ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। आज इस दिव्य श्रृंखला का 32वां लेख प्रस्तुत किया गया है।
आज प्रस्तुत किया गया ज्ञानप्रसाद लेख आद जितेंद्र रघुवंशी जी की पांच फेसबुक Posts पर आधारित कंटेंट का दूसरा एवं समापन पार्ट है। दोनों लेखों में दी गयी दुर्लभ जानकारी के लिए हम रघुवंशी भाई साहिब का आभार व्यक्त करते हैं।







कल हम फिर से “महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित कंटेंट प्रस्तुत करेंगें जहाँ हम लगभग समापन की ओर बढ़ रहे हैं।
कल के लेख में “माँ” स्थूल शरीर में न होने के बावजूद हम संतानों को वोह आश्वासन दे रही हैं जिसके लिए आज ही प्रतीक्षारत मनोभूमि बनाने की आवश्यकता है।
पूर्व प्रकाशित लेखों में हमने लिखा था कि चित्रकूट शक्तिपीठ से सम्बंधित कोई भी वीडियो उपलब्ध नहीं है जिसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं, तीन मिंट से भी कम चित्रकूट शक्तिपीठ की एक शार्ट वीडियो आज के लेख के साथ अटैच की गयी है।
आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुज्ञान प्राप्त करने के लिए अगले कुछ मिनटों के लिए स्थिर होकर गुरुचरणों में समर्पित हो जाएँ।
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21 अप्रैल 1994 वाले दिन परम पूज्य गुरुदेव के कर कमलों से प्राण प्रतिष्ठित 24 शक्तिपीठों में से एक “गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट” के प्राण प्रतिष्ठा का तेरहवां वर्ष पूरा हुआ था। 45 वर्ष पूर्व (2026 के अनुसार) परम पूज्य गुरुदेव के कर कमलों से गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी। प्रातःकाल शक्तिपीठ में गायत्री माता को नमन करके माताजी ने व्यवस्थापक श्री राम नारायण त्रिपाठी से कहा कि अश्वमेध यज्ञ तो आज पूरा हो गया, पर परम पूज्य गुरुदेव चाहते थे कि “मन्दिर जन जागरण के केन्द्र बनें” यह दायित्व अब तुम्हें पूरा करना है। विश्व पटल पर इस गायत्री शक्तिपीठ तथा पिण्डरा गायत्री शक्तिपीठ एवं इस अश्वमेध यज्ञ का एक महत्वपूर्ण स्थान हो।
इसके बाद ही जिलाधिकारी श्री प्रसन्न कुमार दास तथा पुलिस अधीक्षक श्री देवेन्द्र सिंह के साथ ही अश्वमेध यज्ञ में संलग्न प्रशासनिक अधिकारियों का आभार व्यक्त किया। जिलाधिकारी ने कहा कि इतना बड़ा आयोजन हमारी छोटी सी प्रशासनिक टीम के माध्यम से होना असंभव था, यह संस्था तो दैवीय शक्ति से संचालित है, इसीलिए प्रकृति के भीषण तांडव के बाद भी जिस गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ, यह आश्चर्यजनक है। पुलिस ने कहा कि हमें जब जितेंद्र रघुवंशी जी द्वारा कार्यक्रम का स्वरूप बताया जा रहा था तब हम लोग कपोल कल्पना समझ कर मुस्कुराते थे,लेकिन जब आयोजन को देखा तो हम लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं। आशंका थी कि जैसा बताया जा रहा है, इतने बड़े आयोजन में कहीं कोई दुर्घटना हो गई तो क्या होगा? हमने सभी अधिकारियों को उनके पुरुषार्थ के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट की प्राण प्रतिष्ठा के समय परम पूज्य गुरुदेव ने हमारे ताऊ जी स्व. श्री चकृपाल सिंह जी को बुलाकर कहा था कि “राजा साहब अब तो आपका संकल्प पूरा हो गया है अब तो शान्तिकुँज आयेंगे?”
हमारे ताऊ जी ने कहा कि हाँ, अब जरूर आऊंगा। आइए ताऊ जी के संकल्प को भी समझ लें।
मई 1978 में ताऊ जी स्व. श्री चकृपाल सिंह जी और हमारे पिता जी स्व. श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह शान्तिकुँज पहुंचे थे। परम पूज्य गुरुदेव ने उनसे कहा:
“हम चित्रकूट में एक शक्तिपीठ बनाना चाहते हैं, डॉ. रतन सक्सेना तथा केशव खण्डेलवाल बहुत प्रयास कर चुके, पर ज़मीन नहीं मिल रही है। राजा साहब आप यदि चाह लेंगे तो शक्तिपीठ बन जाएगी।”
ताऊ जी ने कहा कि आप की जैसी इच्छा। परम पूज्य गुरुदेव ने तत्काल कलावा मंगवाया और तिलक करके ताऊजी और पिता जी के हाथ में बांध दिया। उस समय ताऊजी ने कहा था:
“अब हम शान्तिकुँज तभी आयेंगे जब चित्रकूट शक्तिपीठ की प्राण प्रतिष्ठा हो जाएगी।”
शान्तिकुँज से आकर ताऊ जी ने डॉ. रतन सक्सेना तथा श्री केशव खण्डेलवाल जी को बुलवाया और पिता जी स्व. श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह जी के साथ चित्रकूट पहुंचे। ताऊ जी तथा हमारे पिता जी दोनों ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और कामता नाथ मंदिर के श्री प्रेम पुजारी जी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, अतः सीधे पुजारी जी के पास पहुंचे। श्रद्धेय प्रेम पुजारी जी का चित्रकूट के संतों में प्रमुख स्थान था। उन्होंने तत्काल जमीन की खोजबीन करवाई और परम पूज्य गुरुदेव के संकल्प का प्रथम चरण भूमि पूजन के रूप में पूरा हो गया था।
परम पूज्य गुरुदेव को यह बात स्मरण थी कि जब तक “गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट” की प्राण प्रतिष्ठा नहीं होगी ताऊ जी शान्तिकुँज नहीं जाएंगे।
“नींव के पत्थर दिखाई भले ही न दें पर सारा कलेवर उन्हीं पर टिका होता है।”
प्राण प्रतिष्ठा के बाद डॉ. रतन सक्सेना, श्री केशव खण्डेलवाल, श्री सत्य नारायण अग्रवाल तथा श्रीमती तारा अग्रवाल जी ने अपने स्तर पर विस्तार देने में महती भूमिका निभाई, किन्तु जब से एक अध्यापक के रूप में कार्यरत श्री राम नारायण त्रिपाठी के कंधों पर अश्वमेध यज्ञ के समय व्यवस्थापक का दायित्व सौंपा गया, तब से गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट ने दिन दुगना, रात चौगुना विस्तार पाया है। यह त्रिपाठी जी के पुरुषार्थ का प्रतिफल है।
संयोग से परम वन्दनीया माता जी के कर कमलों से प्राण प्रतिष्ठित अन्तिम शक्तिपीठ पिण्डरा तथा अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम के रूप में अश्वमेध यज्ञ चित्रकूट बने।
“अतः हम सभी का दायित्व है कि इन दोनों स्थानों को परम पूज्य गुरुदेव तथा वन्दनीया माताजी के तीर्थों के रूप में स्थापित करें।”
आद जितेन्द्र रघुवंशी जी संलग्न चित्रों के बारे में लिखते हैं ये ऐतिहासिक चित्र आज से 45 वर्ष पूर्व 22 अप्रैल 1981 के हैं। 21 अप्रैल को गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट की प्राण प्रतिष्ठा हुई, चित्रकूट कार्यक्रम के लिए हम भी माँ को लेकर गए थे। बड़े भाई भी वहीं थे।
सायंकालीन प्रवचन के लिए हम परम पूज्य गुरुदेव को लेने के लिए पयस्वनी तट पर स्थित राजकीय अतिथि गृह पहुंचे। पूज्य गुरुदेव को सूचना दी कि प्रवचन का समय हो गया है, गुरुदेव ने कहा: “रघुवंशी तुम्हारा घर भी तो यहीं कहीं है?”
हमने कहा कि हाँ पिताजी, यहाँ से सतना जाते समय कल रास्ते में पड़ेगा। गुरुदेव ने कहा कि “कल तुम्हारे घर होते हुए चलेंगे।” हमने कहा कि पिताजी घर में कोई भी नहीं है, हम लोग तो शान्तिकुँज में ही रहते हैं, कल मझगंवा, महसुआ में गायत्री प्रज्ञापीठों की प्राण प्रतिष्ठाएं हैं तथा सतना, रीवा में भी समय लगेगा और सायंकाल तक मऊगंज पहुंचना है, तो रास्ते में रुकना उचित नहीं होगा।
पूज्य गुरुदेव ने कहा:
“कोई बात नहीं, आगे समय बचा लेंगे लेकिन तुम्हारे घर जरूर जायेंगे।”
हमारे सामने “जी” कहने के अलावा कोई चारा नहीं था लेकिन हमने कहा कि यहां से जल्दी भोजन करके आधा घंटा पहले ही निकल लेंगे तो आगे विलम्ब नहीं होगा, तुरंत ही गुरुदेव ने कहा:
“भोजन यहाँ क्यों करेंगे? अपने घर में भोजन करेंगे।”
उस समय ऐसा लगा कि गुरुदेव कैसी परीक्षा ले रहे हैं? रात्रि का समय हो गया है, सुबह पहुंचना है, 18 किलोमीटर जाना भी है, कैसे व्यवस्था होगी?
रघुवंशी जी लिखते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव को स्टेज में पहुंचाकर बड़े भाई साहब के पास गया और कहा कि गुरुदेव ने कहा है कि कल सुबह हमारे घर पिण्डरा जायेंगे और भोजन भी वहीं करेंगे। बड़े भाई साहब के साथ ही रीवा के श्री प्रमोद सिंह भी खड़े थे, जिनकी बसें सेवा में लगी थीं, बड़े भाई साहब ने कहा कि तू पागल तो नहीं है, इतनी जल्दी कैसे व्यवस्था होगी? श्री प्रमोद सिंह ने कहा कि सब हो जायेगा, चलिए पिण्डरा चलते हैं। उन्होंने अपनी बसों में कार्यकर्त्ता भरे और रात में ही टेसू के फूल तोड़े और सड़क से लगभग एक किलोमीटर घर तक के मार्ग की ऐसी सजावट की कि हम स्वयं ही नहीं पहचान पाये कि हम आ कहां गये। हम तो परम पूज्य गुरुदेव के आगे- आगे चल रहे थे। सारा गांव पलकें बिछाये पूज्य गुरुदेव का स्वागत कर रहा था, हमने पैर छूकर प्रणाम करने के लिए मना किया तो गुरुदेव ने हमें डांट दिया, चल प्रणाम करने दे। परम पूज्य गुरुदेव हमारे पिताजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह से स्वतंत्रता आन्दोलन में गांव की भूमिका की जानकारी लेते रहे। प्रणाम का क्रम समाप्त होते ही पूज्यवर स्वयं उठकर अन्दर बढ़े, जैसे पहले भी कभी आ चुके हों। आंगन से सीधे रसोईघर में पहुँच गए, जहाँ माँ भाव विभोर होकर गुरुदेव के लिए भोजन पका रहीं थीं। हमने परम पूज्य गुरुदेव तथा साथ चल रहे पं. लीलापत शर्मा जी के लिए भोजन की व्यवस्था अलग से दालान में बनाई थी, तथा शेष काफिले में चल रहे लगभग 200 व्यक्तियों की भोजन व्यवस्था बाहर चौपाल में की थी लेकिन यह क्या, पूज्य गुरुदेव ने रसोई में ही माँ से कहा कि “लाओ, पट्टा यहीं रखो और क्या-क्या बनाया है? सब एक एक कटोरी में यहीं रखो।”
माँ सकुचाईं लेकिन आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकीं। रसोई में ही पट्टा रखकर कटोरियों में ही खाना लग गया। यह सब देखकर हम भाव विभोर हो गये और अश्रुओं की धारा फूट पड़ी, तभी देखते हैं कि पिताजी, माँ, ताऊ जी तथा बड़े भाई साहब को भी अपने बगल में ही बैठाकर कहते हैं:
“लो, तुम लोग भी खाओ।”
वहाँ फोटो लेने की किसी की हिम्मत नहीं थी, पर डॉ हेमन्त पाण्डेय अपना कैमरा लिए खड़े थे। गुरुदेव ने कहा:
“ले, सबकी फोटो खींच, तू डर क्यों रहा है?” हमारी रसोई का चित्र श्री मृत्युंजय शर्मा जी भाई साहब द्वारा संपादित गुरुसत्ता से साक्षात्कार चित्रावली के पृष्ठ 174 चित्र 2 में काट छांट कर दिया गया है।
साढ़े तीन घंटे घर के कोने-कोने में दरवाजे के सांकल स्वयं खोलकर पूछते कि यह किसका कमरा था। आगे के कार्यक्रमों के आयोजक देरी के कारण हमारे यहाँ पहुंचने लगे थे। सभी हमें कोसते, पर हम तो स्तब्ध थे कि क्या किया जाए।
आखिरकार 4 घंटे के विलम्ब से मझगंवा प्रज्ञापीठ की प्राण प्रतिष्ठा करके पूज्य गुरुदेव सतना पहुंचे। विन्ध्य क्षेत्र में मिशन का बीजारोपण करने वाले यशस्वी कार्यकर्ता स्व. डॉ रतन सक्सेना ने गुरुवर से कहा कि पाँच मिनट के लिए श्री केशव खण्डेलवाल के घर चलना होगा। तुरन्त ही परम पूज्य गुरुदेव ने कहा कि हम किसी के घर नहीं जायेंगे, सीधे रीवा चलो, विलम्ब हो रहा है। सक्सेना जी ने कहा कि अभी तो आप साढ़े तीन घंटे पिण्डरा में रघुवंशी के घर में रहे हैं, तो गुरुदेव ने कहा:
“वहां मैं अपने घर गया था, रघुवंशी परिवार के मेरे बच्चे मेरे पास ही रहते हैं।”
औपचारिकताएं पूरी करते हुए परम पूज्य गुरुदेव रीवा, महसुआ होते हुए मध्यरात्रि में मऊगंज काफिले सहित पहुंचे, जहाँ सायंकाल पहुंचकर प्रवचन करना था। वाङ्गमय क्रमांक 1, युगदृष्टा का जीवन दर्शन के पृष्ठ 10.27 में भी इसका संक्षिप्त उल्लेख है।
परम पूज्य गुरुदेव के जहां चरण पड़े, उस अपनी पैतृक हवेली को गायत्री शक्तिपीठ पिण्डरा के रूप में परिवर्तित करके “जन जागरण केन्द्र” के रूप में समाज को समर्पित किया। यह शक्तिपीठ परम वन्दनीय माता जी के करकमलों से प्राण प्रतिष्ठित अन्तिम शक्तिपीठ कहलाई, जिसकी वर्तमान में व्यवस्था श्री राम नारायण त्रिपाठी द्वारा संचालित की जा रही है।
धन्यवाद् जय गुरुदेव