वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित लेख श्रृंखला का 26वां ज्ञानप्रसाद लेख: माँ ने अश्वमेध यज्ञ श्रृंखला का शुभारम्भ किया  

ऑनलाइन/ऑफलाइन दोनों स्रोतों पर उपलब्ध ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पादित 118 Scanned  पन्नों  और 32 Text पन्नों  की दिव्य पुस्तक “महाशक्ति की लोकयात्रा” पर आधारित  लेख श्रृंखला का प्रथम लेख हमने 8 मार्च 2026 को प्रस्तुत किया था।  परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित इस लेख श्रृंखला का आज 26वां लेख प्रस्तुत किया गया है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं को पूरे एक दिन के लिए 1992 के शपथ समरोह की दिव्य वीडियो में दिए गए कंटेंट को जानने के लिए, समझने के लिए,यहाँ तक कि नोट्स बनाने के लिए निवेदन किया गया, उचित समझा गया कि कमेंटस  की ओर अधिक ध्यान देने के बजाए वीडियो को समझा जाए। हमारे इस वाले प्रयोग को भी साथिओं का भरपूर समर्थन एवं सहयोग मिला जिसके लिए हम उनके  जीवनपर्यन्त ऋणी रहेंगें। 

इस मंच पर किया गया प्रत्येक प्रयास गुरुसत्ता के साथ एक अटूट इलेक्ट्रॉनिक बंधन स्थापित करने की दिशा की ओर है। मंच के प्रति साथिओं की श्रद्धा,विश्वास,अपनत्व के वर्णन के लिए हम पूर्णतया निशब्द हैं। इसी श्रद्धा और विश्वास को कायम रखते हुए, गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा, गुरुचरणों में समर्पित होकर आरम्भ करते हैं। आज के लेख में अत्यधिक लिंक्स होने के कारण, भूमिका लिखना असंभव सा दिख रहा है। 

ज्ञानप्रसाद लेख की पूर्णता के लिए कल वाली वीडियो संलग्न करना अनुचित नहीं है। 

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हमारी सबकी माँ  परम वंदनीय माताजी जिनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, राष्ट्र की प्राणदायिनी शक्ति हैं। “महाशक्ति की लोकयात्रा” जिसका ध्यानपूर्वक अध्ययन करके, समझकर यह लेख श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है, कोई साधारण पुस्तक नहीं है। पाठकों से करबद्ध निवेदन है कि ज्ञानप्रसाद लेखों का  मातृवाणी अर्थात माँ की वाणी समझकर अमृतपान करें, फिर देखें कायाकल्प हुआ कि नहीं। 

मातृसत्ता में राष्ट्रीय संवेदना की सघनता की अनुभूति पहले भी सभी को समय-समय पर होती रहती थी लेकिन 1990 के “संकल्प श्रद्धांजलि समारोह” के बाद से राष्ट्र के लिए उनके प्राणों की विकलता कुछ और अधिक  ही बढ़ गई। 1 से 4 अक्टूबर 1990  के बीच हुए इस समारोह को अनेकों बार इस मंच पर शेयर किया जा चुका है। 

माताजी  बार-बार सोचती रहतीं कि ऐसा कौन-सा अनुष्ठान संपन्न किया जाए  जिससे राष्ट्र के प्राणों को नवस्फूर्ति प्राप्त हो, देश की संस्कृति संवेदना अपना व्यापक विस्तार कर सके। अपने निकटस्थजनों से चर्चा में भी उन दिनों उनका यही चिंतन मुखरित होता था। मिशन के सारे कामकाज  के ताने-बाने को सुलझाती-बुनती हुई माताजी इसी राष्ट्र-चिंता में लीन रहती थीं। माताजी का अधिकतर समय ऐसे  चिंतन और चर्चा में  बीता। 

इसी दौरान शांतिकुंज के क्रियाकलापों में कई नयी कड़ियां भी जुड़ीं। परम वंदनीय  माताजी की देख-रेख व उनके सूत्र संचालन में पहले से सुचारु व्यवस्था और भी अधिक गतिशील हुई। इसी समय उन्होंने हिमालय यात्रा की योजना बनाई। यह योजना प्रायः यकायक ही बनी। आइए इस यात्रा के संक्षिप्त वर्णन का भी अमृतपान कर लें।

माताजी की हिमालय यात्रा के संकल्प को जानकर  निकटस्थजनों को थोड़ा भय भी हुआ। वे सोच रहे थे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि माताजी हिमालय में ही रहने का मन बना रही हैं । कइयों को यह भी शंका हुई कि कहीं वह हिमालय के हिमशिखरों के बीच महासमाधि तो नहीं लेना चाहतीं क्योंकि वैसे भी गुरुदेव के अभाव में उनका मन संसार में किसी भी तरह टिक नहीं  पा रहा था। अंतर्यामी माँ  से अपने बच्चों के मन की यह ऊहापोह छुपी न रही। उन्होंने हंसते हुए कहा:

सबको इस तरह अपनी वापसी के बारे में निश्चिंत कर माताजी  हिमालय में गंगोत्री के लिए चल पड़ीं। उनके साथ आद शैल जीजी, आद डॉ. प्रणव पंड्या, आद चिन्मय जी  एवं कुछ अन्य पारिवारिक सदस्य थे। दो-चार दूसरे सौभाग्यशालीजनों को भी उनके साथ इस यात्रा में जाने का सुयोग मिला। हिमशिखरों के मध्य पहुंचकर माताजी के भावों में एक अनोखा परिवर्तन झलकने लगा। उन्हें देखने वालों को ऐसा लगा जैसे कि कोई कन्या अपने पीहर आई है। जैसे कि वह अपने आप नहीं, पिता हिमवान के बुलावे पर यहां आई हों । उनके दीप्त मुखमंडल पर आनंद की रेखाएं सघन हो गईं। कई स्थानों पर वह रुकीं और ध्यानस्थ हो गईं। गंगोत्री के पास भागीरथी  शिला पर तो वह काफी देर ध्यानमग्न बैठी रहीं। यहां पर जब वह ध्यान से उठीं, तो उनके चेहरे पर “कुछ विशेष पाने की प्रसन्नता की प्रदीप्ति थी।”

भागीरथी शिला गंगोत्री में स्थित एक प्रसिद्ध आकर्षक पर्यटन स्थल है। इस शिला से एक पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है। मान्यताओं के अनुसार, राजा भागीरथ  ने माँ  गंगा को प्रसन्न करने के लिए इसी चट्टान पर आराधना की थी। वंदनीय माताजी ने यहीं से अपनी यात्रा को विराम दिया और शांतिकुंज वापस लौट आईं। 

वापस लौटने पर उन्होंने हरिद्वार में “एक भव्य शपथ समारोह” का आयोजन किया। इसी समारोह में वंदनीय माताजी ने राष्ट्रिय  एवं अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर अश्वमेध महायज्ञों की घोषणा की। 8-10 जून 1992 को आयोजित इस शपथ समारोह  की डेढ़ घंटे की  वीडियो का लिंक यहाँ दे रहे हैं, इस वीडियो को भी अवश्य देखें, पूरा देखें, साथ-साथ में नोट्स बनाते जाएँ क्योंकि इस वीडियो के अनेकों पॉइंट स्मरण रखने वाले हैं, बाद में कुछ भी याद नहीं रहता। हमारा विश्वास  है कि वीडियो देखने के बाद पाठकों को बहुत सारे सुप्त प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगें। https://youtu.be/TIm5XyxuFf8?si=Hv5EaM3HsXh28jXk

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर 2022 में अपलोड की गयी इस वीडियो को मात्र 2.5 हज़ार दर्शकों ने ही देखा जो कि वीडियो की महत्ता के सामने कोई अच्छा संकेत नहीं है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पिछले कल पूरे 24 घण्टे इस वीडियो को समर्पित कर दिए, कल का ज्ञानप्रसाद यही वीडियो थी।  

अश्वमेध यज्ञों की  घोषणा करते समय माताजी ने  बताया कि देवात्मा हिमालय  ने उन्हें यही संदेश दिया है। हिमालय में निवास करने वाली दिव्य शक्तियों का यही आग्रह है कि राष्ट्र को समर्थ एवं सशक्त बनाने वाले “अश्वमेध महायज्ञ का महानुष्ठान”  किया जाए। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि इन महायज्ञों में वह स्वयं जाएंगी। उनके आने की बात सुनकर परिजनों का उत्साह आकाश चूमने लगा। सभी अपने क्षेत्र में इस महायज्ञ को आयोजित करने के लिए उतावले थे लेकिन  यह सौभाग्य कुछ विशेष स्थानों को ही मिला। माताजी ने अपनी देख-रेख में इस महायज्ञ का कर्मकांड तैयार करवाया। परिजनों को इसकी विस्तृत जानकारी देने के लिए अखण्ड ज्योति की संपादक मंडली ने अखण्ड ज्योति का एक संपूर्ण विशेषांक (नवम्बर 1992 ) तैयार किया। इस स्पेशल अंक  में यज्ञ सम्बन्धी पाठकों के अनेकों प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं। इस अंक का लिंक भी यहाँ शेयर करना अपना कर्तव्य समझते हैं। https://www.awgp.org/en/literature/akhandjyoti/1992/November/v1.3

हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि साथिओं के सहयोग से अखंड ज्योति के अधिक से अधिक अंक ऑनलाइन उपलब्ध हो रहे हैं।ऐसे साथिओं का ह्रदय से धन्यवाद् है 

परम वंदनीय  माताजी ने “जयपुर के प्रथम अश्वमेध” के लिए अपनी यात्रा प्रारंभ की। उनका यह क्रम भिलाई (म.प्र.), गुना (म.प्र.), भुवनेश्वर (उड़ीसा), लखनऊ (उ.प्र.) बड़ौदा (गुजरात), भोपाल (म.प्र.), नागपुर (महाराष्ट्र), ब्रह्मपुर (उड़ीसा), कोरबा (म.प्र.), पटना (बिहार), कुरुक्षेत्र (हरियाणा) एवं चित्रकूट (म.प्र.) आदि स्थानों में होने वाले अश्वमेध महायज्ञों में जारी रहा। इन सभी स्थानों की यात्रा के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने उनके लिए सरकारी वायुयान की व्यवस्था की। परम वंदनीय माताजी को  राजकीय अतिथि का सम्मान दिया गया । दिग्विजय सिंह, लालू प्रसाद यादव, बीजू पटनायक, चिमन भाई पटेल आदि कई राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों ने उनके वात्सल्य से स्वयं को अनुग्रहीत अनुभव किया। मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल मो. शफी कुरैशी, उ.प्र. के तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा एवं उस समय के  प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्ह राव एवं प्रतिपक्ष नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी आदि अनेकों विशिष्ट व्यक्तियों ने इन अश्वमेध कार्यक्रमों में उपस्थित होकर अनुभव किया कि माताजी का हृदय समूचे राष्ट्र के प्रति वात्सल्य से भरा हुआ है।

माताजी की अश्वमेध यात्रा की अनुभूतियां एवं यादें इतनी अधिक हैं कि उन पर अलग से कई खंडों में एक समूची ग्रंथावली प्रकाशित की जा सकती है। वह जहां भी गईं, वहां व्यस्त कार्यक्रमों एवं थोड़े समय के बावजूद सभी से मिलीं। अति विशिष्ट जनों से लेकर अति साधारणजन तक सभी उनसे मिलकर धन्य हुए। इस अति व्यस्तता में भी वे अपने भावुक बच्चों को नहीं भूलीं। उनके आग्रह/अनुरोध पर वे उनके घरों में गईं। समूचे देश में ऐसे कई घर हैं जो उनकी चरण धूलि से तीर्थ स्थान बन गए। जहां पर वह बैठीं, उन स्थानों को कई लोगों ने अपनी उपासना स्थली बना लिया। ऐसे व्यक्तियों ने बाद के दिनों में अनेकों दिव्य अनुभूतियां पाईं। उनकी अंतर्चेतना में एक अलौकिक आलोक का अवतरण हुआ। वह जहां भी गईं, वहां उन्होंने अनेकों अनुदान बिखेरे। कई स्थानों पर स्वयं उन्हें भी अनेकों यादों ने घेर लिया। ऐसा लगा जैसे कि वह पहले किसी अन्य रूप में यहां आई हैं। 

चित्रकूट अश्वमेध के समय वह शारीरिक रूप से काफी कुछ कमज़ोर  थीं। इस शारीरिक कमज़ोरी  के बावजूद वह उन सभी स्थानों पर गईं जहां प्रभु श्रीराम, माता सीता एवं भ्राता  लक्ष्मण के साथ गए थे, जहां उन्होंने अनेकों ऋषि-मुनियों का संग लाभ लिया था। माताजी इन सभी स्थानों पर आग्रहपूर्वक गईं। कामदगिरि, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी आदि सभी स्थानों की यात्रा उन्होंने बड़े भाव भरे मन से की। इन जगहों को उन्होंने कुछ इस तरह से देखा जैसे वह यहीं कहीं अपने राम को देख रही हों। स्फटिक शिला पर वह थोड़ी देर बैठीं भी। यहां बैठने पर बोलीं, 

सुनने वाले कुछ समझे, कुछ नहीं समझे, अधिक  पूछने पर वह हल्के से मुस्करा दीं। अपने बच्चों को खुशियां देते, राष्ट्र के प्राणों में नवस्फूर्ति का संचार करते हुए उनकी यह यात्रा चल रही थी। उन्हें इस तरह यात्रा करते हुए देखकर विदेशों में बसे परिजनों के मन में यह लालसा सघन हो गई कि उनकी माँ  उनके पास भी आ जाएं। उनके घर भी विश्वजननी की चरण धूलि से तीर्थभूमि बन सके। 

अपने विदेशी बच्चों के इस आग्रह को माँ  ठुकरा न सकीं। सभी के प्रबल प्रेम के कारण विश्वमाता ने विश्वयात्रा के लिए हामी भर दी। उनकी इस “हां”  से अगणित हृदय पुलकित-प्रफुल्लित हो उठे।

आज की गुरुकक्षा का समापन यहीं पर होता है, कल माताजी की विदेश यात्रा का वर्णन करेंगें। 

धन्यवाद्,जय गुरुदेव  


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