वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

वर्ष 2026 की “त्रिवेणी शताब्दी” को समर्पित एक और लेख श्रृंखला का 8वां  ज्ञानप्रसाद लेख: वंदनीय माताजी द्वारा गाय, वानर सेना एवं तोते के प्रति करूणा दर्शाता एक दिव्य लेख   

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के  अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के लिए हम ऐसी-ऐसी जानकारियां लेकर आ रहे हैं (यां यूँ कहें कि गुरुवर हमारे हाथों में थमा रहे हैं ) कि इतने समय से गायत्री परिवार के साथ जुड़े होने के बावजूद हम इन जानकारिओं से बिलकुल ही अनजान थे, ऐसे गुरु के चरणों में कैसे न अपना शीश झुकाएं ?

आज के ज्ञानप्रसाद लेख में परम वंदनीय माताजी की करुणा केवल मनुष्यों के प्रति न होकर ऐसे प्राणीओं के लिए दर्शाई गयी है जिन्हें स्वार्थी मनुष्य ने कुछ समझा ही नहीं है। वानर,गाय,तोते,बिल्ली, कबूतर आदि के प्रति करुणा भाव देखकर हम सहसा ही कह सकते हैं “माँ तुम तो साक्षात् करूणा की मूर्त हो। इन प्राणीओं के प्रति माँ का स्नेह एवं करुणा दर्शाता, आज का लेख कपिला गाय, वानर सेना एवं एक तोते की कहानी वर्णन कर रहा है। कल प्रकाशित होने वाले लेख में ऐसे ही कुछ अन्य प्राणीओं के बारे में माताजी का अपनत्व भरा स्वभाव वर्णित किया जायेगा। 

आज के लेख को चार चाँद लगाता, कवि एवं गायक प्रदीप का सुप्रसिद्ध गीत “पिंजरे के पंछी” उत्कृष्ट दिव्यता का आभास करा रहा है।

आइए आज के ज्ञानप्रसाद का अमृतपान करके अपने जीवन को सफल बनायें।

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भगवान वामन ने तीन कदमों में सारी दुनिया नाप ली थी। हम सबको भी यदि वंदनीय माताजी के व्यक्तित्व की गहराइयाँ तीन अक्षरों से नापनी हों, तो वे तीन अक्षर होंगे “करुणा”। यही उनका स्वभाव था। किसी के भी दुःख कष्ट को देखकर वह व्यथित  हुए बिना रह ही नहीं सकती थीं। उनकी उफनती भावनाशील नेचर मनुष्यों तक ही सीमित नहीं थी।  वह कहा करती थीं: 

Evolution एवं विकास के कारण अवश्य ही मनुष्य ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ राजकुमार है लेकिन अन्य प्राणीओं से भी प्रभु कोई कम प्रेम नहीं करते। हनुमान जी (वानर), जटाऊ (गिद्ध), जामवंत(भालू) आदि के योगदान को कोई कैसे भूल सकता है।  

वंदनीय माताजी के जीवन से देखा जा सकता है कि घर में जितना ध्यान परिवार के अन्य सदस्यों का रखा जाता था उतनी ही देखभाल पशु-पक्षियों की भी होती थी। इनकी बीमारी-आरामी, सेवा, सुश्रूषा में माताजी  कुछ इस तरह से जुटी रहतीं, जैसे ये सब उनके अपने ही  हों। खाने-पीने में भी इनका बराबर का ध्यान रखा जाता था।  कई बार तो वह अपने सामने की थाली यह कह कर दौड़ पड़तीं, “अरे देखो! अभी मैंने गाय के लिए इंतजाम नहीं किया और खुद खाने के लिए आ बैठी।”

गुरुदेव के 24 लाख के 24 महापुरश्चरण लगभग 24 वर्षों  में संपन्न हुए। इन वर्षों  में घर में हमेशा ही गौमाता की उपस्थिति बनी रही क्योंकि गाय की छाछ आदि की आवश्यकता अधिक रहती थी। इसके अलावा आचार्य जी गौयावक व्रत भी करते थे जिसमें गाय को जौ खिलाया जाता था, उसके बाद गाय के गोबर में जौ के जो दाने आ जाते, उनको बीनकर गौमूत्र में धोया जाता, फिर इन्हें सुखाकर-पीस कर एक छोटी-सी रोटी बनाकर छाछ के साथ गुरुदेव  खाया करते थे। यह क्रम लंबे समय तक चला।

इस व्रत के बारे में ऑनलाइन भांति-भांति की पोस्ट्स प्राप्त हो  जायेंगीं लेकिन कोई भी पोस्ट स्प्ष्टता से कहने में असमर्थ है।  

इस व्रत के लिए सारा इंतजाम माताजी स्वयं करती थीं। हर समय उनको गाय के चारे,पानी, सर्दी, गर्मी एवं  जौ देने की चिंता लगी रहती। आंवलखेड़ा वाले घर में एक कपिला गाय रखी  हुई थी, काले रंग की यह गाय बहुत सीधी थी। छोटे बच्चे तक उसके थन पकड़ लेते, फिर भी वह चुपचाप खड़ी रहती। घर में जब भी जरूरत होती उसका दूध निकाल लिया जाता था।  बार-बार दुहे जाने के कारण यह कहना कठिन है कि वह कितना दूध देती थी।

एक बार वह इतनी बीमार हो गई कि चारा खाना ही छोड़ दिया,गुमसुम खड़ी रहती थी। आंवलखेड़ा में कोई चिकित्सक तो था नहीं, दूसरे गाँव से बुलाया गया। उसने आयुर्वेद की कई दवाएँ दीं, लेकिन सुधार न हुआ। माताजी की परेशानी बढ़ गई। उन्हें खाना पीना अच्छा न लगता। हर समय यही सोचते बीतता कि गाय कैसे ठीक होगी। उन्हें इस तरह चिंताकुल-परेशान देखकर घर के सभी सदस्य हैरानी में थे उन सबको यह लग रहा था कि पशु तो बीमार होते ही रहते हैं, भला इसमें परेशान होने की क्या जरूरत है लेकिन  माताजी के लिए तो जैसे उनका कोई अपना आत्मीय बीमार था। उन्होंने बरहन (पास के गाँव) से चिकित्सक बुलाया। चिकित्सक ने बताया कि उसे गला घोटू नामक बीमारी है। उसके सारे प्रयासों का कोई खास असर न हुआ। गाय को जितना शारीरिक कष्ट था, माताजी की मानसिक विकलता उससे कहीं अधिक थी। परिवार के सदस्यों ने उनकी परेशानी देखकर आगरा से पशु चिकित्सक बुलाया। अपनी समझ में उसने अच्छी चिकित्सा की लेकिन अब तक गाय का पेट फूल चुका था। प्रातः काल 6:00 बजे वह जोर-जोर से साँस लेने लगीं लगभग 7:00  बजे एकादशी के दिन सबको अपने प्यार से वंचित कर कपिला गाय चिरनिद्रा में सो गई।

माताजी का तो जैसे सब कुछ ही लुट गया हो । वह फूट-फूट कर रो पड़ीं। ढकेल गाड़ी मँगाई गयी। बहुत बड़ा गड्ढा खोदा गया। गड्ढे में पहले माताजी  उतरीं गंगाजल छिड़का, गंगाजल छिड़कते समय वह गायत्री मंत्र पढ़ती जा रही थीं और बिलख-बिलख कर रोती जा रही थीं। गाय को उसमें उतारा गया।माताजी  अपने हाथों से उस पर लाल कपड़ा ओढ़ाया, गंगाजल छिड़का,अपने मस्तक को उसके पैरों पर रखा, फिर उस पर अपने हाथों से मिट्टी डाली। बाद में उस गड्ढे को मिट्टी से भर दिया। अंत में बालू बिछाई गयी जिस पर उन्होंने अपने हाथों से लिखा ‘श्रीराम’। यह सब करके वह घर तो आ गयीं लेकिन  कई दिन तक उनका मन अन्यमनस्क रहा। लगभग एक सप्ताह बाद वह ठीक से खाना खा सकीं।

कल वाले ज्ञानप्रसाद लेख में वर्णन किया गया था कि वंदनीय माताजी परिवार सहित आँवलखेड़ा से घीया मंडी स्थित अखंड ज्योति संस्थान मथुरा में शिफ्ट हो गयी थीं। साथिओं को स्मरण हो आया होगा कि हम उसी बिल्डिंग की बात कर रहे हैं जिसे भूतों वाली बिल्डिंग कहा गया था। 

यह कहना कठिन है कि इस बिल्डिंग में परिवार पहले आया यां वानर सेना। 1971 में जब गुरुदेव मथुरा छोड़कर शांतिकुंज आ गए तो वानर  भी घर छोड़ गए। जब तक वंदनीय माताजी इस  घर में  रहीं वानर पूर्ण स्वतंत्र होकर  दिवाली मनाते रहे। वानरों  का भी कमाल था, बीस-बीस वानर  घर की छत पर बैठे रहते, दीवारों पर इधर-उधर गश्त लगाते रहते लेकिन कोई शैतानी नहीं करते, घर का कोई कपड़ा बर्तन आदि  न उठाते। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि माताजी ने उन्हें पाल रखा हो, उनके अपने ही हों। माताजी  उनके लिए रोटी टुकड़े करके डाल देतीं, दाल,चावल और सब्जी एक निश्चित बर्तन में रख दी जाती। अपने लिए परोसे गए भोजन से सभी वानर पूर्ण रूप से संतुष्ट हो जाते। संस्थान में आने वाले साधक, मेहमान, रिश्तेदार, अतिथि आदि  तो वानर सेना  से बहुत डरते लेकिन घर के सभी लोग अभ्यस्त हो गए थे। वानरों ने कभी भी किसी को काटा नहीं। जब माताजी द्वारा बनाए-परोसे गए भोजन से ही उन्हें तृप्ति मिल जाती तब काटने-खीझने की जरूरत ही क्या थी?

माताजी का जीवों पर अबाध प्रेम था। उनके लिए सभी जीव उनके अपने थे। किसी की सेवा करतीं, तो किसी के साथ हंस खेल लेतीं, यदा-कदा चिढ़ा भी देतीं। हाँ पीड़ा-कष्ट किसी का भी हो माताजी की  भावनाएँ आँसू बनकर बहने लगतीं। 

इसी तरह का एक वृतांत तोते की भी है जिसका वर्णन किए बिना हम कहाँ रह पाएंगें। 

एक दिन हमारी माँ, वंदनीय माताजी  धूप में कपड़े सुखा रही थीं। गुरुदेव के साधना कक्ष के सामने खुली जगह थी। वहीं धूप में कपड़े सूखने के लिए डाल दिए जाते थे। अपनी धोती को तार पर फैला कर अभी माताजी हटी ही थीं कि आसमान से एक घायल तोता लुढ़क-पुढ़क करता हुआ आ गिरा। गिरे तोते की स्थिति देखकर माताजी ने समझा कि वह मर गया। उसकी गर्दन पर पीछे की तरफ गहरा घाव था जिसमें से  खून बह रहा था। तोते का मुँह फटा था,आँखें पथरा गयी थीं। 

माताजी ने  अपने गीले कपड़े वहीं छोड़ दिए। दोनों हाथों से धीमे से तोता उठाया, उसे खुली रसोई की छत पर ले आयीं। उसके मुँह में पानी डाला। इतने में गुलाब देवी “एजू” आ गई। पास आकर बोली अरे इसके तो खून निकल रहा है। माताजी ने उसे संबोधित करते हुए कहा तो देख क्या रही हो  उन्होंने कहा, जल्दी से हल्दी पीसकर ले आ। “एजू” हल्दी पीसकर ले आई। माताजी ने उसके घाव में हल्दी भर दी। तोता थोड़ा छटपटाया, माताजी यह जानकर खुश हो गई कि चलो अभी जिंदा है।

अपने पूर्वप्रकाशित ज्ञानप्रसाद लेखों में “एजू” की कहानी लिख चुके हैं,पाठकों को अवश्य ही स्मरण हो आया होगा क्योंकि हमारे पाठक कोई ऐसे-वैसे पाठक नहीं हैं, पूर्ण आत्मा से इन लेखों का अमृतपान करते हैं  

वंदनीय माताजी की रसोई में बचा हुआ भोजन रखने के लिए लकड़ी की जाली वाली एक Moveable अलमारी थी। माताजी ने बीच के शेल्फ में तोते को  रख दिया। बाद में ख्याल आया कि तोता अल्मारी में विष्ठा  करेगा, वहां तो खाना भी रखना होता है , तुरंत एक बड़ा सा  पिंजरा मँगाया गया और तोते को अलमारी से पिंजरे में शिफ्ट कर दिया। पिंजड़े में कटोरी रखी, जिसमें दाल, एक हरी मिर्च और अमरूद रखा। दूसरी  कटोरी में पानी भर कर रख दिया। पिंजड़े में तोता सिकुड़ कर बैठा हुआ था। माताजी ने शाम को फिर हल्दी लगाई। तीन-चार दिन यही क्रम चलता रहा। हर रोज वह पिंजरे की खिड़की खोलतीं, हल्दी लगातीं और वापस पिंजरे में बंद कर देतीं। धीरे-धीरे तोता पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया। रोज की तरह अब की बार भी उन्होंने खिड़की खोली, हल्दी लगाई। लेकिन इतने में उसने माताजी की उँगली जोर से काट ली, वह जोर से चीख पड़ीं। इतने में तोता हाथ से छूट कर उड़ गया। आसमान में तोते को उड़ते देखकर माताजी प्रसन्नता से हँस पड़ीं और बोली चलो, “अपनी सेवा काम कर गई।”

आज के लेख का समापन कवि प्रदीप के सुप्रसिद्ध गीत “पिजरे के पंछी” से कर रहे है, लेकिन यह समापन नहीं है,मध्यांतर है। कल के  ज्ञानप्रसाद में ऐसे ही कुछ और संस्मरण जानने का सौभाग्य प्राप्त होगा।  जिस गीत को आप इस समय देख रहे हैं, वोह त्रिलोक कपूर (पृथ्वीराज कपूर के छोटे भाई) पर फिल्माया गया था,कवि प्रदीप ने अनेकों गीतों की भांति इस गीत को भी अपनी दिव्य वाणी एवं लेखनी से अमर बना दिया,इस आत्मा को नमन करते हैं।  

जय गुरुदेव 


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