ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं। 88 पन्नों का यह स्मृति विशेषांक 40 पन्नों में ब्लैक एंड वाइट चित्र लिए हुए है, चित्रों की क्वालिटी Low होने के बावजूद बहुत सी जानकारी दर्शा रहे हैं।


आज इस दिव्य लेख श्रृंखला का 7वां लेख प्रस्तुतकिया गया है। प्रस्तुत लेख में उन दिनों का आँखों देखा हाल वर्णित किया गया है जब जगत जननी माँ विवाह करके आंवलखेड़ा की हवेली में आयी थीं, वहां थोड़े ही अंतराल के बाद मथुरा आ गयी थीं, गुरुदेव की दो हिमालय यात्राओं के समय परिवार की ज़िम्मेदारी, प्रकाशन का कार्य, तपोभूमि का संचालन एवं और न जाने कौन कौन से उत्तरदाईत्व संभालती माँ हमारे लिए एक आदर्श बनी रही है।
सभी लेखों की भांति इस लेख के लिए भी इस नाचीज़ लेखक का आग्रह है कि इसका अमृतपान आत्मा के स्तर से करें, अपनी आँखों के सामने आंवलखेड़ा की हवेली, घीआ मंडी का अखंड ज्योति संस्थान देखते हुए करें, फिर देखें आपकी ऊर्जा कहाँ से कहाँ पंहुच जाती है, यह अमृत, मृत शरीर में प्राणों का संचार करता है कि नहीं। हमारे व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार इन लेखों के अमृतपान से ऊर्जा के फव्वारे का प्रस्फुटित होना सुनिश्चित है।
तो आइए सभी गुरुशिष्य, गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर उस गुरुज्ञान का अमृतपान करें जिससे जीवन जीने की कला सीखने का सौभाग्य हो रहा है।
**********************
परम वंदनीय माताजी बता रही हैं कि अगर परिवारों में आपस की समझदारी हो तो घर-परिवार का हर दिन खुशियों का त्योहार बन जाता है। उनका सारा जीवन इसी समझदारी को अपनाने/सिखाने में बीतता रहा। पूज्य गुरुदेव के साथ दाँपत्य सूत्र में बँधते ही वंदनीय माताजी एक बड़े परिवार में आ गईं। घर में गुरुदेव के तीन बड़े भाई-भाइयों की पत्नियाँ और बच्चों का समूह, कुल मिलाकर बड़ा कुटुँब था। इतने बड़े परिवार का संचालन सूत्र गुरुदेव की माँ (जिन्हें सब ‘ताई जी’ कहते थे) के हाथों में था। ताई ऊँचा कद, गौर वर्ण, तेज आवाज, और विशाल-पुष्ट शरीर के साथ-साथ स्वयं अपनी ऐसी शान और दबाव लिए हुए थीं कि हर कोई देखते ही प्रभावित हो जाता। संलग्न चित्र अवश्य देखें एवं नमन करें। अंतःकरण से अतीव कोमल होते हुए भी ताई जी स्वभाव से प्रशासक (Administrator) थीं। समूची जमींदारी के क्रियाकलाप उन्हीं के मार्गदर्शन में चलते थे। लड़कों, बहुओं और परिवार के सदस्यों पर उनका रोब था।
आंवलखेड़ा स्थित हवेली में, हमारी सबकी माँ, वंदनीय माताजी का प्रथम दिन बड़े परिवर्तन का दिन था। मायके की परिस्थितियाँ ससुराल से बिलकुल अलग थीं। माँ का साया बचपन में ही उठ जाने के कारण पिता जसवंत राय ने बड़े लाड़-दुलार से उन्हें पाला था। घर में छोटी होने की वजह से भाई-बहनों की प्रीति-वर्षा भी कुछ कम नहीं थी। ससुराल में जाकर किसके साथ कैसा व्यवहार करना है? परिवार में कौन सी समस्या कब उठ खड़ी हो, उसके क्या समाधान खोजने हैं? आदि शिक्षाएं उन्हें न मिल पायीं थीं। माँ के अभाव में इन छोटी-छोटी लेकिन बेहद जरूरी बातों को सिखाता भी कौन? ससुराल में सबसे छोटे होने का एक ही मतलब होता है:
“कर्तव्यों की भरमार,अधिकारों का अभाव।”
पारिवारिक जीवन की इस शुरुआत के साथ ही उनके सामने कुछ अन्य कसौटियाँ भी थीं जिन पर अनेकों रगड़ें खा कर अपना खरापन साबित करना था। इन्हीं में से एक कसौटी,गुरुदेव के पहले विवाह की संतानें, बेटा ओमप्रकाश और दो बेटियां श्रद्धा और दया थीं। माताजी के आने के समय ये तीनों बच्चे भोलेभाले अबोध थे। माँ की छत्रछाया बचपन से ही हट जाने के कारण तीनों के मन प्यार के भूखे थे। गुरुजी की अपनी सामाजिक व्यस्तताएँ थीं। स्वतंत्रता आँदोलन का जोर-शोर, समाज सुधार की बढ़ती प्रवृत्तियाँ, साधना के नित नए आयामों का विकास। ऐसे में वे अपने बच्चों से प्यार भले ही कितना करते रहे हों लेकिन सान्निध्य-सामीप्य के अवसर तो दुर्लभ ही थे।
व्यस्तता की बेबसी को बाल-मन कहाँ समझ पाता है। बार-बार रूठने की तो उसकी प्रवृति होती है और हर बार रूठ कर वह यही सोचता रहता है, उसे कोई मनाए, प्यार-दुलार करता रहे। यद्यपि ताई जी अपने ढंग से तीनों बच्चों की इस चाहत को पूरा करती भी रहती थीं लेकिन माँ के प्यार पाने की ललक-कसक का क्या किया जाए। इसके साथ ही बाल-मन में उठने वाले संदेह भी थे, बचकाना जिदें भी थीं। माँ का ममत्व ही इन सभी समस्याओं का समाधान था।
पारिवारिक जीवन में प्रवेश के साथ ही माताजी को यह चुनौती स्वीकार करनी पड़ी।
इसके साथ कुछ ऐसे अड़ोसी-पड़ोसी भी थे जिनके बारे में गोस्वामी तुलसीदास की भाषा में कहें तो “जे बिनुकाज दाहिने बांए” अर्थात् जो अकारण की टिप्पणियाँ बड़ी मर्माहत करने वाली थीं। इन टिप्पणियों का आरम्भ तो उसी समय से हो गया था जिस क्षण माताजी बहू बनकर डोली से उतरीं।
एक पड़ोसन बोली:अरे ये तो ऊँट बकरी की जोड़ी है।
दूसरी का स्वर था: भाई, साँवली तो बहुत है, उस पर चेहरे पर माता के दाग भी हैं।
ऐसे न जाने कितने स्वरों को शाँत करते हुए माताजी की जिठानी बोली: हमारे घर की बहू भगवती है, किसी दिन इसके पैर छुओगी।”
इन शब्दों के साथ ही वह उन्हें घर ले गईं। घर पहुँच कर सबसे एक-एक करके परिचय हुआ।
माताजी के प्रथम दर्शन को बताते हुए बेटे ओमप्रकाश जी की यादें बहुत जीवंत हैं। ओमप्रकाश जी बताते हैं:
“माता जी उस समय गुलाबी साड़ी पहने थीं जिस पर सोने का काम हुआ था। मस्तक पर टीका, नाक में नथ और गले में हार पहने थीं। हाथों में सोने के कंगन, पैरों में पाजेब, बिछवे और गहरे लाल रंग की चप्पल पहने थीं। एक बदामी रंग की चद्दर ओढ़े थीं। गाँव की परंपरा के अनुसार घूँघट निकाले हुए थीं।
हम तीनों भाई बहिन एक-एक कर चुपके से जाते और इधर-उधर दूर-दूर चक्कर लगाकर लौट आते। मुस्कराकर कहते:
ये तो बड़ी पतली हैं, छोटी हैं,थोड़ी-थोड़ी साँवली हैं। दया कहती, इनके हाथ कितने छोटे हैं, मुँह तो गोल है। दया, जो फ्रॉक पहने थी हिम्मत करके पास खड़ी हो गई। माताजी ने हाथ पकड़ कर अपने पास बिठा लिया। मेरे मन ने भी ज़ोर मारा, मैं भी उनके पास खड़ा हो गया। पास में खड़ी ताई जी तेज़ आवाज में बोली:
देख क्या रहा है, पैर छू। मैंने पैर छू लिए। माताजी ने प्रेम से हाथ पकड़ा और पास बिठाते हुए बोली:
तुम्हारा नाम क्या है? कौन-सी क्लास में पढ़ते हो। मैंने कहा,मेरा नाम ओमप्रकाश है और मैं कक्षा 5 में पढ़ता हूँ।
ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के पाठकों को स्मरण हो आया होगा कि ओमप्रकश जी की बातें इस मंच पर अक्सर होती रहती हैं, इस मंच पर अभी कुछ वर्ष पूर्व ही उनके महाप्रयाण की बात भी हुई थी।
ममत्व के प्यासे बच्चों का अपनी दूसरी माँ से इतना ही प्रथम परिचय था ।
माँ और बच्चों के पारस्परिक संबंध, सगे और सौतेलेपन की रेखा से विभाजित नहीं किए जा सकते। सामाजिक मान्यताओं की ऊपरी सतह से हटकर गहराइयों में भावनाओं की वत्सलता में इनका पोषण होता है। यहाँ वही था जिसे माँ ने अनुभव किया, बच्चे भी अनुभव कर रहे हैं।
पहले ही दिन से माताजी ने अपने स्वजनों को जो अपनत्व एवं आत्मीयता दी, उसे पाकर सबके सब उनके प्रशंसक होते चले गए। माताजी की भतीजी,शीलावती, उन स्नेह स्मृतियों को समेटते-बटोरते कहती हैं:
चाची की तत्परता देखते ही बनती थी,परिवार बड़ा था, बच्चों से लेकर बड़ों तक सबकी अलग-अलग फरमाइशें थीं। सबके स्वभाव के अनुरूप अपने को ढाल लेना कुछ सरल कार्य नहीं था लेकिन चाची को इसमें जैसे महारथ हासिल थी। हर कोई यही समझता कि वह उसी का सबसे ज्यादा ध्यान रखती हैं। ताई जी तो जैसे उन्हीं पर निर्भर हो गयीं। हर काम के पहले यही कहतीं:छोटी बहू से पूछ ले। सास-बहू के रिश्तों में इतनी मधुरता शायद ही कहीं अन्यत्र मिलें।
आँवलखेड़ा में माताजी का निवास अधिक दिनों तक नहीं रह सका। देश स्वतंत्र होने की ओर अग्रसर था। गुरुदेव की गतिविधियाँ राष्ट्र-मुक्ति की ओर से हटकर समाज मुक्ति की ओर मुड़ने लगीं। कुरीतियों, कुप्रथाओं,मूढ़मान्यताओं से बंधे समाज को मुक्त कराने के लिए गुरुदेव का रोम-रोम दीवाना हो रहा था। उन्होंने अपने अभियान की प्रथम केन्द्र स्थली मथुरा को चुना। स्वभावतः इसका असर उनके पारिवारिक जीवन पर भी आया। माताजी तीनों बच्चों को लेकर मथुरा आ गईं ।
मथुरा में आरंभ किया गया पारिवारिक जीवन आँवलखेड़ा की तरह सुविधाओं से भरा-पूरा न था। यहाँ जमींदारी की संपन्नता न थी। यद्यपि यह गरीबी स्वयं की ओढ़ी हुई थी फिर भी गरीबी तो गरीबी ही है। इस स्वतः अपनाई गई गरीबी में भी उन सारे अभावों का अनुभव मौजूद था, जो किसी गरीब के जीवन में होता है। हाँ ऋषिकल्प मनःस्थिति ने गरीबी को कभी पास नहीं फटकने दिया।
मथुरा के जीवनकाल में ही स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद माताजी की अपनी कोख से भी दो संतानें, मृत्युंजय (1949) और शैलबाला (1953) ने इस संसार में कदम रखे, इस तरह कुल मिलाकर सात लोगों का परिवार हो गया। गुरुदेव का अधिकांश जीवन तप-साधना, सामाजिक क्रियाकलापों एवं अध्ययन लेखन में बीतता रहता। अपने व्यस्त जीवन में शायद ही कुछ क्षण वह परिवार को दे पाते हों। कुल मिलाकर परिवार का संचालन-भार माताजी पर ही था। पिता का प्यार और माँ का दुलार दोनों उन्हें ही जुटाने पड़ते थे।
गुरुदेव और माताजी के दाँपत्य जीवन की तुलना यदि की जा सकती है तो वह शिव-पार्वती ही हैं। निताँत विरक्त, भगवान शिव तो प्रायः तपोलीन, समाधि निमग्न ही रहते हैं। माँ पार्वती को ही गणेश, कार्तिकेय के साथ अन्य गणों की भी सार-सँभाल करनी पड़ती है। यहाँ भी कुछ वैसा ही था। परेशानियां कम नहीं आयीं लेकिन उन्होंने अपनी कठिनाइयों, मुसीबतों का रोना रोकर कभी गुरुदेव को तप से विरत करने की चेष्टा नहीं की। अभाव के इस दौर में कुछ क्षण ऐसे भी आए जब माँ का ममत्व छटपटा उठा।
ऐसी ही एक घटना उस दिन हुई जब उनकी छोटी बेटी शैलबाला (हमारी शैल जीजी) ने रास्ते में एक रूपए का सिक्का गिरा हुआ पाया। एक रुपये के इस सिक्के को देखकर उनका बचपन गुब्बारे, खिलौने के लिए मचल उठा। उन्होंने सोचा की गिरे हुए सिक्के को उठा लेना कोई चोरी तो नहीं है। उन्होंने सिक्का उठाया, दुकान जाकर गुब्बारे, खिलौने खरीदे और प्रसन्न मन से घर पहुंची।
घर पहुँचने पर माताजी की पहली दृष्टि उनके हाथों में थमे गुब्बारों और खिलौनों पर पड़ी। घटना का विवरण पूछने पर शैल बेटी ने सत्य बता दिया। सब कुछ सुनकर एक बार तो माँ का हृदय तो तड़प उठा कि यदि हम खिलौने दे सकते तो बच्चे के मन में लालच क्यों आता लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने स्वयं को संयत करते हुए कहा:
बेटी,इन सब चीजों को वापस कर आओ और पैसे को किसी मंदिर में डाल दो। 6-7 वर्ष की बालिका ने आश्चर्य से कारण पूछा एवं कहा कि मैंने तो कोई चोरी नहीं की, मुझे तो सड़क पर पड़े मिले थे। माँ ने कहा कि पड़े मिले तो क्या, बिना मेहनत का पैसा चोरी का ही होता है। बेटी को बात समझ में आ गई, गुब्बारे/खिलौने वापस किए और पैसा मंदिर में चढ़ा दिया
प्रकाशन के साथ ही सात लोगों का छोटा सा परिवार बड़े अखंड ज्योति परिवार का रूप ले रहा था। इसी के अनुरूप लोगों का आना-जाना भी बढ़ रहा था। इसी बीच गुरुदेव के साधनात्मक प्रयास भी तीव्र होते जा रहे थे। दो हिमालय यात्राएँ भी मथुरा के जीवनकाल में ही हुईं।
गुरुदेव की हिमालय यात्राओं के दौरान वंदनीय माताजी ने ही पत्रिकाओं के प्रकाशन एवं गायत्री तपोभूमि की देखरेख का काम बड़ी ही खूबसूरती के साथ सँभाला। पत्र-लेखन और कार्यालय के कामकाज के साथ उन्होंने बच्चों को किसी बात की कमी खटकने नहीं दी,न ही गुरुदेव को अनुभव होने दिया कि उनका कार्य विस्तार उनके एकाँतवास के कारण मंद पड़ जाएगा और न ही गायत्री परिवार के सदस्यों को इस बात का एहसास होने दिया कि उनके संरक्षणदाता उनके बीच नहीं हैं।
माताजी के पास आज के युग की लड़कियों की तरह भारी भरकम डिग्रियाँ तो नहीं थी लेकिन वह सूझ-समझ अवश्य थी जिससे उन्होंने अपने परिवार को नित प्रफुल्लित बनाए रखा। शाँतिकुँज के निवास काल में उन्होंने बाहर से आए हुए एक कार्यकर्ता को समझाते हुए कहा था:
बेटा! घर-परिवार झंझट बोझ नहीं है। बोझ मानकर इसे छोड़ देने से कोई साधक नहीं बना करता। हमने भी साधना की है लेकिन अपने घर को तपोवन बनाकर। गृहस्थ जीवन में आने वाली तकलीफें, परेशानियां साधनात्मक जीवन की कठोर तप-तितिक्षा ही हैं जिसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारने पर व्यक्तित्व कुँदन की तरह चमक उठता है। हमने तो परिवार को छोड़कर भागने एवं उसे घटाने की जगह बढ़ाया ही बढ़ाया है। पहले ओमप्रकाश, दया, श्रद्धा, सतीश (मृत्युँजय), शैल, मैं और गुरुजी ही हुआ करते थे, फिर हुआ अखण्ड ज्योति परिवार हुआ जिसमें 10-20 हजार लोग रहे होंगे। अब तो हो विश्व्यापी गायत्री परिवार हो गया है जिसकी संख्या लाखों को पार कर करोड़ों में पहुँच रही है।
इस मतस्यावतार जैसे विस्तार के पीछे उदारता और सहिष्णुता की भावना ही रही है।
भावना हृदय की आँतरिक वस्तु है। यदि हम झूठे भाव से अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच अपनत्व, उदारता और त्याग का भाव प्रदर्शन करना चाहेंगे तो कभी न कभी हमारी पोल खुल ही जाएगी।पोल खुलने पर परिवार के सदस्यों का दृष्टिकोण हमारे प्रति गलत हो जाएगा। यदि भावना सच्ची है तो जिनका दृष्टिकोण अपने प्रति गलत भी है तो उसमें भी देर-सबेर सुधार आ ही जाएगा। हमने सदैव यही किया है और हम चाहते हैं अपने मिशन का हर परिवार हमारी ही तरह अपने परिवार को नंदनवन बना ले जिसमें हर रोज़ खुशियों के फूल खिल सकें।
आज के लेख का समापन
जय गुरुदेव