वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित एक और लेख श्रृंखला का तीसरा  ज्ञानप्रसाद लेख: वंदनीय माताजी के उद्बोधन से कुछ और शिक्षाप्रद ज्ञान 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के  अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।

वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति  विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं।  

आज के  ज्ञानप्रसाद लेख में पिछले ही लेख को आगे बढ़ाया जा रहा है जहाँ हम सबकी माँ, परम वंदनीय माताजी उद्बोधन के माध्यम से, अपनी अंतर् की वाणी से, ऊँगली पकड़ कर वोह ज्ञान प्रदान करा रही हैं जिसे  यदि ध्यानपूर्वक पढ़कर, समझ लिया जाए तो पाठकों के अनेकों कष्ट दूर होने की सम्भावना है। 

लेख के शुभारम्भ से पहले सभी साथिओं के लिए एक महत्वपूर्ण निम्नलिखित सन्देश है:

साथिओं से प्राप्त हुए  सन्देशों से दिख रहा है कि उन्हें व्हाट्सएप पर ज्ञानप्रसाद लेख प्राप्त करने में असुविधा हो रही है। बताना चाहेंगें कि हम व्हाट्सप्प पर कुछ भी भेजने में असमर्थ हैं, इसका सबसे सरल विकल्प हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करना ही है जिसका लिंक यहां भी दे रहे हैं:  https://youtube.com/@trikha48draruntrikha?si=sxq5Ix1w-WmL3-0g

आने वाले शनिवार को इस विषय पर फिर से  चर्चा होगी। 

हम समझ  सकते हैं कि जब भी कोई बदलाव होता है तो उस पर अमल करने में कम से कम एक वर्ष लग जाता है,कोई बात नहीं साथिओं की सहायता करना हमारा कर्तव्य है, बार-बार कहना भी हमारा कर्तव्य है, हमारा गुरु पिछले 115 वर्ष से कह रहा है तो हम क्यों पीछे हट जाएँ।   

आइए चलें लेख की ओर:

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भगवान बुद्ध से एक शिष्य ने पूछा:

भगवन,महामानव कैसे बन जाते हैं, छोटे से छोटा व्यक्ति ऐसे महान कार्य कैसे कर लेता है जो बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी नहीं कर पाता ? छोटा सा व्यक्ति ऐसा काम कर जाता है जो लखपति, करोड़पति, राजा, महाराजा और बड़े-बड़े अधिकारी भी नहीं कर सकते। एक छोटे से घर में पैदा हुआ व्यक्ति किस तरीके से ऊँची छलांग लगा सकता है और बलवान हो सकता है, उसे इतना बड़ा “आत्मबल” कैसे मिल जाता है,यह बात आप मुझे बताइये? 

बुद्ध थोड़ी देर सोचने लगे कि क्या जवाब दिया जाये, इसको कैसे समझ में आये कि आत्मिक शक्ति कैसे मिलती है। 

बुद्ध ने कहा अभी सुनाता हूँ, उन्होंने निम्नलिखित कहानी सुनाई:

किसी राजा के पास एक हाथी था। हाथी जब जवान था लड़ाई के मैदान में जाता था, जीत कर आता था। अब हाथी बूढ़ा हो गया,बूढ़ा अर्थात “नाउम्मीद” हो गया। नाउम्मीद यानि जिसके अंदर कोई हलचल नहीं, उत्साह नहीं, तमन्ना नहीं कि कुछ करना है। उसी को बूढ़ा कहते हैं। नाउम्मीदी में  हाथी बेचारा तालाब के किनारे गया, तालाब में उसे पानी नहीं मिला, वह आगे बढ़ता हुआ चला गया और कीचड़ में धँसता चला गया। ऐसा धंसा कि अब उससे निकलते ही न बना। जब निकलते नहीं बना तो उस समय एक सैनिक आया  जो बहुत होशियार था। उसने हाथी  से पूछा बाहिर निकलेगा? सैनिक ने  बिगुल बजाया तो हाथी ने चारों तरफ सूंड घुमाई। सैनिक ने बिगुल की आवाज़ तेज़ की तो हाथी अपनेआप ही दलदल से बाहिर निकल आया। 

साथिओ हुआ यह कि हाथी की शक्ति जो निराशता से,नाउम्मीदी से सो गयी थी, बिगुल ने उसे जगा दिया। उसे भान हो गया कि मुझ में कोई कमी नहीं है। मैं केवल उम्र से ही बूढ़ा हो गया हूँ, मेरी अंतर-आत्मा तो बूढ़ी नहीं हुई है । जब मेरी अंतरात्मा बूढ़ी नहीं हुई है तो शरीर कैसे बूढ़ा हो सकता है। 

हमारी माँ, वंदनीय माताजी हमें समझा रही हैं:

बेटे! शरीर बूढ़ा नहीं हो सकता।  वह हाथी फिर लड़ाई के मैदान में चला गया। लोग देखते रह गए कि जिस बुड्ढे हाथी में जान नहीं थी, जो पानी पीने में भी समर्थ नहीं था, वही हाथी अब फिर से लड़ाई के मैदान में चला आया, अब फिर से वह लड़ाई के मैदान में लड़ सकता है?

इसी सन्दर्भ में माताजी बता रही हैं कि हमारे ज़रा-ज़रा  से लड़के, ज़रा-ज़रा सी लड़कियाँ इतनी बड़ी हैं कि  क्या कहा जाए।  

1975 में शांतिकुंज से एक टोली क्षेत्रों में गयी थी वह तहलका मचा कर आईं। यह “ज़रा-ज़रा” सी लड़कियाँ” हमारी देव कन्यायें थीं?  जहाँ जाती थीं लोग दाँतों तले उँगली दबाकर रह जाते थे। ज़रा-ज़रा सी बच्चियाँ,क्या से क्या बना दिया है, अभी देखते जाओ क्या से क्या बनाते हैं। 

माताजी शिक्षा देते हुए कहती हैं बेटे,जो कोई भी हमसे जुड़ा है, उसे हम क्या से क्या बना देते हैं। बच्चो, आज वही शक्ति आपको दी जा रही है। यदि आप में सामर्थ्य होगी और वास्तव में हाथी की तरह आप दलदल से, प्रलोभनों से, लोभ-मोह की जंजीरों से निकल सकते हैं तो आप बराबर आगे बढ़ते चले जायेंगे। जो शक्ति हाथी के लिए नियत थी वह शक्ति आपके लिए भी है। 

माताजी, ये क्या हुआ, हम तो वरदान लेने आये थे कि धन दौलत मिलेगा, कारोबार में फायदा होगा, हम तो वसंत के दिन आशीर्वाद लेने आये थे, यह क्या दे रही हैं? बेटे, हम तो आपको वही दे रहे हैं जिसके  सहारे आपकी नाव चलती है। आप वोह माँगने आये हैं जो क्षणिक हैं। आप वह चीज माँगिये जिससे, यह लोक और परलोक दोनों ही सुधर जायेंगे। जो शक्ति आपको मिले, उस शक्ति को विश्वमानस में बिखेरते हुए चले जाओ,संकीर्णता से कुछ नहीं हासिल होगा, हम अपने बच्चों को संकीर्ण नहीं देखना चाहते। न हम में संकीर्णता है न हम संकीर्ण देखना चाहते हैं, और जो संकीर्ण बनकर रहेगा, वो बेटा बौना हो जायेगा। आज की आवश्यकता ही भविष्य की तरफ चेतावनी है। आप उसकी तरफ नहीं देख रहे,अपना ही राग अलाप रहे हैं, अपना ही राग अलापते रहेंगें? 

आप उस संत से जुड़े हुए हैं जिसने अपनी सारी जिंदगी दाँव पर लगा दी। हमने भी जुआरी की तरह अपना जीवन दाँव पर लगा दिया है। जिस किसी में भी हिम्मत हो वह हमारे साथ चले और यह वायदा दे कि हम आपके जीवन के अंतिम छोर तक आपके साथ चलेंगे, आपको चलाते हुए चले जायेंगे। 

अर्जुन ने कहते हुए मना कर दिया था कि सब मेरे भाई-भतीजे, कुटुँबी हैं, मैं इनको नहीं मारूंगा, मुझ से नहीं मारे जायेंगे। योगेश्वर कृष्ण ने कहा अर्जुन तुमसे नहीं मारे जायेंगे, मार तो मैं एक क्षण में दूँगा, लेकिन श्रेय तुझे नहीं मिलेगा, मुझे ही मिलेगा। तू श्रेय ले, मारूंगा मैं। मैं तेरे पीछे सारथी हूँ।

माताजी, हमें भी अर्जुन की भांति ज्ञान के गांडीव उठाने को कह रही हैं, अंतर में बैठे अनेकों कौरवों  से लड़ने के लिए कह रही हैं,उन कौरवों को कोई भी नाम दे सकते हैं। आपके अंतर्मन में उठ रहे महाभारत को जीतने के लिये,अर्जुन की तरह आपको भी को गाण्डीव उठाना ही पड़ेगा। इतना स्पष्ट है कि जब अर्जुन गाण्डीव उठायेगा तो भगवान  कृष्ण भी पीछे नहीं रहेंगे, वही पीछे से धक्का लगायेंगें, बेटे अर्जुन के दाएं बाएं तो केवल एक ही कृष्ण थे। यहाँ तो हम दो हैं, एक और एक दो नहीं, एक और  एक ग्यारह। तुम्हारे साथ जब हम दो हैं तो फिर यह अजूबा काम नहीं कर सकता क्या? आप आगे की पंक्ति में नहीं आ सकते क्या ? आगे नहीं चल सकते क्या ? आपमें क्या कमी है? आप प्रत्येक में इतनी शक्ति भरी पड़ी है कि मैं क्या कहूँ? मैं कुछ नहीं कह सकती, आपको इतनी अपार शक्ति मिल रही है कि यदि आपने इसका सदुपयोग नहीं किया तो उस सेठ के बच्चे के तरीके से आप पछताते रहेंगे जो मरते समय अपने बच्चे के गले में हीरों का हार पहना गया था। उसने कहा था कि अब तो चला चली का ही मेला है, जब हम नहीं रहेंगे बच्चा इस माला में  से एक एक हीरा निकालता रहेगा और जीवनयापन करता रहेगा, इसके जीवन की नाव किनारे लग जायेगी। मैं भी आप सबके गले में एक हीरों का हार बाँध दूँगी। हमें नहीं मालूम कि आप इस अमूल्य हार को पहनेगें यां फेंक देंगें लेकिन हम पहनाकर जरूर जा रहे हैं। 

जब माता पिता दोनों नहीं रहे तो वह छोटा-सा बच्चा रह गया। बच्चा जब थोड़ा बड़ा हुआ तो भूखों मरने लगा, जब भूखों मरने लगा तो एक जौहरी जा रहा था उसने कहा इधर आना बेटे तुम गर्दन में यह क्या पहने हो? पता नहीं क्या है? मेरे माता पिता पहना कर गये थे। जौहरी ने हार में से एक मनका निकाला और उसे बेच कर  आया। वह तो लाखों का बिका। जौहरी ने कहा,अरे बेवकूफ! इस हार में इतना धन है कि तू  क्या, तेरी पीढ़ी दर पीढ़ी खाती हुई चली जायेगी। 

आज मैं आपको वही दौलत देते हुए जा रही हूँ। यह एक ऐसी दौलत है जो बढ़ती ही जाएगी, ब्याज दर ब्याज होती चली जाएगी। बेटे इस दौलत को तुम अकेले मत खा जाना। स्वयं  लाभ लीजिये और दूसरों को लाभ दीजिये। 

मैंने आप बच्चों को यह कहानी बताई।  जाने अनजाने में जो अनुदान और वरदान मिलते हैं, झोली भरती हुई चली जाती है और हम उन्हें  समझ नहीं पाते। देने वाला तो हमें इतना देता है कि हम क्या करें। एक गाने की एक कड़ी याद आ रही है:

देने वाले ने तो इतना दिया है, शरीर के रूप में, हम करोड़ों की संपत्ति से भी अधिक  लेकर बैठे हैं। हमारे शरीर का कोई एक अंग भी खराब हो जाता है तो कितना कष्ट होता है,कितना अमूल्य है। ईश्वर ने मनुष्य की झोली में इतना अनुदान और वरदान भर दिया है कि  क्या कहा जाये। अपने जीवन के बारे में हम सोचते ही नहीं कि हम काहे के लिए पैदा हुए थे और किस तरीके से इसका श्रेष्ठतम उपयोग हो सकता है। यदि गहराई से विचारें तो एक-एक क्षण इतना मूल्यवान है कि करोड़ों की संपत्ति एक ही क्षण में न्योछावर की  जा सकती है। यदि सोचें तो यह समय इतना मूल्यवान है कि यदि यह निकल गया तो पछताते रह जायेंगे। 

यहीं पर कल तक के लिए मध्यांतर होता है। 

धन्यवाद, जय गुरुदेव 


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