वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वंदनीय माताजी की जन्म शताब्दी को समर्पित वर्तमान लेख श्रृंखला का 14वां एवं अंतिम ज्ञानप्रसाद लेख: हमारी माँ कह रही है, यह श्रेय लेने का समय है,बार-बार नहीं आएगा। 

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परम वंदनीय माता जी के अवतरण, परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।

अगस्त 1994 की अखंड ज्योति में प्रकाशित लेख, “एक माँ की अंतः वेदना एवं अपेक्षा भरी गुहार” से प्रभावित होकर कल एक ज्ञानप्रसाद लेख प्रस्तुत किया गया था। आज उसी का दूसरा एवं समापन भाग प्रस्तुत  है। आज के लेख के साथ ही माताजी की जन्म शताब्दी पर आधारित लेख श्रृंखला  का समापन होता है, यह भी कैसा संयोग है कि समापन भी गुरुवार (अपने गुरु के वार अर्थात दिन) को हो रहा है। 

हमारी माँ, गुरुसत्ता के साथ जुड़ने के संकेत देते हुए, हम पर विश्वास करते हुए न जाने क्या कुछ कह गयी कि हम भावना में इस कदर बहते चले गए कि क्या कहें !!!

गुरुदेव तो रोज़ ही हमें समयदान के लिए कहते आ रहे हैं, बार-बार आग्रह कर रहे हैं कि यह श्रेय लेने का अवसर है। आज माँ भी वही बात कह रही है, माँ की बात तो अक्सर बच्चे मान ही लेते हैं। आज माँ के अनेकों अनुदानों का ऋण चुकाने का स्वर्ण अवसर है। 

बस फिर क्या है,आओ चलें ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल में जहाँ इस समय गुरुकक्षा चल रही है, यह कोई साधारण कक्षा नहीं है, साक्षात् गुरुचरणों से ज्ञानगंगा की अविरल धारा बह रही है, ज्ञानगंगा में डुबकी लगाने का यह एक स्वर्ण/दुर्लभ अवसर है, देखना कहीं मिस न कर जाएँ। 

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हमारी माँ, वन्दनीय माताजी कह रही हैं कि मैंने प्रत्यक्ष देखा है कि व्यक्ति-व्यक्ति के मनों में दुःख , पारिवारिक जीवन के विग्रहों तथा समाज की विषमताओं, तोड़−फोड़ भरी, विपन्नताओं से भरी परिस्थितियाँ कैसे परोक्ष जगत को प्रदूषित किये जा रही है। नारी पर हो रहा दमन, दहेज के नाम पर जलती बहुएँ, यौन शोषण बढ़ोत्तरी पर है। वैभव के बढ़ते चले जाने, तकनीकी प्रगति के बावजूद व्यक्ति आज भी बेचैन है, क्षुब्ध है तथा भविष्य के प्रति उसके मन में अनिश्चितता है। अपहरण-फिरौती के मामले बढ़ते जा रहे हैं, व्यक्ति संवेदनहीन होता जा रहा है व ऐसा लगता है कि समाज के इस बढ़ते कैंसर के लिए “कोई सूक्ष्मतम स्तर का उपचार” शीघ्र ही खोजना होगा ताकि सभी को शरीर, मन, अंतःकरण से पवित्र बना उन्हें आगामी कष्टों से जूझने के लिए “एक सुरक्षा कवच” दिया जा सके। दैवी प्रकोप भी तेजी से बढ़े है। विमान दुर्घटनाएँ बढ़ रही है व बाढ़, भूकम्प, महामारी,दुर्भिक्ष, ज्वालामुखी विस्फोट का संकट वृद्धि पर है। कहने को तो तृतीय युद्ध का खतरा टल गया लेकिन अनेकों देशों  के पास आधुनिक हथियारों व आणविक बमों का जखीरा तथा विभाजित हुए रूस के देश अभी भी शीतयुद्ध का वातावरण बनाए हुए है। कहने का आशय यह है कि अभी भी सूक्ष्म स्तर पर एक बड़ी व्यापक तैयारी होनी है जिससे नवसृजन को संकल्पित आत्मबल संपन्न देवमानवों की उत्पत्ति संभव हो सके एवं विनाश को टाला जा सके।

महाकाल ने इस मिशन को युग परिवर्तन का निमित्त बनाने हेतु ही कौरवों की सेना के बीच ला खड़ा किया है। बुझती शमा जब भी लपलपाती है, कइयों को लगता है कि यह तो और बढ़ गयी है किन्तु यह क्षणिक चमक कुछ ही पल में ओझल हो जाती है। मरणासन्न व्यक्ति तेजी से सांसें लेता है तो पास बैठे रिश्तेदारों की आँखों में चमक आ जाती है कि संभवतः अब यह पुनः प्राणदान पा लेगा लेकिन  चिकित्सक जानते हैं कि यह अंतिम वेला है। प्राण अब शरीर छोड़ने ही वाले हैं ऐसा ही कुछ इन दिनों हो रहा है। हमें मनोबल खोना नहीं है,सँजोना है तथा अनीति  से मोर्चा लेने वाली ताकतों को एक जुट करना है।

परिजन मात्र इतना ही करें कि अपने साधनात्मक पुरुषार्थ में वृद्धि कर दें तथा समष्टि में संव्याप्त “महाकाल की सत्ता से एकात्मता (Integration with supreme power)” स्थापित करने का प्रयास करें ताकि श्रेष्ठ वातावरण बनने में मदद मिले।

माताजी कर रही हैं कि इन दिनों, मेरी अपनी, स्वयं की स्थिति परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारण सत्ता के साथ पल-पल स्पंदन लेती हुई सी है। हर श्वास में मेरे आराध्य,मेरे भगवान ही मुझे दिखाई देते हैं। उन्हीं के निर्देशों से पिछले चार वर्षों  की जीवन नौका चलती रही। अब आगे भी उन्हीं के इशारों पर चलते चले जाना है। परिजन तनिक भी परेशान न हों, मन को दुःखी  न करें, न ही उद्विग्न हों कि हम विगत दो माह से अपनी माता के स्थूल दर्शन न कर पाए। यह शरीर तो शक्ति का वाहक, हाड़ माँस का चोला भर है। इसे जितने दिन कार्य करना है, करेगा लेकिन अपना आश्वासन ,अपनी गुरुसत्ता के साथ मिलकर अवश्य पूरा करेगा कि जब तक अपना एक भी बच्चा  दुःखी  है, उसे दिलासा देने, साँत्वना देने उसकी माँ उसके पास ही कहीं विद्यमान है। उसके पंख इतने बड़े हैं कि सारे जगत  के दुःखी  जनों को वह अपनी संरक्षण छाया में रख सकती है।

मात्र गायत्री परिवार के परिजनों के दुःख  कष्ट ही नहीं, सारी धरित्री के कष्ट जहाँ मिटाने का प्रसंग समक्ष हो, दैवी विधान बनकर वह सामने आया हो तो अपना एक ही कर्तव्य रह जाता है कि जो भी निर्देश आ रहा है, वह स्वीकार किया जाय। बच्चे अपनी माँ के स्थूल कष्ट को देखते हैं तो अपनी पूरी कोशिश करते हैं एवं उसे यथासंभव आराम देने का प्रयास करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर उच्चतम स्तर पर उपलब्ध सहायता भी देने का प्रयास करते हैं। अपनी निजी इच्छा तो यही है कि अपनेआप को प्रकृति के प्रवाह के अंतर्गत महाकाल की सत्ता के अधीन कर दिया जाय, वह जो चाहे करे,जैसा चाहे कर ले।  

गायत्री परिवार मिशन का भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है। इसे वही भगीरथी  पुरुषार्थ करना है जिसमें 60000  सगर पुत्रों को शाप मुक्त किया गया था। 

पौराणिक कथा के अनुसार अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ  का घोड़ा देवराज इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में छिपा दिया था। घोड़े को खोजते हुए राजा सगर के 60000  पुत्र कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने मुनि को चोर समझकर उनका अपमान किया, जिससे क्रोधित होकर मुनि ने उन्हें शाप देकर भस्म कर दिया। शापित राजकुमारों की मुक्ति केवल गंगाजल के स्पर्श से ही संभव थी, जो उस समय केवल स्वर्गलोक में बहती थीं। राजा सगर के वंशजों (अंशुमान और दिलीप) ने गंगा को धरती पर लाने का प्रयास किया लेकिन असफल रहे। अंत में, महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा धरती पर आने को तैयार हुईं, लेकिन उनके प्रचंड वेग को रोकने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लिया। इसके बाद शिवजी ने गंगा को सात धाराओं में पृथ्वी पर प्रवाहित किया। भगीरथ गंगा की धारा के आगे-आगे रथ चलाकर उन्हें उस स्थान पर ले गए जहाँ उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी। गंगा के जल के स्पर्श से सभी 60000  पुत्रों के पाप धुल गए और उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई। 

वोह तो 60000  पुत्रों को शापमुक्त करने की बात थी लेकिन अब तो संसार की जनसँख्या 800 करोड़ तक जा पहुँची है। गायत्री परिवार के लोग तो मात्र कुछ ही करोड़ हैं।यदि सारे भी संकल्प ले लें तो भी  मानवी पुरुषार्थ पर्याप्त  नहीं है,  इसे केवल अतिमानवी स्तर(Super human level)  पर ही पूरा करना होगा। 

यह कार्य कोई भी करता दिखाई पड़े किंतु शक्ति का प्रवाह सूक्ष्म जगत से ही चलेगा। माताजी कह रही हैं कि अश्वमेध यज्ञों के  पुरुषार्थ ने मेरी उम्मीदें और भी प्रबल बना दी है। मुझे पूरी आशा है कि मजबूत कंधों वाले मेरे बच्चे, हमारे सौंपे गए दायित्वों को जरूर निभाएँगे। जो इस समय इस प्रवाह में जुड़ा रहेगा वह आगामी 10-12 वर्षों में स्वयं को श्रेय-सम्मान का अधिकारी होता पाएगा। देवसंस्कृति दिग्विजय का यह उपक्रम जो पिछले दिनों से चलता आ रहा  है, उसने आशाएँ प्रबल कर दी हैं कि यदि सत्प्रयोजनों के लिए कुछ सज्जन जुट पड़ें  तो परिवर्तन होकर ही रहता है। यह समय भी कुछ ऐसा ही विशिष्ट है।

यह समय संधिकाल की वेला वाला समय है,बार-बार नहीं आने वाला। जब सारी धरती के भाग्य को नये सिरे से लिखा जा रहा हो तब कन्नी काटकर बहाने  बनाने वाले निश्चित ही अभागे कहलाये जायेंगे। विशिष्ट समय की जिम्मेदारियाँ भी विशिष्ट ही होती है। यदि हमारे परिजन यह समझ सके तो शक्ति की प्रक्रिया के साथ स्वयं को जोड़कर, स्वयं को अर्जुनों, सुग्रीव, हनुमानों की श्रेणी में ला खड़ा कर सकेंगे, चुनाव उन्हें ही करना है।

जब हम यह पंक्तियों लिख रहे हैं तो हमें तो यही लग रहा है कि यह ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवरजनों के लिए ही कहा जा रहा है, हम तो अनेकों बार कह चुके हैं, शायद बच्चे  माँ का आग्रह ही सुन लें। 

माताजी कह रही हैं कि अब  हमारी भूमिका परोक्ष जगत में अधिक सक्रियता वाली होगी। गुरुजी का आमंत्रण तीव्र व तीव्र होता चला जा रहा  है तथा एक ही स्वर हर श्वास के साथ मुखरित होता जा रहा है: युगपरिवर्तन के लिए और अधिक और अधिक समर्पण। ऐसे में प्रत्यक्ष रंगमंच की भूमिका अपने वरिष्ठ बच्चों के कंधों पर सौंपकर हमें भी सूक्ष्म व कारण सत्ता के रूप में सक्रिय होना पड़ सकता है। विज्ञान भी कहता है कि शक्ति का प्रवाह कभी रुकता नहीं, इस तथ्य को जानने वाले कभी भी लौकिक स्तर पर चिंतन नहीं करेंगे तथा अपने पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं  आने देंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।

आपकी  माँ अपना स्नेह लुटाना चाहती है, बदले में समर्पण चाहती है।  परिजनों से लोभ-मोह के बंधनों से मुक्ति चाहती है। क्या हमारे परिजन यह विश्वास हमें दे सकेंगे ? जिस मिशन रूपी ज्ञानरथ  को हम व गुरुदेव खींचकर यहाँ तक लाए थे,आगे बढ़ाते रख सकेंगे ?

यह प्रश्न प्रत्येक को अपनी अंतरात्मा से आज/अभी पूछना है। किसी परिस्थिति में किसी को अपना मनोबल न खोकर शक्ति के अजस्र चले आ रहे प्रवाह पर पूरा विश्वास रखते हुए आगे ही आगे बढ़ते चले जाना है।  हमारी अंतर्वेदना में जो हिस्सा बँटा सकें, उन्हें आमंत्रण है कि वे शाँतिकुँज की रचनात्मक प्रक्रिया से स्थायी रूप से अथवा आँशिक समयदानी के रूप में ओर अधिक गहन स्तर पर जुड़ें। जो मोह को त्याग सकें वे अधिक से अधिक समय का अंश भगवान के काम के लिए निकालें। जो आने वाले दिनों के  “देवसंस्कृति दिग्विजय क्रम” के अंतर्गत छोटे बड़े कार्यक्रमों के लिए अपनी क्षमता-सामर्थ्य की प्लानिंग कर सकते हों, अवश्य करें। 

परिजनों की इस माँ ने अपने जीवन का हर क्षण एक समर्पित शिष्य की तरह जिया है। अपने आराध्य की हर इच्छा को पूरा करने का अथक प्रयास किया है। प्रत्यक्ष दृश्य पटल पर यदि हम दिखाई न भी पड़े तो हमारे द्वारा किया गया कार्य  जो अब तक गुरुसत्ता की अनुकंपा से बन पड़ा है, सबके लिए प्रेरणा का केन्द्र बना रहेगा एवं हमारे बच्चे सच्चे उत्तराधिकारी बनते हुए आदर्शों के क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य समीप लाते दिखाई पड़ेंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।

माताजी को समर्पित लेख श्रृंखला का यहीं पर समापन होता है। 


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