ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। आज इस दिव्य श्रृंखला का 31वां लेख प्रस्तुत किया गया है।








आज के ज्ञानप्रसाद लेख का शुभारम्भ करने से पहले हम अपने समर्पित,नियमित एवं आदरणीय साथी डॉ चंद्रेश जी से क्षमाप्रार्थी हैं कि उनके द्वारा भेजे गए तीन “शुभ अवसर” परिवार की शुभकामनाओं से वंचित रह गए। विस्तृत कारण तो कल वाले स्पेशल स्पेशल सेगेमेंट में ही बता पायेंगें लेकिन इतना कहना उचित रहेगा कि हमारी व्यस्तता ने व्हाट्सप्प मैसेज देखने ही नहीं दिया। जिस लेख को आज प्रस्तुत किया गया है उसके लिए जिस स्तर की “एकांत साधना” की गयी है उसे वर्णित नहीं किया जा सकता, गुरुदेव ने कहीं पर लिखा भी है कि अनुसंधानकर्ता की एकांत में, वन में बैठे ऋषि से बड़ी ही आसानी से तुलना की जा सकती है। इस लेख का दूसरा भाग सोमवार को प्रस्तुत किया जायेगा।
आदरणीय जितेंद्र रघुवंशी जी को कौन नहीं जानता, उनके बारे में हम तो नहीं लिखेंगें लेकिन साथिओं से आग्रह है कि उनके फेसबुक पेज अवश्य विजिट करें।
जो जानकारी उन्होंने “चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ” से सम्बंधित पांच फेसबुक पोस्ट्स में दी है, उन्हें देखकर हमारा रुकना असंभव था। फिर क्या था उन्हें कितनी ही बार पढ़ा, देखा, एडिट किया और साथिओं के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया। पांचों पोस्ट्स में ऐसे दुर्लभ चित्र हैं जिन्हें शार्ट वीडियो में प्रस्तुत करना उचित रहेगा।
हम अक्सर कहा करते हैं कि गुरुदेव हमें हाथ पकड़ का लिखवा रहे हैं, इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। 5 फेसबुक पोस्टस जिनका इन दो लेखों में वर्णन है पिछले वर्ष 2025 में प्रकाशित हुई थीं लेकिन हमारी दृष्टि अब 2026 में पड़ी। गुरुदेव ने देख लिया कि हम चित्रकूट यज्ञ के लिए वीडियो ढूंढ रहे हैं, वीडियो तो नहीं मिली लेकिन इतने ओरिजिनल रंगीन/ब्लैक एंड व्हाइट चित्र मिले कि हम एक शॉर्ट वीडियो तो बना ही सकते हैं। इन लेखों से भी विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए 153 पन्नों की स्मारिका भी तो उपलब्ध है।
तो आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में गुरुज्ञान प्राप्त करने लिए गुरुचरणों में समर्पित हो जाएं।
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16 अप्रैल 1994 को वन्दनीया माता जी ने उस गायत्री शक्तिपीठ की अन्तिम प्राण प्रतिष्ठा की जहाँ 21 अप्रैल 1981 में परम पूज्य गुरुदेव स्वयं तीन घंटे विराजमान रहे।
सुबह से ही लाखों मानस पुत्रों की निगाहें अपनी परम वन्दनीया माता जी की अगवानी के लिए सतना हवाई अड्डे पर टिकी थीं। मध्य प्रदेश सरकार का विशेष विमान वन्दनीया माताजी को देहरादून के जौलीग्रांट हवाई अड्डे से राजकीय अतिथि के रूप में लेकर जैसे ही सतना (मध्य प्रदेश) हवाई अड्डे के ऊपर दिखा गायत्री माता, परम पूज्य गुरुदेव तथा वन्दनीया माताजी के जयकारों से समूचा आसमान गूंज उठा। हवाई अड्डे पर वन्दनीया माताजी का भावभरा स्वागत करने के बाद अनेकों वाहनों के काफिले के साथ माताजी कुछ क्षण “सतना शक्तिपीठ” में रुककर “गायत्री शक्तिपीठ पिण्डरा” की प्राण प्रतिष्ठा के लिए रवाना हो गईं।
“गायत्री शक्तिपीठ पिण्डरा” पहुंचते ही हमारे ताऊ महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री चकृपाल सिंह तथा पिताजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह की अगुवाई में वन्दनीया माताजी का भावभरा स्वागत किया गया। भावविभोर होकर हमारी माँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती सत्यवती देवी रघुवंशी वन्दनीया माताजी के चरणों में लिपट गईं, हमारी माँ के सिर पर हाथ रखकर वन्दनीया माताजी ने कहा कि आप तो सौभाग्यशाली हैं कि आपने अपने तीनों बेटे हमें सौंप दिए हैं। हम (जितेंद्र जी) लोग भी भाव विभोर थे। हमें कहाँ पता था कि आज एक इतिहास रचा जा रहा है। जिस गायत्री शक्तिपीठ पिण्डरा की प्राण प्रतिष्ठा करने वन्दनीया माताजी पधारी हैं वह उनके कर कमलों से प्राण प्रतिष्ठित “अन्तिम गायत्री शक्तिपीठ” कहलायेगी। प्राण प्रतिष्ठा के पूर्व श्री श्याम बिहारी दुबे के नेतृत्व में पूर्ण विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा का प्रारंभिक चरण पूरा किया गया।
प्राण प्रतिष्ठा के बाद मन्दिर से निकल कर वन्दनीया माताजी सभी को आशीर्वाद देते हुए “अश्वमेध नगरी चित्रकूट” के लिए प्रस्थान कर गईं, जहाँ की पांच किलोमीटर लंबी कलश यात्रा अपना सौंदर्य बिखेर रही थी।
16 से 20 अप्रैल 1994 को सम्पन्न हुए चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ के एक वर्ष पूर्व स्थापित अश्वमेध कलश का पूजन, आश्वमेधिक पताका का ध्वजारोहण,16वें “अश्वमेध यज्ञ चित्रकूट” के शुभारंभ की घोषणा हुई थी। 1994 में 1008 कुंडीय आश्वमेधिक यज्ञशाला में यज्ञाश्व के प्रवेश के समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे स्वर्गलोक धरती पर ही अवतरित हो गया हो।
चित्रकूट प्रवेश के समय से ही वन्दनीया माताजी की प्रसन्नता देखते बनती थी, ऐसा लग रहा था मानो अपनी चिर परिचित भूमि पर अपने आराध्य को निहार रही हों। हम लोगों को कहाँ पता था कि वे अपने लीला संदोह का अन्तिम पृष्ठ जोड़ रही हैं। देवमंच पर वन्दनीया माताजी के साथ आदरणीया शैल जीजी, डॉ प्रणव पण्ड्या, ब्रह्मा के रूप में श्री धर्मदेव चौबे, अध्वर्यु के रूप में श्री श्यामबिहारी दुबे, श्री विश्व प्रकाश त्रिपाठी तथा उद्गाता गण सुशोभित थे।
देवपूजन के पश्चात ब्राह्मणाच्छंसी श्री चन्द्रभूषण मिश्रा जी के निर्देशन में यज्ञाहुतियों का क्रम आरंभ हुआ। होता के रूप में श्री सूरज प्रसाद शुक्ला, श्री बृजेन्द्र रघुवंशी, श्री शशिकांत सिंह तथा श्री राजकुमार गुप्ता के द्वारा उच्चारित वेदमंत्रों की गूंज से समूचा आश्वमेधिक नगर गुंजायमान हो उठा। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन पर आधारित चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद “अश्वमेध यज्ञ समिति चित्रकूट” द्वारा तैयार किए गए विशेष रथ से वन्दनीया माताजी ने पूरे आश्वमेधिक परिसर का भ्रमण करते हुए देश विदेश से आये हुए मानस पुत्रों को दर्शन लाभ दिया। सायंकालीन प्रवचन मंच से दिए गए सन्देश ने गुरुवर की युग बदलने की टीस का भान कराया।
18 अप्रैल 1994 वाले दिन भी ब्रह्म मुहूर्त से ही देवमंच से गूँज रहे वैदिक मंत्र 15 किलोमीटर की परिधि में फैले अश्वमेध नगरों में गुंजित होने लगे। गायत्री शक्तिपीठ चित्रकूट के व्यवस्थापक राम नारायण त्रिपाठी की व्यवस्था में वन्दनीया माताजी चित्रकूट धाम के प्रमुख मन्दिर कामता नाथ जी पहुंचीं। कामता नाथ मंदिर के प्रमुख पुजारी तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री प्रेम पुजारी जी महाराज ने वन्दनीया माताजी के मंदिर पहुंचने पर भव्य स्वागत किया। कामता नाथ मंदिर में वन्दनीया माताजी कुछ क्षणों के लिए खो जैसी गईं।1981 में परम पूज्य गुरुदेव भी इसी तरह कामता नाथ मंदिर पहुंचे थे और इसी तरह प्रेम पुजारी जी ने उनका स्वागत किया था। शास्त्रोक्त विधि विधान से वन्दनीया माताजी ने कामता नाथ मंदिर में पूजन अर्चन किया। श्री प्रेम पुजारी जी ने परम पूज्य गुरुदेव के आगमन की स्मृतियों को साझा किया।
इसी दिन वन्दनीया माताजी के आवास स्थल कामदगिरि भवन में ग्रामोदय चित्रकूट विश्व विद्यालय के कुलाधिपति और अब भारत रत्न श्री नानाजी देशमुख पहुंचे। वन्दनीया माताजी ने चित्रकूट क्षेत्र में उनके द्वारा किए जा रहे सेवापरक रचनात्मक कार्यों की प्रशंसा की। जिले के प्रभारी मंत्री श्री इन्द्रजीत पटेल ने वन्दनीया माताजी से हमारी शिकायत करते हुए कहा कि “रघुवंशी जी ने हमें अच्छी डांट लगाई है।” तुरंत वन्दनीया माताजी ने कहा:
“शायद उसी डांट का प्रतिफल आज चित्रकूट में भव्यता के रूप में दिखाई दे रहा है। मेरे बेटे अनावश्यक रूप से किसी को भी नहीं डांटते हैं। आप लोगों ने भी अथक परिश्रम करके चित्रकूट में स्वर्ग को उतार दिया है।”
अश्वमेध यज्ञ समिति चित्रकूट द्वारा वन्दनीया माताजी को उनकी सुविधानुकूल एयर कंडिशन्ड वाहन समर्पित किया गया, जिससे उन्होंने सभी नगरों तथा परम पूज्य गुरुदेव के जीवन से आधारित प्रेरणादायी प्रदर्शनी का भ्रमण करते हुए देवमंच पहुंचीं। सायंकाल का मार्मिक उद्बोधन मानस पुत्रों के हृदयों को झकझोर रहा था।
अश्वमेध यज्ञ चित्रकूट के लिए 14 अश्वमेध नगर में बसाये गये; कामद नगर, तुलसी नगर, अत्रि नगर, वाल्मीकि नगर, श्री राम नगर, भरत नगर, लक्ष्मण नगर, सरभंग नगर, आचार्य नगर, वामदेव नगर, वशिष्ठ नगर, विश्वामित्र नगर, भारद्वाज नगर तथा गायत्री नगर में एक दिन पहले ही उम्मीद से दुगुने श्रद्धालुओं का जन सैलाब आश्रय पा चुका था। चित्रकूट धाम के अधिकांश सन्तों ने भी अपने अपने द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिये थे। 1008 कुंडीय यज्ञशाला में मध्य रात्रि से ही श्रद्धालुओं ने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया था, जन सैलाब का अत्यधिक दबाव होने के कारण श्री चन्द्र भूषण मिश्रा जी के नेतृत्व में आश्वमेधिक टोली ने भी समय से पहले ही यज्ञाहुतियों का क्रम आरंभ कर दिया।
श्री बिजेन्द्र नाथ चौबे, श्री हंस कुमार तथा श्री गोपाल अग्रवाल जी के नेतृत्व में ओम टेण्ट हाउस बलिया के संसाधनों से सुसज्जित संस्कारशाला आकर्षण का मुख्य केन्द्र रही, जहाँ वन्दनीय माताजी ने विशाल पण्डाल में अपने श्रीमुख से हजारों मानस पुत्रों को दीक्षित किया। दोपहर में अन्य संस्कारों के साथ सैकड़ों विवाह संस्कार सम्पन्न कराये गये। परम पूज्य गुरुदेव द्वारा अनुवादित वेद विभाग (जिसके स्व. श्री चन्द्र भूषण मिश्रा तथा हम (जितेंद्र जी) भी अभिन्न अंग रहे हैं)) द्वारा सुसज्जित नवीन संस्करण का विमोचन भी वन्दनीय माताजी के कर कमलों से हुआ।
मध्याह्न से पूर्व ही श्रद्धालुओं के लिए बनाये गये अनुसुइया, अन्नपूर्णा, मंदाकिनी, पयस्विनी, गोदावरी, भगवती, प्रयागराज, शारदा, धमतेश्वरी तथा लक्ष्मीबाई भोजनालयों में प्रसाद ग्रहण करने के लिए तांता लगा रहा।
वन्दनीय माता जी इस अवधि में शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद चित्रकूट के लगभग सभी तीर्थ स्थलों पर गईं। गुप्त गोदावरी में माताजी का ऊपर चढ़ पाना मुश्किल था, अतः एक सोफा की डोली जैसी बना दी गई थी, जिस पर मानस पुत्रों ने बिठाकर अपने कंधों पर रखकर अन्दर ले गए। कंधों पर उठाते ही वन्दनीय माताजी ने कहा:
“अब उठा तो लिया ही है, अब इन्हीं कंधों के सहारे अपने आराध्य के पास भी पहुंच जाऊँगी।”
यह सुनते ही सबकी आंखों से आंसू फूट पड़े। शायद माताजी को आभास हो गया था कि अब आगे किसी कार्यक्रम में नहीं जा पाएंगी, और उनका एहसास तब सत्य हुआ, जब 19 सितम्बर 1994 में वन्दनीय माताजी महाप्रयाण कर गईं।
गुप्त गोदावरी की गुफा के अंदर का सौन्दर्य, पत्थरों की नक्काशी देख कर वन्दनीय माताजी अतीव प्रसन्न थीं। स्फटिक शिला पर बैठकर तो इतनी अभिभूत थीं कि ऐसा लग रहा था कि अपने चिर परिचित स्थान पर विराजमान हुई हों। सायंकालीन उद्बोधन में वन्दनीय माताजी ने अश्वमेध यज्ञ में सम्मिलित सभी मानस पुत्रों को झकझोरते हुए कहा:
“अब तुम लोग श्रवण कुमार की तरह अपनी गुरु सत्ता को घर घर पहुंचाओ और समूची धरा को “पाश्चात्य संस्कृति की दासता” से मुक्त कराने में लग जाओ।”
इससे आगे का वृतांत सोमवार को प्रस्तुत करने की योजना है।
धन्यवाद, जय गुरुदेव