ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
आज प्रारम्भ हुई लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं। 88 पन्नों का यह अंक Scanned और Text version दोनों में ऑनलाइन उपलब्ध है, हार्ड कॉपी तो उपलब्ध होगी ही। 88 पन्नों के इस विशेषांक में 40 पन्नें वंदनीय माताजी के दुर्लभ चित्रों को ही समर्पित हैं। 1994 में वंदनीय माताजी के महाप्रयाण के बाद 1995 में इसका प्रकाशन अवश्य ही एक सराहनीय कार्य है।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर इस अंक पर आधारित लेख श्रृंखला का प्रस्तुत होना एक दुर्लभ सौभाग्य है। इस मंच को एक गुरुकुल की परिभाषा देना, गुरुकक्षा में गुरु के शिष्य बन कर बैठना, गुरुज्ञान का अमृतपान कर पाना कोई ऐसी वैसी बात नहीं है। ज्ञानार्जन की इस साधना (ज्ञान-साधना) में जो कोई भी जुड़ पा रहा है उसके लिए इससे बड़ा सौभाग्य कोई हो ही नहीं सकता क्योंकि यह लेख मात्र लेख न होकर जीवन की दिशा धारा नियंत्रित करने की समर्था लिए हुए हैं।
आज का आरंभिक लेख वंदनीय माताजी के विशिष्ट वसंत पंचमी व्याख्यान का मात्र छोटा सा अंश है। साथिओं के समय का ध्यान रखते हुए 5500 शब्दों के विशाल उद्बोधन को एक बार में ही प्रकाशित करना कोई समझदारी न होती। यदि हम इस उद्बोधन में से कुछ ग्रहण करना चाहते हैं तो छोटे-छोटे भागों में, महत्वपूर्ण पॉइंट्स को नोट करके ही कुछ कर सकते हैं। शार्ट वीडियोस को हज़ारों की संख्या में व्यूज मिलने के पीछे यही गुप्त तथ्य छिपा बैठा है।
साथिओं को बताना चाहते हैं कि इस उद्बोधन की वीडियो भी यूट्यूब पर उपलब्ध है। लेख आरम्भ करने से पहले एक और बात करना चाहते हैं कि इस उद्बोधन की Scanned और Text, दोनों कॉपियों में कुछ पन्नें मिसिंग हैं जिससे लिंक नहीं बन पा रहा, हमसे जितना बन पायेगा, अवश्य प्रयास करेंगें।
तो आइये गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर अपनी माँ, गुरु माँ की दिव्य वाणी का अमृतपान करें, ज्ञान-साधना की प्रैक्टिस करें जिसे करते करते समय अवश्य ही कुछ अद्भुत आभास होना सुनिश्चित है
***************
परम वंदनीय माताजी के श्रीमुख से दिया गया वसंत पंचमी 1989 का विशेष उद्बोधन:
पाठकों को जान लेना चाहिए कि 1986 के वसंत पर्व के उद्बोधन के बाद परम पूज्य गुरुदेव कभी शाँतिकुँज में मुख्य प्रवचन मंच पर नहीं आए। उसके बाद यह उत्तरदायित्व माता जी ने ही सँभाला। यह उद्बोधन विशिष्ट भी है और प्रेरणादायी भी।
गायत्री मंत्र के साथ वंदनीय माताजी ने अपना उद्बोधन आरम्भ किया: हमारे आत्मीय परिजनों! आज वसंत पर्व, उल्लास का पर्व है। यह गुरुजी का जन्म दिन है, बहुत हँसी खुशी और प्रसन्नता-प्रेरणा का पर्व है। आज से ठीक 63 वर्ष पूर्व (1926) उनके जीवन में एक क्राँति आई, और उस क्राँति के नाम पर ही, उनका यह जन्म दिन है, और यह उद्बोधन उसी को समर्पित है।
1926 की वसंत पंचमी वाले दिन, गुरूजी के आध्यात्मिक गुरु आदरणीय सर्वेश्वरानन्द जी, छाया के रूप में,प्रेरणा के रूप में प्रकाशपुंज की भांति प्रकट हुए एवं वही दिन उनका जन्म दिन हो गया। 1911 के जन्म अनुसार देखा जाए तो गुरूजी 80 वर्ष के लगभग हो गये हैं लेकिन उस दिन को वह जन्म दिन नहीं मनाते। वसंत वाला जन्म दिन ही उनका आध्यात्मिक जन्मदिन है, इसी को हम मनाते हैं और हर वर्ष एक नया संकल्प लिया जाता है, उसी संकल्प को पूरा करते हैं। इसी को उन्होंने जीवनभर जन्म दिन माना। लाखों ने हम से दीक्षा ली है और संभव है उनसे, गुरुजी से भी कभी ली होगी। अब तो वे दीक्षा नहीं देते किंतु छाया के रूप में हमेशा हमारे साथ रहते हैं। मैं समझती हूँ कि उनसे यानि गुरुजी से जिन्होंने दीक्षा ली है लाखों ने कलावा बंधवाया होगा लेकिन क्या वोह लोग क्रिया के रूप में वे उतार पाये ? मैं समझती हूँ, अधिकाँश नहीं उतार पाये। लेकिन गुरूजी ने जिस दिन से अपना दीक्षा का दिन माना उसके बाद उन्होंने अपने गुरु के निर्देश अनुसार जीवन जिया। उनका सारे का सारा जीवनक्रम परिवर्तित होता चला गया। कहते हैं कि च्यवन ऋषि जवान हुए थे, मालूम नहीं कि वे जवान हुए थे या नहीं हुए थे। बुढ़ापा तो आखिर बुढ़ापा ही होता है। अवस्था भी एक अवस्था ही होती है। झुर्रियां भी पड़ेंगी, कमर भी झुकेगी, लेकिन एक माने में गुरूजी जरूर जवान हो गये होंगे। “जिसका मतलब है उत्साह, जिसका मतलब है शक्ति।” जिस व्यक्ति के अंदर शक्ति है वह कभी बूढ़ा नहीं होता, गुरुजी कभी बूढ़े नहीं हो सकते। वे न तो आज बूढ़े हैं और न 1000 वर्ष बाद बुड्ढे होंगे। यह शरीर तो रहेगा नहीं, सूक्ष्म रूप में रहेगा कहीं न कहीं। यह तो भगवान मालिक है जिसने तय किया है कि जिसने जन्म लिया है वह नहीं रहने वाला। यों तो हम जायेंगे ही लेकिन यह कलंक का टीका लेकर नहीं जायेंगे कि एक ऐसे महामानव हुए जो बूढ़े हो करके गये। बूढ़े हो करके नहीं जवान, जवान। हर समय उनके नस और नाड़ियाँ बेटो! इस रूप से फड़फड़ाती रहती हैं, हर दिशाओं में।
“आध्यात्मिक क्षेत्र से लेकर, सामाजिक क्षेत्र तक उनको परिवर्तन ही परिवर्तन दिखाई देता है। यही है उनकी तपश्चर्या।”
जब से उन्होंने अपनी साधना शुरू की, तब से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, हमेशा आगे की लाइन में चले। उन्होंने कहा कि क्राँति करेंगे तो जन-क्राँति करेंगे। आध्यात्मिक क्षेत्र में क्राँति है तो क्राँति है इसको कोई पीछे नहीं हटा सकता। अवरोध तो आते ही रहते हैं। गुरूजी ने अवरोधों की कभी भी परवाह नहीं की। जो आगे-आगे चलता है वह विजेता होता है और जो पीछे चलता है उसका कोर्टमार्शल होता है और वह भगोड़ों में गिना जाता है। वे भगोड़ों में नहीं गये, वे हमेशा आगे की पंक्ति में गिने गये। वे महामानवों में गिने गये। जहाँ कहीं संसार में महामानवों की गिनती होगी उनमें गुरुजी की होगी, बिलकुल होगी। मैं तो यह कहती हूँ कि गुरूजी देवताओं के समतुल्य, भगवान के समतुल्य हैं। लोग कहेंगे कि आप गुरूजी को भगवान घोषित करती हैं, मैं तो भगवान से भी ऊपर का कहती हूँ और आगे बढ़ा सकती हूँ, क्यों? आप इतना बड़ा शब्द बोलती हैं? अरे बेटो तुम साथ में नहीं रहे। जिंदगी का कितना बड़ा अरसा मैंने उनके साथ बिताया है। आप उन गहराइयों में नहीं जा सकते, जिन गहराइयों में मैं गई हूँ और उनके साथ हर क्षण जुड़ी हूँ । हम दोनों एक प्राण हैं। एक प्राण की तरह से हम घुले हैं । हमें मालूम है कि कहाँ से कहाँ तक मंजिल पार करके आये। आप उन बातों को सुनेंगे? मैं आपका समय बरबाद नहीं करूंगी, अरे माता जी तो गुरुजी की तारीफ करने ही बैठी हैं, इन्हें और कोई काम ही नहीं है, हाँ मुझे तारीफ करने दीजिये और यह तो वास्तविकता है, तारीफ नहीं है।
जिस दिन से उन्होंने आध्यात्मिकता के क्षेत्र में पग बढ़ाए वह कितनी महान क्राँति थी। आज तो दुनिया नहीं समझ सकेगी, गाँधी जी जब तक सामने रहे तब तक लोगों ने उनकी कीमत नहीं समझी, लेकिन जब चले गये तो उन्हें मालूम पड़ा गाँधी जी क्या थे? गुरुजी के भी पीछे यही मालूम पड़ेगा कि एक महामानव आया। आखिर कौन था, क्या था? आपको नहीं मालूम पड़ेगा। वह भगवान की एक शक्ति थी जो आयी थी और वह एक ऐसी जबरदस्त शक्ति थी जो संसार को हिला देने में समर्थ थी, और उसने वही कार्य किया जो करना चाहिये।
यों तो भगवान की शक्ति हर मनुष्य में होती है लेकिन उस शक्ति का उपयोग हर कोई नहीं कर पाता और जिस दिव्य सत्ता से जुड़े हुए हैं, उसका लाभ नहीं उठा पाते, यह उनका दुर्भाग्य कहिये या नासमझी कहिये या प्रलोभन कहिये, जो भी आप उसको उपमा देना चाहें, दे सकते हो। सही बात यह है कि लोग समझ ही नहीं पाते। अपनी क्षुद्र बुद्धि से केवल क्षणिक लाभ ही उन्हें दिखाई पड़ता है। पारलौकिक संपदायें हैं, किसी को मालूम नहीं कि यह विश्व पारलौकिक सम्पदाओं से भरा पड़ा है। “विश्व मानव” के रूप में हमारे आस-पास जो भगवान हैं, इनकी सेवा हमको दिखाई नहीं पड़ती। हमें तो केवल वही दो पांच कुटुम्बिओं की सेवा ही दिखाई पड़ती है जिनसे हम जुड़े हुए हैं, उन्हीं में हमारा सारे का सारा जीवन निकलता चला जाता है और एक रोज मरकर हम मौत की भट्टी में चले जाते हैं, यह कोई जीवन का अर्थ हुआ ? कोई अर्थ नहीं। कोई अस्तित्व नहीं। अस्तित्व तब है, जब मनुष्य अपने जीवन के प्रति जागरूक होता है, सतर्क होता है और उसे भान होता है कि हम इस संसार में किस लिए आए थे? भगवान ने हमको किस उद्देश्य के लिए भेजा है,किस कार्य के लिए भेजा है? हम यह भूल जाते हैं लेकिन गुरूजी ने अपने गुरु के सभी निर्देशों को गाँठ बाँधकर रखा। उन्होंने सदैव स्मरण रखा कि मुझे किसी विशेष उद्देश्य के लिए, किसी विशेष लक्ष्य के लिए, किसी विशेष कार्य के लिए भेजा गया है। वे हर तरीके से गुरु की आज्ञा का पालन करते रहे। उन्होंने उनकी वाणी का महत्व समझ लिया और उस वाणी से प्रेरणा मिली कि निर्देशित गुरुकार्य के अलावा मुझे कुछ करना ही नहीं है, पीछे मुड़कर देखना ही नहीं। गुरूजी को क्या देखना है? आगे की जिंदगी को देखना है, विश्व को देखना है, वर्तमान को क्या देखना है, आगे जो भविष्य है, इसका क्या होगा? आज जो समय चल रहा है इसके प्रति गुरूजी कितने चिंतित हैं मालूम नहीं लेकिन जितने वह चिंतित हैं, उतने ही आशावादी भी हैं। आशावादी भी हैं कि “21 वीं सदी उज्ज्वल भविष्य” लेकर के आ रही हैं। ये कम नहीं है कि जो भयावह स्थितियाँ हैं परिस्थितियाँ हैं वे दिखाई दे रही हैं देश की, विदेश की, राष्ट्र व अंतर्राष्ट्रीय समस्यायें उनसे आप भी वाकिफ हैं क्योंकि आप लोग भी पढ़े लिखे हैं, और आप बुद्धिजीवी हैं। आप पढ़ते हैं,समझते हैं आपको मालूम है कि कैसा समय गुजर रहा है। तो इस समय में, हम क्या कर सकते हैं? वह सारा का सारा कार्य गुरूजी के दिमाग में एक नक्शे की तरह प्रकाशित हुआ है।
यहाँ पर इस दिव्य उद्बोधन का सोमवार तक के लिए मध्यांतर होता है।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
