कहें?
ऐसे एक नहीं अनेकों घटनाक्रम हैं जो हमारी गुरुसत्ता के निकट रहने वाले ही जानते हैं। शाँतिकुँज में रहने वाले हर कार्यकर्ता को उस समय तक की (1983-84) जानकारी है जब तक परम वंदनीय माताजी पर प्रत्यक्षतः पूरा भार नहीं आया था। प्रत्येक को बाजरे की रोटी बनाकर खिलाना, अपने सामने बिठाकर भोजन करा तृप्त करना, कोयले की अँगीठी पर पापड़ सेंककर खिलाना, उन्हें लगा कि बच्चों की बेसन का नमकीन हलुवा खाने की इच्छा है, तो उसे बनाकर खिलाना सबको याद है। उस स्वाद की याद आती है तो मन माँ के स्नेह में भीगकर रस से सराबोर हो जाता है।
अखंड ज्योति में प्रकाशित हुए लेख के लेखक को,ज्ञानप्रसाद लिख रहे इस प्राणी को एवं इन पंक्तियों को पढ़ रहे पाठकों को अवश्य ही अनुभव हो रहा होगा कि किसी पूर्वजन्म का सौभाग्य ही था जो साक्षात माँ अन्नपूर्णा का इतना सामीप्य मिला रहा है। हमारी माँ स्थूल में हमारे पास नहीं हैं लेकिन उनके साहित्य में लिखा एक एक शब्द उनका ही साक्षात् रूप है, आज़मा कर देख लो, माँ साक्षात् सामने खड़ी देखेगी।
मातृसत्ता को समर्पित हो रही यह स्मृतियाँ हम सबके लिए एक सौगात हैं, अनमोल धरोहर हैं व हर किसी के लिए एक अविज्ञात स्वरूप की झलक-झाँकी हैं जिसे देख-पढ़ कर हर कोई अध्यात्म सिद्धि को जान सकता है, समझ सकता है।
शर्त केवल एक ही है: समय और विवेक का दान
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
