वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 30वां ज्ञानप्रसाद लेख: 19 सितम्बर 1994 को हुए वंदनीय माताजी के महाप्रयाण को समर्पित एक दिव्य लेख     

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के  अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। आज इस दिव्य श्रृंखला  का 30वां लेख प्रस्तुत किया गया है। 

हमारे पाठकों को अद्भुत संयोग स्मरण हो आया होगा कि माताजी का अवतरण 20 सितम्बर को हुआ था और महाप्रयाण 19 सितम्बर को, अंतिम संस्कार 20 सितम्बर,1994  को हुआ था। 

वर्तमान लेख श्रृंखला जिसका सृजन,118 पन्नों की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” से किया गया है अपने अंतिम श्वासों  की ओर बढ़ रही है। शीघ्र ही इस श्रृंखला के समापन होने की आशा है लेकिन माँ पर आधारित  लेखों के बारे में अभी बहुत कुछ जानने को है। समय आने पर सब कुछ बताया जाता रहेगा। 

आज के लेख में उन मार्मिक क्षणों को  पिक्चराइज़ करने का प्रयास किया गया है जिसे किसी भी बच्चे भी के लिए सहन करना असंभव होता है। माँ का साया सिर से उठ जाना बच्चे को अनाथ बना जाता है लेकिन इस जगत्माता के बच्चे सारे विश्व में फैले हुए हैं, हमारी माँ सभी को अपनी सूक्ष्म  शक्ति से संरक्षण प्रदान कर रही है, ज्ञानप्रसाद लेखों को पढ़कर तो देखो, साक्षात माँ और पिता गुरुदेव का आभास न हो तो कहना। 

आज के लेख की अंतिम पंक्तियाँ, 11:50 बजे की अद्भुत घटना एवं उसका चरितार्थ लेख में चार चाँद लगा रहा है।    

कल फिर  एक वीडियो प्रस्तुत की जाएगी। वंदनीय माताजी के महाप्रयाण को समर्पित यह दिव्य/दुर्लभ/मार्मिक वीडियो जिसे आदरणीय देवेश जी ने Archive से ढूंढ कर हमारे लिए प्रस्तुत की, किस के भी आंसू छलका सकती है। 

तो आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा की ओर कदम बढ़ाएं और गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें। शब्द संख्या और लेख के सब्जेक्ट  के कारण इस ज्ञानप्रसाद लेख को गूगल ड्राइव में प्रस्तुत किया गया है।

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हम सब जानते हैं कि वंदनीय माताजी स्वास्थ्य की किसी स्थिति में चित्रकूट यज्ञ में उपस्थित हुई थीं। जाने से पहले ही उनका स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था लेकिन आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि जितने दिन वह चित्रकूट रहीं, उनका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक रहा। 

शांतिकुंज आने पर उनकी बीमारी फिर से वैसी ही  हो गई जैसी जाने से पहले थी। डॉ. प्रणव पंड्या के निर्देशन में सभी लोग उनकी  सेवा में जुट गए। विशेषज्ञ चिकित्सकों की भी सहायता ली गई। सभी के आग्रह-अनुरोध पर उन्होंने चिकित्सालय में भी भरती होना स्वीकार किया। इस क्रम में पहले वह कुछ दिन आगरा में रहीं, बाद में कुछ दिनों तक दिल्ली में भरती रहीं। चिकित्सक जो कर सकते थे, कर रहे थे। चिकित्सा विज्ञान में जो आधुनिकतम तकनीकें थीं, उन्हें प्रयोग में लाया जा रहा था लेकिन उनकी बीमारी भी अनोखी थी। एक के बाद दूसरी नई बीमारी की परत खुल जाती थी। वह सभी को प्रयत्न करते, परेशान होते हुए देख रही थीं। शैल जीजी  के साथ माताजी के  सुपुत्र मृत्युंजय शर्मा भी प्राण-पण से अपनी जन्मदात्री माँ की सेवा में जुटे थे। सभी के सारे प्रयत्न निष्फल हुए जा रहे थे। काफी दिन बीत चुकने पर उन्होंने एक दिन कहा: 

उन्हें देखकर सभी यह अनुभव कर रहे थे कि महामाया अपनी योगमाया समेट रही हैं। उनका आदेश मानकर सभी लोग उन्हें लेकर शांतिकुंज आ गए। वह प्रसन्न  भाव से असह्य कष्ट सहे जा रही थीं। 

श्रीमद्भागवत गीता का वाक्य ‘यस्मिन्सिथतो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते’ उन दिनों उनके जीवन में पूरी तरह से चरितार्थ हो रहा था। इस गीता वाक्य को समझने  के लिए गूगल टीचर द्वारा दिया गया निम्नलिखित विवरण साथियों के समक्ष रख रहे हैं:  

भौतिक जीवन में किसी भी उपलब्धि से कोई भी प्राणी पूर्णतः संतुष्ट नहीं हो पाता।निर्धन व्यक्ति धनवान बनने के लिए कड़ा परिश्रम करता है और जब वह लखपति हो जाता है तब स्वयं को संतुष्ट मानने लगता है। किन्तु जब वह करोड़पति को देखता है तब पुनः दु:खी हो जाता है। करोड़पति भी अपने से अधिक धनवान को देखकर असंतोष प्रकट करता है। 

हम चाहे कितने भी सुखी हों जब हम उच्चावस्था वाले सुखों की ओर देखते हैं तब हमें अपने सुख बौने दिखाई देने लगते हैं और हमारे भीतर अतृप्ति की भावना जागृत हो जाती है। लेकिन योग की अवस्था में प्राप्त होने वाला सुख भगवान का असीम सुख है क्योंकि इससे श्रेष्ठ कुछ नहीं है। 

इस सुख की अनुभूति से आत्मा को स्वाभाविक रूप से यह बोध हो जाता है कि उसने अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। भगवान का दिव्य आनन्द भी शाश्वत है और एक बार जो योगी इसे पा लेता है फिर उससे यह दिव्य आनंद छिन नहीं सकता। ऐसी भगवत्प्राप्त आत्माएँ भौतिक शरीर में रहते हुए भी दिव्य चेतना की अवस्था में स्थित रहती हैं। 

कभी-कभी बाहर से देखने पर प्रतीत होता कि ऐसे सिद्ध संत अस्वस्थता, विरोधी लोगों और कष्टदायी परिवेश के रूप में संकटों का सामना कर रहे हैं किन्तु आंतरिक दृष्टि से वे दिव्य चेतना में लीन रहते हैं और निरन्तर भगवान के दिव्य सुख का आस्वादन करते रहते हैं। इस प्रकार बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ भी ऐसे संतों को विचलित नहीं कर सकतीं।

इस बीच माताजी को  एक-दो ऑपरेशनों से भी गुजरना पड़ा था, उनके घाव अभी भरे नहीं थे लेकिन  वह जैसे इन सब से परे थीं। इच्छामयी ने स्वयं की इच्छा से अपनी असंख्य संतानों का कष्ट अपने ऊपर ले लिया था। वह बच्चों की पीड़ा को अपने ऊपर लेकर प्रसन्न थीं। देह के असह्य कष्ट उनके अंतःकरण को किसी भी तरह से छू नहीं पा रहे थे। बीमारी के इन दिनों में सभी अपने-अपने ढंग से सेवा करने में जुटे थे। रिश्ते-नातेदारों का आवागमन जारी था। शांतिकुंज,गायत्री तपोभूमि के कार्यकर्त्ता, आदरणीय पं. लीलापत जी आदि गायत्री परिवार के परिजन आदिमाता से अपनी माँ  के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहे थे। ये बड़े ही विशिष्ट क्षण थे। इन क्षणों में माताजी के दौहित्र चिन्मय एवं उनकी छोटी सुपौत्री मृणालिनी को उनके विशेष सान्निध्य का मौका मिला। छोटी-मोटी सभी सेवाओं को करते हुए ये बच्चे देर रात तक उनके पास बैठे रहते थे। कभी-कभी उनसे पूछते भी, अम्मा जी, आप कब ठीक होंगी। उत्तर में वह हंस  देतीं और कहतीं,

इस तरह की बातें सुनकर ये लोग उदास हो जाते, उन्हें समझ में नहीं आता कि वे क्या कहें और क्या करें। जिस माँ ने अनगनित बच्चों  को अपनी योगशक्ति से असाध्य और जटिल रोगों से मुक्त किया,आज वही रोग शैय्या पर लेटी हुई थीं। अंतिम दिनों में सेवा करते हुए बातों के क्रम में एक रात्रि  चिन्मय जी  ने माताजी से पूछा: 

उत्तर में माताजी  मुस्कराने लगीं, थोड़ी देर रुककर  धीरे से बोलीं: 

असह्य एवं असीमित पीड़ा के इन क्षणों में माताजी का  वात्सल्य पहले की तुलना में और भी बढ़ गया था। जो पास में थे, उन्हें तो वह दुलार करती ही थीं लेकिन  जो पास में नहीं थे, उनके बारे में भी वह पूछताछ करती रहती थीं। उनका हाल- समाचार लेती रहती थीं। वात्सल्य का वितरण करती भावमयी माँ  ने अपनी इस बीमारी को “एक विशिष्ट योग-साधना” बना लिया था। इस साधना को करते हुए उनके प्राण अपने आराध्य में महामिलन के लिए महाप्रयाण करने की तैयारी में लगे थे। 

वंदनीय माताजी के मन में अपनी असंख्य संतानों के प्रति गहरी आकुलता थी। वे जानती थीं कि उनके इस तरह चले जाने से उनके बच्चे बिलख उठेंगे लेकिन  किया क्या जाए? देह छोड़ने की भी अनिवार्यता थी। परमपूज्य गुरुदेव के संकेत उन्हें बार-बार मिल रहे थे। इन संकेतों में एक ही स्वर निहित था, 

गुरुदेव के इन सांकेतिक स्वरों को माताजी पिछले कई महीनों से लगातार अनुभव कर रही थीं। उनका स्वयं का मन-अंतःकरण भी गुरुदेव के लिए हमेशा विकल रहता था लेकिन  उनकी यह निजी विकलता सदा ही उनके सहज मातृत्व से ढक जाती थी। उनका मातृभाव अन्य सभी भावों पर छा जाता था।इन पंक्तियों को लिखते समय यह अच्छी तरह याद आ रहा है कि श्रद्धांजलि समारोह के बाद वर्ष 1991 के मई महीने में माताजी ब्रह्मवर्चस आई थीं। दोपहर के बाद का समय होगा। ब्रह्मवर्चस में बनी हुई यज्ञशाला के सामने छाया आ गई थी। वहीं पर उन्होंने कुर्सी  डलवाई और बैठ गईं। यहां रहने वाले सभी कार्यकर्त्ता भाई-बहन उनके इर्द-गिर्द खड़े हो गए। उन्होंने एक-एक करके सभी का हालचाल पूछा। फिर बातों-बातों में बोलीं: 

संतानों की जिस चिंता के कारण वंदनीय माताजी ने  इन वर्षों में अपनी देह को टिकाए रखा, वह चिंता उन्हें देह छोड़ने से पहले भी थी। उनके सामने कभी भी प्रश्न  यह नहीं था कि मिशन किस तरह से चलेगा क्योंकि  यह सच्चाई  वे अच्छी तरह से जानती थीं और इसे वह सभी को यह कहते हुए समय-समय पर बताया करती थीं: 

माताजी  चाहती यह थीं कि जिस प्यार की डोर में उन्होंने जीवन भर समूचे गायत्री परिवार को बांधकर रखा, वह डोर वैसी ही मजबूत बनी रहे।

इसी कारण उन्होंने महाप्रयाण से कुछ दिन पूर्व शांतिकुंज के सभी वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं को एक-एक करके बुलाया। उनकी निजी जिंदगी की बातें पूछीं, उन्हें दिलासा दी और फिर यह कर्त्तव्य याद दिलाया और कहा:

इस तरह सबको समझाने-बुझाने के बाद उन्होंने एक बात अपने बारे में कही:

इन शब्दों में माताजी ने सभी को संकेत में अपना स्वरूप बोध कराया। ताकि जो लोग लंबे समय तक उनके साथ रहे, वे समझ सकें कि वह कौन हैं।  

मछलियों का उदाहरण एक वैज्ञानिक तथ्य है। पूर्णिमा के दिनों में जब चाँद अपने यौवन पर  होता है तो मछलियाँ बहुत सक्रीय होती हैं, उनमें बहुत ही एनर्जी होती है।  Biologists इस तथ्य पर काफी रिसर्च कर रहे हैं कि Full moon के दिनों में चाँद का दूधिया प्रकाश मछलियों को आकर्षित करता  है यां जवारभाटा।  

इस तरह समझाकर वंदनीय माताजी  मौन हो गईं, साथ ही उन्होंने “विशिष्ट यौगिक क्रियाओं के द्वारा अपनी आत्मचेतना को देह से हटाना शुरू कर दिया। इसी के साथ Step by step  उनका देह-बोध शून्य होने लगा। बीतते पलों के साथ वह घड़ी भी आ गई  जिसे वंदनीय माताजी ने  अपने प्रभु से महामिलन के लिए निश्चित किया था।” 

भाद्रपद पूर्णिमा 19 सितम्बर, 1994 को प्रातः सभी को उनके मुखमंडल पर एक अनोखा भावांतर नजर आया। जिस कक्ष में वह लेटी हुई थीं, वहां का वातावरण पिछले दिनों की तुलना में एकदम बदला हुआ नज़र  आया। वहां पर दिव्य सूक्ष्म स्पंदन सघन हो उठे। ऐसा लगने लगा कि सभी देव शक्तियां उनके इर्द-गिर्द उपस्थित हो गई हैं। बिना किसी कृत्रिम साधन के वहां एक दिव्य सुगंध  फैल गई। इसे वहां  उपस्थित सभी  लोगों ने अनुभव किया। अपने गहन मौन में लीन माताजी प्रातः से ही ध्यानस्थ थीं। मुखमंडल पर प्रदीप्त आभा से, कुछ को यह भी लग रहा था कि माताजी आज पहले से कहीं अधिक  स्वस्थ हैं। एक अर्थ में यह सोचना सही भी था, क्योंकि अन्य दिनों की तुलना में वह आज पहले से ज्यादा “अपने स्व: में स्थित” हो गई थीं। वातावरण में सब ओर सर्वत्र एक गहन सन्नाटा  हिलोरें ले रहा था । सब लोग यंत्र के समान काम-काज किए जा रहे थे। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था। ध्यानस्थ माताजी मूर्तिमयी प्रशांति के रूप में विराज रही थीं। उनके मुखमंडल पर एक अनिवर्चनीय शांति और आनंद की दीप्ति खेल रही थी, मानो  महाकाली अपने  महाकाल के ध्यान में मग्न हो रही थीं। इन पलों में साक्षी हुए लोग अपूर्व सौभाग्यशाली थे। सौभाग्य का कुछ अंश उन्हें भी मिला था जो पिछले कुछ महीनों से हर दिन अपनी आत्मचेतना को एकाग्र करके अपनी प्रिय  माँ  को अपना भक्तिपूर्ण प्रणाम निवेदित करते थे, माँ  के चले जाने के अहसास को अनुभव कर जिनकी सिसकियां थमती नहीं थीं। इन क्षणों में भी उनकी ध्यानस्थ चेतना माँ  के चरणों में अपनी भावांजलि अर्पित कर रही थी।

11 बजकर 40 मिंट पर  पर ध्यानस्थ जनों के ध्यान में एक दृश्य बड़ी ही स्पष्ट रीति से उभरा। इस अद्भुत अनुभूति में उन्होंने अनुभव किया कि परमपूज्य गुरुदेव अपनी लीला संगिनी को अमरधाम  में लेने के लिए आए हैं। सूक्ष्मलोक में अनेकों देवशक्तियां, ऋषिगण उन्हें घेरे हुए हैं। सभी की दृष्टि माताजी पर टिकी है। क्षण बीते 11:50 पर माताजी की स्थूल देह हल्के से कंपित हुई और माँ आदिशक्ति अपने परम पुरुष पुरुषोत्तम के साथ विराजमान हो गईं। हृदय-हृदय में वेदना की रागिनी बज उठी। समूचे कक्ष में निष्कंप- स्तब्धता उतर आई। इस स्तब्धता (अचलता) ने भी बड़ी अनोखी रीति से इस सत्य का संचार कर दिया कि माता भगवती महाकाली भगवान् महाकाल से महामिलन के लिए महाप्रयाण कर चुकी हैं। उनकी तपःपूत देह के अंतिम दर्शन के लिए शिष्यों भक्तों वे संतानों की भीड़ लग गई। लगभग 24 घंटे तक अंतिम दर्शन का सिलसिला चलता रहा। अगले दिन यानि कि 20 सितंबर 1994 को महाशक्ति की आवास बनी उनकी स्थूल देह चिता-अग्नि के तेज में विलीन हो गई। नित्यप्रति अपने बच्चों को दर्शन देने वाली माता अब ध्यानगम्य हो गईं। हां बच्चों को दिए गए माँ  के आश्वासन के स्वरों की गूंज अभी भी थी।

जय गुरुदेव, धन्यवाद 


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