ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित अलग-अलग लेख श्रृंखलाओं के अंतर्गत ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। हम सब परिवारजनों का परम सौभाग्य है कि गुरुकृपा से अपनेआप ही, एक स्वचालित इंस्ट्रूमेंट की भांति गुरुवर द्वारा रचित विशाल साहित्य में से चयन करके, इन दिव्य विषयों पर एक के बाद दूसरे विषय, दिव्य सन्देश, शार्ट वीडियोस आदि का प्राकट्य हुए जा रहा है, इसे हम गुरु-अनुकम्पा न कहें तो और क्या कहें ? गुरुदेव का ऐसा दुर्लभ सानिध्य विरलों को ही प्राप्त होता है, उन सौभाग्यशालिओं में से हम एक तो हैं हीं लेकिन हमारे ज्ञानरथ को धक्का दे रहे अनेकों समर्पित साथी भी कुछ कम सौभाग्यशाली नहीं हैं। प्रतिदिन, दिन की शुरुआत गुरु की ज्ञान-साधना से करना, पढ़कर/समझकर उसे अंतर्मन में उतारना, समझे हुए ज्ञान को ज्ञानप्रसाद के रूप में परिवार में वितरण करना,परिवारजनों को ज्ञान-साधना के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना, कमैंट्स-काउंटर कमैंट्स की प्रक्रिया से इस बात को सुनश्चित करना कि ज्ञानप्रसाद का अमृतपान सच में जन्म घूंटी का कार्य कर रहा है, यदि कर रहा है तो पाठकों का कायाकल्प हो रहा कि नहीं।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार में यह Super effective प्रक्रिया पिछले कईं वर्षों से कुछ ऐसे परिणाम लेकर आई है जिनसे हर कोई गौरवान्वित हुआ अनुभव कर रहा है, सभी का अनवरत प्रयास एवं परिश्रम सार्थक रिजल्ट्स लेकर आया है।
इन्हीं रिजल्ट्स का एक छोटा सा अवलोकन कल के लेख में दिखाया था। आज फिर उसी तरह के परिणाम देख कर साथिओं का ह्रदय से आभार करते हैं। कल प्रकाशित हुए ज्ञानप्रसाद लेख को इन पंक्तियों के लिखने समय तक फेसबुक पर 5500 व्यूज मिल चुके हैं । कल ही प्रकाशित हुई शार्ट वीडियो को फेसबुक पर 26000 और इंस्टाग्राम पर 27000 व्यूज मिल चुके हैं। टोटल 500 से अधिक कमेंट भी मिले हैं। यहाँ यह भी बताना उचित समझते हैं कि यह कमेंट केवल “जय गुरुदेव” ही लिख कर औपचारिकता के लिए नहीं पोस्ट किये गए हैं, स्पष्ट दिख रहा है कि लोगों ने लेख का अमृतपान करने के बाद ही कमेंट लिखे हैं। उपरोक्त बात केवल परिवार के रिपोर्ट कार्ड को सार्वजानिक करने एवं शाबासी के उद्देश्य से लिखी गयी है।
हम अपने गुरु का किन शब्दों में धन्यवाद् करें। कार्य खुद करते हैं और श्रेय हम जैसों को दिए जा रहे हैं। गुरुदेव के उस उद्बोधन का स्मरण हुए जाता है जहाँ वोह कह रहे हैं, “हमने सारी व्यवस्था बना रखी है, तुम्हें तो केवल श्रेय ही लेना है।” नमन हो, नमन हो, नमन हो।
आइये आगे चलते हैं:
हमारे साथी हमारी प्रक्रिया से भलीभांति परिचित हैं कि जब भी किसी ज्ञानप्रसाद लेख श्रृंखला का समापन होता है, उसका Wrap up करना अपना कर्तव्य समझते हैं। इसी प्रकार जब भी किसी नई श्रृंखला का शुभारम्भ होता है तो उसकी पृष्ठभूमि लिखी जाती है।
ब्रह्मवर्चस द्वारा रचित 118 पृष्ठों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित लेख श्रृंखला का कल समापन हुआ था। 52 दिन लम्बी चली इस लेख श्रृंखला के अंतर्गत 34 Full length लेख प्रस्तुत किये गए, कई बार शब्द सीमा के कारण Open format में गूगल ड्राइव का सहारा भी लेना पड़ा। लेखों को रोचक एवं ज्ञान से भरपूर बनाने के लिए अलग-अलग उपलब्ध साधनों का प्रयोग भी किया गया। इस दिव्य पुस्तक के एक-एक पन्नें में वोह ज्ञान एवं अमृत वचन प्रकाशित किये गए हैं कि लेखक ने इन्हीं अमृत वचनों से प्रेरित होकर दैनिक दिव्य सन्देश एवं Related वीडियोस भी प्रकाशित करने का एक नवीन प्रयास किया है। दर्शकों द्वारा पोस्ट हुए कमैंट्स, मात्र जय गुरुदेव, अंगूठा दिखाने वाले न होकर काफी उत्साहवर्धक हैं।
कल से आरम्भ होने वाली लेख श्रृंखला “अखंड ज्योति फ़रवरी 1995 के मातृ स्मृति विशेषांक” पर आधारित है। 88 पन्नों का यह स्पेशल एडिशन Scanned copy के रूप में विचारक्रांति पुस्तकालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इसी स्पेशल एडिशन की टेक्स्ट कॉपी मात्र 36 पन्नों में AWGP वेबसाइट पर उपलब्ध है। हमें विश्वास है कि इस एडिशन की हार्ड कॉपी भी अवश्य ही उपलब्ध होगी।
इस कॉपी के बारे में बताना चाहेंगें कि विचारक्रांति वेबसाइट पर Scanned version उपलब्ध है लेकिन यह कॉपी रंगीन न होकर ब्लैक एंड वाइट है और 40 पन्नों पर दिए गए दुर्लभ चित्र इतने Low quality के हैं कि क्या कहा जाए। AWGP की वेबसाइट पर उपलब्ध Text कॉपी में कोई चित्र नहीं है।
इसी सन्दर्भ में लिखना चाहेंगें कि वर्षों पहले हमने अपने पुराने फ़ोन पर एक लिंक पोस्ट किया था जिसमें लगभग 10000 के करीब Enteries थीं, लगभग 200 अखंड ज्योति के विशेषांक थे। यह विशेषांक वहीँ से मिला था लेकिन वोह साइट अब बंद हो चुकी है, केवल Thumbnails ही उपलब्ध हैं।
अब तो हमारे साथिओं को समझ आ गया होगा कि हम युग निर्माण योजना एवं अखंड ज्योति की डिजिटल copies के पीछे क्यों पड़े हुए हैं। जब कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं होती है तो पाठकों से बढ़कर जो Irritation हमें होती है उसे शब्दों में नहीं उतारा जा सकता।
जिन समर्पित साथिओं के कारण हमारी वेबसाइट https://life2health.org/ अपडेट हो गयी है उनके लिए धन्यवाद् शब्द बहुत ही छोटा है।
जैसा ऊपर लिखा है कि वंदनीय माताजी को समर्पित इस विशेषांक के 40 पन्नों में महत्वपूर्ण चित्र संग्रहित किये गए हैं, कितना अच्छा होता कि हम रंगीन HD चित्र साथिओं के समक्ष ला पाते।
अपने साथिओं के साथ एक और बात शेयर करना चाहेंगें कि जब हम “महाशक्ति को लोकयात्रा” पर आधारित लेख श्रृंखला के लेख लिख रहे थे तो गूगल सर्च में “मातृवाणी” शीर्षक से एक ऐसी पोस्ट मिली जिसने हमारा दिल ही जीत लिया। 7 पन्नों की यह पोस्ट परम वंदनीय माताजी द्वारा दिए गए 1989 की वसंत पंचमी का उद्बोधन था। इस उद्बोधन के Top पर हाईलाइट करके बताया गया था कि 1986 के उद्बोधन के बाद परम पूज्य गुरुदेव कभी भी शांतिकुंज के मुख्य प्रवचन मंच पर नहीं आये। उसके बाद यह उत्तरदाइत्व वंदनीय माताजी ने ही संभाला। इस कारण 7 पृष्ठों का यह उद्बोधन विशिष्ट भी है और प्रेरणादायक भी।
“मातृवाणी” अर्थात माँ की वाणी शीर्षक अपनेआप में ही इतना Eye catching है कि हमने गूगल से उपलब्ध उस पोस्ट का लिंक एकदम सेव कर लिया और तब से लेकर अब तक न जाने कितनी ही बार उस विशिष्ट लेख का अमृतपान कर चुके हैं।
कल इस नवीन श्रृंखला का शुभारम्भ इसी Opening लेख से होने की योजना है।
कल के बाद इस श्रृंखला में जो-जो लेख भी प्रस्तुत होंगें उन पर से पर्दा अभी हटा दिया जाए तो नाटक को देखने की जिज्ञासा और रोचकता कहाँ रह जाएगी।
चलते-चलते साथिओं का धन्यवाद् करना चाहते हैं व्हाट्सप्प पर हमारा बोझ काफी कम हो गया है, केवल गायत्री परिवार की गतिविधिओं आदि की नोटिफिकेशन्स आ रही हैं जिन्हें शनिवार के स्पेशल सेगमेंट में शामिल किया जाता है। साथिओं ने जन्म दिन, विवाह दिन जैसे विशेष नोटिफिकेशन्स स्वयं ही यूट्यूब पर पोस्ट करने शुरू कर दिए हैं। आदरणीय चंद्रेश जी ने इस क्षेत्र में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। अपने होनहार नाती की सहायता के कारण ही सही उन्होंने यूट्यूब पर चित्रों के लिंक भी पोस्ट करने शुरू कर दिए हैं। बधाई हो, भाई साहिब
“नया दौर” मूवी के सुपरहिट गीत “साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाए तो मिलकर हाथ बढ़ाना” के साथ आज के इस अपडेट का समापन होता है।
धन्यवाद्, जय गुरुदेव
