ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य भलीभांति परिचित है कि वर्ष 2026 त्रिवेणी शताब्दी लेकर आया है। परम वंदनीय माता जी का अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य के वर्ष 2026 में 100 वर्ष पूरे होना हम सबके लिए सौभाग्य का अवसर है। इसी सौभाग्य को मनाते हुए हमने वर्ष के आरंभिक पांच महीनों में वंदनीय माता जी को जानने का प्रयास किया, उसके बाद यज्ञ पिता- गायत्री माता पुस्तक के माध्यम से गुरुवर एवं उनके समर्पित शिष्य पंडित लीलापत शर्मा जी के बीच हुए संवाद का अमृतपान किया। इस प्रयास में 16 अद्भुत लेख प्रस्तुत किये गए।
अब, परम पूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शक, Himalayan Guru सर्वेश्वरानन्द जी के निर्देश पर स्थापित हुए अखंड दीप के बारे में जानकारी प्राप्त करने का समय है, समय है अखंड दीप की स्थापना के पीछे रहस्य को न केवल जानने का बल्कि समझ कर, कमैंट्स के माध्यम से विश्व को अपने गुरु की शक्ति बताने का।
अखंड ज्योति जनवरी 1971 के अंक में पृष्ठ 54 पर एक लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक “हमारे दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ” था। “अपनों से अपनी बात” धारावाहिक सेगमेंट के अंतर्गत प्रकाशित हुआ यह लेख मात्र 1-2 पन्नों का न होकर 6 पन्नों में ऐसी महत्वपूर्ण एवं विस्तृत जानकारी लिए हुए था कि इन पंक्तियों का लेखक,अपने महान गुरु का शिष्य ऐसा प्रेरित हुआ कि बार-बार पढ़ता ही गया, पढ़ता ही गया। इस लेख के कंटेंट ने ऐसा मंत्रमुग्ध किया कि स्मरण ही नहीं रहा कि इसे अनेकों बार पहले भी न केवल पढ़ा ही जा चुका है बल्कि ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच पर प्रकाशित भी किया जा चुका है। अभी 10 महीने पहले ही 5 अगस्त 2025 को Princess cruise के जहाज़ के 18वें तल से प्रकाशित किया था। मन ने एकदम प्रश्न किया कि आखिर इस लेख में ऐसा है क्या जो बार-बार लिखने की प्रेरणा दे रहा है। तो रिप्लाई मिला कि भले ही यह लेख बार-बार प्रकाशित हुआ हो, “अखंड दीप” के प्राकट्य के 100 वर्ष पूरा होने वाले वर्ष (2026) में इसका प्रकाशन एक अलग ही महत्व लिए है। एक और रिप्लाई मिला कि बार-बार प्रकाशन होने के बावजूद क्या हमें इसके कंटेंट का तनिक भी आभास है? नहीं न? हम में से बहुतों को तो यह भी नहीं स्मरण होगा कि आज नाश्ते में क्या खाया था तो यह लेख कहाँ से याद रहेगा। एक और बात, जो सबसे महत्वपूर्ण है वोह यह है कि चाहे जितनी भी बार प्रकाशित हो जाए, हर बार की प्रस्तुति अपनेआप में यूनिक ही होगी क्योंकि पुनः प्रकाशन कोई कॉपी पेस्ट तो है नहीं।
तो आइए पुनः प्रकाशन के लॉजिक के साथ गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर,गुरु अमृत द्वारा वर्षों से जमी कालिख को रगड़-रगड़ कर धो डालें।
*******************
गुरुदेव कह रहे हैं :
15 वर्ष की आयु होती ही क्या है, काम,वासना, लोभ,महत्वाकांक्षा की प्रबलता के वही दिन होते हैं। अपने मार्गदर्शक का पूजास्थली की कोठरी में प्रकट होना, ऐसे-ऐसे निर्देश देकर अदृश्य हो जाना, पता ही नहीं चला कि 40 वर्ष की आयु कब आ पंहुची। जीवन का यही समय होता है जब कामना, वासनायें, तृष्णा, महत्वाकांक्षायें प्रायः आकाश और पाताल के सिरे मिलाती हैं। हमारे लिए यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत से मनोविकार प्रबल रहते हैं। मनोविकार में बह कर व्यक्ति ऐसे-ऐसे रास्तों पर निकल जाता है कि आसपास के लोग सनकी और पागल भी कहने से नहीं कतराते। आमतौर पर यही समझा जाता है कि परमार्थ प्रयोजनों के लिए, पूजा पाठ, भक्ति आदि के लिए ढलती आयु ही उपयुक्त होती है।
मौज मस्ती के आधुनिक माहौल में, “Live for today-कल किसने देखा है” के सिद्धांत का प्रचार करने वाले अनेकों मिल जायेंगें जो ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के साथिओं की दिनचर्या पर कटाक्ष कर रहे होंगें। यदि इस परिवार के किसी साथी ने ऐसे रिटायर्ड, 70-75 वर्षीय व्यक्तियों को प्रेरित करने का साहस भी किया होगा तो यही उत्तर मिला होगा:अभी हम बूढ़े थोड़े हुए हैं, अभी तो रिटायर हुए हैं, अभी तो एन्जॉय करने का, आराम करने का समय है।
आइए आगे गुरुदेव का दिव्य सन्देश सुनें:
युवावस्था में लोग अर्थव्यवस्था से लेकर सैन्य चालन तक अनेक महत्वपूर्ण कार्यों का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाते हैं और उन्हें उठाने भी चाहिएं। इस आयु में महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए बहुत अवसर मिलता है। सेवाकार्य में भी अधिकतर नवयुवक ही योगदान दे सकते हैं/देते हैं। लोकमंगल के लिए, परमार्थ कार्यों के लिए, नेतृत्व करने के लिए वह अवधि उचित नही समझी जाती। शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द, रामदास, मीरा, निवेदिता जैसे थोड़े से ही Exception ऐसे हैं जिन्होंने युवावस्था में ही लोकमंगल के नेतृत्व का भार अपने कंधों पर सफलता से वहन किया हो। आमतौर पर देखा गया है कि कच्ची उम्र गड़बड़ा ही जाती है। यश, पद की इच्छा, धन का प्रलोभन, आकर्षण के बने रहने के कारण खराबी ही पैदा होती है। अच्छी संस्थाओं का भी सर्वनाश इसी स्तर के लोगों द्वारा होता है।
यों तो बुराई भलाई किसी आयु विशेष से बंधी नहीं रहती लेकिन प्रकृति की परम्परा कुछ ऐसी ही चली आती है जिसके कारण “युवावस्था महत्वाकांक्षाओं की अवधि” मानी गई है। इस आयु में मनुष्य उड़ कर आकाश को ही छूना चाहता है। ढलती उम्र के साथ-साथ सम्भवतः मनुष्य कुछ ढीला पड़ जाता है तब उसकी भौतिक लालसाएं भी ढीली पड़ जाती है। मरने के अटल सत्य को याद आने से उस समय मनुष्य लोक-परलोक, धर्म-कर्म में भी रुचि दिखाने लगता है इसीलिए फिलॉसफ़रों ने वानप्रस्थ और संन्यास के लिए उपयुक्त समय आयु के उत्तरार्द्ध को ही माना है।
गुरुदेव बता रहे हैं:
न जाने क्या रहस्य था कि हमारे मार्गदर्शक (दादा गुरु, सर्वश्वरानन्द जी) ने छोटी सी आयु में ही तपश्चर्या के कठोर प्रयोजन में लगा दिया और देखते-देखते उसी प्रयास में 40 वर्ष की आयु पूरी हो गई। हो सकता है हमारे गुरु ने वर्चस्व और नेतृत्व के अहंकार का, महत्वाकांक्षाओं और प्रलोभनों में बह जाने का खतरा समझा हो। हो सकता है उन्होंने सोचा हो कि आन्तरिक परिपक्वता,आत्मिक बलिष्ठता पाये बिना कुछ बड़ा काम करना कठिन हो। हो सकता है हमारे द्वारा करवाए जाने वाले महान् कार्यों के लिए अत्यन्त आवश्यक संकल्पबल, धैर्य, साहस और संतुलन परखा गया हो।अपना यौवन तो साधन क्रम में बीत गया, इसकी चर्चा हम अपने परिजनों से अनेकों बार कर चुके हैं।
24 वर्ष चली उस परीक्षा की अवधि में सब कुछ तो सामान्य ही चला लेकिन असामान्य केवल एक ही था और वह था हमारा गौघृत से अहर्निश जलने वाला अखण्ड दीप। पूजा की कोठरी में वह निरन्तर जलता रहता। इसका वैज्ञानिक या आध्यात्मिक रहस्य क्या था कुछ ठीक से कह नहीं सकते।
गुरु सो गुरु, आदेश सो आदेश, अनुशासन सो अनुशासन, समर्पण सो समर्पण।
एक बार जब ठोक बजा कर देख लिया और समझ लिया कि इसकी नाव में बैठने पर डूबने का खतरा नहीं है तो फिर आँख मूँदकर बैठ ही गये। फौजी सैनिक को अनुशासन प्राणों से भी अधिक प्यारा होता है। हमारे समर्पण को कोई अन्धश्रद्धा कहे तो कोई बात नहीं, हमारे लिए ऐसी अन्धश्रद्धा शिरोधार्य है। अनुशासन प्रियता या जीवन की जो दिशा निर्धारित कर दी गई, कार्य पद्धति जो बता दी गई उसे सर्वस्व मानकर पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ करते चले गये। साधना कक्ष में अखण्ड दीप की स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आती है। जो साधना हमें बताई गई उसमें “अखण्ड दीप का महत्व” है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक ठीक उसी तरह जलाये रखा गया। बाद में तो वह प्राणप्रिय ही बन गया। 24 वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था लेकिन बुझाने की कल्पना भी ऐसी लगती थी कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा। सो उसे आजीवन प्रज्वलित रखा गया। हम अज्ञातवास गये थे,अब फिर जा रहे हैं, उसे हमारी धर्मपत्नी (वंदनीय माताजी) संजोये रखेंगी। यदि अकेले रहे होते पत्नी न होती तो अखण्ड दीप संजोये रखना कठिन होता। अनेकों लोग अखण्ड दीप स्थापित करते हैं, अनेकों के जलते बुझते भी रहते हैं, वे नाममात्र के ही अखण्ड होते होंगे। अपना दीपक अखण्ड बना रहा इसका कारण बाहरी सतर्कता नहीं बल्कि अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्मपत्नी ने असाधारण योगदान दिया है।
हो सकता है अखण्ड दीप अखण्ड यज्ञ का ही स्वरूप हो। धूप बत्तियों का जलना, जप मंत्रों को उच्चारण करने की प्रक्रिया, दीपक में घी समर्पित करना,यज्ञ की ही आवश्यकता पूरी करता हो और इस तरह अखण्ड हवन की ही कोई स्वसंचालित प्रक्रिया बन जाती हो। हो सकता है जल भरे कलश और ज्वलन्त अग्नि की स्थापना में कोई अग्नि और जल का संयोग रेल इंजन जैसी भाप शक्ति का सूक्ष्म प्रयोजन पूरा करना हो। हो सकता है अंतर्ज्योति जगाने में इस बाहरी ज्योति से कुछ सहायता मिलती हो, इसी ज्योति से हमें “अखण्ड ज्योति पत्रिका” के लिए भावनात्मक प्रकाश, अनुपम आनन्द, उल्लास मिलता रहा हो। बाहर चौकी पर रखा हुआ यह दीपक कुछ दिन तो बाहर जलता दिखा,बाद में अनुभूति बदली और ऐसे अनुभव हुआ कि हमारे अन्तःकरण में यही प्रकाश ज्योति ज्यों की त्यों जलती है। हमें अनुभव हुआ कि जिस प्रकार पूजा की कोठरी प्रकाश से आलोकित होती है वैसे ही अपना समस्त अन्तरंग इस ज्योति से ज्योर्तिमय हो रहा है। शरीर, मन और आत्मा में, स्थूल सूक्ष्म और कारण कलेवर में हम जिस ज्योतिर्मयता (Radiance) का ध्यान करते रहे हैं सम्भवतः वह इस अखण्ड दीप की ही प्रतिक्रिया रही होगी। सर्वत्र प्रकाश का समुद्र लहलहा रहा है और हम तालाब की मछली की तरह उस ज्योति-सरोवर में क्रीडा-कलोल करते विचरण कर रहे हैं। इस दिव्य अखंड दीप ने हमारी इन अनुभूतियों,आत्मबल, दिव्य दर्शन और आंतरिक उल्लास को विकासमय बनाने में जितनी सहायता पहुँचाई उसका शब्दों में उल्लेख नहीं किया जा सकता। हो सकता है यह हमारी कल्पना (Imagination) ही हो लेकिन सोचते जरूर हैं कि यदि यह अखण्ड दीप/ज्योति न जलाई गई होती तो पूजा की कोठरी के धुँधलेपन की तरह शायद अंतःकरण भी धुँधला ही बना रहता। अब तो वह दीपक दीपावली के दीप की तरह हमारी नस-नाड़ियों में जगमगाता दिखता है। अपनी इन्हीं भाव भरी अनुभूतियों के प्रवाह में ही जब वर्षों पूर्व अखंड ज्योति पत्रिका प्रारम्भ की तो संसार का सर्वोत्तम नाम जो हमें प्रिय लगा,पसन्द आया “अखण्ड ज्योति” रख दिया। हो सकता है उसी भावावेश में प्रतिष्ठापित पत्रिका का छोटा सा विग्रह संसार में मंगलमय प्रगति की प्रकाश किरणें बिखरने में समर्थ और सफल हो सका हो।
तो साथिओ, कमेंट करके बताना कि आपके जीवन में “अखंड ज्योति पत्रिका” की Radiance किस स्तर तक सहायक हुई है।
जय गुरुदेव,धन्यवाद्
