वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित एक और लेख श्रृंखला का दूसरा ज्ञानप्रसाद लेख: मातृवाणी में  बोओ और काटो का सिद्धांत

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के  अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।

वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति  विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं।  

आज के  ज्ञानप्रसाद लेख में पिछले ही लेख को आगे बढ़ाया जा रहा है जहाँ हम सबकी माँ, परम वंदनीय माताजी उद्बोधन के माध्यम से, मातृवाणी से, ऊँगली पकड़ कर वोह ज्ञान प्रदान करा रही हैं जिसे  यदि ध्यानपूर्वक पढ़कर, समझ लिया जाए तो पाठकों के अनेकों कष्ट दूर होने की सम्भावना है। 

लेख के शुभारम्भ से पहले सभी साथिओं का धन्यवाद करना चाहते हैं जिन्होंने शनिवार के प्रैक्टिकल में अद्भुत भागीदारी करके हमारा सहयोग किया है। सबसे बड़ा नंबर फेसबुक साथिओं का है जिन्होंने 12000 व्यूज देकर 330% की वृद्धि दर्शाकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। आने वाले शनिवार, इस बात पर, नंबरों के साथ-साथ कुछ और भी बातों की चर्चा लाइन अप हो गई है। 

आइए चलें लेख की ओर:

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गुरुदेव दिन भर जो कमाते हैं शाम को पल्ला झाड़ देते हैं। सब का सब दे डालते हैं। बेटे जिनको यह रहता है कि किसी को कुछ  देना नहीं है, जोड़कर अपने पास ही रखना है, ऐसा संभाल कर रखना है कि चोर न ले जायें, डकैत न ले जावें उनका क्या कहना? सही पूछो तो सँभालने के बावजूद चोर ले ही जाते हैं। 

मेरे पास एक लड़की आई, बोली माताजी मेरा बहुत बड़ा  नुकसान हो गया, मैंने कहा कि तूने क्या किया था ? लड़की कहने लगी कि मैंने पैसा इक्क्ठा किया था कि भगवान के चरणों में रखूँगी और अपनी लड़की की शादी में लगाऊँगी। माताजी ने  कहा कि तेरी जो नीयत  थी, सो हो गया। तूने अपनी लड़की की शादी में लगाना था और वह किसी और की लड़की की शादी में लग गया, क्या फर्क पड़ता है? 

कभी यह भी सोचा क्या, कि हम एक  विशाल समाज के अंग हैं। यह सारा समाज अपना ही है। इसके प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारियाँ हैं।  गुरुजी ने जिम्मेदारियाँ समझीं। उन्हें जो कुछ भी धन-दौलत विरासत के रूप में मिला, उन्होंने उसे सारे समाज का समझा। 

गुरूजी को दौलत के रूप में क्या मिला? उन्हें “आध्यात्मिक दौलत” के रूप में मिला, पैसे के रूप में नहीं, पैसे की तो गुरूजी ने कभी आशा ही नहीं की। वह स्वयं ही आता गया,कोई भी काम कभी रुका नहीं। गुरूजी ने  जीवन में जितने भी  बड़े-बड़े संकल्प लिए, वह सब के सब  पूरे हुए हैं। 

स्वार्थी होकर अपने लिए संकल्प लिए होते तो एक आध कोठी होती, बंगला होता, राजनीति में बने होते, न जाने क्या बन गये होते, मंत्री-संत्री, इतने ही बने होते न ?  उन्होंने आध्यात्मिक जिंदगी में प्रवेश किया, इसमें आगे बढ़े, अपनी संकीर्णता को छोड़ा, तब क्या कमी है।  इतनी बड़ी दौलत है कि यदि आपको गिनाने बैठें बेटे, तो पसीना छूट जायेगा, इतनी दौलत है कि बस आप से क्या कहें, करोड़पति नहीं, अरबपति नहीं, जो भी आप कहें इतने बड़े हिन्दुस्तान में इतनी दौलत नहीं, सारी दुनिया की दौलत हमारे पास है। हम इतने जबरदस्त दौलतमंद हैं कि क्या कहें?

मगर बेटे इस दौलत का राज़ हम जानते हैं,आप नहीं। आप तो केवल यही जानते हैं कि हम  ही तो ट्रस्टी हैं, लाओ साइन करा ले जायें। साइन करा ले बेटे, क्या सब मिल जायेगा ? तुम्हें  खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा, तुझे हमारी दौलत का क्या पता? 

यह सम्पत्ति कहाँ से आई माताजी,यह गुरुमंत्र हमें भी बता दो, हम भी दौलत खोद कर ले जावें!!!! 

नहीं बेटे, तुम इस दौलत को नहीं खोद पाओगे। जब अपने को गुरूजी जितना विशाल बनाओगे तभी यह दौलत पा सकोगे।अपने को गुरुजी की तरह विशाल बनाइये।

मैं आपको एक छोटी सी घटना बताती हूँ, ज्यादा तो नहीं बताऊँगी क्योंकि व्यक्तिगत जीवन की पर्तें खोलना कोई जरूरी नहीं है लेकिन यदि आप प्रेरणा के रूप में ग्रहण करना चाहें तो आप कर भी सकते हैं:

गुरुजी अज्ञातवास पर गये थे और मेरे लिए मनाही थी कि तुम वहां न आना। मुझे तो मालूम ही नहीं था कि गुरूजी कहाँ हैं। जब मालूम पड़ा कि अमुक स्थान पर हैं तो  मेरे लिये जाना वर्जित कर दिया और यह कहा था, कि तुम मत आना क्योंकि तुम्हारी तबियत खराब हो जाती है, जाने कहाँ से कहाँ तक पैदल चलना पड़ेगा। मैं समझती हूँ कि उन्होंने जितना पूजा उपासना को महत्व दिया, समाज सेवा को महत्व दिया उससे कम भी मुझे नहीं दिया, उससे अधिक ही दिया होगा। उन्होंने मेरा इतना मान, सम्मान किया कि जिसके मैं योग्य भी नहीं हूँ। मेरे दुःख- दर्द का इतना ध्यान रखते हैं कि शायद ही कोई खुशनसीब महिला होगी जिसका पति इतना ख्याल रखता होगा। गुरूजी तो मेरे पति नहीं,परमेश्वर ही हैं, परमेश्वर ही हैं, यही कहूँगी। 

हाँ तो मैं नहीं मानी, मैं चली गई। मुझे तो मालूम भी नहीं था कि गुरूजी कहाँ हैं लेकिन मैंने ढूँढ़ा और पहुँच गयी। मैंने देखा कि गुरूजी ने कुछ पत्तियाँ उबली हुई रखी हैं। कुछ खा लिए थे और कुछ रखी थीं, उनमें नमक भी ज्यादा था। मरे सामने बैठ गये और बोले मैं तुम्हारे लिए मैं क्या लाऊँ? मैंने कहा कि जो मैं चाहती थी वह मिल गया। मुझे अब खाने को क्या चाहिये। इतना कहते ही मेरे आँसू निकल पड़े। उबली हुई पत्तियों में से एक पत्ती मैंने अपने मुँह में डाली, वह इतनी कड़वी थी कि मैं बता नहीं कर सकती और मैंने उस पत्ती  को उगल कर निकाल दिया।  

मैंने कहा, मैं तो घर में बैठी रही,बच्चों का पालन पोषण करती रही।  गुरूजी का आदेश था कि हमने इतना विशाल परिवार बनाया है, इस परिवार की तुम माँ हो। यदि तुम मेरे साथ चली आती  तो यह बच्चे छूट जाते। मैंने कहा कि गुरूजी की आज्ञा ही मेरे लिए शिरोधार्य है और मैंने आप सब बच्चों को छाती से लगाये रखा है। 

मैं बस पानी पीकर उठ गई। इतने गहन चिंतन में चली गई कि मैंने एक वर्ष सब कुछ खाया और खिलाया भी लेकिन गुरूजी ने किस  तरीके से एक वर्ष  निकाला वोह ही जानते हैं।  

गुरूजी ने जब से होश संभाला होगा,उनका जिह्वा पर इतना कन्ट्रोल है, तभी सरस्वती का वास है। आज माँ सरस्वती का जन्म भी है, गुरूजी की जीभ पर सरस्वती का वास है जो कह देते हैं, पूरी हो जाती है? आखिर कैसे हो जाती है और क्यों हो जाती है? इसलिए हो जाती है कि उन्होंने अपनी  जीभ को ऐसे कस रखा है जैसे जम्बूर से कस लेते हैं। उनको अपने पर नियंत्रण है, अपनी तपस्या पर विश्वास है, गुरु के प्रति आस्था और श्रद्धा है। इसी श्रद्धा, विश्वास और नियंत्रण से उपहार में बहुत कुछ मिला है। इतना  कुछ मिला है, मिलता हुआ, चला जा रहा है और मिलता हुआ चला ही जायेगा। गुरूजी ने अपने लिए कभी चार पैसे भी खर्च नहीं किये। उन्होंने कभी भी अपनेआप खरीद कर कपड़ा नहीं पहना। कभी अपनेआप लाकर खाया नहीं।  मैं ही कपड़ा लाती रही हूँ। 

है तो सब उन्हीं का, मैं तो निमित्त मात्र हूँ लेकिन मैं बताती हूँ उन्होंने कभी भी भौतिक चीजों को महत्व नहीं दिया और एक से एक बड़ा व्यक्ति उनके संपर्क में आता हुआ चला गया। जो लोग ये देखते नहीं, जो ये सोचते हैं कि जो कुछ है हमारा शरीर ही है, जो है वह भौतिक सुविधा ही है, जो हमको आज मिल रही है वही हमारे जीवन की श्रेष्ठतम सम्पत्ति है,उनके लिए क्या कहूँ?

मैंने तो आपको गुरुजी का उदाहरण दिया। आप गुरुजी के जन्म दिवस पर शामिल हुए, यह शिक्षा नहीं एक पर्व है।  शामिल हुए हैं तो आप संकल्प लीजिये, कुछ करके दिखाइये। उन्होंने अपने जीवन में करके दिखाया है आप भी करके दिखाइये। नहीं दिखायेंगे तो आप पछताते रहेंगे।

आपको एक कहानी सुनाती हूँ: 

किसी के घर में एक भिखारी आया, उसने कहा कि मुझे कुछ दीजिये, मेरी झोली में डालिये। उसने  कहा: नहीं। भिखारी  ने कहा कि आपकी झोली भरी हुई है, अरे उस में से कुछ तो डालिये, लेकिन संकीर्ण (कंजूस, तंगदिल) मन वाला मनुष्य कुछ न दे सका। उसने एक दाना उठाया और भिखारी  की हथेली पर  रख दिया। भिखारी लेकर चला गया। मनुष्य ने थोड़ी देर बाद झोली में देखा तो उसमें एक दाना सोने का था,वह ज़ोर-ज़ोर से सिर पटकने लगा,कहने लगा मैं कितना मूर्ख था जो घर आये भगवान को न दे सका। यदि सारी झोली उड़ेल दी होती तो उसके सारे के सारे दाने सोने के हो जाते। मेरा मन संकीर्ण था कि मैंने एक ही दाना दिया। जो दाना दिया था वही एक दाना, सोने के रूप में वापिस आ गया। 

शुभ और अशुभ कर्म जो भी किये हैं मनुष्य को उन्हीं के अनुसार ही मिलेगा। करते तो हैं अशुभ कर्म और  चाहते हैं शुभ फल। ऐसे नहीं होता। जो करेंगे वही पायेंगे। बुरा करेंगे तो अनेक बुरे कामों का फल मिलता हुआ चला जायेगा। अच्छे करिये तो अच्छाइयाँ मिलती हुई चली जायेंगी। जन-श्रद्धा वापस अपनी ओर उमड़ेगी। 

गुरुदेव ने सारी की सारी जिंदगी जन-श्रद्धा के दाँव पर लगा दी।  लौट कर कैसे नहीं आई ? मंदिर के गुबंद की आवाज (Echo) लौटकर वापिस आती है। 

बोया और काटा यही सिद्धाँत है: जिसने बोया ही नहीं है, बोना जानता ही नहीं है,भूमि बंजर है,उपजाऊ नहीं है,निराई गुड़ाई उसने कभी की नहीं है,खाद कभी डाली नहीं,बीज डालेगा तो सड़ेगा ही क्योंकि भूमि में  कुसंस्कार हैं, सु-संस्कार नहीं हैं। 

मनुष्य में अच्छे संस्कार हैं तो ही वह शक्ति के रूप में जुड़ेगा। ऐसे भी व्यक्ति हुए हैं जो महामानव के साथ जुड़ कर महान होते हुए चले गये।  ऐसे भी हुए हैं जो महामानव के पास रहे लेकिन जैसे के तैसे ही रहे ओर गये गुजरे ही रहे। ऐसा कैसे हो गया,किसी को गुरुकृपा  मिली और किसी को न मिली। 

भगवान के यहाँ कभी पक्षपात नहीं होता, गुरु भी किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। जिसकी जितनी  श्रद्धा होती है, भावनायें होती हैं उसे उतना ही मिल जाता है। अर्जुन की भावनाएँ थीं, उसने द्रोणाचार्य से सीखा। एकलव्य की आस्था थी तो वह धनुर्विद्या में अर्जुन से भी ज्यादा पारंगत हो गए क्योंकि उनकी श्रद्धा थी। उन्होंने कहा कि मैंने गुरु बनाकर शिक्षा ली है, मेरे गुरु द्रोणाचार्य हैं। यही मुझे सिखायेंगे ओर उसने पा लिया,उसको वरदान  मिल गया। मिलता उसी को है जो उनकी शक्ति के प्रति जागरूक होता है। जो  जागरूक नहीं होता, वैसा का वैसा ही रह जाता। 

यहीं पर कल तक के लिए मध्यांतर होता है। 

धन्यवाद् जय गुरुदेव 


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