ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
पिछले कल प्रस्तुत किया गया 12वां ज्ञानप्रसाद लेख “मातृशक्ति विशेषांक पर आधारित” लेख श्रृंखला का समापन लेख था। जब हम फरवरी 1995 के इस अखंड ज्योति विशेष अंक को पढ़ रहे थे तो कहीं पर अगस्त 1994 के अंक का वर्णन आया। हमने एकदम उस अंक का लिंक अपने पास सेव कर लिया और मन बना लिया कि “मातृशक्ति विशेषांक” पर आधारित श्रृंखला के बाद इस अंक के उस लेख को ज़रूर साथिओं के समक्ष लाएंगें। मात्र दो लेखों में समाहित (आज और कल के लेख) इस कंटेंट ने हमें जिस तरह प्रभावित किया उसे शब्दों में वर्णन करना लगभग असम्भव है।
जिस लेख ने हमें इतना प्रभावित किया उसका शीर्षक था: विशेष लेख: एक माँ की अंतः वेदना एवं अपेक्षा भरी गुहार
हम साथिओं को विश्वास दिला सकते हैं कि शीर्षक में इतना कुछ छिपा नहीं है जितना कि लेख के कंटेंट में है। जिस प्रकार परम पूज्य गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण के बारे में घोषणा कर दी थी,उसी तरह वंदनीय माताजी ने भी अगस्त 1994 (महाप्रयाण के कुछ दिन पूर्व) में संकेत दे दिए थे। हमारे साथी जानते हैं कि वन्दनीय माताजी ने सितम्बर 1994 में स्थूल शरीर का त्याग कर दिया था।
तो साथिओ इन दो ज्ञानप्रसाद लेखों में वर्णित यही जानकारी दी गयी है।
आइए गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुमां के चरणों में समर्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें और चेक कर लें कि क्या सच में यह ज्ञानप्रसाद भी अमृत (मृत को जीवित) की भांति कार्य करता है यां नहीं।
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लगभग सारा लेख माताजी का सम्बोधन ही है:
दो शरीर व एक मन, दूध व पानी घुल-मिल कर जिस प्रकार एक हो जाते हैं, हमारी एवं पूज्य गुरुदेव की ऐसी ही जीवन यात्रा रही जिसमें हम दोनों ने एक दूसरे के पूरक बनकर अपने नन्हें-नन्हें बच्चों के लिए जो भी कुछ संभव हो पाया, किया तथा बदले में असीम स्नेह-प्यार भरी संवेदना तथा अकथनीय सम्मान पाया। गुरुदेव का जीवन एक समिधा की तरह तिलतिल कर जला व जीवन यज्ञ की इस प्रतिक्रिया में अपनी सुगंध बिखेरता हुआ अपने अस्सी वर्षीय जीवनकाल के एक-एक क्षण को मानव मात्र के लिए नियोजित होता चला गया। हमारे अधिकतर साथी समिधा के बारे में परिचित हैं लेकिन फिर भी बता दें कि हवन या यज्ञ में जलाई जाने वाली पवित्र लकड़ी को समिधा कहा जाता है। इसके अलावा, यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री को भी समिधा कहा जाता
कैसे भुलाऊँ मैं अपने साथ बिताए गए उनके उन क्षणों को जिनमें उन्होंने न केवल मुझे असीम स्नेह दिया बल्कि करोड़ों पुत्रों की माता के सर्वोच्च शिखर पर पदासीन कर दिया।
गुरूजी के साथ जुड़ने के बाद पहले दिन से ही यही शिक्षा मिली:
सारे विश्व की पीड़ा एवं उस पीड़ा के निवारण के लिए साधनात्मक पुरुषार्थ में ही जीवन की हर साँस लग जाए।
मैनें यथासंभव गुरूजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने का प्रयास किया। यही क्रम पिछले कई जन्मों से ही तो चला आ रहा था अतः कोई भी अटपटापन, नयापन अनुभव नहीं हुआ। बदले में असीम शाँति, परम आनन्द की अनुभूति होती रही । रोतों के आँसू पोंछने, उनकी पीड़ा बँटाने, उनके प्रारब्ध को हल्का करने के लिए जितना भी कुछ संभव हो पाया, वह गुरुदेव की साधना के साथ “अपनी समर्पण साधना” जोड़कर करते रहने का प्रयास किया। परिजन स्वयं ही इस तथ्य के साक्षी हैं कि ममता के असीम सागर पूज्य गुरुदेव जिनका अंतःकरण करुणा से लबालब था, अपने बच्चों को कितना कुछ देकर गए हैं । किसी को भौतिक उपलब्धि के रूप में मिला तो किसी को कष्टों से मुक्ति के रूप में, किन्तु गुरुदेव के रिजर्व बैंक में कही कोई कमी नहीं रही।
माताजी बता रही हैं:
मुझे अभी तक स्मरण है कि विवाहित जीवन के 20 वर्ष ही बीते थे कि उन्होंने मुझे एक बड़ी ज़िम्मेदारी सौंप दी। वह ज़िम्मेदारी हिमालय जाते समय अज्ञातवास की अवधि में अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका के संपादन की थी। संपादन के साथ ही, गुरूजी ने 1958 के ऐतिहासिक सहस्र कुण्डीय यज्ञ की ऊर्जा से, नए-नए विनिर्मित गायत्री परिवार रूपी नन्हें पौधे की सुरक्षा भी सौंप दी ताकि हमारा कोई भी बच्चा, इस एक डेढ़ वर्ष की अवधि में स्वयं को अकेला अनुभव न करें। गुरूजी द्वारा सौंपे गए दायित्व, केवल उनकी दी हुई शक्ति से ही संभव हो पाए। गुरुदेव का तो क्या ही कहा जाए। उन्होंने कठोर तप के साथ वेदों का भाष्य किया तथा “एक साधक की डायरी के पृष्ठों” के रूप में अपने अज्ञातवास के अनुभव लिख भेजे, जो सुप्रसिद्ध पुस्तक “सुनसान के सहचर” के रूप में प्रकाशित हुए। मैं तो एक कठपुतली मात्र ही थी, नचाने वाला कलाकार तो मेरा इष्ट,मेरा आराध्य, मेरा गुरु, मेरा सब कुछ ही था जिसे मैं सब कुछ समर्पित कर चुकी थी। मेरी गुरुसत्ता ने मुझे अपने निजी परिवार से बढ़कर सम्पूर्ण विश्व्यापी परिवार का दायित्व मुझे सौंप दिया था।
जब गुरूजी ने अपनी दिव्य दृष्टि से विश्व पर शासन कर रही विभीषिकाओं के गहन घटाटोप बादल देखे तो “महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया” के अंतर्गत साधनात्मक पुरुषार्थों की व उसमें जन-जन की सहभागिता की घोषणा की। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरूजी ने अपनी स्वयं की कर्मभूमि मथुरा को सदा के लिए छोड़कर, 1971 में हरिद्वार सप्तसरोवर में, मेरे लिए शान्तिकुँज नामक एक साधना स्थली का निर्धारण किया एवं तप-पुरषार्थ के लिए स्वयं हिमालय जाने की घोषणा की।
विदाई का समय आया एवं मुझे एक बार फिर गुरूजी से विलग होकर हृदयवेधी मर्मांतक वेदना झेलते हुए हरिद्वार के सप्तसरोवर क्षेत्र में नवनिर्मित शांतिकुंज आश्रम से जून 1971 में विदाई देनी पड़ी।
एक वर्ष बाद जब गुरूजी जब तप से अर्जित हुई शक्ति से लालिमायुक्त चेहरे के साथ लौटे तो उन्होंने “प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों” की, “जीवन साधना सत्रों” की तथा “ऋषि परंपरा के बीजारोपण” की घोषणा की। गुरूजी का हिमालय से वापिस आना व मुझे उनका समर्थ सहयोग मिलना,मेरे लिये संजीवनी का काम कर गया। गायत्री परिवार व उसकी गतिविधियाँ पूरी स्पीड से बढ़ती चली गयीं।
इतना होने के बावजूद, सभी ने एक प्रत्यक्ष परिवर्तन देखा और वह था कि पूज्यवर ने स्वयं को बैकग्राउंड में रखा और मुझे ही आगे आकर सारे परिवार की लालन-पालन की व्यवस्था सँभालने के लिए प्रोत्साहित कर दिया। कई बार मैं कहती भी थी कि यह भार अकेले मुझ से संभलेगा नहीं लेकिन उन्होंने कहा कि शक्ति हमारी है, तुम प्यार बाँटती चलो, सभी को एक सूत्र में बाँधती चलो, महाकाल ने ही धरती के भाग्य को बदलने के लिए इस मिशन को माध्यम बनाया है, इसके लिए हम तुम जितना भी कर सकें, किया जाना चाहिए।
हुआ भी ऐसा ही: सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान एक और परीक्षा की घडी आयी जब गुरूजी ने एक-दो परिजनों व मेरे अलावा सभी से मिलना बंद करते हुए कठोर तप आरंभ कर दिया। न के बराबर आहार एवं सारा ध्यान जगती पीड़ा पर केंद्रित कर पाना कोई संत ही कर सकता है। सूक्ष्मीकरण साधना का समापन 1986 की वसंत पंचमी पर हुआ। मिशन बढ़ता चला गया चक्रवृद्धि गति से नवयुग के मत्स्यावतार का रूप जो था एवं सभी आशा भरी दृष्टि से सतयुग की वापसी की प्रक्रिया के लिए शाँतिकुँज-इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री की ओर निहारने लगे।
जिससे चोली-दमन का संबंध था, जिसके साथ आत्मा के सूत्र अविच्छिन्न गहराई से जुड़े थे, उसी गुरुसत्ता ने, मेरे भगवान ने जब 1990 की गायत्री जयंती पर स्वेच्छा से स्थूल काया के बंधनों से मुक्त हो सूक्ष्म व कारण में संव्याप्त हो कार्य को द्रुतगति से बढ़ाने की घोषणा की तो यह शरीर और मन टूटता सा दिखने लगा। उस सत्ता के बिना,खिवैया के बिना, जीवन की नैया कैसे आगे बढ़ेगी, मानों आँखों के सामने अँधकार सा छा गया।इस अन्धकार में भी गुरुदेव ने ही शक्ति प्रदान की।
अखंड ज्योति के जनवरी 1988 के अंक में 3 पृष्ठों में प्रकाशित सुप्रसिद्ध लेख “ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं” से लेकर 2 जून 1990 को दिये गए उनके अंतिम संदेश तक छाती पर पत्थर बाँधकर मैंने वह किया जिसकी मेरे आराध्य ने मुझ से अपेक्षा की थी। प्रत्यक्षतः उनकी स्थूल काया से, उनसे बिछुड़ना इस प्रकार था जैसे जल से निकली गयी मछली का पीड़ा से तड़पना होता है। मेरे बच्चों को, करोड़ों गायत्री परिजनों को, पूज्यवर सूक्ष्म व कारण सत्ता से जो देना चाहते थे,सारे जगत पर छाये संकटों के निवारण हेतु साधनात्मक पुरुषार्थ का माध्यम बनाना चाहते थे, वह उनके गायत्री जयंती 2 जून 1990 के महाप्रयाण के बाद संभव होता चला गया।
श्रद्धाँजलि समारोह, शक्ति साधना सत्र, शपथ समारोह एवं संस्कार महोत्सवों के उपक्रमों के बाद देवसंस्कृति दिग्विजय के क्रम में 18 अश्वमेध महायज्ञों द्वारा भारत व पूरी धरित्री पर देव संस्कृति का अलख जगाने की जो प्रक्रिया संपन्न हुई , उसने करोड़ों व्यक्तियों की चेतना को प्रभावित ही नहीं किया है, सतयुग का स्वप्न साकार होने की पूर्व भूमिका भी बना दी है। प्रत्येक महायज्ञ में 25-30 लाख व्यक्तियों का जुड़ना, उनके द्वारा संस्कृति विस्तार का संकल्प लिया जाना, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन-सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यक्रम आरंभ होना; यह सभी बताते हैं कि महाप्रयाण के बाद गुरुदेव की सूक्ष्म व कारण सत्ता ने कितना कुछ कर दिखाया है। जो विगत 60 वर्षों (1994 के अनुसार) में नहीं बन पड़ा था, उससे कई गुना अधिक विगत तीन वर्षों में संपन्न हुआ है। इसी को शक्ति का चमत्कार कहा जाता है।
कल इसी लेख का दूसरा एवं अंतिम भाग प्रस्तुत किया जायेगा।
जय गुरुदेव
