ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं। आज इस दिव्य श्रृंखला का 29वां लेख प्रस्तुत किया गया है।
लेख का शुभारम्भ करने से पहले साथिओं से सहयोग की याचना कर रहे हैं:
हमारे बार-बार लिखने पर भी, इतना क्लियर करके, Pointwise, हाईलाइट करने के बावजूद भी कहीं न कहीं,कोई न कोई Confusion रह ही जाता है, यह हमारी अयोग्यता का ही प्रमाण है कि हमारी बात आपके पास ठीक से पँहुच ही नहीं पाती है।
शनिवार को पोस्ट हुई वीडियो पर भांति-भांति के प्रश्न पूछे गए, Within seconds सभी के उत्तर देना हमारा कर्तव्य है, व्हाट्सअप, यूट्यूब एवं अन्य सोशल मीडिया साइट्स पर पोस्ट हुए सभी Queries के यथासंभव उत्तर दिए भी गए, आगे देते रहेंगें लेकिन सहयोग मिल जाये तो सक्रियता बढ़ेगी, परिणाम और उत्तम प्राप्त होंगें जो हम सबके लिए लाभदायक होंगें।
1.आज के ज्ञानप्रसाद लेख में उस अश्वमेध यज्ञ का संक्षिप्त सा वर्णन है जिसमें हमारी माँ, वंदनीय माताजी की अंतिम उपस्थिति थी, माताजी की स्थूल उपस्थिति वाला यह अंतिम अश्वमेध यज्ञ था। इसके बाद सितम्बर 1994 में वन्दनीय माताजी ने अपनी स्थूल देह का त्याग कर दिया था। अपने जीते जी, घोषणा के मात्र दो वर्ष से भी कम समय में माताजी ने 16 अश्वमेध यज्ञों में अपनी स्थूल भागीदारी सुनिश्चित कराई। उनके महाप्रयाण से पहले, मई और जून में, भिंड और शिमला में भी अश्वमेध यज्ञ आयोजित हुए लेकिन स्वास्थ्य के कारण माताजी का उनमें जाना संभव न हो पाया।
2. ऑनलाइन/ऑफलाइन स्रोत रिसर्च करने पर,चित्रकूट यज्ञ पर कोई भी विस्तृत वीडियो उपलब्ध नहीं हो पायी, हाँ अभी-अभी वैरागी द्वीप के शताब्दी समारोह में रिकॉर्ड की गयी आदरणीय शैल जीजी की एक शार्ट वीडियो उपलब्ध हुई है जिसे यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक वीडियो है। उपरोक्त पॉइंट्स को रेफर करते हुए फिर रिपीट कर रहे हैं कि वीडियो के कमेंट वीडियो में ही करें( न कि ज्ञानप्रसाद लेख में) आशा कर रहे हैं कि अन्य निवेदनों की भांति हमारे इस निवेदन का भी सम्मान होगा।
3.चित्रकूट अश्वमेध यज्ञ पर कोई विस्तृत वीडियो तो उपलब्ध नहीं है लेकिन 153 पृष्ठों की स्मारिका अवश्य उपलब्ध है जिसमें अनेकों रंगीन एवं और ब्लैक एंड वाइट चित्र हैं। यदि हम उस स्मारिका का लिंक आज शेयर कर देते हैं तो फिर कोई और Confusion हो जायेगा, इसलिए इसे अलग से तभी शेयर करेंगें जब हमारे साथी बिलकुल फ्री होंगें, पढ़ने के मूड में होंगें।
4.1992 के शपथ समारोह में वंदनीय मातजी ने 108 अश्वमेध यज्ञों का संकल्प लिया था। 2024 का मुंबई अश्वमेध यज्ञ, इस श्रृंखला का 47वां यज्ञ था और 1992 का जयपुर यज्ञ प्रथम था। विदेशों में संपन्न हुए यज्ञों के बारे में पूछा जाए तो 1993 में लेस्टर इंग्लैंड वाला यज्ञ प्रथम यज्ञ था जिसमें वंदनीय माता जी की स्थूल उपस्थिति थी, उसके बाद उसी वर्ष टोरंटो(कनाडा) और लॉस एंजेलेस( अमरीका) में माताजी उपस्थित रही थीं।
तो साथिओ अश्वमेध यज्ञों के विषय का यहीं पर समापन होता है लेकिन समापन के साथ ही आप सबसे एक संकल्प की याचना कर रहे हैं कि एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी की भांति यह सारी जानकारी आपके Fingertips पर हो, हमें विश्वास है कि हम एक परिश्रमी गुरु के परिश्रमी शिष्य हैं, यदि ऐसा नहीं होता है तो गुरु का नाम बदनाम होता है जिसे हम में से कोई भी सहन न कर पायेगा। इसको स्मरण करने के लिए एकमात्र ट्रिक है: अपने पास,अपने फ़ोन में नोट कर लें, बाद में ढूंढने में समस्या आएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
5. पांचवें और अंतिम पॉइंट में लिख रहे कि कल यानि मंगलवार की गुरुकक्षा का ज्ञानप्रसाद “जयपुर अश्वमेध यज्ञ, यज्ञ श्रृंखला का प्रथम यज्ञ” एक वीडियो होगी। फिर से याचना कर रहे हैं कि वीडियो पर ही कमेंट करें, इस Confusion से नजात पाने के लिए Post section में कुछ भी पोस्ट नहीं होगा।
तो आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करें।
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विदेश में अपनी संतानों की पीड़ा के लगातार विषपान से वंदनीया माताजी का स्वास्थ्य जर्जर होता गया । उनकी देह निरंतर व्याधिग्रस्त होती गई। गिरते स्वास्थ्य के कारण 16-20 अप्रैल 1994 को चित्रकूट में आयोजित होने वाले अश्वमेध यज्ञ में जाने के बारे में भी शंकाएं उठने लगीं। काफी ऊहापोह था कि चित्रकूट जाएं कि न जाएं। उनकी तबीयत को देखते हुए निकटस्थ जन सुझा रहे थे कि “माताजी ऐसे में आपको पूरी तरह से विश्राम करना चाहिए।” परम वंदनीय माताजी काफी देर तक सबकी बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं,
“तबियत तो खैर जैसी है, वैसी है लेकिन इस बार मैं जाऊंगी। इसी बहाने फिर से चित्रकूट देखना हो जाएगा। इसके बाद कौन जाने, मेरा कहीं जाना हो या न हो”।
उनकी इन बातों के बाद किसी की कुछ अधिक कहने की हिम्मत नहीं हुई। यात्रा की तैयारियां होने लगीं, निर्धारित समय पर उन्होंने जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून से मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भेजे गए विमान से चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया।
चित्रकूट पहुंचकर वह जैसे देह के सभी कष्टों से अनजान हो गई हों । कुछ यों जैसे कि उनकी देह उनकी न होकर किसी और की हो। इस यात्रा में उनके साथ शैल जीजी , डॉ. प्रणव पंड्या, इनके सुपुत्र चिन्मय और माताजी की मानस पुत्री दुर्गा दीदी थीं। इन सभी को वंदनीया माताजी की सभी शारीरिक पीड़ाओं का ज्ञान था। इन सबमें से किसी को उस समय अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था कि कोई इस तरह अपनी दैहिक पीड़ाओं से मुंह कैसे मोड़ सकता है।
स्थितप्रज्ञ की भावदशा की बातें गीता में बहुतों ने पढ़ी-सुनी होंगी लेकिन उस समय माताजी को देखकर सभी को इस सत्य की अनुभूति हो रही थी। इसी दशा में उन्होंने चित्रकूट अश्वमेध के सभी कार्यक्रम पूरे किए। हज़ारों श्रद्धालुओं को दीक्षा देकर उनकी मुक्ति का मार्ग खोला एवं असंख्यों पर अपने आशीषों की वर्षा की। माताजी को इस तरह कृपा-वर्षा करते हुए देखकर लग रहा था कि समस्त प्राणियों के भवरोग का हरण करने वाली कृपालु जननी ने स्वयं ही देह को रोगमुक्त कर लिया है। सबके आग्रह करने पर उन्होंने उत्साहपूर्वक तीर्थभूमि चित्रकूट के विभिन्न स्थलों पर जाने का कार्यक्रम बनाया। कामदगिरि, स्फटिकशिला आदि स्थानों पर वह कुछ पलों के लिए भावसमाधि में डूबी रहीं।
“गुप्त गोदावरी” के बाहर जब उनकी गाड़ी रुकीं , तो वहीं कहीं पास से 10-12 वर्ष की एक छोटी-सी बालिका भागी-भागी आई। उसके हाथों में थोड़े से जंगली फल और कुछ पैसे थे। जब माताजी गाड़ी से उतरीं तो बालिका ठीक उनके सामने आकर खड़ी हो गई। इससे पहले कि साथ के लोग कुछ कह पाते, वह कहने लगी:
“आप शांतिकुंज वाली माताजी हो न। मैंने काफी दिनों से सुन रखा है कि शांतिकुंज, हरिद्वार से माताजी आने वाली हैं।”
बालिका की भोली सी बातों के उत्तर में माताजी बोलीं:
“हां बेटी ! मैं वही हूं।”
माताजी के इस कथन पर वह बालिका पुलकित हो उठी और कहने लगी:
“आपको मालूम है मैंने दो दिन पहले एक सपना देखा था कि सीता मैया फिर से चित्रकूट आई हैं। जगने पर मैंने सोचा कि यदि शांतिकुंज वाली माताजी हमारी सीता मैया हैं, तो वे जरूर यहां “गुप्त गोदावरी” आएंगी और देखो आप आ गईं।”
बालिका की इस बाल-श्रद्धा पर माताजी भाव विगलित हो गईं। वह छोटी-सी बालिका कहे जा रही थी:
“मैया, मैं आपकी भिखारिन छोकरी हूँ । आज मुझे भीख में बस इतने ही पैसे मिले हैं। ये जंगली फल मैंने आपके लिए इकट्ठे किए थे, इन सबको मैं आपको देने आई हूं। “
माताजी ने बालिका की यह भेंट बड़े ही भाव भरे मन से स्वीकार की। वह कुछ बोलीं तो नहीं लेकिन उनकी मुख मुद्रा से लगा, जैसे वे कह रही हों कि बेटी मैं तेरे लिए ही यहां “गुप्त गोदावरी” आई हूं। उस बालिका की यह प्यार भरी भेंट स्वीकार करने के साथ उन्होंने उसके सिर पर अपना हाथ फेरा और बालिका चली गई।
माताजी अपने परिजनों के साथ “गुप्त गोदावरी” की गुफा में गईं। इसी के साथ उनका यह भ्रमण समाप्त हुआ। भव्य दीपयज्ञ के बाद आयोजन स्थल से विदा लेकर वह शांतिकुंज आ गईं।
कल वाला ज्ञानप्रसाद अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला का प्रथम यज्ञ ,जयपुर यज्ञ की वीडियो लेकर आएगा।
जय गुरुदेव
