ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। आज इस दिव्य श्रृंखला का 33 वां लेख प्रस्तुत किया गया है।
आज शब्द सीमा की बेड़ियाँ केवल इतना ही कहने की आज्ञा दे रही हैं कि कल इस श्रृंखला का अंतिम लेख प्रस्तुत किया जायेगा। आज के लेख में माँ द्वारा दिए गए अनेकों आश्वासन हाईलाइट किये गए हैं, आने वाले दिव्य सन्देश इसी कंटेंट को दर्शाएंगें।
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वंदनीय माता जी ने कहा था कि वे देह के न रहने पर भी अपने बच्चों से दूर न होंगी। उनके बेटे-बेटियां उन्हें पुकारते ही अपनी माँ के आंचल की छाया और छुअन को महसूस करेंगे। माँ के स्थूल शरीर में न होते हुए भी जिस किसी ने भी उन्हें दिल से पुकारा, ठीक उसी तरह का स्पर्श पाया जैसा कभी माँ ने मथुरा स्थित अखंड ज्योति संस्थान की भूतों वाली बिल्डिंग में यां हरिद्वार स्थित युगतीर्थ शांतिकुंज के कक्ष में अनुभव कराया था। आज भी अनेकों साथिओं से सुनते आ रहे हैं कि शांतिकुंज के समाधि स्थल के सामने खड़े होकर सच्चे मन से की गयी प्रार्थना पूर्ण होती है।
हमारी सबकी माँ, वंदनीय माताजी ने अपने जीवनकाल में अनेक अवसरों पर, अनेकों बातें कही थीं जिनमें कुछ तो व्यक्तिगत हैं लेकिन बहुत कुछ ऐसी हैं जो सार्वकालिक (For ever) और सार्वभौम ( विश्व् व्यापी) होने के कारण विश्व में रह रहे किसी भी बेटे-बेटी, गायत्री परिजन के लिए हैं।
माताजी के प्रेम से छलकते स्वर अपने बच्चों के जीवन के लिए अनेकों समाधान लिए हुए हैं।उनके उद्बोधनों से पता चलता है कि माताजी हमें ऐसे ही बिना किसी सहारे के छोड़कर नहीं चली गयीं । उनका प्यार-दुलार एवं समर्थ शक्ति हम सबके साथ है। यहां तक कि वे स्वयं भी हमारे आस-पास ही हैं। इस सच्चाई को अनुभव करने के लिए हमें बस अपने ह्रदय की गहराइयों से “माँ” कहकर पुकारना होगा। यह “एक अक्षर सृष्टि बीज है, मंत्रराज और महामंत्र” है जिसे माताजी ने हम सबके लिए स्वयं जाग्रत और चैतन्य किया है। न जाने कितनी बार माताजी ने अपने श्रीमुख से कहा है:
“मैं कभी भी अपने बेटे-बेटियों को छोड़कर जाने वाली थोड़े ही हूं। देह सबकी छूटती है, मेरी भी छूटेगी। देह का तो धर्म ही है पैदा होकर नष्ट होना, सो यह तो नष्ट होगी ही लेकिन इससे क्या, मैं तो जैसी की तैसी बनी रहूंगी। तुममें से जब कभी भी कोई माँ ! माँ !! कहकर बुलाएगा तो मैं दौड़ी-भागी चली आऊंगी।अभी भी तुम लोग मुझे बुलाते हो तो मैं आती हूं कि नहीं। तुम्हारे बुलाने पर मैं ही आती हूँ। देह तो यहीं शांतिकुंज में पड़ी रहती है।”
अपनी देह की ओर इशारा करते हुए माताजी कहती हैं:
यह देह है तो क्या, नहीं है तो क्या, इससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है, इसलिए तुममें से किसी को इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है कि माताजी आज हैं कल नहीं रहेंगी। अरे, माताजी आज हैं और हमेशा रहेंगी। माताजी तब भी थीं, जब यह देह नहीं थी और माताजी तब भी रहेंगी,जब यह देह नहीं रहेगी। जब हमारे बच्चे हमको बुलाएंगे, मैं भागकर आऊंगी।”
एक बार माताजी के किसी भक्त ने पूछा यह बुलाना कैसा होता है माताजी ?
भक्त की बात सुनकर माताजी हंसने लगीं और बोलीं:
“अपनी माँ को बुलाने के लिए कोई विधि-विधान भी होता है क्या? अरे बेटा,माँ तो अपने उस बच्चे की भी सारी बातें समझ लेती है जो अभी बोलना भी नहीं जानता। क्या तुमने देखा नहीं कि नवजात शिशु जो बोलना भी नहीं जानते, केवल अपनी माँ की याद कर बिलख उठते हैं। माँ को पुकारने का उनका यही अद्भुत साधन है। शिशु की इस पुकार को अन्य कोई और समझे या न समझे लेकिन माँ समझ जाती है और इस तरह पुकारते ही वह झटपट अपने हाथ के सारे काम छोड़कर दौड़ी-भागती आती है,शिशु को गोद में उठा लेती है,अपने कोमल हृदय का सम्पूर्ण स्नेह शिशु पर उड़ेल देती है।
इन पंक्तियों को पढ़ रही बहिनें तो हमारे साथ अवश्य ही सहमत होंगीं क्योंकि वोह “माँ” के उच्चस्तरीय अलंकार से सम्मानित हैं लेकिन भाई लोग भी इस तथ्य का विरोध( यदि वोह करते हैं तो) करते समय हज़ार बार सोचेंगें। अरे, यहाँ पर माँ की जिन विशेषताओं की चर्चा हो रही है, वोह तो पशुओं में भी साक्षात् देखी गयी है। गाय का अपने बछड़े के साथ प्रेम, बंदरी का अपने बच्चों से प्यार आदि के इतने उदाहरण मिल सकते हैं कि यदि उनकी चर्चा करना शुरू कर दें तो वर्तमान विषय से भटकने का अंदेशा होगा।
केवल इतना ही कह कर आगे बढ़ते हैं कि माँ केवल माँ ही होती है और कुछ भी नहीं।
वंदनीय माताजी “बुलाने का अर्थ” समझाते हुए हंसकर बोलीं:
“अरे बेटा! माँ तो उन बच्चों की बातों को भी समझ लेती है जो गूंगे हैं, बहरे हैं,अपाहिज हैं। माँ को बुलाने के लिए कुछ और नहीं, केवल ह्रदय की तड़प चाहिए। बच्चे की तड़प माँ को तड़पाती है, बच्चे की रुदन माँ को रुलाती है, बच्चे के आंसुओं पर माँ व्याकुल हो उठती है।”
इस वाक्य को पूरा करते-करते ऐसा अनुभव हुआ कि माताजी कुछ देर के लिए अपनी ही गहराइयों में खो गईं और फिर उबरते हुए धीरे से बोलीं:
“ बेटे, माँ और बच्चों का रिश्ता कुछ ऐसा ही होता है”
अपनी संतानों पर हर पल, प्राण न्योछावर करने वाली माताजी अपनी शक्ति के बारे में प्रायः चुप ही रहती थीं। कोई बात होने पर वह यही कहतीं:
“अच्छा बेटा! हम गुरुजी से कह देंगे अथवा फिर यह कहा करतीं कि गायत्री माता से प्रार्थना करेंगे।”
एक कार्यकर्ता के माध्यम से अनेकों प्रश्नों का समाधान:
बात 1992 के अंतिम दिनों की है। उस दिन दोपहर में मिलने वाले कुछ कम ही थे, सो माताजी जल्दी ही फुरसत पा गईं । सबसे अंत में एक कार्यकर्ता आया , माताजी के पास और कोई तो था नहीं, सो उन्होंने उसे अपने पास बिठा लिया। वह भी माताजी के साथ कुछ क्षणों का संग-लाभ पाकर खुश हो गया। खुशी के इन क्षणों में कार्यकर्ता ने अपने मन की बात पूछते हुए कहा, “माताजी, मैंने अपनी पूजास्थली पर मात्र एक छोटी सी गायत्री माँ की फोटो रखी है,साथ ही गुरुजी का और आपका भी चित्र लगा रखा है। ध्यान के समय आप दोनों में ही मैं सूर्य और गायत्री की, महाकाल और महाकाली की कल्पना करता हूं। क्या यह ठीक है? उत्तर में पहले तो वह चुप रहीं, फिर बोलीं:
“बेटा, यह व्यक्ति की श्रद्धा-भाव संवेदना पर निर्भर करता है। मनुष्य जितना गहरा किसी से लगाव करेगा, उतना ही उस वस्तु, मनुष्य, स्त्री,पुरुष आदि में ध्यान गहराता जाएगा। तुम्हें अपनी साधना और गहरी बनानी चाहिए। गायत्री महाशक्ति से साक्षात्कार करने के कारण गुरुजी का ध्यान सविता के ध्यान से शीघ्र लगता है। इसी तरह वे मेरे भी आराध्य हैं। उनकी ही शक्ति मुझे भी मिली है। मेरा ध्यान तुझे उन तक, गायत्री माता तक, और जल्दी पहुंचा सकता है। जो गुरुजी हैं, वही मैं हूं। जो मैं हूं, वही गुरुजी हैं। हम दोनों में कोई अंतर नहीं।”
माताजी का कथन सुनने वाला कार्यकर्ता भाव-विह्वल हो गया । काफी देर तो उसे कुछ सूझा ही नहीं, फिर धीरे से पूछा, “माताजी आपकी कृपा से अनगनित लोगों के लौकिक कष्टों का निवारण हुआ है लेकिन क्या आपकी कृपा से जीव को मुक्ति भी मिलती है ?
इस प्रश्न को सुनकर वह जैसे आत्मलीन हो गईं और कहने लगीं:
“सब कुछ माँ की कृपा से होता है, संकट निवारण, स्वर्ग, मोक्ष सब कुछ उनकी ही कृपा से संभव है। हम तो निमित्त मात्र हैं।”
महाशक्ति के इन वचनों को ध्यान से सुनने के बाद भी कार्यकर्ता भाई साहिब ने अपनी शंका के निवारण के लिए एक और प्रश्न किया: “माताजी, वेदांत आदि शास्त्रों में लिखा है कि ज्ञान होने पर मोक्ष मिलता है।”
उत्तर में वंदनीय माताजी बोलीं:
“यह सत्य तो है लेकिन वह ज्ञान आद्यशक्ति माँ की कृपा के बगैर नहीं मिलता। वहां तक पंहुचने के लिए मातृशक्ति के रूप में गुरु की सत्ता ही सर्वाधिक सक्षम है। जब किसी जीव पर माँ की कृपा होती है, तभी ज्ञान की प्राप्ति होती है। फिर मोक्ष दूर नहीं।”
दुर्गा सप्तशती में लिखे निम्नलिखित श्लोक को समझाते माताजी कहती हैं :
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ।। संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ।।
अर्थात
“आदिशक्ति माँ ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मोक्ष के लिए वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी और संपूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं।”
ऐसा समझाकर माताजी ने परोक्ष रूप में इस समर्पित कार्यकर्ता को मातृशक्ति की लीला में अपनी भूमिका से परिचित करा दिया। माँ के वचन सुनने वाले के कानों में अमृत घोल रहे थे। उसने बहुत हिम्मत जुटाकर एक अंतिम प्रश्न किया:
“माताजी, दुर्गा सप्तशती माँ आदिशक्ति की चरित्रकथा है। इसे पढ़ने को एक तीव्र साधना माना जाता है। लाखों लोग प्रतिदिन इसका पाठ करते हुए मनोवांछित फल पाते हैं। इसी तरह क्या आपके बच्चे आपकी जीवनकथा के पाठ को साधना के रूप में कर सकते हैं।
इस प्रश्न के उत्तर में माताजी ने कहा:
“बेटा, समय आने पर हम दोनों की ही जीवनगाथा आप सबके समक्ष आएगी। इन लीला प्रसंगों को पढ़ना स्वयं गुरुसत्ता से साक्षात्कार के समान होगा। वैसे मैं माँ हूं। मुझे तो कोई कभी भी जब भी याद करेगा तो उसके समीप रहूंगी। उसके कष्टों के शमन का प्रयास करूंगी।”
माताजी कहा करती थीं:
“जीवन है तो परेशानियां भी आएंगी, संकट, मुसीबतें भी खड़ी होंगी लेकिन तुम लोग घबराना नहीं। संकट कितने भी बड़े और विकराल हों, हमेशा याद रखना कि हमारी एक माँ है, जो हमेशा पीछे खड़ी है। ये संकट कितने ही बड़े क्यों न हों लेकिन हमारी माँ से बड़े नहीं हो सकते। हमेशा अपनी माँ की असीम सामर्थ्य एवं कृपाशक्ति पर भरोसा रखना।”
माँ के इस आश्वासन के बाद भी यदि हमारी किसी चिंता का कोई कारण बचता है तो फिर हम में ही समस्या है, ऐसा केवल अविश्वास की स्थिति में ही होता है, शंका के कारण ही होता है। विश्वास करने वालों ने तो पत्थर में भी भगवान प्रकट करवा डाले हैं, यह पुरातन सुनी सुनाई बातें नहीं हैं, आज 21वीं सदी में भी देखी जा रही हैं, शर्त केवल एक ही हैं: अटूट श्रद्धा, अटूट विश्वास एवं अटूट समर्पण। यदि इतना करने पर भी कुछ नहीं होता तो फिर सितारों के खेल है, प्रारब्ध की बात है।
माताजी का यह आश्वासन उनके लिए है जो उनसे कभी भी कैसे ही क्षणों में मिले हैं और उनके लिए भी है जो उनसे कभी भी नहीं मिले। माताजी कहा करती थीं कि मैं अपने उन बच्चों से भी परिचित हूँ जो मेरी देह के न रहने पर शांतिकुंज आएंगे। उनके प्रति मेरा प्यार उनसे कहीं अधिक होगा जो मुझसे मिल चुके हैं। उन्हें मैं अपनी स्नेह छाया से पूरी तरह सुरक्षित-संरक्षित रखूंगी। जब वे मुझे याद करेंगे, मैं उन्हें उनका अभीष्ट प्रदान करूंगी।
धन्यवाद्,जय गुरुदेव
