ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से वर्तमान लेख श्रृंखला के अंतर्गत परम वंदनीय माता जी के अवतरण,परम पूज्य गुरुदेव की साधना एवं अखंड दीप के प्राकट्य की तीन शताब्दिओं को समर्पित ज्ञानप्रसाद लिखे जा रहे हैं।
वर्तमान लेख श्रृंखला का आधार अखंड ज्योति का फरवरी 1995 का “मातृस्मृति विशेषांक” है जिसमें अनेकों उत्कृष्ट लेख प्रकाशित हुए हैं। 88 पन्नों का यह स्मृति विशेषांक 40 पन्नों में ब्लैक एंड वाइट चित्र लिए हुए है, चित्रों की क्वालिटी Low होने के बावजूद बहुत सी जानकारी दर्शा रहे हैं।
इसी अंक में “नारी जाग्रति अभियान” पर एक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें ऐसे-ऐसे संस्मरण प्रस्तुत किये जिन्हें पढ़कर कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
पिछले ज्ञानप्रसाद लेख में पांच महिलाओं (फूलवती, प्रेमवती, कौशल्या, रतन एवं नारायणी) से आरम्भ होने वाले “गायत्री परिवार के पहले महिला मंडल” का वर्णन था। महिला मंडल का शुभारम्भ होना और उसे आज की स्थिति तक लेकर आना, दो अलग-अलग पहलु हैं। संगठन/मंडल/संस्थाएं आदि बन तो जाती हैं लेकिन उनका पोषण होना बहुत ही कठिन कार्य है। उसी कठिन कार्य ने “जागेगी भाई जागेगी नारी शक्ति जागेगी” के उद्घोष को “जाग गई भाई जाग गई, नारी शक्ति जाग गई” में परिवर्तित करके अपनी माँ का सपना पूर्ण करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई है। ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार की सभी महिलाओं को हम सादर नमन करते हैं।
आज के ज्ञानप्रसाद लेख में दो अद्भुत वीडियोस संलग्न की हैं। एक वीडियो मात्र 10 मिंट अवधि की है जिसमें ब्रह्मवादिनी घोषा अपाला के बारे में बताया गया है। कौन है घोषा अपाला और उनका आज के लेख से क्या सम्बन्ध है, वोह तो आपको वीडियो देखकर ही पता चलेगा लेकिन जब हमें घोषा अपाला के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तो सर्च करने पर एक वीडियो प्राप्त हुई जिसे परिवार में शेयर करना अपना कर्तव्य समझते हैं, हमने तो यह वीडियो तीन बार देखी है,आशा है पाठकों के लिए भी यह अद्भुत जानकारी साबित होगी। देवराज इंद्र द्वारा तीन बार अपाला की चमड़ी का उतारना एवं उस चमड़ी से तीन प्रकार की प्रजातिओं का जन्म होना अपनेआप में रहस्य्पूर्ण तो है ही लेकिन हमारे मस्तिष्क ने इस पुर्नजन्म को श्रद्धेय डॉ साहिब से जोड़ने का प्रयास किया।
परम पूज्य गुरुदेव श्रद्धेय डॉ साहिब को शांतिकुंज आने के लिए, गायत्री परिवार के लिए समर्पित होने को कई बार कह चुके थे लेकिन हर बार आनाकानी ही होती रही। एक बार श्रद्धेय जी का गंभीर एक्सीडेंट हो गया, हरिद्वार की सिटी बस में उन्हें किसी तरह शांतिकुंज के गेट नंबर 2 पर लाया गया। परम पूज्य गुरुदेव अपने कक्ष से दौड़े-दौड़े आये और डॉ साहिब को देखकर कहने लगे अब तू कहीं नहीं जायेगा, अब तेरा पुनर्जन्म हो गया है।
साथिओं से क्षमाप्रार्थी हैं कि गुरुदेव के विशाल साहित्य में इस घटना का वर्णन तो अवश्य है लेकिन हम इस समय इसे ढूंढ पाने में असमर्थ हैं। वर्षों पूर्व हमने इस घटना पर आधारित एक लेख भी लिखा था।
अपाला की दिव्य वीडियो में विज्ञान का अति महत्वपूर्ण सिद्धांत Law of Conservation of Energy प्रमाणित हो रहा है। इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण एनर्जी कभी भी खत्म नहीं होती, यह एक फॉर्म से दूसरी फॉर्म में परिवर्तित होती रहती है। हम भोजन की फॉर्म में केमिकल एनर्जी ग्रहण करते हैं जो बायोलॉजिकल प्रोसेस से मैकेनिकल एनर्जी में परिवर्तित होती है जिससे हम दिन भर काम कर पाते हैं।गाड़ी में डाला जाने वाला पेट्रोल केमिकल है जो जलने पर मैकेनिकल एनर्जी पैदा करता है जिससे गाड़ी चलती है, ऐसे अनेकों उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन इसे यहीं पर रोकना उचित रहेगा।
दूसरी वीडियो थोड़ी लम्बी है, एक घंटे से भी अधिक लेकिन हम इसका आरंभिक भाग देखने के कह रहे हैं। इस भाग में आप देख सकते हैं कि गायत्री परिवार की सुशिक्षित बहिनें देवमंच पर विराजमान कैसे सारे आयोजन का संचालन कर रही हैं। स्पष्ट दिख रहा है कि वंदनीय माताजी द्वारा मथुरा में आरम्भ किया गया पांच बहिनों का महिला मंडल किस उच्च शिखर पर जा पंहुचा है।
मातृ दिवस पर लिखा जा रहा यह ज्ञानप्रसाद लेख संयोग न होकर माँ का दिव्य सन्देश ही है।
तो आइए सभी गुरुशिष्य, गुरुकुल की आज की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में समर्पित होकर उस गुरुज्ञान का अमृतपान करें जिससे जीवन जीने की कला सीखने का सौभाग्य हो रहा है।
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गायत्री महाशक्ति की उपासना का क्रम और कुछ नहीं प्राचीन मापदंडों का नवीनीकरण है । वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग तक के साहित्य को खंगालने से पता चलता है कि नारी शक्ति क्या है। गायत्री उपासना ही नारी शक्ति को महाशक्ति बनाने का उपक्रम था। गुरुदेव ने इस दिशा में संकल्प ले लिया था कि गायत्री साधना से आत्मबल प्राप्त करके महिलाएँ समाज में अपना बहुमुखी विकास कर सकें।
इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर शाँतिकुँज की स्थापना हुई। इस भावपूर्ण प्रयास को गुरुदेव के शब्दों में निम्नलिखित कहा जा सकता है:
“शांतिकुंज की स्थापना का मूल प्रयोजन माताजी के मार्गदर्शन में महिला जागरण अभियान का आरंभ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष को अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना है।”
शाँतिकुँज की स्थापना के तुरंत बाद पूज्य गुरुदेव तो तप साधना के लिए हिमालय चले गए थे। माताजी ने नारी के अभ्युदय एवं विकास के लिए अनवरत साधना का क्रम अपनाया। उन्होंने अनेकों कन्याओं को इसमें भागीदार बनाया। पहले इन लड़कियों की संख्या 4 थी, बाद में 24 हुई, बाद में बढ़ते-बढ़ते 100 से भी अधिक पहुँच गई। साधना के साथ इन लड़कियों के शिक्षण का काम भी माताजी स्वयं संपन्न करती रहीं। शिक्षण के इस क्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ संगीत, कर्मकाण्ड, पौरोहित्य के साथ वक्तृत्व कला का भी समुचित स्थान रहता।
उन दिनों शाँतिकुँज का कलेवर इतना बड़ा न था। सिर्फ दो-तीन कमरों का छोटा सा परिसर था। आसपास वनप्रांत था, निकट में बहती गंगा की जलधारा थी । इस सब की सुरम्यता अनुभव करने योग्य थी।
शब्दों में भला वह सामर्थ्य कहाँ कि इस सुरम्यता को वर्णन कर सकें। जैसे-जैसे लड़कियों की संख्या बढ़ती गई नए भवन भी विनिर्मित होते गए। बाद में गुरुदेव के वापस आने पर विधिवत “देवकन्या प्रशिक्षण विद्यालय” आरंभ किया गया। जिसकी मुख्य अधिष्ठात्री भी माताजी स्वयं थीं।
उनके द्वारा प्रशिक्षित की गई कन्याओं ने सारे देश में कार्यक्रम संपन्न करके नए कीर्तिमान स्थापित किए। 15 से 18 वर्ष की इन भोली-भाली, मासूम कन्याओं का उद्बोधन सुनकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते।
ऐसा ही एक कार्यक्रम लखनऊ में संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम में उस समय के उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल एम. चन्ना रेड्डी भी उपस्थित हुए। कार्यक्रम की समाप्ति पर वह इन कन्याओं से मिले एवं पूर्ण जानकारी प्राप्त की। जानकारी मिलने पर उन्होंने कहा:
आप लोगों के कार्यक्रम ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मैं माताजी एवं गुरुजी से मिलने शाँतिकुँज जरूर आऊँगा और कुछ समय बाद वोह आए भी। माताजी से मिलने पर बड़े भाव विह्वल स्वर में बोले:
धन्य हैं आप, जिन्होंने ऐसी कन्याएँ प्रशिक्षित कीं। वैदिक साहित्य में “घोषा अपाला” के बारे में पढ़ा था,आज देख भी लिया।
देवकन्या प्रशिक्षण के साथ वंदनीय माताजी ने पूज्य गुरुदेव के सहचरत्व एवं संरक्षण में विधिवत नारी जागरण अभियान शुरू किया। इसे शुरू करते हुए उन्होंने कहा:
हमारे नारी जागरण का मतलब है संवेदनाओं का जागरण और भावनाओं का विकास। इसे पश्चिम का “नारी मुक्ति आँदोलन” समझने की भूल नहीं करनी चाहिए जिसके अंतर्गत नारी पुरुष बनने के लिए उतारू है। पुरुषों ने पहले ही क्या कम उलझने पैदा कर रखी हैं? नारियों को पुरुष बनाकर कुछ भी सुलझाया नहीं जा सकता। इन्हें सुलझाने के लिए तो महिलाओं को अपने अंदर मातृत्व का विकास करना होगा।
इंटरनेट पर सर्च करने पर “पश्चिम के नारी मुक्ति आंदोलन (Women liberation revolution) के बारे में जानकारी मिलती है लेकिन माताजी नारी जागरण की बात कर रही हैं न कि नारी मुक्ति की। 1990 से भारत में भी नारी मुक्ति संघ जैसी संस्था कार्यरत है जो अधिकतर बिहार और झारखण्ड जैसे क्षेत्रों में सक्रीय है। खैर, इस विषय को यहीं पर रोककर आगे बढ़ना उचित रहेगा।
नारी जागरण के बारे में पिछले लेख में आदरणीय अरुण जी का कमेंट बहुत ही सार्थक है:
नारी जागरण का काम बहुत ही तेजी से आगे बढ़ रहा है,आज “अखिल विश्व गायत्री परिवार” में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की ही सक्रियता देखने को मिलती है। “जागेगी भाई जागेगी नारी शक्ति जागेगी” का उद्घोष पुराना हो गया है, अब तो “जाग गई भाई जाग गई, नारी शक्ति जाग गई” का प्रचलन है
परम वंदनीय माताजी ने अपने “नारी जागरण अभियान” के क्रियाकलापों को चार भागों में बाँटा:
(1) साहित्य प्रकाशन (2) नारी शिक्षण सत्र (3) संगठन द्वारा संघ शक्ति का उदय (4) रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यापक विस्तार।
माताजी द्वारा चलाया गया यह सिलसिला अभी तक चल रहा है। हमारी माँ भले ही आज स्थूल रूप से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका शक्ति-प्रवाह यथावत है। इस शक्ति-प्रवाह से ऊर्जा पाकर “नारी जागरण अभियान” की गति और अधिक तेज हुई है।
नारी जागरण का एक साक्षात् प्रमाण हम सब रोज़ाना ही शांतिकुंज की यज्ञशाला में देवमंच पर विराजित बहिनों को देखते हैं। इस तरह के न जाने कितने ही दृश्य देखने को मिल जायेंगें लेकिन 1995 का “आँवलखेड़ा पूर्णाहुति समारोह” का क्लिप अवश्य ही शेयर होना चाहिए।
एक वोह समय था जब नारी को गायत्री उपासना के लिए प्रतिबंध था और आज का समय है जब शाँतिकुँज में प्रशिक्षित ब्रह्मवादिनी महिलाओं द्वारा विराट यज्ञ का संचालन किया जा रहा है।
ब्रह्मवादिनी महिलाओं द्वारा उठाया गया यह कदम,वंदनीय माताजी द्वारा शुरू किए गये कार्य का ही विराट विस्तार है जिसे देखकर हर कोई कह सकता है:
नारी ब्रह्मविद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्रता है, कला है और वह सब कुछ है जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धि है, ऋद्धि है और वह सब कुछ जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, कष्टों एवं संकटों को निवारण करने में समर्थ है। यदि उसे श्रद्धा सद्भावना के साथ सींचा जाय तो उसकी कोमलता विश्व के कण−कण को स्वर्गीय परिस्थितियों से ओत-प्रोत कर सकती है।
आज के लेख का समापन होता है
जय गुरुदेव
