आज का ज्ञानप्रसाद लेख कल वाले लेख की ही एक्सटेंशन है I शब्द सीमा की बेड़ियाँ कहाँ हमें अपने मन की बात लिखने देती हैं। अनेकों बार अपना ह्रदय चीरकर साथिओं के समक्ष रखने का प्रयास किया है लेकिन आज सीधा अपनी माँ के चरणों में समर्पित होकर, कुछ अन्य प्राणियों के प्रति भाव-संवेदना अनुभव करने का स्वर्ण अवसर है।
आइये चले चरण वंदन करें और अपनी माँ को जानें।
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बिल्ली के चार बच्चे:
घीया मंडी वाले घर में जीने के पास एक बुखारी थी। उसमें वह सूखी लकड़ी और उपले रखती थीं। एक रोज उसी बुखारी में बिल्ली ने चार बच्चे दिये। बिल्लियों के बारे में आम-तौर पर सोचा जाता है कि वह अपने बच्चों को कई घर घुमाती है। पता नहीं इसमें कितना सच है। कुछ भी हो बच्चे देने के बाद वह बिल्ली लड़खड़ाती हुई छत पर चढ़ी। बाद में कहाँ गई कुछ मालूम नहीं। जब कई दिन बिल्ली वापस न लौटी तो बच्चों का बुरा हाल देखकर हमारी माँ भी कैसे आराम से बैठ पाती। वह अपने को रोक न सकीं, भाग कर बुखारी के पास गईं। उपले पलटने पर देखा, चार बच्चे थे। उनकी आँखें अभी तक खुली न थीं। भूख-प्यास से ये सभी लगभग मरणासन्न थे।
माताजी कटोरी में गाय का दूध लायी, रुई की बत्ती बनाई, धीरे से उनका मुँह खोला और रुई की बत्ती से दूध उनके मुँह में टपका दिया। यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। धीरे-धीरे बच्चे बड़े हो गए। वे जीने के आसपास घूमने लगे। इस तरह उनका घूमना-फिरना, हर किसी के बिस्तर पर जब चाहे चढ़ बैठना, घर वालों के लिए एक मुसीबत बन गया। अब तक वह दूध-रोटी भी खाने लगे थे। घर के सदस्यों को यह सब अच्छा न लगता। चुपके-चुपके माताजी की आलोचना होने लगी। बर्तनों में मुँह डाल देंगे, खाना झूठा करेंगे तब पता चलेगा तब जीव-दया महंगी पड़ेगी। आलोचना तो होती रही लेकिन माताजी से सीधे-सीधे कहने का किसी को साहस नहीं होता था। इधर बिल्ली के बच्चे एक दूसरे को यदा-कदा माँ का स्तन समझकर काट लेते। इस तरह काटते रहने से उनके शरीर में तकलीफ हो गई। माताजी उन चारों को एक लकड़ी की टोकरी में रखकर पशु चिकित्सक को दिखाने ले गईं। डॉक्टर बोला, “बहिन जो इन्हें खुजली हो गई है, इन्हें फेंक दो। जानवर की खुजली मनुष्य को हो जाय तो बड़ी मुश्किल हो जाती है। इस गंदगी का क्या करोगी?”
यह सुनकर माताजी का हृदय बेचैन हो उठा। काफी देर तक वह डॉक्टर से अनुनय-विनय करती रहीं, बोली खुजली की कोई अच्छी-सी दवा दे दो। डॉक्टर ने कहा, “छोटे हैं, दवा बर्दाश्त न कर सकेंगे।” फिर कुछ सोचते हुए उसने कहा, “अच्छा ये शीशी ले लो, रुई की फरहरी बनाकर दवा लगाना। दवा लगाकर हाथ साबुन से धोना।” माताजी बच्चों और दवा के साथ घर आ गईं। डॉक्टर की बताई विधि से उन्होंने दवा लगाई। बच्चे एक दूसरे से चिपट रहे थे। वे एक-दूसरे की दवाई चाट गए। रात को 7:00 बजे देखा उनमें से एक लंबा पड़ा था। माताजी रोने लगीं, बोलीं यह तो मर गई। कुछ देर तक रुआंसी सी घर का काम करती रहीं। थोड़ी देर बाद अपने बड़े लड़के से बोलीं, “ओमप्रकाश जरा तुम देखना।” उन्होंने देखा दूसरा बच्चा भी लंबा पड़ा है। दोनों लंबे चारों खाने चित्त पड़े हैं। दो चिपट रहे हैं। वह सब काम छोड़ कर दौड़ी भागी आयीं और रोते हुए बोलीं , “हाय ये भी मर गई। रात को नौ बजते-बजते तीसरा बच्चा भी लंबा हो गया, माता जी सुबक रही थीं।
घर के सभी लोग सो गए थे। वह अकेली बिल्ली के बच्चों को लिए बैठी थीं, इतने में चौथा भी मर गया। उन्होंने ओमप्रकाश को कई आवाजें दी, पास आकर झकझोरा, बड़ी मुश्किल से उनकी नींद टूटी। नींद खुलने पर उन्होंने पूछा बात क्या है? जवाब में वह रोते हुए कहने लगीं, “ओमप्रकाश वे चारों मर गईं। मुझ से बड़ा पाप हुआ। मैंने दवाई क्यों लगाई। मैंने चारों को मार डाला।” वंदनीय माताजी के दुःख की कोई सीमा न थी। सारी रात रोते-सुबकते कटी। सुबह होने पर उन्होंने बिल्ली के मृत बच्चों को रघुवीर (उस समय के प्रिंटिंग करने वाले) को देते हुए कहा, “बेटा इन्हें लाल कपड़े में बाँध लो।” चारों को अलग-अलग कपड़े में बाँधा गया। इन्हें लेकर रघुवीर जब चलने लगा तब उसे रोकती हुई वह बोलीं, “बेटे, इन्हें दूर यमुना जी में डालना, पशु की योनि से छूट जाएँगे।” उसके चले जाने पर
“माताजी भगवान से प्रार्थना करती रहीं कि इन आत्माओं को पशु योनि से मुक्ति मिले।”
किसी का भी कष्ट उन्हें व्याकुल और बेचैन किए रखता । वह बेचैनी जितनी मनुष्यों के लिए थी, उतनी ही अन्य प्राणियों के लिए। हो भी क्यों न, सभी उसी विश्व जननी की संतान ही तो हैं।
बिल्ली के मुँह में कबूतर:
एक दिन की घटना है कि माताजी छत पर, चटाई पर बैठी कुछ पढ़ रही थीं। यकायक उनकी नज़र एक बिल्ली पर पड़ी। बिल्ली के मुँह में एक कबूतर था। कबूतर के पंखों सहित पिछला हिस्सा बिल्ली के मुँह में था। उसकी पेट और गर्दन सुरक्षित थे। माताजी तुरंत समझ गईं कि कबूतर की जान बचाई जा सकती है। उन्होंने बिल्ली को घेर लिया। निकल भागने का एक ही रास्ता था और वह रास्ता उन्होंने घेर लिया। बिल्ली जिधर को मुड़ती वह उसी तरफ से “हुष” करतीं, बिल्ली भी कुछ कमजोर न थी। वह बराबर उछल-कूद मचा रही थी। वहीं पर एक चप्पल पड़ी थी, उन्होंने चप्पल उठाकर बिल्ली को मारी पर उसे लगी नहीं। खीझ से भरी बिल्ली ने उन्हीं के ऊपर छलाँग लगाई। पास में ही एक लकड़ी पड़ी थी, जिसे हाथ में लेकर उन्होंने बिल्ली को रोकने की कोशिश की। इस धमा-चौकड़ी में बिल्ली के मुँह से कबूतर छूट गया।
उन्होंने दौड़कर कबूतर उठा लिया। कबूतर के पेट में नीचे की तरफ बिल्ली के दाँतों से हुए घाव से खून निकल रहा था, बांया पैर भी घायल था, बेचारे की बड़ी ही बुरी हालत थी। माताजी काफी देर तक उसे अपने हाथ में लिए सहलाती रहीं । फिर प्रेमवती को पास बुलाकर बोलीं,“जा जल्दी से हल्दी लेकर आ।” प्रेमवती बोली, “माताजी कबूतर तो मरेगा। बिल्ली के दाँतों का जहर चढ़ेगा। हल्दी से कुछ होने वाला नहीं, तोते की बात और थी।”
एक क्षण के लिए मातजी का चेहरा उतर गया। फिर कुछ सोचकर उन्होंने कबूतर को कमरे में बंद कर दिया। कमरे में उसके लिए दाना-पानी रख दिया। दोपहर में तपोभूमि से कुछ साधक खाना-खाने के लिए आये। उन्हीं में डॉ. जी. के. पारिख भी थे। माताजी ने अपने कबूतर का दुख-दर्द उन्हें कह सुनाया। डॉ. पारिख अहमदाबाद के अच्छे सर्जन थे। कई आप्रेशन उन्हें रोज करने पड़ते लेकिन कबूतर का इलाज उन्होंने कभी नहीं किया था। खाना खाते हुए वह इस गूढ़ गुत्थी को सुलझाते रहे। मानो, आप्रेशन टेबल पर कोई मरीज मर रहा हो। डॉक्टर साहिब को,उनकी एम. एस. की डिग्री को, कबूतर चैलेंज कर रहा था,आखिर माताजी का कबूतर जो ठहरा।
डॉ. पारिख खाना खाकर बाजार चले गए। दवा, सिरिंज, मरहम न जाने क्या-क्या लेकर लौटे। जहाँ से खून निकल रहा था वहां कोई दवाई लगाई, बाद में इंजेक्शन लगाया। उनका यह क्रम तकरीबन पाँच दिन चलता रहा। धीरे-धीरे कबूतर पूर्ण स्वस्थ हो गया।
डॉक्टर ने कबूतर को अपने हाथ से उड़ाया। कबूतर पंख पसार कर आसमान की सैर करने लगा। उन्होंने चरण छूकर माताजी को प्रणाम किया और कहा कि वह अहमदाबाद के अमुक अस्पताल में सर्जन हैं। सिर्फ दो दिन की छुट्टी लेकर आए थे। अब आठवें दिन जाकर ड्यूटी ज्वाइन करेंगे। माताजी खुश होकर मुसकरायी और बोलीं, “बेटा! बना बात मैंने तुम्हें इतने दिन रोक लिया।”
पूज्य गुरुदेव का कुत्ता मन्टो:
कुछ समय बाद मथुरा में विदाई समारोह का भव्य आयोजन हुआ और माताजी गुरुदेव के साथ शांतिकुंज आ गयीं। यहाँ आकर उनकी ममता और व्यापक हो उठी। उनकी करुणा के सरित प्रवाह में असंख्य लोग स्नान करने लगे। मनुष्यों के अलावा इनमें कुछ अन्य प्राणी भी थे। इन्हीं में से था पूज्य गुरुदेव का कुत्ता मन्टो। भूटान के किन्हीं कर्नल साहब ने इसे गुरुदेव को भेंट दिया था। उस समय पूज्यवर अपनी तीसरी हिमालय यात्रा से वापस लौटे थे। शाँतिकुँज में प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों का सिलसिला चल रहा था। जो भी परिजन उन दिनों शाँतिकुँज आए हैं, उन्हें मन्टो की आन-बान-शान भूली न होगी। वह हमेशा गुरुजी के साथ रहता। सुबह जब वह प्रवचन देने के लिए जाते, मन्टों उनके आगे-आगे चलता। दोपहर में उनके पास सोफे पर बैठता। जमीन पर बैठना उसे पसंद न था। उसे माताजी का पर्याप्त लाड़-प्यार मिला। जब कभी उसे भूख लगती, दौड़कर माताजी के पास पहुँच जाता और अपना पेट दिखाकर भौंकने लगता जैसे कह रहा हो, मुझे जोर की भूख लगी है, जल्दी कुछ इंतजाम करो। उसका इशारा समझकर माताजी जल्दी ही कुछ खाने के लिए जुटा देतीं। जो धोती पहनकर आता, भारतीय वेषभूषा में गुरुदेव एवं माताजी के चरण स्पर्श करता उन्हें वह कुछ न कहता किंतु विदेशी पोशाक वालों पर भौंक कर तुरंत चेता देता कि अगली बार भारतीय वेश में आना। ऋषिसत्ता से मिलने के दो-तीन वर्ष तक वह माताजी का स्नेह सान्निध्य पाता रहा। बाद में वह मर गया। गुरुजी, माताजी ने उसे गंगा के दूसरी ओर बालू में गड़वा दिया।
पंकज नाम का खरगोश:
मन्टो के अलावा माताजी का स्नेह बटोरा पंकज नाम के खरगोश ने। उसे पंकज नाम माताजी ने दिया था। पंकज माता जी के हाथों से दूध पीता, उन्हीं के इर्द-गिर्द मंडराता रहता। जब कभी वह उछलकर उनकी गोद में चढ़ जाता और वह मुस्कुरा उठतीं। इस खरगोश को रूठना बहुत पसंद था और माताजी को मनाना। कुछ सालों तक वह उनके प्यार से तृप्त होता रहा। बाद में एक दिन मर गया। उस दिन माताजी खाना न खा सकीं। कई दिन तक उनके चेहरे पर उदासी छायी रही।
आज और पिछले कल के लेख का समापन निम्नलिखित सन्देश से बेहतर क्या हो सकता है :
रामायण काल में जब माँ सीता धरती पर आयी थीं, न जाने कितने बंदर भालुओं ने, गिद्ध , गिलहरी ने उनका प्यार पाया। आज के युग में सतयुग का अवतरण करने वाली परम शक्ति माँ भगवती के प्यार में, उनकी करुणा में, अनगिनत प्राणी सराबोर हुए। वह ठीक ही कहा करती थीं-प्यार-प्यार प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह, यही हमारी उपासना है। सो बाकी दिनों अब अपनों से अपनी बातें ही नहीं कहेंगे, अपनी सारी ममता भी उन पर उड़ेलते रहेंगे। शायद इससे हमारे बच्चों को यत्किंचित् सुखद अनुभूति मिले। प्रतिफल और प्रतिदान की आशा किए बिना हमारा भावना प्रवाह तो अविरल जारी रहेगा। अपने बच्चों को भरपूर स्नेह, यही इन बीते दिनों का हमारा उपहार है। जिसे कोई भुला सके तो भुला दे। हम कहीं भी रहें, शरीर रहे अथवा न रहे, धरती पर रहें या किसी और लोक में अपने बच्चों पर ममत्व और करुणा उड़ेलते रहेंगे।
जय गुरुदेव
