वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

अखंड दीप के प्राकट्य के 100 वर्ष को समर्पित द्वितीय  ज्ञानप्रसाद लेख- आदरणीय चंद्रेश जी के सहयोग से  

आज के ज्ञानप्रसाद लेख के लिए यदि कहा जाए कि यह लेख आदरणीय डॉ चंद्रेश बहादुर जी का ही लेख है तो शायद गलत न हो। लेख में प्रस्तुत किया गया, दो भागों का कंटेंट कल ही चंद्रेश जी ने हमें व्हाट्सप्प पर भेजा था। 

पहले भाग में ScoopWhoop मीडिया में 9 सितम्बर 2022 में प्रकाशित हुआ एक इंटरव्यू था। “एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के हाथों प्रज्वलित वो सिद्ध ‘अखण्ड दीप’, जो 1926 से लगातार जल रहा है” शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित हुए इस लेख में शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ता आदरणीय अगमवीर सिंह जी अखंड दीप के बारे में जानकारी दे रहे हैं। कंटेंट को देखकर पाठक कह सकते हैं कि इसमें तो कुछ भी नया नहीं है, हम तो पहले से ही इससे अधिक जानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है, बहुत कुछ नया  जानने को मिलेगा, ऐसा हमारा विश्वास है। 

ज्ञानप्रसाद लेख के दूसरे भाग में स्वराज इंडिया वेबसाइट (नीचे दिया गया लिंक) की अंग्रेजी भाषा में दी गयी जानकारी थी जिसे हमने हिंदी में अनुवाद करके साथिओं के लिए प्रस्तुत किया है। साथिओं को आग्रह है कि आप स्वयं भी  वेबसाइट पर जाकर अखंड दीप की अतिरिक्त जानकारी एवं सुन्दर से सुन्दर दीपक खरीद भी सकते हैं    https://swarajyaindia.com/blogs/news/radiating-light-exploring-the-significance-of-akhand-diyas-in-spiritual-practices

दोनों ही लिंक्स के लिए आदरणीय भाई साहिब का जितना भी धन्यवाद् करें कम ही होगा। भाई साहिब ने सक्रियता एवं ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के प्रति Belongingness का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है, उन्होंने बता दिया है कि यह हमारा ही परिवार है, इसमें सहयोग करना हमारा दिव्य उत्तरदाईत्व है  

आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर,गुरु अमृत द्वारा वर्षों से जमी कालिख को रगड़-रगड़ कर धो डालें। 

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ScoopWhoop media के सौजन्य से:

एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के हाथों प्रज्वलित वो सिद्ध ‘अखण्ड दीप’, जो 1926 से लगातार जल रहा है:

जब आध्यात्मिक और धार्मिक स्थलों की बात हो तो उत्तराखंड का नाम न आए ऐसा हो ही नहीं सकता है। हरिद्वार शहर (उत्तराखंड) में विश्व प्रसिद्ध  “शांतिकुंज आश्रम” को कौन नहीं जानता। यह आश्रम अपनेआप में कई बातों के लिए प्रसिद्ध है लेकिन आज के ज्ञानप्रसाद लेख में  100 वर्ष पूर्व स्थापित हुए  “सिद्ध अखंड दीप”  के बारे में कुछ और जानने का प्रयास किया गया है। 

अखण्ड दीप के बारे में जानने से पहले हमारे गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के बारे में जानना उचित होगा, परम पूज्य गुरुदेव ने ही  इस अखंड दीप को 1926 को प्रज्वलित किया था। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एक संत, एक आध्यात्मिक गुरु, एक स्वतंत्रता सेनानी, लेखक व एक दार्शनिक थे/हैं। उन्होंने ही ‘अखिल विश्व गायत्री परिवार’ की स्थापना की थी।

परम पूज्य गुरुदेव  का जन्म 20 सितंबर 1911 को उत्तर प्रदेश के आंवलखेड़ा ग्राम में हुआ था जो आगरा जिले में स्थित है। समाज सेवी, आध्यात्मिक गुरु होने के इलावा  गुरुदेव एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे।  अपनी किशोर अवस्था से ही वो स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कूद  गए थे।  उन्हें तीन बार जेल भी जाना पड़ा।  उन्होंने महात्मा गांधी के संरक्षण में कार्य किया  और कई बार साबरमती  आश्रम भी गए थे। पश्चिम बंगाल की आसनसोल जेल में गुरुदेव के  कई क्रांतिकारियों से सम्बन्ध बने।  

एक क्रांतिकारी का जीवन जीने के साथ-साथ गुरुदेव ने  एक संत का भी जीवन जिया ताकि समाज के उत्थान में अपनी भागीदारी दे सकें। अपने गुरु के निर्देश पर गुरुदेव ने चार बार हिमालय यात्रा की। क़रीब एक वर्ष  तक अज्ञातवास में रह कर गुरुदेव ने कठिन तप किया। 

अखण्ड दीप के विषय में अधिक जानकारी के लिए Scoopwhoop ने शांतिकुंज के वरिष्ट कार्यकर्ता अगमवीर सिंह जी से बातचीत की।  उन्होंने बताया कि, 1926 की वसंत पंचमी को जब हिमालयन गुरु  सर्वेश्वरानंद जी (जो उनके आत्यात्मिक गुरु बनें),का बालक श्रीराम की पूजास्थली में प्राकट्य हुआ तो उनकी आज्ञा पर अखण्ड दीप को प्रज्वलित किया गया था।  अगमवीर सिंह जी ने बातचीत में बताया कि गुरु सर्वेश्वरानंद जी ने 15 वर्षीय बालक श्रीराम से  कहा था कि ये दीप, अखंड रहेगा, इसे  कभी भी बुझना नहीं होगा। उन्हीं के कहने पर गुरुदेव ने गायत्री महामंत्र के 24 महापुरश्चरण पूरे किये थे।  वहीं, अगमवीर सिंह बताते हैं कि मथुरा की यज्ञशाला में 750 साल पुरानी अग्नि लाई गई थी और वो ही अग्नि  शांतिकुंज, हरिद्वार में भी स्थापित की गई। 

अगमवीर जी आगे बताते हैं कि अखण्ड दीप को आवलखेड़ा गांव में 1926 को प्रज्वलित किया गया था। इसके बाद दीपक को क़रीब 1930 के आसपास आगरा शहर लाया गया इसके बाद 1950 में मथुरा लाया गया। जब गुरुदेव 1971 में अपनी धर्मपत्नी के साथ मथुरा से हरिद्वार आ गए  तो अपने साथ अखण्ड दीपक को भी ले आये थे।  ये अखण्ड दीप एक सिद्ध ज्योति है। मान्यता है कि अगर कोई दीपक 40 वर्षों तक लगातार जलता रहे, तो वो सिद्ध हो जाता है।

सिद्ध का अर्थ समझने के लिए आगे देखें।   

शांतिकुंज के वरिष्ट कार्यकर्ता अगमवीर सिंह जी के अनुसार, इस सिद्ध अखण्ड दीपक में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य, उनके गुरुदेव और गायत्री मंत्र की अपार शक्ति समाहित है।  उनके अनुसार, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने 24 वर्षों तक इस अखण्ड दीपक के समक्ष  बैठ कर  गायत्री मंत्र की रोज़ाना 66 मालाएं  जपी थीं और तब से अब तक ये परंपरा जारी है।  अगमवीर सिंह जी बताते हैं कि देव कन्याओं के माध्यम से रोज़ाना 24000  गायत्री मंत्रों की शक्ति अखण्ड दीप तक पहुंचाई जाती है।  

वहीं, वो आगे बताते हैं कि, “अग्नि में एक दिव्य विशेषता है कि  वह शक्ति को अपने अंदर  जमा कर सकती है यानी एक्युमुलेट कर सकती है। इसी सिद्धांत के अनुसार 1926 से अखण्ड दीपक में गायत्री मंत्र की शक्ति अनवरत मौजूद है, जो आज भी एक्युमुलेट हो रही है, जमा हो रही है।  

अगमवीर सिंह जी गायत्री मंत्र के जाप करने की शक्ति के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि एक बार उन्होंने किसी बच्चे को देखा जो गुस्से में अपनी किताब फाड़ दिया करता था और पढ़ने के नाम पर रोता  था।  उन्होंने बच्चे की मां से कहा कि आप बच्चे को लेकर रोज़ हमारे साथ यज्ञ किया करो।  उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से ‘पंजीरी’ (जिसे आटे, ड्राई फ़्रूट और घी से तैयार किया जाता है) प्रसाद के रूप में बनवाई और मिठाई की तरह चकोर  काटकर उसके पीस  बना दिये और एक डब्बे में रख दिया। एक महीने तक रोज़ाना उस बच्चे को उसकी मां के ज़रिये पंजीरी खाने को दी।  अगमवीर जी हर दिन 24 गायत्री मंत्र जाप करके  वो पंजीरी उस महिला को दिया करते थे। लगातार 29 दिनों तक ये क्रम बना रहा।  बाद में देखा गया कि बच्चे ने गुस्से में किताब फाड़ना और रोना छोड़ दिया और पढाई में मन लगाना शुरू कर दिया।  

हरिद्वार के शांतिकुंज आश्रम में मौजूद  स्थित अखण्ड दीप एक सिद्ध, शक्तिशाली दीपक है। प्रतिदिन  यहां हज़ारों श्रद्धालू इस दीप के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। माना जाता है कि मात्र दर्शन से ही अखण्ड दीप की पॉजिटिव  एनर्जी श्रद्धालुओं तक पहुंचती है। अखंड दीप की शक्ति की सराहना करते हुए अगमवीर सिंह जी बताते हैं कि कई बार अखण्ड दीप के सामने खड़े श्रद्धालुओं के पैर कांपने लग जाते हैं, कुछ तो बहुत देर तक शांत अवस्था में चले जाते हैं। कई श्रद्धालु तो रोने भी लग जाते हैं। उन्होंने इसे शक्तिपात कहा है।

 Swarajyaindia  के सौजन्य से: 

दिये  या तेल के दीपक की रोशनी का अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों में गहरा आध्यात्मिक महत्व होता है। इनमें से, अखंड दीप  रस्मों और समारोहों में अपनी खास भूमिका के लिए सबसे अलग है। यह ब्लॉग अखंड दीप  के मतलब और महत्व पर गहराई से बात करता है, और आध्यात्मिक अनुभवों और अभ्यासों को बढ़ाने में उनके महत्व पर रोशनी डालता है।

अखंड दीप का अर्थ एवं  महत्व:

“अखंड” शब्द का अर्थ होता है बिना टूटे, लगातार। अखंड जाप,अखंड पाठ जैसे शब्दों से तो हमारे साथी परिचित ही होंगें।  

अखंड दीप एक ऐसा दीपक होता  है जो बिना किसी रुकावट के अनवरत जलता रहता है। अनवरत साधना एवं शाश्वत रोशनी का प्रतीक, अखंड दीप अटूट विश्वास और ईश्वर की लगातार उपस्थिति  को दशार्ता  है।

शाश्वत प्रकाश  का प्रतीक:

अखंड दीप  की अनवरत प्रज्वलित  लौ ईश्वर की बुद्धि, पवित्रता और सुरक्षा की शाश्वता  को दर्शाती है। अखंड दीप ईश्वर के शाश्वत करैक्टर का  एक जीता-जागता उदाहरण है, जो साधकों को मिल रहे  मार्गदर्शन का स्मरण कराता  है। 

अटूट भक्ति का प्रतीक:

अखंड दीप प्रज्वलित करना  विश्वास का एक शक्तिशाली इंडिकेटर  है, जो साधक की आध्यात्मिक यात्रा के प्रति अटूट  समर्पण को दर्शाता  है। अखंड दीप जीवन की चुनौतियों के वशीभूत ध्यान भटकने की परवाह किए बिना, आध्यात्मिक जुड़ाव बनाए रखने का कमिटमेंट को दर्शाता  है।

अखंड दीप  से जुड़े रीति-रिवाज और अभ्यास:

अलग-अलग आध्यात्मिक परंपराओं में अखंड दीप  का महत्व स्पष्ट  दिखता है:

रोज़ाना की पूजा: कई घरों में अखंड दीप  अपनी रोज़ाना की पूजा में शामिल होते हैं जहाँ यह एक पवित्र वातावरण  बनाता है, जिससे शांति और आध्यात्मिकता बढ़ती है।

खास समारोह: नवरात्रि, दिवाली एवं अन्य  शुभ अवसरों  पर, अखंड दीप  से आशीर्वाद, खुशहाली और भगवान की कृपा मिलने की मान्यता है।

ध्यान और प्रार्थना: अखंड दीप की स्थिर लौ की ध्यान के दौरान एक केंद्र बिंदु के रूप में काम कर सकती है, जो गहरी जागरूकता और आध्यात्मिक जुड़ाव में मदद करती है। 

अखंड दीप की ज्योति : अखंड दीप की अनवरत प्रज्वलित लौ अखंड  पक्के विश्वास और लगन का सबूत है। यह हमेशा जलने वाली लौ एक गाइडिंग लाइट की तरह काम करती है, जो भक्तों को उनकी आध्यात्मिक  यात्रा  और जीवन की कठिनाइओं  में सपोर्ट करती है।

अखंड दीप प्रज्वलन के लाभ:

स्पिरिचुअल अपलिफ्ट: लगातार जलने वाली लौ स्पिरिचुअल वातावरण  को बेहतर बनाती है, जिससे प्रार्थना और मेडिटेशन के लिए एक आइडियल माहौल बनता है।

मेंटल क्लैरिटी: लगातार जलने वाली रोशनी फोकस बढ़ाती है, जिससे प्रैक्टिस करने वालों को सोच-विचार के दौरान मेंटल शांति पाने में मदद मिलती है।

पॉजिटिव एनर्जी: माना जाता है कि अखंड दीप प्रज्वलन  से आस-पास का माहौल शुद्ध होता है और पॉजिटिव एनर्जी आती है।

आशा  का सिंबल: अखंड दीप की  लौ कठिन  समय में आराम देते हुए, हिम्मत और भगवान की मौजूदगी की याद दिलाती है।

हम तो कहेंगें कि “दीपक” के बिना कोई भी साधना संभव ही नहीं है। 

इन्हीं  शब्दों से आज के ज्ञानप्रसाद लेख का समापन होता है। 

जय गुरुदेव  


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