ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में पिछले ही लेख को आगे बढ़ाया जा रहा है जहाँ हम सबकी माँ, परम वंदनीय माताजी उद्बोधन के माध्यम से, अपनी अंतर् की वाणी से समर्पण, श्रद्धा और निष्ठा की बात कह रही हैं। उद्बोधन में हमारी माँ ने न जाने कितनी ही बार दोहराया कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, हमारे पास सब कुछ है, यदि कुछ चाहिए तो केवल श्रद्धा,समर्पण और निष्ठा चाहिए। यदि आप इनका आजीवन पालन करते हैं तो हम आपके जीवन का रथ चलाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में हमेशा ही इन बातों का प्रसारण एवं आग्रह होता है लेकिन कितनों पर हमारे शब्दों का प्रभाव होता है ,कहना कठिन है, हमारी नहीं तो अपनी माँ, सर्वपूजनीय, सर्व वंदनीय माताजी की बात ही सुन लें।
हम विश्वास से कह सकते हैं कि यदि ज्ञानप्रसाद लेखों में व्यक्त किये गए “ज्ञान” को ध्यानपूर्वक पढ़कर, समझ लिया जाए तो पाठकों के अनेकों कष्ट दूर होने की सम्भावना है।
हम अक्सर कहते आये हैं कि गुरुसत्ता हमारी ऊँगली पकड़ कर हमसे लिखवा रही है। जब हम मातृशक्ति की जन्म शताब्दी मना रहे हैं, मातृशक्ति विषय पर लेख श्रृंखला लिख रहे हैं तो संलग्न शार्ट वीडियो का https://youtube.com/shorts/_0V0tlW15SM?si=luC7ZT9sYeAxj7Hz फेसबुक पर प्रकट होना किसी भी प्रकार से मात्र संयोग नहीं है, यह संकेत है कि जो हम कह रहे हैं उस पर हमारी माँ ने मोहर लगा दी है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में मातृशक्ति की बात होना, गायत्री परिवार के लिए एक बहुत बड़ी बात है। फेसबुक से उपलब्ध हुई इस वीडियो को डाउनलोड करने का प्रयास किया लेकिन प्राइवेट होने के कारण डाउनलोड न हो पायी। अपने लैपटॉप में प्ले करके,फ़ोन से रिकॉर्ड करके, प्रोसेसिंग आदि करके आज के लेख के साथ संलग्न किया गया है।
साथिओ आज का लेख बहुत ही संक्षिप्त सा है एवं उद्बोधन का अंतिम भाग भी है। कल का ज्ञानप्रसाद इन चारों ज्ञानप्रसाद लेखों की एक घंटे की वीडियो लेकर आ रहा है। 15 वर्ष पूर्व शांतिकुंज के यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित हुई इस दिव्य वीडियो को मात्र 841 व्यूज मिलने कोई उत्साहजनक बात नहीं है। हमारे चैनल पर भी इतनी बड़ी वीडियो को कोई ज़्यादा व्यूज मिलने की आशा तो नहीं है लेकिन फिर भी देखने में कोई हर्ज़ तो नहीं है।
तो साथिओ इन्हीं शब्दों के साथ अब समय है कि गुरुकुल की गुरुकक्षा में सभी समर्पित शिष्य अपनी गुरुमाता के चरणों में समर्पित हो जाएँ और दिव्य गुरुज्ञान का का अमृतपान करें, मनुष्य के कायाकल्प का यही एकमात्र साधन है।
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माताजी कह रही हैं:
बेटे जिंदगी भर पछताना ही रह जायेगा कि हम इस जिंदगी का सही उपयोग न कर सके क्योंकि जो हमको करना चाहिये था वह हमने किया नहीं। पतन और पीड़ा के रूप में सारा समाज चिल्लाता रहा। सारा राज्य, सारा विश्व हमारी तरफ देखता रहा, कहता रहा कि एक संत दुनिया में पैदा हुआ था, जिसने बीड़ा उठाया था कि हम सारे संसार में बौद्धिक क्राँति लाकर छोड़ेंगें। व्यक्ति अपाहिज़ हो गया है, उसे लकवा हो गया है, पोलियो हो गया है, इसका उपचार होना चाहिए। हम इसका इलाज करके ही रहेंगे। जो इस संत के साथ जुड़े हैं उन्हें गुरूजी द्वारा मार्गदर्शन मिलेगा, गुरूजी द्वारा प्रेरणा मिलेगी क्योंकि उन्होंने अनेकों को इस योग्य बना दिया गया है, गुरूजी ने अपने प्राण फूँक दिये हैं।
आपको यह कह कर पछताना न पड़ जाए की हम कुछ भी न कर पाए। उस समय से पहले आप चौकन्नें हो जाएँ तो ज्यादा अच्छा है।
आज वसंत का दिन है, आज आप यह संकल्प लेकर जाइये कि जो गुरुजी की आकाँक्षाएँ हैं, कामनाएँ हैं हम उन्हें पूरा करेंगें।
बेटे आप कहेंगें कि कामनाएँ तो हम लेकर आये हैं माताजी। यह तो आप सही कह रहे हैं, आप हमारे बच्चे हैं, कुटुँबी हैं, भाई, भतीजे कुटुँबी सब हमारे हैं। आपका हमारे ऊपर जरूर अधिकार है,आप जब कुछ भी माँगेगें हम हर समर्थ बेटे को देंगे। जो समर्थ नहीं हैं उसके बारे में तो हम कह नहीं सकते। हम भगवान तो हैं नहीं, जो सारी की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दें, लेकिन आप विश्वास रखिये कि हम यदि देने में समर्थ हुए तो आपकी झोली ज़रूर भरी जायेगी। हम उनमें से नहीं जो बचाकर रखेंगे। हम सारे के सारे दाने आपकी झोली में उड़ेल कर ही जायेंगे,निश्चिन्त होकर ही जायेंगे।
लेकिन हमारी भी तो कुछ कामना है।
आप समर्थ हो गये हैं, बड़े हो गए हैं,दाढ़ी मूँछ वाले हैं, माँ बाप की भी बच्चों से कुछ कामनाएँ होती हैं कि वह बड़ा होकर कमायेगा, खिलायेगा, हमारे पाँव दबायेगा, कपड़े धोयेगा। लेकिन हमारा यह उद्देश्य नहीं है, यह आपका निजी कार्य है। बेटे ऐसा कभी न सोचना की हम आपसे कुछ भौतिक मांग रहे हैं । यदि कोई कपड़ा आदि लाता है तो सोचते हैं कि इसका तिरस्कार क्यों करें। भावनावश लाता है, मना करें तो कहेगा हमारी भावनाओं का सम्मान नहीं किया। हो सकता है पहन भी लें, लेकिन हमारा अंतःकरण ऐसा नहीं है। हमारी अपनी कोई भी आवश्यकता नहीं है, बिलकुल नहीं है। खूब कमा लेते हैं, अपनी नाव का नाविक ही ऐसा है जो लाखों का पेट भर सकता है। आप क्या करेंगे हम तो अपनेआप अपना पेट भर लेते हैं। गुरुजी के लंबे-लंबे हाथ और माताजी के मोटे-मोटे हाथ, एक भी पड़ जाये तो नानी याद आ जायेगी।
हमें कोई कमी नहीं है बेटे, एक ही कमी है और वोह है आपकी श्रद्धा की कमी, आपकी आस्था की कमी और आपके विश्वास की कमी।
हमारे बच्चे हमें पूछें माताजी आपको किसी चीज की आवश्यकता है, आप बूढ़े हो गये हैं, कुछ खाने को चाहिये तो हम कहेंगें: नहीं बेटे,हमें कुछ नहीं चाहिये। मथुरा से अभी हमारा बेटा आया था, 6 साड़ी दे गया था,मैं क्या करूंगी ,मैंने कहा,चल तेरा मान होता है तो रख लेती हूँ। हमें एक-एक लड़के की आवश्यकता है। जिस समय लड़ाई छिड़ती है तो क्या होता है ? फौज की आवश्यकता होती है, एक जमाना था जब सिक्खों के हर परिवार से एक लड़का फौज में जाता था। हम भी यही चाहते हैं कि हमारा प्रत्येक परिजन मोर्चे के लिए सतर्क, साहस, जिम्मेदारी भरी सक्रियता लाये। हमें केवल एक ही चीज़ की आवश्यकता और वोह है कि अंधकार को मिटाना चाहिए, उजाला होना चाहिये, सद्विचार आने चाहिये, कुविचार जाने चाहिये।
इसके लिए क्या करना पड़ेगा? यह मेरा विषय नहीं है।
मेरा विषय है तो केवल आस्था, निष्ठा और श्रद्धा का है। मैं देखती हूँ यह तीनो चीज़ें आप सब में विद्यमान है। ऐसा कोई भी बच्चा नहीं जिसमें श्रद्धा न हो। आपके पास श्रद्धा है लेकिन बुरा मत मानना बेटे, मैं मार भी लेती हूँ और पुचकार भी लेती हूँ। कोई बात नहीं जब रूठ जाओगे तो मना लूँगी। माँ में विशेषता होती है: वह यह है वह सतत् देती रहती है किंतु आपका मन डाल–डाल और पात–पात घूमता रहता है। क्या किया जाये, न मालूम कौन साथ दे जाये। शायद शंकर जी दे जायें, हनुमान जी दे जायें, चंडी देवी दे जाये कि संतोषी माँ दे जाये, गुरुजी दे जायें,माताजी दे जायें, जाने कौन हमारे सामने आ जाये, उसे ही हम पकड़ लें, जैसे बहरूपिया करता है। बगुला बैठा रहता है, जहाँ देखी मछली कुडाक से निगल जाता है।
ये नहीं होना चाहिये, एक लक्ष्य होना चाहिये, एक निश्चय होना चाहिए जो हमने फैसला कर लिया,वही होगा, आजीवन पालन करना होगा। यदि आप आजीवन पालन करेंगे तो हम सदा आपके साथ हैं। आपके जीवनरुपी रथ को चलाने की जिम्मेदारी हमारी है और गाण्डीव उठाना आपका काम है।
चलिए यहीं समाप्त करते हैं।
साथिओं आज का लेख यहीं पर समाप्त होता है,जय गुरुदेव
