मई 2026 का प्रथम शनिवार, हर बार की भांति आज एक बार फिर ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण बातें लेकर उपस्थित है।
नए साथी अनवरत आते रहते हैं, पुराने साथी छोड़ कर जाते रहते हैं: परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत नियम है, इसे कोई भी नकार नहीं सकता।
इसीलिए हर बार शनिवार के विशेष सेगमेंट का इतिहास रिपीट करना उचित समझा जाता है।
साथिओं के ही सहयोग एवं सुझाव से सप्ताह के अंतिम दिन यानि शनिवार को इस परिवार के साथी अपनी गतिविधियों से अवगत करते हैं, परिवार में शेयर करते हैं। इस विशेष सेगमेंट को बहुत ही चाव से पढ़ा जाता है, सराहना की जाती है, जिसके लिए सभी का ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। सभी से यही आशा की जाती है कि “केवल” गायत्री परिवार से सम्बंधित कंटेंट ही शेयर करने का प्रयास करें।
परिवार की आदरणीय, समर्पित एवं सबकी प्रिय बहिन सुमनलता जी को भला कब चैन था!!!! उन्होंने देखा कि सभी साथी अपनी बातें सारा सप्ताह लिखते रहते हैं, अरुण भाई साहिब तो सारा महीना पढ़ने, पढ़ाने, Assignment check करने में, पेपर check करने में ही उलझे रहते हैं,यह कैसा इन्साफ है? उनकी बात भी तो सुनी जानी चाहिए, बहिन जी के इसी विचार ने महीने का अंतिम शनिवार सिर्फ और सिर्फ हमारी बात ही सुनने के लिए रिज़र्व कर दिया, यह एक ऐसा सम्मान था जिसके लिए धन्यवाद् जैसा शब्द बहुत छोटा है। साथिओं ने भी भरपूर समर्थन किया। फिर क्या था? बोलना तो हमारी सबसे बुरी आदत है, इसी आदत के कारण आज तक बोल रहे हैं, आद नीरा जी से पूछ लें, पता चल जायेगा। हमारे लिए तो अंधे को दो आँख मिलना जैसा था।
तो साथिओ यही है महीने के सभी शनिवारों का फॉर्मेट, अंतिम शनिवार को छोड़ कर बाकी सभी शनिवार परिवार की समस्याओं को, इस मंच को इम्प्रूव करने में, यूट्यूब, व्हाट्सप्प, फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया साईट्स, साथिओं के योगदान आदि की चर्चा को समर्पित होते हैं।
आज के विशेषांक में दो महत्वपूर्ण पॉइंट्स हैं, आइए एक एक करके दोनों को देख लें :
1. आदरणीय पुष्पा बहिन जी का निम्नलिखित व्हाट्सअप मैसेज एवं संलग्न चित्र :
जय गुरुदेव भाई साहब जी 🙏🙏
मैं अभी चार दिनों से अपने नजदीकी प्रज्ञा पीठ मंदिर में प्रतिदिन 24 घंटे का समय दान दें रही हूं इसलिए मैं ज्ञानरथ का लेख नहीं पढ़ पा रही हूं। आप सभी भाई बहनों से क्षमा चाहती हूँ।
सुबह (भोर की आरती) से लेकर रात्रि शयन तक का जो भी कार्य होता है सब मेरे जिम्मे है इसलिए समय नहीं मिल पा रहा है जय मां गायत्री जय गुरुदेव माता जी कोटि-कोटि प्रणाम 🙏🙏🙏
आपके पास ये मैसेज भेज कर आपको थोड़ी सी परेशानी दे रही हूं, शुभ रात्रि शुभ स्वप्न 🕉️
2. व्हाट्सप्प से सम्बंधित महत्वपूर्ण अपडेट:
व्हाट्सप्प में आयी समस्या को पहले ही परिवार में शेयर कर चुके हैं, साथिओं ने हमारी बातों का समर्थन करके, हमें जो सम्मान प्रदान किया है उसके लिए आभार व्यक्त करते हैं। अभी भी कुछ Individual message जिनका OGGP से दूर-दूर तक कोई भी संबंध नहीं है, आ रहे हैं।
आशा करते हैं हमारी (हमारी क्या, नीरा जी की) Strategy काम कर जाएगी:
जो भी मैसेज OGGP से सम्बंधित न हो उसका कोई रिप्लाई नहीं करना।
साथिओं की गतिविधियां आती रहेंगी, शनिवार को विशेष सेगमेंट में शामिल कर देंगें। जन्म दिन, विवाह दिन आदि, अपडेट आदि सभी परिवारजन स्वयं यूट्यूब पर पोस्ट कर देंगें, फोटो पोस्ट करना बहुत ही सरल है, न भी हो तो कोई बड़ी बात नहीं है।
इस बदलाव से हमें काफी राहत मिली है, स्ट्रेस और डिप्रेशन आदि से बचते दिख रहे हैं, सभी का धन्यवाद् करते हैं।
इसी सन्दर्भ में लिख रहे हैं कि कल का दैनिक दिव्य सन्देश व्हाट्सप्प अपडेट से सम्बंधित होगा जिसमें एक ग्रुप मैसेज भेज कर साथिओं की काटा-छंटी करने का निवेदन किया जायेगा। जो इस ग्रुप में रहना चाहते हों Yes करके रिप्लाई कर दें, जो छोड़ना चाहते हैं No करके रिप्लाई कर दें।
गुरुदेव ने बार-बार दोहराया है कि हमें भीड़ नहीं चाहिए। पिछले 15 दिन से ग्रुप मैसेज न जाने के कारण केवल मुट्ठी भर ने ही जिज्ञासा दिखाई है तो फिर ऐसों को, जिन्हें गुरु से कोई सम्बन्ध ही नहीं है, शामिल करके गुरु का अपमान क्यों करें।
हमारे साथी भलीभांति जानते कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की टैग लाइन है:
“हम अंतिम स्वास तक परम पूज्य को समर्पित होने का संकल्प लिए हैं।”
यदि यह टैग लाइन मार्केटिंग, विज्ञापनबाजी आदि के लिए होती तो और बात थी लेकिन दिख तो ऐसा रहा है कि सभी साथी पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ यथासंभव अपनी भागीदारी दिखा रहे हैं। समझा जा सकता है कि हर कोई किसी न किसी फॉर्म में गुरुकार्य कर ही रहा है। आद पुष्पा जी एक तरह का कार्य कर रही हैं, आद योगिता जी युवा पीढ़ी से जुडी हैं, आद योगेश जी ज्ञानरथ चला रहे हैं, आद अरुण जी नौकरी करते हुए, घर बनाते हुए भी पूरी तरह से भागीदारी दिखा रहे हैं। इसी तरह “यह छोटा परिवार,सुखी परिवार” अपने-अपने तौर पर अपना कर्तव्य निभा रहा है। आद संध्या जी, आद मंजू मिश्रा जी, आद पुष्पा सिंह जी जैसे साथी हैं जो पल-पल की अपडेट देते हैं लेकिन उनकी भी कमी नहीं है जिन्होंने सूचित न करने की कसम खाई हुई है।
सबकी अलग-अलग प्रवृति है। साँप अगर डंक मारना नहीं छोड़ता तो हम दूध पिलाना क्यों छोड़ें।
गाँठ बांधने वाली बात तो केवल इतनी ही है कि परिवार की टैगलाइन केवल लिखने के लिए नहीं है, पालन करने के लिए है। यदि काम ही चलाना होता तो अपनी माँ, वंदनीय माताजी का 6000 शब्दों का उद्बोधन, एक घंटे की वीडियो सीधे शेयर कर देते और खुद चादर ओढ़ कर सो जाते लेकिन सामने टेबल पर रखी गुरूजी की कान खींचती फोटो को क्या जवाब देते, उद्देश्य है कि सभी के परिवारों में गुरु के ज्ञान का आलोक हो, सभी ज्ञान-साधना का अभ्यास करें, सुख शांति का वास हो।
आइए एक और बात कर लें:
हमारी आदरणीय बहिन सुमनलता जी ने ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में “गुरुकुल” शब्द जोड़ा तो हम पुरानी यादों को स्मरण करने में स्वयं को रोक न पाए। फिर क्या था, हमने अपने सभी भाव अपनी हस्तलिखित लेखनी में लिख डाले, हाथ से लिखने को बहुत बार मन करता है तो अपनी सुरक्षित “ब्लैक बुक” डायरी में लिखते रहते हैं,कभी-कभी पुराने संस्मरण पढ़कर बहुत ही आंनद मिलता है। पढ़ने में आयी समस्या के बावजूद हमारी लेखनी की भूरी-भूरी प्रशंसा हुई लेकिन साथियों को आई समस्या के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।
यह एक बहुत ही छोटा सा प्रयोग था। इस प्रयोग से प्रेरित होकर हमारी आदरणीय संध्या बहिन जी ने भी समयदान, श्रमदान करके 1 नहीं, 2 नहीं पूरे 6 हस्तलिखित पन्नें भेजे। हमारी लेखनी की ही तरह, बहिन जी द्वारा भेजे गए पन्नों को भी पढ़ने में समस्या आयी, ज़ूम करने पर Blurring होने के कारण ठीक से पढ़ा नहीं गया। बहिन कोकिला जी, आद नीरा जी, आद रेणु जी ने कमेंट करके इस समस्या को परिवार के समक्ष शेयर भी किया, इसी बीच आद पुष्पा जी ने भी दो पन्नें भेजे। हमने तो Magnifying lens भी रखा हुआ है, उसका प्रयोग करके भी साथिओं द्वारा भेजे कंटेंट को चेक करने के प्रयोग करते रहते हैं। नीरा जी ने तो हस्तलिखित पन्नों ( टाइप किये गए पन्नों की तुलना में) को लिखने के उद्देश्य पर प्रश्न भी किया था। हस्तलिखित नोट्स की श्रेणी में ही आद चंद्रेश जी ने भी दो पन्ने लिख कर भेजे जिसमें उन्होंने वीडियो को देखकर हमारे सुझाव का सम्मान करते हुए पॉइंट्स भी लिख डाले, नमन है ऐसे सभी समर्पित साथियों को ।
इस सारी चर्चा से हमें इतना ही समझ आया है कि 40-50 के लगभग शब्दों का सन्देश (दिव्य सन्देश से भी छोटा) हस्तलिखित ठीक लगता है, 1800 शब्दों का पूरा लेख टाइप करके ही ठीक रहेगा। दिव्य सन्देश में कम से कम 300 शब्द होते हैं।
हमारी अल्पबुद्धि इतना ही समझ पायी है, यदि हमारे साथी हमारी समझ में संशोधन करना चाहते हैं तो वोह पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।
भांति-भांति के प्रयोग करते रहने से साथिओं की प्रतिभा को प्रोत्साहन मिलता है।
इस परिवार में भागीदारी दे रहे लगभग सभी साथी जीवन के उस पड़ाव की यात्रा कर रहे हैं जिसमें जिज्ञासा होती है कि अपने जीवन के सभी खट्टे/मीठे अनुभव किसी के साथ शेयर किए जाएं, सफलता/असफलता शेयर की जाए। यही कारण है कि जब इन अतुल्य,अनुपम,अद्वितीय प्राणियों का पिटारा एक बार खुल जाता है तो बंद होने का नाम ही नहीं लेता। हो भी कैसे? इस पिटारे में एक/दो नहीं, 70/80 वर्षों के ठाठें मारते अनुभव छिपे बैठे होते हैं, जब भी कोई सुनने वाला मिलता है तो बस Explosion जैसा ही होता है।
हम सबका परम सौभाग्य है कि गुरुदेव ने हमारे लिए एक ऐसे परिवार की सृजन कर दिया कि जिसमें स्वाध्याय, गुरुशिक्षा का अमृतपान तो होता ही है (क्योंकि वही Prime objective है), ऐसे विचारों के Explosion को भी पूरा सम्मान दिया जाता है। पारिवारिक बातें भी होती हैं, फोन कॉल्स, वीडियो कॉल्स भी होती हैं, आयु के इस पढ़ाव में और क्या चाहिए।
यह तो हम परिवार की उस श्रेणी की बात कर रहे हैं जिन्हें सरल भाषा में बूढ़े और सभ्य भाषा में वरिष्ठ जैसे विशेषण देकर सम्मानित किया जाता है लेकिन हमारे सीमित से युवा साथी भी एक दूसरे को सम्मान देने में पीछे नहीं रहते, जब भी उनसे हमारी बात हुई है एक घंटे से पहले तो किसी ने भी फोन छोड़ा ही नहीं। स्मरण हो रहा है कि बेटी संजना तो पिछली बार एक घुटने पर चल रहे शिशु की भांति रो ही रही थी, हमें उसी प्रकार सांत्वना देनी पड़ी थी जैसे एक अभिभावक सिर पर हाथ फेर कर देता है।
आज के युग में जहां हर जगह मारधाड़, भागदौड़ मची हुई है, इस तरह के अनुभव को आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय किंतु सत्य न कहें तो और क्या कहें। किसी तो सुनाने में झिझक सी लगती है, कहेंगे सब ड्रामेबाजी है,नाटक है। अरे भैया, नाटक ही सही, हम सबको आनंद की सुखद अनुभूति होती है, हमारे लिए यह प्रेम का एक अटूट बंधन है तो ड्रामेबाजी ही सही, हमें कोई चिंता नहीं है।
हमारे दरवेश गुरु का सबसे शक्तिशाली सूत्र ही “प्रेम” है, इसी सूत्र ने इतना बड़ा परिवार खड़ा किया हुआ है।
साथियों, यह हमारी भावनाओं का प्रवाह है, जिसे रोक पाना बहुत ही कठिन होता है।
अप्रैल माह के विशेषांक में 3200 के लगभग शब्द लिखे गए थे, साथियों के समय की चिंता भी हमारी लेखनी को लगाम न लगा पाई थी (बोलना हमारी आदत जो ठहरी), हजारों मील दूर होते हुए भी हम आप सबको अपने सामने बैठे हुए देखते हैं । यह है इस परिवार की विशिष्टता, क्या ऐसा कोई अन्य परिवार है? शायद नहीं!!! अपने “रक्त संबंध” भी नहीं!!!
स्वार्थ और निस्वार्थ के युद्ध में जीत सदैव स्वार्थ की ही होती है, ऐसा हमारा विश्वास है, साथी कमेंट करके हमें करेक्ट कर सकते हैं। पिछले शनिवार की तरह इस बार भी सार्थक इन्वॉल्वमेंट/इंटरेक्शन की आशा कर रहे हैं।
धन्यवाद् जय गुरुदेव

