वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 28वां ज्ञानप्रसाद लेख: 1993  में विदेश की धरती पर वंदनीय माताजी के संरक्षण में 3 अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हुए  

हमारे स्वर्गीय पिताजी हमारे गुरु भी थे, कक्षाओं में पढ़ाते हुए अक्सर बोलते थे, “आगे दौड़ पीछे चौड़” अर्थात जल्दी-जल्दी में बहुत कुछ छूटने की आशंका रहती है। 

अपनी माँ की जन्म शताब्दी मनाने का दुर्लभ सौभाग्य सभी को नहीं मिलता, इसमें ज़रा भी जल्दी करने की ज़रुरत नहीं है, धीरे-धीरे एक नवजात शिशु की भांति,अमृत की एक-एक बूँद (जन्म घूंटी की तरह) ग्रहण करके ही, हम नवीन ऊर्जा के साथ,नवजीवन प्राप्त करें,तभी हम आकाश की ऊंचाइयों को छूने में समर्थ होंगें। इस पुनर्जीवन के बाद ही हम इस दिव्य माँ की संतान कह पायेंगें। 

आज के ज्ञानप्रसाद में वंदनीय माताजी की तीन देशों की दिव्य यात्रा का संक्षिप्त वर्णन है। कल शनिवार वाले दिन इंग्लैंड के लेस्टर नगर में हुए 1993 के अश्वमेध यज्ञ की दुर्लभ वीडियो प्रस्तुत की जाएगी, इस वीडियो को देखना, इसके पलों का सुखद आनदं ही विशेषांक होगा, So stay tuned.

आइये गुरुचरणों में समर्पित होकर, गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा का शुभारम्भ करें। 

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हमारी सबकी माँ, माता भगवती देवी शर्मा, जिनकी जन्म शताब्दी को मनाने के लिए हम भांति-भांति के यथासम्भव प्रयास कर रहे हैं सच में विश्वमाता थीं। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार ने वर्ष 2026 पूर्णतया त्रिवेणी शताब्दी को समर्पित करने का संकल्प लिया हुआ है। गिलहरी, वानर सेना जैसे इस प्रयास के अंतर्गत त्रिवेणी शताब्दी से सम्बंधित यथासंभव रिसर्च करके इस मंच पर अपने योगदान करके दिव्यसत्ताओं के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का सौभाग्य दुर्लभ मानवों को ही मिलता है, हमारे साथी अपना योगदान देकर हमारा सहयोग कर रहे हैं, हम उनके आभारी हैं।  

विश्वमाता, विश्वभर में फैले अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने की तैयारियां करने लगीं। वैसे तो अकेला विश्व क्या अनंत-अनंत ब्रह्मांड उनके जाने-पहचाने थे। सूक्ष्मशरीर से उन्होंने अनेकों रहस्यमय यात्राएं की थीं। बच्चों की प्रेम भरी पुकार पर दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचना उनका स्वभाव था। कभी स्वप्नों के माध्यम से तो कभी ध्यान की भावदशा में वह अपनी संतानों के हृदय को अनोखी तृप्ति दिया करती थीं। वंदनीय माताजी, यह सब  सूक्ष्म शरीर से करती थीं, स्थूल देह से तो  उन्होंने, 1993 से पूर्व कभी कोई विदेश यात्रा  की ही नहीं  थी और  ऐसा करने की उनकी अपनी कोई चाहत भी न थी  लेकिन भारत के बाहिर बसे प्रवासी परिजनों की बहुतेरी ज़िद  के बाद उन्होंने पहली बार विदेश यात्रा का मन बनाया । इस यात्रा के बारे में उन्होंने हामी भरते हुए कहा:

वंदनीय माताजी द्वारा 1993 में की गयी प्रथम एवं एक ही विदेश यात्रा का  उद्देश्य अपने बच्चों से मिलने के साथ-साथ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न  कराने थे। वंदनीय माताजी ने विश्व भर में करवाए जाने वाले अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला की घोषणा 1992 वाले विशाल शपथ समारोह  में की थी। इस श्रंखला का शुभारम्भ जयपुर से हुआ था। 1994 में माताजी के महाप्रयाण से पूर्व विदेश में केवल तीन (इंग्लैंड ,कनाडा एवं अमरीका) अश्वमेध यज्ञ ही करवाए जा सके लेकिन इसी अवधि में भारत में 19 यज्ञ सम्पन्न हुए। 

आइए विदेशों में हुए 3 अश्वमेध यज्ञों के संक्षिप्त विवरण पर दृष्टि डालें। कई घंटों की रिसर्च के बावजूद हम केवल एक ही (इंग्लैंड देश के लेस्टर नगर वाली ) वीडियो ढूंढ पाए जिसे कल इसी मंच पर प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा।             

वंदनीय माता जी के  हां करने के बाद पासपोर्ट-वीज़ा आदि की विभिन्न सरकारी औपचारिकताएं पूरी हुईं। विदेशों में कार्यक्रम की तिथियां निश्चित हुईं। इस क्रम में पहला अश्वमेध महायज्ञ इंग्लैंड के लेस्टर नामक नगर में 8 से 11 जुलाई 1993 में आयोजित किया गया। 

विकिपीडिया के अनुसार इंग्लैंड में भारतीयों की जनसँख्या, लेस्टर नगर में ही सबसे ज़्यादा (34%) है, वैसे तो लंदन भी इसी केटेगरी में आता है लेकिन उसका मापदंड कुछ और  है।  इस विषय को किसी अन्य समय के लिए स्थगित  करना ही उचित रहेगा लेकिन यह  बताना महत्वपूर्ण रहेगा कि परम पूज्य गुरुदेव की 1972 वाली अफ्रीका यात्रा में विदेश में रह रहे भारतीयों के लिए एक बहुत बड़ा सन्देश था। वहीँ से स्थान्तरित हुए, विश्व भर में फैले  भारतीय आज भी गुरुदेव के सपने को पूर्ण करने में लगे हुए हैं।  आइए आगे बढ़ने से पहले “गुरुदेव के सपने” प्रज्ञागीत को भी देख लें :   https://youtu.be/Z9YBmJh-mLg?si=5B8bP1ZOHnSIbZWH  

3 से 6 मई  1993 को भुवनेश्वर अश्वमेध का कार्यक्रम था, उसके बाद एक-डेढ़ महीना  माताजी शांतिकुंज में रहीं। बाद में निर्धारित तिथि पर उन्होंने इंग्लैंड के लिए प्रस्थान किया । 

हमारे साथ नियमितता से जुड़ी आदरणीय बहिन सुजाता जी भुवनेश्वर में रहने के बावजूद इस यज्ञ में शामिल न हो पायीं, आदरणीय रेणु श्रीवास्तव जी कलश यात्रा में जाने के लिए तैयार थीं लेकिन एक दिन पूर्व ही उनका एक्सीडेंट हो गया, हम स्वयं Guelph नगर, कनाडा  में निवासी होने के बावजूद 108 कुंडीय यज्ञ में शामिल न हो पाए। यह तीनों उदाहरण एक ही तथ्य को प्रमाणित करते हैं: ईश्वर के आदेश के बिना पत्ता भी हिल नहीं सकता।   

इंग्लैंड के परिजनों के लिए वंदनीय माताजी का  पहुंचना स्वप्नों के सच होने जैसा था। उनकी उपासना की अनुभूति प्रत्यक्ष हो रही थी। बड़ी संख्या में वे सब उन्हें लेने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे। वंदनीय माताजी के जयघोष और परिजनों की श्रद्धा से भीगे नेत्रों ने गेटविक हवाई अड्डे के कर्मचारियों को भी श्रद्धा से भिगो दिया। इतिहास साक्षी है कि इससे पहले भी अनेकों साधु-संत भारत से इंग्लैंड गए थे, उनका भी  भरपूर सम्मान  हुआ था, उन पर भी फूल-मालाओं की बौछार और जय-जयकार की गुंजार  देखी गई थी लेकिन परिजन  किसी के लिए इतने तीव्र प्यार  से नहीं उमड़े थे जितने वंदनीय माताजी के लिए उमड़े थे, किसी के लिए इतनी आंखों नहीं भीगी थीं। एयरपोर्ट के कर्मचारियों ने इस अंतर्  को बहुत ही  साफ-साफ अनुभव किया। उन्होंने परिजनों से जिज्ञासा की कि ये कौन हैं? उन्हें उत्तर मिला, हम सबकी माँ आई हैं। पता नहीं इस उत्तर से उनमें से किसको क्या समझ आया लेकिन उनमें से अनेकों ने “शी इज डिवाइन मदर ( She is Divine Mother) ”  कहते हुए माताजी के चरण स्पर्श किए। माताजी ने भी उन्हें जी भरकर आशीष दिए। उनके लिए तो सभी उनके बच्चे थे। जो भी मां! मां!! कहते हुए उनके पास दौड़ा चला आए, वही उनका सबसे ज्यादा लाड़ला था। लेस्टर का कार्यक्रम निर्धारित समय पर विशिष्ट विधि-विधान से शुरू हुआ। श्री कीथवाज, लार्ड मेयर एवं श्री जान मूडी आदि इस कार्यक्रम के विशिष्ट अभ्यागत बने। वहां की सरकार व समाज में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त ये विशिष्ट जन माताजी की ममता का स्पर्श पाकर अनुग्रहीत हुए। इंग्लैंड में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त श्री लक्ष्मीमल सिंघवी भी सपत्नीक इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। अश्वमेध महायज्ञ के लिए निश्चित किए गए विधि-विधान के साथ ही माताजी ने वहां के लोगों को दीक्षा दी। यह दीक्षा कार्यक्रम कई अर्थों में अनूठा था। इसमें भागीदार होने वालों के मन-प्राण अनेकों विलक्षण अनुभूतियों से भर गए। इसमें से अनेकों ने मंत्राक्षरों को सुनहरे अक्षरों में अपने भीतर अवतरित होते हुए देखा। कुछ ने गायत्री माता की एक झलक पाई। कइयों के सालों पुराने असाध्य रोग दीक्षा लेते ही जड़ से चले गए। उन्होंने इस सत्य को अनुभव किया कि विश्वमाता ने उनके समस्त पापों-तापों को हर लिया है।  शैल जीजी  एवं डॉ. प्रणव पंड्या इस कार्यक्रम में माताजी के साथ ही थे। उन्होंने जब माताजी से दीक्षा लेने वाले परिजनों की इन विलक्षण अनुभूतियों की चर्चा की तो पहले वे कुछ देर मौन रहीं फिर कहने लगीं: 

टोरंटो में बसे प्रवासी भारतीयों  ने  23 से 25 जुलाई 1993 की तिथियां अपने यहां के लिए निश्चित कर रखी थीं। वंदनीय माताजी, शैल जीजी  एवं डॉ. साहब के साथ ठीक समय पर पहुंच गईं। इन सबके पहुंचने के कुछ दिन पहले से यहां भारी वर्षा हो रही थी। आयोजनों के साथ सभी कार्यकर्त्ता घबराए हुए थे कि सब कुछ कैसे और किस तरह से संपन्न और सफल होगा। अपनी घबराहट में उन्होंने शांतिकुंज कई फोन भी किए थे। फोन पर हुई बातचीत में माताजी ने उन्हें आश्वस्त किया कि  तुम लोग परेशान न हो, मैं आ रही हूं, मेरे वहां आते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। सचमुच ऐसा ही हुआ। लगातार कई दिनों से हो रही भारी वर्षा थम गई। इस कार्यक्रम में कनाडा की तत्कालीन प्रधानमंत्री कैम्पबेल और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों ने भारी सहयोग दिया। आयोजन में सक्रिय गायत्री परिजनों के साथ अन्य संगठनों के लोगों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। इन सभी भागीदारों ने माताजी की तपशक्ति के अनेकों चमत्कारों की अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभूति पाई। 

कनाडा के बाद वंदनीय माताजी ने 19 से 22 अगस्त 1993 को अमेरिका के लॉस ऐंगेल्स नगर  में होने वाले अश्वमेध महायज्ञ के लिए प्रस्थान किया। पश्चिमी तटीय अमेरिका के परिजन माताजी को अपने बीच में देखने के लिए अति उत्साहित थे। उन्होंने जी-जान से जुटकर 1008 कुंडीय  महायज्ञ का आयोजन किया था। अमेरिका के किसी शहर में उन दिनों इतना बड़ा  यज्ञायोजन करना सरल नहीं था। श्री कालीचरण शर्मा के नेतृत्व में गए दल ने यों तो सारा पुरुषार्थ किया लेकिन  सभी के हृदय अपनी माँ  के प्रति इतनी गहन श्रद्धा से भरे थे कि इस आयोजन के कठिन काम सभी के लिए सरल होते चले गए। माताजी के पहुंचते ही वहां के संपूर्ण वातावरण में दिव्यता छा गई। सभी कार्यक्रम उनके दिव्य  संरक्षण में भलीप्रकार संपन्न होते गए। यज्ञस्थल में दीक्षा के लिए लगभग, 30,000 लोग उपस्थित हुए। सभी ने सुन रखा था कि दीक्षा देते समय माताजी अपनी संतानों की अनेकों कष्ट-कठिनाइयां हर लेती हैं। साथ ही उन्हें अनेकों तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियां प्रदान करती हैं। उस दिन यह सब सुनी हुई बातें प्रत्यक्ष हुईं। अनेकों लोगों ने अनेकों तरह से माताजी के अनुदान-वरदान पाए। माताजी के मुख से उच्चारित  गायत्री मंत्र ने सचमुच ही उनके प्राणों को त्राण देने का कार्य किया। अमेरिका के अन्य नगरों से आये लोगों ने अपने हृदय में माताजी के भाव भरे उद्बोधन को आत्मसात् किया। इन सभी कार्यक्रमों में अनेकों अनुदान बरसाने वाली माँ  सतत अपनी संतानों की पीड़ा का विषपान करती जा रही थीं। 

धन्यवाद्, जय गुरुदेव 


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