वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 34वां एवं समापन ज्ञानप्रसाद लेख: माँ के चरणों में क्षमा याचना  

“कुछ त्याग नहीं अपना माँ ,बस क़र्ज़ चुकाते हैं”, यह शब्द आज के लेख के साथ संलग्न वीडियो के चुनिंदा शब्द हैं, इसकी भावना समझते ही अश्रुधारा का फूट पड़ना स्वाभाविक है। आज स्वर्ण अवसर  है अपनी माँ के चरणों में समर्पित होकर किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा याचना का।  

8 मार्च 2026 को आरम्भ होकर 29 अप्रैल 2026 तक चली वर्तमान लेख श्रृंखला का यह समापन लेख हमसे अनेकों प्रश्न कर रहा है। 

118 पन्नों की दिव्य रचना “महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित लेख श्रृंखला 52 दिन चली, 34 विस्तृत लेख प्रस्तुत किये गए, लाखों नहीं तो हज़ारों लोगों के इनबॉक्स में तो यह दिव्य ज्ञान पंहुच ही गया होगा। केवल यूट्यूब के 47000 और फेसबुक के 12000 Followers पर ही ध्यान केंद्रित कर लिया जाए तो अनेकों का कायाकल्प होता दिखना चाहिए। कल के लेख को ही 4000 से ऊपर के व्यूज मिले हैं एवं इसी से सम्बंधित एक शार्ट  वीडियो को 54000 दर्शकों ने देखा।  

इतना कुछ पॉजिटिव देखने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न उभर कर आता है कि क्या सच में इन लेखों को इतना रिस्पांस मिला है यां वैसे ही अंगूठे लगते रहे? हमारी अल्प बुद्धि के अनुसार इसका सबसे Intelligent उत्तर यही बनता है कि जितना भी हुआ, सार्थक ही हुआ, ज्ञान का प्रसार तो अवश्य ही हुआ। गुरुसत्ता के आशीर्वाद से, इस कठिन ज्ञान-साधना में हम जितनों को भी जोड़ पाए, उनका कायाकल्प सुनश्चित है। हमारे नियमित साथिओं के कमेंट इस तथ्य का प्रतक्ष्य प्रमाण हैं कि सभी लेखों के एक-एक शब्द पढ़े गए हैं, इतनी  श्रद्धा तो शायद अपने विद्यार्थी जीवन में भी अनुभव न की गयी हो। औरों का तो पता नहीं, हमारे ऊपर यह बिलकुल सटीक फिट होती है। अपने समयनुसार ज्ञानप्रसाद लेखों का अध्ययन करना, समझना, समझ कर न केवल कमेंट करना बल्कि औरों के कमैंट्स पर कमेंट करना कोई सरल कार्य नहीं है- यही है सच्ची ज्ञान-साधना। पूजास्थली में हम आँखें बंद करके ध्यान लगाने का प्रयास करते हैं लेकिन मन के घोड़ों को कान खींच कर, डाँट कर केंद्रित करना पड़ता है लेकिन ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करते समय ऐसी कोई भी स्थिति नहीं होती, लेखक की हृदयवाणी के साथ तार जोड़ने होते हैं। दृष्टि, मस्तिष्क, ह्रदय आदि सब एक ही बिंदु पर केंद्रित होते हैं। 

प्रत्येक लेख का शुभारम्भ गुरुकुल, गुरुकक्षा, गुरुज्ञान,गुरुचरणों, अमृतपान आदि से होता है जिसका उद्देश्य होता है कि उस वातावरण का आभास हो।        

आइए लेख का शुभारम्भ करें:

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हमारी सबकी माँ, परम वंदनीय माता भगवती देवी शर्मा जी के इतने करुणामई होने के बावजूद उनकी नादान संतानों ने जाने-अनजाने में अनेकों भूलें कीं, इन पंक्तियों के लिखने वाले, पढ़ने वालों से भी कुछ न कुछ भूलें तो अवश्य ही हुई होंगीं, हम सबने माँ का कोमल ह्रदय दुखाया  ही होगा !!!!!

इन सभी भूलों का एकमात्र उपाय है कि हम सब क्षमामयी माँ के चरणों में क्षमा की याचना करें, विश्वास है कि  माँ का ह्रदय पिघल जायेगा और हमें क्षमा कर देंगीं।

आइए हम सब अत्यंत गहरी आत्मपीड़ा और सघन अंतर्वेदना से घिरे माँ से याचना करें कि आप चाहे स्थूल रूप से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन आपके साथ बिताए गए हर पल का कोमल अहसास हमारे हृदय में ज्यों का त्यों  है। आपकी हर याद की छुअन मन में अगणित अनुभूतियों का रस घोलती है। माँ आपकी यादों के कई रूप हैं; सभी अनूठे हैं, सभी अनोखे हैं। हममें से कइयों को गुरुदेव विभिन्न कार्यों के सिलसिले में बुलाते थे। हमें आलस्य एवं प्रमाद के कारण गुरुदेव से डांट-फटकार भी पड़ती थी। सीढ़ियों से उतरते ही जब हम आपके कमरे में प्रवेश करते तो आप हंसकर कहतीं:

ऐसे एक नहीं अनेक अवसरों की यादें हमारे मनों में घुली हैं। आपके प्यार-दुलार के अनेकों रूप मन के आंगन में अपनी दिव्य आभा फैला रहे हैं। जहां तक आपकी डांट- फटकार की बात है, तो वह प्रायः होती ही नहीं थी। यदि आप डांटतीं भी थीं तो उससे ज्यादा हमारी मान-मनुहार करतीं। हमें यह समझातीं कि आपकी इस डांट में हम सबका कितना भला छुपा है। इतना ही नहीं, डांटने के बाद आप अवश्य ही अपने सामने बिठाकर कुछ खिलाती-पिलातीं। हे भावमयी माँ, हम आपके भाव भरे मातृत्व की कैसे, क्या एवं  कितनी चर्चा करें? 

माँ के मातृत्व की कथा तो असीम है,अनंत है अर्थात इसकी कोई सीमा नहीं है, कोई अंत नहीं है। हम जैसे अज्ञानी बालक तो क्या, दिव्य लोकों के देवगण भी इस कथा को  पूरी तरह से कहने में अयोग्य  हैं। 

इन दुर्लभ क्षणों में हम तो बस यही अनुभव कर रहे हैं कि हमनें  आपके कोमल हृदय को जाने-अनजाने अनेकों तरह से चोट पहुंचाई है। आप कितना कुछ सहकर हमारे  हठों को पूरा करती रहीं और हम इसे अपना सौभाग्य मानकर इतराते रहे। हमनें  उस समय यह सोचने का  तनिक सा भी प्रयास नहीं किया कि  आपको कितना कष्ट होता होगा। सच में माँ,आज हम अपने किए पर अत्यंत शर्मिंदा हैं।

हमें वह पल  अच्छी तरह से याद है, जब हमने अपने अज्ञानी बाल स्वभाव के कारण आप से लड़-झगड़ लिया लेकिन कैसा आश्चर्य है कि  बदले में आपने हमें डांटने-डपटने के  बजाय भरपूर प्यार दिया। झगड़ा भी हमीं ने किया और रूठे भी हमीं, लेकिन  आप सदा ही हम पर कृपालु बनी रहीं। कभी भूल से भी हममें से किसी पर कभी भी कुपित नहीं हुईं क्योंकि इस सत्य को केवल आप ही जानती थीं कि आपके कुपित होने पर तीनों लोकों में हमारा कोई भी  शरणदाता न होगा, हमें कहीं भी  ठिकाना न मिलेगा। कर्म से, वाणी से और चिंतन से हमने अनेकों अपराध किए हैं, कोई भी अपराध क्षमा के काबिल नहीं है।   हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि क्रूर कर्म में प्रवीण कालदेवता, निष्ठुरता में निष्णात विधि का विधान हमारे किसी भी अपराध के थोड़े से अंश को भी क्षमा न करेगा लेकिन हमारी इनसे कोई आशा नहीं है। हम सबकी प्रत्येक आशा का केंद्रबिंदु तो आप हैं। 

अब तक हमने अपनी हर चाहत को पूरा करने के लिए एक नवजात शिशु की भांति केवल “माँ- माँ” ही  कहना सीखा है। आज फिर से वही “माँ-माँ” कहते हुए अपने किए गए कृत्यों के लिए, अपने समस्त अपराधों के लिए क्षमा की याचना कर रहे हैं।अपने द्वार पर आए सभी याचकों की झोली भरने वाली माता,आज हम बच्चों की झोली अपनी क्षमा से भर दो। आपकी क्षमा शक्ति ही हमारी  जीवन नैया  को पार लगा सकती है,हमें  भवसागर से पार उतार सकती है।

हे माँ, यदि हममें से किसी के द्वारा कोई ऐसा अपराध हो गया है जो किसी भी तरह से क्षमा करने लायक नहीं है तो उसके लिए आप स्वयं ही दंड विधान निर्धारित करना। हमको काल के क्रूर हाथों में अथवा विधाता के निष्ठुर विधानपाश के हवाले मत करना। हमें कुछ भी सजा देना माँ , लेकिन अपने से दूर मत करना। हम आपके चरणों के सान्निध्य से कभी भी, किसी भी हाल में दूर नहीं होना चाहते। आपकी कृपा छांव में हम सारे कष्ट प्रसन्नतापूर्वक सह लेंगे। मुंह से कभी कोई उफ तक नहीं करेंगें। आपके बिना,आपसे थोड़ा भी दूर होकर हमें इस समस्त विश्व-ब्रह्माँड का कोई भी बड़े से बड़ा श्रेय-सौभाग्य नहीं चाहिए। सांसारिक धन-वैभव, यश-प्रतिष्ठा, पद-सम्मान की तो बात ही क्या, माँ  हमेंआपसे दूर होकर देवराज इंद्र और सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा का पद भी नहीं चाहिए। दंड हो या पुरस्कार, हमारा समस्त संसार आपके श्रीचरणों में सिमटा हुआ है। हमारे मन व बुद्धि आपके सिवा अन्य कुछ भी सोचने-समझने और जानने में असमर्थ है।

जब आप स्थूल देह में थीं,हम बच्चे रूठा करते थे तो आप हमें मनाया करती थीं। आज जब आप  सूक्ष्म हैं, तो हमारा शंकालु मन यह सोचने लगता है कि कहीं हमारी माँ हमसे रूठ तो नहीं गईं। हालांकि हम यह जानते हैं कि भौतिक जीवन की अनेकों रस्सियों में बंधा यह मन आपकी सूक्ष्म चेतना का स्पर्श पाने में असमर्थ है, फिर भी अपने इर्द-गिर्द आपकी ढूंढ़-खोज में हमेशा जुटा रहता है। हमें तो प्रतिदिन आपको   देखते रहने की आदत सी पड़ गई है। हमें तो  ठीक से न तो समझ आ रहा है और न ही विश्वास हो रहा है कि अपने बच्चों पर प्राण न्योछावर  करने वाली माँ सूक्ष्म में क्यों जा बैठी। कहीं आपने हमसे रूठकर यह निर्णय तो नहीं लिया लेकिन  हृदय की उफनती भावनाओं में विश्वास के यही स्वर उमड़ते हैं कि वात्सल्यमयी माँ  कभी भी अपनी संतानों से रूठ नहीं सकती। अवश्य ही वह किसी विशेष प्रयोजनवश हमारी स्थूल आंखों से ओझल हुई है। इस विश्वास को बल तब  मिलता है, जब स्वप्नों में आपकी दिव्य झलक मिलती है। वही हंसती-मुस्कराती, प्रसन्नता की प्रदीप्ति से ओत-प्रोत दिव्य भावमूर्ति, वही चिर-परिचित वात्सल्य का भावभरा अंदाज, वही स्नेहमय आश्वासन, वही प्रेम छलकाते शब्द। स्वप्न टूटने पर दिखता है कि अरे माँ तो एकदम अपने आस-पास ही है, केवल चर्मचक्षुओं से ओझल हुई है। उसकी सूक्ष्म चेतना तो विराट-विस्तार लिए आंचल की तरह हम सब पर एक साथ छाँव  कर रही है। संकट में, आपत्ति में, मुसीबत में ,परेशानी में जब कभी प्राण पुकारते हैं, सर्वशक्तिमयी माँ अपनी समस्त शक्तियों के साथ आकर उपस्थित हो जाती है। माँ के स्मरण मात्र से क्रूर काल के बढ़ते कदम भी पीछे वापस होने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सच है माँ महाकाली के शिशुओं के सामने बेचारा काल करेगा भी तो क्या। उसके लिए तो जगदंबा की एक हुंकार ही पर्याप्त है। इस सत्य का अनुभव हम बच्चों ने अपने इस छोटे से जीवन में अनेकों बार किया है।

अपने इसी विश्वास के बल पर हे माँ  हम आपसे सिर्फ एक अंतिम याचना कर रहे हैं कि हमें अब किसी और की नहीं, बस आपकी और सिर्फ आपकी चाहत है। हम केवल और केवल आपको ही चाहते हैं। आपके सिवा अब हमें और कुछ भी नहीं चाहिए। हमारे बिलखते हुए हृदय और आंसू भरी आंखों पर दृष्टि डालकर अब हमें अपनी गोद में उठा लो । संसार के भीषण वन में भटकते हुए हे माँ अब हमारा तन-मन पूरी तरह से तार-तार हो गया है। वेदना से जीवन का अणु-अणु व्यथित है। हे वात्सल्यमयी माँ, ऐसे में सिर्फ आपकी गोद ही हमें त्राण दे सकती है। हे भावमयी भगवती ! हम अतीत और आगत के अपने समस्त अपराधों के लिए आपसे क्षमा-प्रार्थना करते हुए बस अपने लिए आपकी गोद की याचना करते हैं। साथ ही जीवन की शेष सांसों को पूरी तरह आप पर निछावर करने का संकल्प लेते हैं।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का एक-एक सहकर्मी इस संकल्प को निभाने में वचनबद्ध है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान है कि इससे कम में कुछ भी होने वाला नहीं है।

अपने साथिओं को बताना चाहेंगें कि फ़रवरी 1995 का अखंड ज्योति अंक “मातृ स्मृति अंक” के रूप में प्रकाशित हुआ था। 88 पन्नों के इस अंक में 40 पन्नें तो चित्र ही लिए हुए थे। प्रयास करेंगें कि इस अंक में से कुछ सिलेक्टेड कंटेंट प्रस्तुत किया जा सके। 

समापन, जय गुरुदेव   


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