यज्ञों पर आधारित लेख श्रृंखला का प्रथम लेख 

श्री वेदमाता गायत्री ट्रस्ट शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा प्रकाशित श्रद्धेय डॉक्टर प्रणव पंड्या और आदरणीय ज्योतिर्मय जी की बहुचर्चित  पुस्तक “चेतना की शिखर यात्रा पार्ट 2 के उस चैप्टर पर जब हमारी दृष्टि पड़ी जिसका शीर्षक था “शीश दिए  प्रभु मिले” तो  एकदम सारे शरीर में बिजली सी कौंध गयी। सिख धर्म के 10वें गुरु, खालसा पंथ के संस्थापक गुरु गोबिंद सिंह जी का वह दृश्य एक चलचित्र की  भांति घूम गया जिसमें गुरु ने पांच शीर्ष याचना किये थे। क्या यह चैप्टर भी  कुछ उसी प्रकार  के कंटेंट को केंद्रित है ? इस जिज्ञासा ने ऐसी प्रेरणा दी  कि कई दिनों तक बार-बार इस चैप्टर के  21 पन्नों का स्वाध्याय किया, कितने ही अंक अखंड ज्योति के पढ़ डाले, गूगल  से कितनी  ही पोस्ट्स पढ़ लीं, वीडियोस देख लीं तो  यज्ञों पर आधारित इस  लेख श्रृंख्ला को प्रस्तुत करने की योजना बन पायी जिसका प्रथम पार्ट  इस समय आपके हाथों में है। 

भारतीय परिवारों  में बच्चों  को कथा-कहानी सुनाने की परिपाटी बहुत ही  प्राचीन है। छोटे-छोटे बच्चे  प्रायः सोने से पूर्व अपने  दादी-दादा से,नानी-नाना से  कहानी सुनाने का अनुरोध किया  करते थे और बुज़ुर्ग  उनको छोटी-छोटी शिक्षाप्रद, मनोरंजक कहानियां सुनाकर अप्रत्यक्ष रूप में धर्म तथा नीति के तत्वों की जानकारी कराया करते थे।  हमने सबने इस सुगन्धित वातावरण का अवश्य ही किसी न किसी समय अनुभव किया होगा। आधुनिक कल पुर्ज़ों के युग “कलयुग” में  यह प्रथा कम होती जा रही है ( लगभग खत्म होती जा रही है !) क्योंकि  मनोरंजन के अन्य कई  साधन उत्पन्न हो गए हैं  और छोटी आयु से ही स्कूली शिक्षा का क्रम आरम्भ कर दिये जाने से लोगों का ध्यान उस प्रकार की शिक्षा से हट गया है। आज के युग के  बच्चे  स्वयं ही  कहानी पुस्तकों के द्वारा अपना मनोरंजन कर लेते हैं, लेकिन इस बात का ध्यान सदा नहीं रखा जाता कि वे कहानियां सद्गुणों का विकास करने वाली ही हों । बहुसंख्यक लेखक केवल मनोरंजन को  ही प्रधान गुण समझते हैं और प्रायः असम्भव तथा अस्वाभाविक बातें लिखकर बालकों में कौतूहल की भावना उत्पन्न करने की चेष्टा करते हैं। ऐसी कहानियों से बालकों की कल्पना शक्ति का कुछ विकास हो सकता है, पर धर्म और नीति के तत्वों का अभाव रहने से, उपदेश और प्रेरणा का अभाव रहने से, इन कहानियों द्वारा जैसा लाभ चाहिए वैसा हो नहीं । हमारे गायत्री परिवार में प्रचलित प्रज्ञा मंडलों के वातावरण से देखकर बहुत ही संतोष मिलता है कि हमारे नन्हे-मुन्नों को माता पिता नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित करने में कोई कसर  नहीं छोड़ रहे,हमारी पोती काव्या त्रिपाठी एक उदाहरण है। लेकिन जहाँ संतोष मिलता है वहीँ  चिंता भी होती है कि जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, वोह अपनी राहों पर चल पड़ते हैं। गायत्री परिवार के ऐसे  बच्चों पर केंद्रित विषय पर भी कभी बात करेंगें, हम चलते हैं आज के विषय की ओर।       

यज्ञों पर आधारित इस  लेख श्रृंखला का आरम्भ हम उसी दादा-दादी, नाना-नानी की  पुरातन प्रथा से कर रहे हैं। तो आइये परम पूज्य गुरुदेव से सुने  शतमन्यु की कहानी जो  अखंड ज्योति दिसंबर 1942 के  पृष्ठ 21 पर प्रकाशित हुई थी। हमारा विशवास है कि यह कहानी नरमेध यज्ञ की भावना  को  समझने में सहायक होगी। कहानी के बाद एक अनुभूति प्रस्तुत की गयी है और  लेख का समापन नरमेध को समझाते हुए गुरुदेव के विचारों से होगा।  कंटेंट थोड़ा लम्बा अवश्य है, इसलिए ध्यान और धैर्य से पढ़ने की आवश्यकता है। 

शतमन्यु की कहानी    

सतयुग में एक बार बड़ा भारी दुर्भिक्ष पड़ा। कई वर्ष तक लगातार वर्षा न होने के कारण अन्न बिल्कुल पैदा न हुआ। कुएँ और नदी तालाब सूख गये। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। पृथ्वी पशु पक्षियों से रहित दिखाई पड़ने लगी। भूख और प्यास से पीड़ित नर-नारी तड़प-2 कर प्राण त्यागने लगे।  

राजाओं ने अपने खजाने खाली कर दिये। धनियों ने अपनी सम्पदायें लुटा दी। विभुक्षितों को बचाने के लिए सब ने अपनी शक्ति का प्रयोग किया लेकिन  दैवी प्रकोप के आगे आखिर किस का, कब तक बस चलता । जब सब शक्तिहीन हो गये और दुर्भिक्ष का दानव विकराल रूप धारण करके, प्रजा को चबाने लगा, तो चारों दिशाओं में हाहाकार गूंजने लगा। इस विपत्ति से छुटकारा पाने का उपाय ढूँढ़ने के लिए राजा ने एक बड़ी भारी सभा बुलाई जिसमें उस समय तक जीवित सभी गणमान्य ऋषि और मनीषी एकत्रित हुए। बहुत सोच विचार के बाद ऋषियों ने निश्चय किया कि इन्द्र देवता कुपित हो गये है, उन्हें शान्त करने के लिए “नरमेध यज्ञ” होना चाहिए।

नरमेध यज्ञ क्या? प्रजा की इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए ऋषियों ने बताया कि पाप पूर्ण कुविचारों से जब अदृश्य लोक भर जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया से समस्त  सृष्टि पर नाना प्रकार की आपत्तियाँ आती हैं। उन्हें शान्त करने के लिए प्रबुद्ध आत्माओं का उच्चकोटि का “स्वेच्छा-त्याग” आवश्यक है। कुछ दिव्य आत्माएँ पवित्रतम विचारों के साथ लोक कल्याण के लिए अपने को बलिदान कर दें, तो विकृत वातावरण शुद्ध हो सकता है, इन्द्र देवता सन्तुष्ट हो सकते हैं।

सब लोग चिन्ता में पड़ गए  कि नरमेध यज्ञ के “बलि पशु कौन बनेगा” लोग कुत्ते की मौत आये दिन मरते थे लेकिन धर्म के लिए प्राण देना तो बड़ा कठिन है। ऋषि ने खड़े होकर पूछा:

“आप लोगों में से कोई व्यक्ति अपने को यज्ञ में बलिदान करने के लिए तैयार है।” 

सभा में सन्नाटा छाया हुआ था, ऋषि की याचना प्रतिध्वनित होकर वापिस लौट आई। दर्शकों और विचारकों की सभा में से किसी का मुँह न खुला और  कार्यवाही दूसरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। सभा का कार्य समाप्त हो जाने के बाद एक ब्राह्मण युवक अपने विचारों में मग्न अपने घर पहुँचा। घर पर उसके वृद्ध माता-पिता भूख से तड़प रहे थे। प्यास के मारे उसके होंठ सूख रहे थे। युवक ने माता पिता के पैर छुए और कहा मैं अब जा रहा हूँ, सदा के लिए जा रहा हूँ, आप मुझे प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दीजिये। उसने सभा का सारा वृतांत  कह सुनाया कि किस प्रकार नरमेध यज्ञ की आवश्यकता बताई गई और उसके लिए एक यज्ञ-पशु का कार्य करने के लिये कोई उद्यत न हुआ। अब मैंने अपने प्राण देकर उस महान् कार्य की पूर्ति करने का निश्चय किया है। माता-पिता का भूख प्यास के कारण होने वाला चीत्कार बन्द हो गया। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से अपने प्राणों से प्यारे पुत्र को देखा और उसे उठाकर छाती से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसुओं का अविरल प्रवाह जारी था और गला रुँध रहा था। एकमात्र पुत्र की ममता उनका कलेजा नोंचे खा रही थी। पुत्र को चरण स्पर्श का उत्तर देते हुए पिता ने कहा:

“बेटा, प्रसन्नतापूर्वक जाओ। यदि तुम्हारे बलिदान से असंख्य प्राणियों की तड़पती हुई आत्माओं को शान्ति मिलेगी, तो तुम बड़े भाग्यशाली हो, प्रसन्नतापूर्वक अपना बलिदान करो बेटा।”

दूसरे दिन प्रातःकाल सभा  की कार्यवाही पुनः आरम्भ हुई। ऋषि ने उठ कर पूछा, 

“क्या यज्ञ न हो सकेगा? क्या आज भी कोई महानुभाव अपने को बलिदान करने के लिये तैयार होकर नहीं आये हैं?” 

सभा मण्डल में भीड़ को चीरता हुआ एक दुर्बल, कृशकाय, गौर वर्ण युवक आगे बढ़ा। उसने कहा,

 “यज्ञ होगा! अवश्य होगा। हाँ, मैं शतमन्यु  तैयार होकर आया हूँ।” सब लोग प्रसन्नता से तालियाँ बजाने लगे।”

यज्ञ की तैयारियाँ होने लगीं। एक विशाल मण्डप के बीच यज्ञ वेदिका बनाई गई। आहुतियों से अग्नि की लपटें आकाश का चुम्बन करने के लिये बढ़ने लगीं। बलिदान की वेदी के निकट तेजस्वी शतमन्यु खड़ा हुआ था, प्रसन्नता से उसका चेहरा खिल रहा था। उसकी आहुति दी ही जाने वाली थी कि आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। एक दिव्य-ज्योति ने प्रकट होकर कहा- पुत्र शतमन्यु! मैं ही इन्द्र हूँ, तुम्हारे त्याग से बहुत प्रसन्न हूँ। जिस देश में तुम्हारे जैसे आत्मत्याग करने वाले मौजूद हैं, वह अधिक दिन दुःखी  न रहेगा। अब नरमेध की आवश्यकता नहीं रही, शीघ्र ही वर्षा होगी और दुर्भिक्ष मिट जायगा।’ ज्योति के अन्तर्ध्यान होते ही घनघोर घटायें उमड़ी और मूसलाधार वर्षा होने लगी। मरणासन्न प्राणियों में पुनः प्राण लौट आये, सर्वत्र शतमन्यु का यशगान होने लगा।

सतयुग के आदि में ऋषि के आदेश का उत्तर देते शतमन्यु ने कहा था ‘यज्ञ होगा।’ मैं तैयार हूँ।’आज के इस युग में  असत्य और पाप के कारण दुर्भिक्ष पीड़ित संसार को शान्ति देने के लिये, सत्य प्रचार करने के लिये, क्या कोई तेजस्वी युवक तत्पर न होंगे? क्या इस सत्य-यज्ञ का अनुष्ठान न हो सकेगा। नरमेध यज्ञ का महत्व समझने वाले कोई आत्मत्यागी नहीं हैं। देखें कोई शतमन्यु यह कहने का सहस करता है कि “हाँ मैं हूँ, असत्य को मिटने के लिए सत्य की बलिवेदी पर प्राण देने के लिए मैं तैयार हूँ। अखंड ज्योति के प्यारे कान ऐसे उत्तर सुनने के लिए गर्दन उठा कर देख रहे हैं।

इसी कहानी के सन्दर्भ में अब प्रस्तुत है एक अनुभूति जो अखंड ज्योति  जून 1956, पृष्ठ 15 पर प्रकाशित हुई थी।  

डा काशीनाथ झा, दरभंगा, बिहार, नरमेध यज्ञ एक संस्मरण 

‘अमृत पत्रिका’ में नरमेध यज्ञ का समाचार प्रकाशित हुआ था। नरमेध का नाम ही चौंकाने वाला था। आज के युग में, नर बलि कैसे दी जा सकती है। सरकार इसे कैसे सहन कर सकती है ऐसे अनेक विचार मस्तिष्क में विद्युत तरंगों की भाँति प्रवाहित हो गये। मित्रों में भी कई दिन चर्चा होती रही  किन्तु कोई निष्कर्ष पर न पहुँच सके। अन्ततः यह निर्णय किया गया कि गायत्री तपोभूमि मथुरा  के प्रबंधकों तथा इस यज्ञ के संयोजकों से पत्र-व्यवहार किया जाय ओर इस कार्य के लिये सभी मित्रों ने मुझे नियुक्त किया। पत्र-व्यवहार का ही परिणाम समझिये कि मैंने मथुरा यात्रा का प्रोग्राम  बना लिया, और भी कई सज्जन मथुरा गमन के उत्सुक थे किन्तु विभिन्न कारणों से वे असफल रहे और केवल तीन व्यक्ति मेरा साथ दे सके। इनमें से एक सज्जन तो पटना के ही रिटायर्ड इंजीनियर थे, दूसरे थे वकील साहब और तीसरे सज्जन थे MA Philosophy  के एक विद्यार्थी। वकील साहब और  इंजीनियर साहब तो पहिले से ही गायत्री संस्था से सम्बन्धित थे।उन्होंने पहिले थोड़े बहुत पुरश्चरण आदि भी कर रखे थे लेकिन हम दोनों (मैं और विद्यार्थी) इस क्षेत्र में नवागन्तुक ही थे।

मनोरंजन से भरपूर डेढ़ दिन की यात्रा के पश्चात् हम लोग मथुरा पहुँचे। स्टेशन पर ही, यज्ञ के स्वयंसेवक तैनात थे किन्तु हमने उन्हें किसी भाँति का कष्ट न देकर, अपनेआप ही यज्ञ स्थल तक पहुँचने का निश्चय किया। हमारा ताँगा अभी चला भी न था कि मथुरा के पंडों ने हमें रोक लिया और आग्रह किया कि हम तपोभूमि न जाएं, वहाँ तो पानी भी प्राप्त नहीं है। हम तो चक्कर में पड़ गये,सच में हम उनकी बात मानकर उन्हीं पंडों के घर चले गये होते  अगर  उसी समय बम्बई ( आजकल मुंबई )  से आने वाले गायत्री-भक्तों ने हमें बताया न होता  कि ये लोग वैसे ही बहकाते हैं, तपोभूमि कोई कष्टकारक स्थान नहीं है।

तपोभूमि का दृश्य, यज्ञ की सुगन्धि से परिपूर्ण वातावरण, कुछ इस प्रकार कि वास्तव में “मथुरा तीन लोक से न्यारी ही है।” जिधर देखो, देश-विदेश से एकत्रित गृहस्थ-तपस्वियों, नर-नारियों का विशाल जन समूह हिलोरें  ले रहा था। 

कुछ प्राकृतिक  प्रेरणा ही  रही होगी यां वातावरण का प्रभाव, हमारे साथी वकील साहब तथा इंजीनियर महोदय तो अपनी भक्ति में तल्लीन हो गये। विशाल गायत्री नगर के कैम्पों में से एक कैम्प उन्हें मिल गया था। वे तो अपनी माला लेकर गायत्री मंत्र के पुरश्चरण में तल्लीन हो गये। किन्तु विद्यार्थी जी ठहरे पक्के नास्तिक। बोले, “चलो घूमें, हम तो मनोरंजन के लिये आये हैं” किन्तु मनोरंजन भी कहाँ, उन्हें तो आलोचना करने से ही फुर्सत नहीं मिल पा रही थी। एक ओर तो हजारों नर-नारी, एक दृढ़ लगन के साथ, सैकड़ों हवन कुंडों में यज्ञ कर रहे थे, स्वाहा की ध्वनियाँ आन्तरिक में व्याप्त हो रही थीं। घी आदि हवन सामग्रियों की सुगन्धि मस्तिष्क, नेत्रों तथा आत्माओं का मैल धो रही थी और दूसरी ओर विद्यार्थी जी का मन आशंकित ही था। धार्मिक कर्मकांडों के विषय में आज के बुद्धिवादी लोग कुछ अच्छे विचार नहीं रखते वे भी कुछ उसी प्रकार सोचते थे।

इसी सम्बन्ध में, हमने अनेकों आगंतुकों से बातचीत की। उतनी होशियारी के साथ जैसे कि सफाई पक्ष का वकील करता है। आगन्तुकों में, अधिकाँश व्यक्ति मथुरा के बाहर से ही आये हुए थे। गुजरात से, महाराष्ट्र से, राजस्थान से, मद्रास से, बिहार से, उड़ीसा से मध्य प्रदेश तथा मध्य भारत से । कुछ तो दक्षिणी अफ्रीका से भी आये। । वोह  ने तो पंडे थे, न सभी कर्मकाँडी पंडित या ब्राह्मण थे वरन् अधिकाँश सद्गृहस्थ थे। वे अकेले नहीं आये थे, उनकी धर्मपत्नी, बच्चे, माँ-बाप आदि भी साथ थे।

इस विहंगम दृष्टि से ही हमारा निश्चय बदल गया। हम सोचने लगे कि इन व्यक्तियों को ढोंग व पाखंड-दिखावे से क्या लाभ। अरे वे तो गायत्री माता के सौम्य उपासक मात्र थे। उन्हें कोई दैवी प्रेरणा ही थी जो  आज के युग में,कलयुग में (कलयुग यानि कल पुर्ज़ों के युग में ) भक्ति मार्ग पर अग्रगामी कर रही थी।

निःसंदेह, हमारे विद्यार्थी जी काफी झेंपे।  बोले, मेरे विचार अभी काफी अपरिमार्जित (unrefined) हैं । शंकाओं ने मेरी बुद्धि भ्रमित कर दी थी वरना, ऐसे भले, पुण्यात्मा व्यक्तियों के विषय में, मैं इस भाँति के विचार न रखता लेकिन मैं समझता हूँ कि यह उनकी गलती नहीं थीं। हमने अपने जीवन में इतने अधिक गृहस्थ तपस्वियों को एक स्थान पर एकत्रित व साधनारत नहीं देखा था। कहने को तो प्रयाग में लाखों ही “साधक” आते हैं, तपस्या भर करते हैं परन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ऐसे ही नामधारी साधुओं ने धर्म में ढोंग को आश्रय देकर नास्तिकता की विचारधारा को फैलाने में सहायता की है। 

यह हम दोनों के लिए पहला अवसर था कि हम इन पवित्र आत्माओं के सम्मुख नतमस्तक हुए। 

भले व्यक्ति प्रत्येक शुभ कार्य के समर्थक होते हैं परन्तु कुछ महान् आत्माएं इस पृथ्वी पर इसीलिये अवतार लेती हैं कि प्रत्येक शुभ कार्य में विघ्न डालें। जैसे भी हो, कुछ न कुछ गड़बड़ी की जाय। इसी भाँति के कुछ व्यक्तियों ने अफवाह उड़ाई कि यमुना  में बाढ़ आ रही है और सभी कैम्प आदि बह जायेंगे। किन्तु न तो कोई बाढ़ आई और न कोई कैम्प बहा। अगले दिन वे सज्जन अचानक ही हमें मिलें। हमने कहा- महाशय ! बाढ़ तो आई नहीं; वे तपाक से बोले “अरे! उन सरकारी मिनिस्टरों ने, जो यज्ञ में आकर सम्मिलित हुए थे, बड़े प्रयत्न से रुकवा दी है। पानी नहरों में काट दिया गया है नहीं तो,बस।”  इससे भी अधिक असत्य भाषण वे न कर सके और नौ दो ग्यारह हो गए।

ऐसे ही कुछ विघ्न संतोषी ईर्ष्यालु लोग स्टेशन पर ही हमारे कान से आ लगे थे। उन्होंने  आचार्यजी के विषय बताया कि 

“वह कोई बड़े महन्त हैं। यज्ञों से कमाते खाते हैं, फूलकर मोटे कुप्पा हो रहे है। लाखों रुपये व्यय कर रहे हैं तो मुनाफा भी लाखों ही बटोरेंगे।” 

किन्तु आचार्यजी के दर्शन मात्र से यह धारणा हमारे मन से स्वतः ही उड़ गई। आचार्यजी ! कितना सरल, सौम्य और निर्विकार (जिसमें कोई दोष) व्यक्ति।  साधनाओं से उनका शरीर ऐसा कि  एक-एक हड्डी पसली गिनी जा सकती थी। मुखाकृति के तेज-तपोबल ही समझिए दर्शक की दृष्टि उनके सम्मुख स्वतः ही झुक जाती है। जिसने अपनी समस्त सम्पत्ति, धर्मपत्नी के ज़ेवर  और बच्चों के जोड़े हुए पैसे तक गायत्री मिशन को  दान देकर निस्पृह( वासना रहित, इच्छा रहित) ब्राह्मण का जीवन स्वेच्छा से स्वीकार किया, ऐसे देव पुरुषों के लिए ऐसी बातें कहना तो दूर सुनना भी पाप प्रतीत हुआ।

आय-व्यय के रजिस्टर सब के लिए खुले पड़े थे। बाहर से आये हुए गायत्री उपासकों में से ही कुछ व्यक्ति आय-व्यय का हिसाब-किताब रख रहे थे। आय रसीद बहियों के द्वारा हो रही थी, जिन्हें कोई व्यक्ति भली प्रकार देख और जाँच सकता था। हमारे विद्यार्थी जी को इस विषय में बहुत दिलचस्पी थी, उनकी जिज्ञासा निवारण के लिए हम लोगों ने चार-पाँच घंटे हिसाब के  कागज़ात  भी उलटने पलटने में लगाये। मालूम हुआ कि कुल मिलाकर लगभग 17000  रुपया पूर्णाहुति के अवसर पर आया। खर्च के कुल पर्चे तो हमने नहीं जोड़े पर इतना अनुमान लगा लिया कि 6000  आगन्तुकों के लगभग एक सप्ताह तक रहने, हवन करने आदि में प्रति व्यक्ति तीन रुपया के हिसाब से हुई आया की अपेक्षा निश्चय ही अधिक व्यय हुआ होगा। ऐसी दशा में इस यज्ञ से “लाभ कमाने” की बात सोचना भी मूर्खता ही होगी।

एक विशेष बात, आचार्यजी के संभाषण में  थी कि यद्यपि वे हमसे एकाध  वाक्य ही  बोल पाये क्योंकि हज़ारों  व्यक्तियों से अधिक बात करना सम्भव ही न था फिर भी उनका प्रत्येक शब्द शुभ गुणों, भक्ति, निर्विकार जीवन की ओर बढ़ने को प्रेरित करता  था। इस विषय में नागपुर के एक परिवार से हमारी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष पूर्व, मथुरा यात्रा के दौरान  वे आचार्यजी के संपर्क में आये और तभी से उनके जीवन का क्रम बदल गया है। वे स्वयं, उनकी  24 वर्षीय पुत्रवधू भी गायत्री माता की  भक्त थीं और क्योंकि उनका कैम्प हमारे पड़ोस में ही था, हमने देखा कि वे सभी गायत्री मन्त्र की माला फेरते रहते थे। ऐसी आदर्श आस्तिकता प्रशंसनीय  है, स्तुति के योग्य है ।

अन्त में विदाई का दृश्य हमारे नेत्रों में नृत्य कर रहा है। छल, कपट, लूटने, मूर्ख बनने आदि के सभी अभियोग, यज्ञ के भागीदारों के अश्रुकणों में मिलकर बह गये। कितना आत्मीयता से भरा, प्रकाशमय  दृश्य था । विदा होते समय सभी भक्त लोग और आचार्य जी कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे जैसे कि माँ-बेटी बिछुड़ रही हों।

दरभंगा बिहार से हम चार लोग  गये थे लेकिन लौटे केवल दो ही। वकील साहब और इंजीनियर महोदय ने तो यह निश्चय किया कि 11 लाख गायत्री मंत्रों का पुरश्चरण, कुछ मन्त्र लेखन, यज्ञ आदि पूर्ण करने के पश्चात्, हरिद्वार आदि होते हुए, लगभग दो मास बाद घर लौटेंगे।

स्वयं मुझे भी प्रेरणा मिली है। मैंने भी अपने मन में कुछ निश्चय किया है। विद्यार्थी जी,नास्तिक से  आस्तिक तो नहीं हुए पर गायत्री महाविज्ञान के पृष्ठों में खोये से रहते हैं। आचार्य जी का आशीर्वाद, यहाँ भी रोज ही हमारे नेत्रों के सम्मुख रहता है। लिखते समय भी मैं उसे आंखें बन्द करके पढ़ रहा है- “ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें।”

नरमेध यज्ञ को समझने  के लिए परम पूज्य गुरुदेव की शिक्षा 

ब्राह्मणत्व का आह्वान

उस दिन का अग्रिहोत्र संपन्न होने के बाद आचार्यश्री ने साधकों को संबोधित किया। उस उद्बोधन में ब्राह्मण धर्म की व्याख्या और नरमेध के महत्व की चर्चा की। यहाँ जाति वाले ब्राह्मण की बात नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति का क्षरण हो रहा है। उसका कारण यही है कि हमारे यहां सच्चे ब्राह्मणों का अभाव हो गया है। पिछले बीस सालों से हम निरंतर अनुभव करते आ रहे हैं कि जब तक ब्राह्मणत्व को अर्जित नहीं कर लेते तब तक भारतीय संस्कृति का उत्थान नहीं किया जा सकता। शंकराचार्य का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने समाधि नहीं लगाई, उपवास करके शरीर को नहीं सुखाया, आंखे बंद करके निर्जन वन में भगवान का ध्यान नहीं किया बल्कि भारतीय संस्कृति की रक्षा का बीड़ा उठाया। शरीर में गंभीर रोग होते हुए भी वे उत्तर से दक्षिण तक भारतीय संस्कृति का संदेश देते हुए घूमते रहे । ब्राह्मणत्व अर्जित करने का अर्थ है तप और त्याग भरा जीवन। नरमेध की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि 

“यह भी ऋषि, ब्राह्मण परम्परा का ही एक अंग है। इसके द्वारा हम अपना सब कुछ, यहाँ तक कि जीवन भी समाज और संस्कृति की सेवा के लिए अर्पित कर देते हैं। यहाँ हो रहे नरमेध में 27  व्यक्ति अपना सब कुछ देश और समाज की सेवा में न्यौछावर कर देंगे। उनके इस बलिदान को नरमेध का नाम दिया गया है।”

दशमी का यज्ञ अग्निहोत्र संपन्न होने के बाद दिया गया यह उद्बोधन सुनने वालों की संख्या कोई इतनी अधिक नहीं थी लेकिन फिर भी  ढाई तीन हजार लोग  आ ही गए थे । लेकिन संदेश और संकल्प भावी समाज साधना की आधारशिला रखने वाला था।

इक्कीस अप्रैल की शाम को पूर्णाहुति समारोह शुरू हुआ। शाम सात बजे मंगलाचरण और भजन से आरंभ हुए इस कार्यक्रम में स्वामी परमानंद ने एक संदेश दिया। उसके बाद आचार्यश्री का उद्बोधन था। चैत्र महीने में शाम को छह साढ़े छह बजे तक खासा अंधेरा हो जाता था। समारोह स्थल चारों तरफ फैली रोशनी से खासा जगमग कर रहा था। आचार्यश्री के परिचयात्मक भाषण के बाद उस समय के लोकसभा अध्यक्ष अनंतशयनम आयंगर ने उद्घाटन भाषण दिया।

मंत्रलेखन की स्थापना, पुस्तकालयों की स्थापना और रुद्रयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, सरस्वती यज्ञ, महामृत्यंजय यज्ञ, नवग्रह यज्ञ, पितृ यज्ञ, यजुर्वेद यज्ञ, अथर्ववेद यज्ञ और सामवेद यज्ञ जैसे अग्निहोत्र अनुष्ठानों की श्रृंखला चली ।

उन्होंने कहा कि यज्ञ अभियान का उद्देश्य मनुष्य को अपने कुसंस्कारों से मुक्त करना रहा है। भगवान कृष्ण ने भी अर्जुन को समझाया है कि यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अलावा सारे कर्म बंधन है। इसलिए मनुष्य को आसक्ति (attachment) से रहित होकर कर्म करना चाहिए अर्थात् यज्ञ के लिए कर्म करना चाहिए।

तीनों दिन नरमेध यज्ञ की चर्चा रही। कई बार स्पष्ट किया गया कि नरमेध का अर्थ अपनी निजी इच्छाओं आकांक्षाओं को समाज के हित में छोड़ देना, त्याग करना है। स्वागताध्यक्ष ने अपने उद्बोधन में अच्छी तरह स्पष्ट किया कि हमारी संस्कृति और परंपरा में पशुबलि का निषेध तो है ही, हरे भरे वृक्षों को काटना और उन्हें यज्ञ के लिए काम में लाना भी निषिद्ध है। पशु बलि और नरबलि जैसे पाप मध्यकाल में आये अंधकार युग की देन है। उन्हीं दिनों पशुबलि और नरबलि जैसी प्रथाएं आरंभ हुई। यज्ञ आयोजनों में कुसंस्कारों और अंधेरों का बोलबाला  हो गया।

नरमेध और नरबलि का अर्थ स्पष्ट करते हुए यह तथ्य बार-बार समझाया गया था कि दोनों में अंतर है लेकिन फिर भी भगवान कृष्ण की जन्मस्थली में जाग रही चेतना को धूमिल करने के उद्देश्य से कई प्रकार की बाधाएं उत्पन की गयीं। इन बाधाओं का विवरण भी आने वाले लेखों में साथ-साथ देने की योजना है।

शेष अगले अंक में  

इस कंटेंट को  प्रस्तुत करते समय हमें अपनी अयोग्यता का संकोच तो अवश्य है लेकिन जिस सदुद्देश्य से प्रकाशन हो रहा है अवश्य ही लोकहितकारी होगा। इसी विश्वास के आधार पर एक उत्साह और आशा की लहर हमारे अंदर कौंध रही है।  

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