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गायत्री मंत्र की शक्ति पर लेखों की श्रृंखला- पार्ट- 3

6 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद 

अपने  पिछले लेख में हमने  गायत्री साधना के विभिन्न स्तर बताये थे।  अब बात आती है ध्यान साधना की। 

ध्यान साधना   में हम अपनी रुचि व स्वभाव के अनुरूप साकार या निराकार ध्यान चुनते हैं। साकार  ध्यान में  मातृरूप  गायत्री महाशक्ति के उपासक प्रात:कालीन स्वर्णिम सूर्य में स्थित हंस पर बैठी गायत्री माता का ध्यान करते हैं। स्वयं को  माँ के आँचल की छाया में बैठने व उनका दुलार, भरपूर  प्यार पाने की भावना की जाती है। माँ का पय:पान करते हुए यह अनुमति करनी चाहिए कि उसके दूध के साथ मुझे सदभाव, ज्ञान व साहस-शक्ति जैसी विभूतियाँ मिल रही हैं और अपना व्यक्तित्व शुद्ध, बुद्ध एवं महान बनता जा रहा है। स्मरण रहे कि ध्यान-धारणा में कल्पित गायत्री माता एक नारी मात्र नहीं है वरन समस्त सद्गुणों, सद्भावनाओं व शक्ति-सामर्थ्य की स्रोत ईश्वरीय शक्ति हैं। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सविता का ध्यान प्रातः उगते हुए सूर्य के रूप में किया जाता है। भाव किया जाता है कि आदि शक्ति की आभा सूर्य की किरणों के रूप में अपने तक चली आ रही है और हम इसके प्रकाश के घेरे में चारों ओर से घिरे हुए हैं। ये प्रकाश किरणें धीरे-धीरे शरीर के अंग प्रत्यंगों में प्रवेश कर रही हैं और इन्हें पुष्ट कर रही हैं। जिह्वा, जननेंद्रिय, नेत्र, नाक, कान आदि इंद्रियाँ इस तेजस्वी प्रकाश से पवित्र हो रही हैं और इनकी असंयम वृत्ति जल रही है। शरीर के स्वस्थ, पवित्र और स्फूर्तिवान होने के बाद स्वर्णिम सूर्य किरणों के मन-मस्तिष्क में प्रवेश की भावना की जाती है। इस तेजस्वी प्रकाश के प्रवेश होते ही वहाँ छाए असंयम, स्वार्थ, भय, भ्रम रूपी जंजाल का अज्ञान-अंधकार छंट रहा है और वहाँ संयम, संतुलन व उच्च विचार जैसी विभूतियाँ जगमगा रही हैं। मन और बुद्धि शुद्ध व सजग हो रही हैं और उनके  प्रकाश में जीवन लक्ष्य स्पष्ट होता दिख रहा है।

मन-मस्तिष्क के बाद गायत्रीशक्ति की प्रकाश किरणें भावनाओं के केंद्र हृदयस्थल में प्रवेश करती दिख  रही होती  हैं। आदिशक्ति की प्रकाशरूपी आभा के उतरने के साथ जीवन का अधूरापन समाप्त हो रहा है। उसकी  तुच्छता, संकीर्णता, को दूर करके वह अपने समान बना रही है। 

उपासक अपनी लघुता परमात्मा को सौंप रहा है और परमात्मा अपनी महानता जीवात्मा को प्रदान कर रहा है। 

इस मिलन से हृदय में सद्भावनाओं की हिलोरें उठ रही हैं। अनंत प्रकाश के आनंद भरे सागर में स्नान करते हुए आत्मा अपने को धन्य व कृतकृत्य अनुभव कर रही है।

ध्यान साधना में भावना की भूमिका

ध्यान साधना  में भावना का बहुत  ही महत्वपूर्ण  भूमिका  है। चित्त को एकाग्र, तन्मय एवं प्रेम-भावना से परिपूर्ण करके इष्टदेव के साथ एकात्म भाव, अद्वैत, विलय की स्थिति उत्पन्न करने में अन्तःकरण का आत्म-भाव का विकास होता है।  यह भाव  आत्मा के स्तर  से आना  आवश्यक है।  कई बार हम बैठे तो पूजा स्थली में होते हैं  परन्तु मन में उठ रहे  विचार कहीं के कहीं बहा  कर ले जा रहे होते हैं। ऐसे में ध्यान साधना का कोई औचित्य नहीं , इस स्थिति में  केवल हमारा  शरीर ही पूजा स्थली में होता है।  परमपूज्य गुरुदेव ने बहुत ही सरल भाषा में यह समझाने  का प्रयास किया है कि  यह आत्मा और परमात्मा के विलय का अवसर होता है। पूज्यवर कहते हैं कि साधक जो लघु है, छोटा कण है और  विभु जो सर्वव्यापक है, महान  है उसमें विलय होने का प्रयास करता है।  लघुता विभुता में परिणत होती है।  यह एक ऐसी स्टेज होती है  जिसमें साधक  पुरुष से  पुरुषोत्तम ( पुरष + उत्तम )  बनता है और नर से नारायण  बनने के लिए प्रेरित होता है।  आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन इसी स्थिति में होता है। सीमितता असीम में परिणत हो जाती है। छोटी सीमा में केन्द्रित समत्व जब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का रूप धारण कर लेता है तो सारा विश्व अपना परिवार, कुटुंब लगता है।  तब अहंकार मिट जाता है  इसी मार्ग पर चलते हुए जीव, ब्रह्म बन जाता है। जब सब अपने लगते हैं, सभी से समान प्रेम होता है तो प्रेम-परमेश्वर का, जड़-चेतन में सर्वत्र अपनी ही विशुद्ध आत्मा का (परमात्मा) का- दर्शन होता है। मनुष्य भी तो  उस परमात्मा का ही रूप है, अंश है, इसी ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करने पर जीवनोद्देश्य पूर्ण हो जाता है। उसी भूमिका को आत्म-साक्षात्कार ( Self – realization ), ब्रह्म निर्माण, सच्चिदानन्द ( सत् +चित्+आनंद)  सुख, निर्विकल्प समाधि कहते हैं। इसी में जीव सब बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्म-लोक का,परमपद का, मोक्ष का अधिकारी बनता है। स्वामी विवेकानंद ने  निर्विकल्प और विकल्प साधना केअंतर् को अपने साहित्य में बहुत ही सरल तरीके  वर्णन किया है।  पाठक इस  टॉपिक को गूगल  करके इस विषय  पर भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

यह सब जो हमने ऊपर वाली पंक्तियों में वर्णन किया तब ही सम्भव हो सकता है जब हम पूर्ण भावना से अपने आप को समर्पित करें  लेकिन  विडम्बना यह है  कि  इस  विशाल भव- रुपी  सागर  जिसे  हम  भवसागर कहते हैं  में फंसा हुआ असहाय जीव आत्म-कल्याण की बात ध्यान में आने पर भी कुछ कर नहीं पाता। श्रेय साधन के लिए उसे न एक मिनट की फुरसत मिलती है और न एक पाई खर्च करने की लोभ आज्ञा देता है।  ऐसे  मानव की आत्मा को अपनी आकाँक्षा दबाते, कुचलते, रोते, कलपते, दिन बिताने पड़ते हैं और एक-एक करके यह बहुमूल्य मानव-जीवन यों ही नष्ट-भ्रष्ट समाप्त हो जाता है। तब अन्तकाल तक केवल दुर्गति और पश्चात्ताप का उत्पीड़न सहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रह जाता है।

क्या हम सब इसी स्थिति में हैं ?

जीवों में से अधिकाँश को इसी स्तर का जीवन काटना पड़ता है। इससे उबरने के लिए अन्धी दुनिया की भेड़ चाल से प्रतिकूल दिशा में चलना पड़ता है और चलना  भी चाहिए। अन्धी  दुनिया से प्रतिकूल दिशा में चलने के लिए  बहुत बड़ा  साहस चाहिये। दुनिया ऐसे मनुष्यों  को मूर्ख  ही बताएगी।  इस स्थिति  को पार करने का  एक ही विकल्प है और वह है – उसकी समझ को उपहास, हंसी-मज़ाक और दिल्लगी मान कर अपने पथ पर निरंतर रहना।  अपना पथ खुद निर्धारित करने की क्षमता और दृढ़ता किसी विरले में ही होती है। 

यह मनस्विता, तेजस्विता, लगन और श्रद्धा जब तक अपनेआप में न हो तब तक आत्म-कल्याण के मार्ग पर देर तक और दूर तक नहीं चला जा सकता।

 श्रेयपथ पर किसी आवेश, उत्साह में थोड़ी दूर तक चले भी तो आलस्य, प्रमाद उसे अस्तव्यस्त कर देते हैं। छोटी-छोटी कठिनाइयों के अवरोध सामने आ खड़े होते हैं। तथाकथित मित्र, परिजनों के स्वार्थ में राई-रत्ती कमी आती है तो वे भी गरम होते हैं। कई तो मुर्ख बताते और उपहास करते हैं। इन अड़चनों से मन ढीला पड़ जाता है और जो कुछ थोड़ा-सा आरंभ किया था वह संकल्प शक्ति की दुर्बलता, मानसिक शिथिलता के कारण थोड़े ही दिन में समाप्त हो जाता है।

ऐसी स्थिति हमारे ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों में भी देखने को आयी है।  शुरू शुरू में बहुत ही साहस ,श्रद्धा और समर्पण होता है और धीरे -धीरे यही साहस  और समर्पण कम होता जाता है। हम अपना कर्म करते रहते हैं और अपने सहकर्मियों में निष्ठां की भावना उजागर ही करते  ही रहते हैं। सहकर्मियों द्वारा दिए  गए कमैंट्स इन तथ्यों के साक्षी हैं। 

तो चलें continue  रखें ध्यान साधना की स्थिति को :

इस परिस्थिति से निपटे बिना आज तक कोई श्रेयार्थी आत्म-कल्याण के पथ पर आगे नहीं बढ़ सका। इसलिए इस अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति के लिये वह आन्तरिक साहस, आत्म-बल एकत्रित करना ही पड़ता है जो इन समस्त विघ्नों को परास्त करता हुआ, अंगद के पैर की तरह अपने निश्चय पर दृढ़ बने रहने से सहायता कर सके। यह आत्मबल- यह आन्तरिक साहस प्राण शक्ति पर आधारित है। इसीलिए  साधक को प्राण-प्रक्रिया द्वारा अभीष्ट मनोबल, आन्तरिक दृढ़ता एवं अविच्छिन्न श्रद्धा का सम्पादन करना पड़ता है। इसके लिये आवश्यक प्रयत्न करने का नाम ही प्राण प्रक्रिया है।  प्राण प्रक्रिया  के  टॉपिक पर हमने इन्ही लेखों की कड़ी के पार्ट 2  में विस्तार से चर्चा की थी। 

आत्म-कल्याण के पथ पर चलने  वाले साधक को अपने सामने आने वाली कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आहार-विहार राजसी न रहने से शरीर में भी कुछ दुर्बलता भी आती है और उसकी पूर्ति भी प्राण बल से ही करनी पड़ती है। अभावग्रस्त, एकाकी ( अकेले), कष्टसाध्य, दूसरों से उपेक्षित ( बेइज़्ज़त)  जीवन खलता है और मन में उद्विग्नता( परेशानी) उत्पन्न होती है। इसके समाधान के लिए भी प्राण-बल चाहिये। फिर श्रेयार्थी का हृदय बड़ा कोमल हो जाता है। दूसरों का कष्ट देख कर मक्खन की तरह सहज ही पिघल जाता है। दया और करुणा से द्रवीभूत अन्तःकरण कुछ सहायता करना ही चाहता है। भौतिक दृष्टि से दूसरों की सहायता धनी लोग कर सकते हैं और आत्मिक दृष्टि से किसी की सहायता कर सकना प्राण-धन से सम्पन्न लोगों के लिए,सिद्ध पुरुषों के लिए- आत्मिक सम्पत्ति से सुसम्पन्न व्यक्ति के लिए ही संभव होता है। यह पूँजी केवल प्राण बल के आधार पर ही संग्रह की जा सकती है।

तो मित्रो ध्यान साधना  से कैसी स्थिति  बनती है और उस स्थिति में  अपने आप को लाने के लिए कैसी -कैसी परीक्षाओं में से गुज़रना पड़ता है हमने देखा।  यह  कार्य कोई सरल नहीं है इसीलिए इसको साधना की highest  स्टेज कहते हैं 

तोआइयेअब चलते-चलते गायत्री मंत्र का भावार्थ भी समझ लें।  अधिकतर लोग इस महामंत्र के  भावार्थ को जानते ही हैं लेकिन हमारा लेख इसके बिना  अधूरा सा ही  रहेगा।  

गायत्री  मंत्र  का अर्थ चिंतन ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। 

ॐ-ब्रह्म

भू:-प्राणस्वरूप 

भुवः-दुःखनाशक

स्वः-सुख स्वरूप 

तत्-उस

सवितुः-तेजस्वी, प्रकाशवान् 

वरेण्यं-श्रेष्ठ

भर्गो-पापनाशक 

देवस्य-दिव्य को, देने वाले को 

धीमहि-धारण करें 

धियो-बुद्धि को

यो-जो 

न:-हमारी

प्रचोदयात्-प्रेरित करे। 

गायत्री-मंत्र के इस अर्थ पर मनन एवं चिंतन करने से अंत:करण में उन तत्त्वों की वृद्धि होती है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। यह भाव बड़े ही शक्तिदायक, उत्साहदायक, सतोगुणी, एवं  आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्यप्रति कुछ समय मनन करना चाहिए।

1-  “भूः लोक, भुवः लोक, स्व: लोक-इन तीन लोकों में ॐ परमात्मा समाया हुआ है। यह जितना भी विश्व-ब्रह्मांड है, परमात्मा की साकार प्रतिमा है। कण-कण में भगवान समाए हुए हैं। सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र देखते हुए, मझे कुविचारों और कुकर्मों से सदा दूर रहना चाहिए एवं संसार की सुख-शांति तथा शोभा बढ़ाने में सहयोग देकर प्रभु की सच्ची पूजा करनी चाहिए।”

2- “तत्-वह परमात्मा, सवितुः-तेजस्वी, वरेण्यं श्रेष्ठ, भर्गो-पाप रहित और देवस्य-दिव्य है, उसको अंत:करण में धारण करता हूँ। इन गुणों वाले भगवान मेरे अंत:करण में प्रविष्ट होकर मुझे भी तेजस्वी, श्रेष्ठ, पाप रहित एवं दिव्य बनाते हैं। मैं प्रतिक्षण इन गुणों से युक्त होता जाता हूँ। इन दोनों की मात्रा मेरे मस्तिष्क तथा शरीर के कण-कण में बढ़ती है। इन गुणों से ओत-प्रोत होता जाता हूँ।”

3- “वह परमात्मा, नः-हमारी, धियो-बुद्धि को, प्रचोदयात्-सन्मार्ग में प्रेरित करे। हम सब की, हमारे स्वजन परिजनों की बुद्धि सन्मार्ग गामी हो। संसार की सबसे बड़ी विभूति, सुखों की आदि माता सद्बुद्धि को पाकर हम इस जीवन में ही स्वर्गीय आनंद का उपयोग करें। मानव जन्म को सफल बनाएँ।”

उपर्युक्त तीन चिंतन संकल्प धीरे-धीरे मनन करने चाहिए।

गायत्री एक दैवी विद्या है, जो परमात्मा ने हमारे लिए सुलभ बनाई है। ऋषि-मुनियों ने धर्मशास्त्रों में पग-पग पर हमारे लिए गायत्री-साधना द्वारा लाभान्वित होने का आदेश किया है।  इतने पर भी हम इससे लाभ न उठाएँ, साधना न करें तो  उसे दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है।

क्रमशः  जारी  To  be  continued 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

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गायत्री मंत्र की शक्ति पर लेखों की श्रृंखला- पार्ट- 2

4 जनवरी 2021 का ज्ञानप्रसाद 

गायत्री मंत्र को तारक मंत्र भी कहते हैं 

गायत्री मंत्र का दूसरा नाम ‘तारक मंत्र भी है। साधना ग्रंथों में उसका उल्लेख तारक मंत्र के नाम से भी हुआ है। तारक अर्थात् तैरा कर पार निकाल देने वाला, पार कर देने वाला। गहरे जल प्रवाह को पार करके निकल जाने को- डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं। यह भवसागर, संसार रुपी सागर ऐसा ही है, जिसमें अधिकाँश जीव डूबते हैं। तरते तो कोई विरले हैं। जिस साधन से तरना संभव हो सके उसे तारक कहा जायेगा। गायत्री में यह सामर्थ्य है, उसी से उसे तारक मंत्र’ कहा जाता है।

गायत्री को ‘तारक मंत्र’ इसीलिये कहा गया है कि वह साधक को नरक से उबार सकता है। कष्टकर और खेदजनक परिस्थितियों से पार कर सकता है। जिनको दुर्बलताओं ने घेर रखा है उनके लिए पग-पग पर दुःख- दारिद्र भरा नरक ही प्रस्तुत रहता है। संसार में उन्हें कुछ भी आकर्षण एवं आनन्द दिखाई नहीं पड़ता। अपनी ही तृष्णायें, अपनी ही वासनायें बंधन बन कर रोम-रोम को जकड़े रहती हैं और बन्दी जीवन की यातनायें सहन करते रहने को बाध्य करती हैं। 

यह परिस्थितियाँ हमारी अपनी विनिर्मित की हुई होती हैं।  दुर्बलताओं का प्रतिरोध न करके हमने स्वयं ही उन्हें अपने ऊपर शासन करने से लिए आमन्त्रित किया होता है। अतएव इस विधान- स्थिति का उत्तरदायित्व भी हमारे अपने ही ऊपर है। जब हम पुरुषार्थ अपनाकर प्राण प्रतिष्ठा के लिए तत्पर होते हैं, गायत्री उपासना का आश्रय लेते हैं तो इन विपत्तियों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। डूबने वाली स्थिति बदल जाती है और हम तर कर पार होने लगते हैं।

गायत्री का माहात्म्य वर्णन करते हुए ऋषियों ने उसे तारक-मंत्र बताया है और कहा है- जो उसकी शरण पकड़ेगा, उसे भवबंधनों से, भव-सागर से, नरक से उबारने में देर न लगेगी। यह महाशक्ति उसे डूबने से बचा लेगी और पार उतरने का उपक्रम बना देगी। भवबंधन अर्थार्त संसार के बंधनों से बचने का उपाय है गायत्री महामंत्र। 

गायत्री महामंत्र में इसी प्रक्रिया का समस्त तत्व-ज्ञान सम्मिलित है। जो विधिवत उसका आश्रय ग्रहण करता है, उसे तत्काल अपने में समग्र जीवनी शक्ति का अभिवर्धन होता हुआ दृष्टिगोचर होता है। ज्यों  ज्यों  प्रकाश बढ़ता है  अन्धकार दूर होता जाता  है। आन्तरिक समर्थता बढ़ने के साथ-साथ नारकीय वातावरण का भी अन्त होने लगता है।ऐसा नारकीय  वातावरण जिसमें  जीवन को दुःखदारिद्र का घर और संसार को भवसागर के रूप में अति सुखदाई दिखाया गया है। 

गायत्री साधना के  स्तर ( Stages  of  Gayatri  Sadhana ) : Science of Gayatri Mantra

गायत्री साधना के  विभिन्न स्तर हैं। सबसे साधारण साधना दैनिक साधना है। दैनिक साधना में गायत्री मंत्र जप का साधारण विधान है। विशेष प्रयोजनों के लिए सकाम-निष्काम-निर्जीव-सजीव अनुष्ठान पुरश्चरण किये जाते हैं। यह सामान्य क्रम कहलाता है। पाठकों से अनुरोध है कि  सकाम-निष्काम-निर्जीव-सजीव का अर्थ  गूगल से समझ लें ताकि इस लेख का flow  बना रहे।  

इससे ऊंचे स्तर की साधना दो भागों में विभक्त है। एक को कहते हैं ध्यान धारणा और दूसरे भाग को कहते है प्राण-प्रक्रिया। इन्हीं दोनों का अवलम्बन कर साधक उच्च आध्यात्मिक भूमिका में विकसित होता है।

दोनों को  बारे में जानने के लिए हमें एक -एक को बारी- बारी लेना पड़ेगा। 

प्राण -प्रक्रिया :

सामान्य नित्यकर्म एवं सकाम पुरश्चरणों से आगे बढ़ कर एक मध्यवर्ती साधन के रूप में क्रिया है जिसे  “प्राण-प्रक्रिया” का नाम दिया गया है। ध्यान की उच्त्तर स्टेज को  अपनाने से पूर्व  इस क्रिया को अपनाना अनिवार्य रूप से आवश्यक हो जाता है। आत्मिक भूमिका में प्रवेश करना शत्रुओं के चक्रव्यूह किले को भेदने की तरह कठिन है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, गर्व, ईर्ष्या रूपी षडरिपु (शत्रु) इस कल्याण मार्ग को रोके बैठे रहते हैं। वासनायें और तृष्णा की दो पिशाचनियाँ मनुष्य को दुराचारिणी वेश्या की तरह प्रलोभन आकर्षण के सारे साज-सामान जुटाये बैठी रहती हैं। इस जंजाल में ही जीव को जन्म से मृत्यु तक बन्धन बद्ध होकर तड़पना पड़ता है। नरक के यह आठ दूत सामान्य स्तर के जीव को अपने चंगुल में ही दबोचे बैठे रहते हैं। वासना और तृष्णा रूपी जादुगरनियाँ उसे ‘नट-मर्कट’ की तरह नचाती रहती हैं। षडरिपु- मनोविकार मित्र बन कर साथ-साथ छद्मवेश में रहते हैं और हर घड़ी शत्रुओं की करतूत करके जीव का लोक, परलोक बिगाड़ते रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, गर्व ,ईर्ष्या की उंगलियों के इशारे पर जीव नाचता रहता है। वे जो चाहते हैं सो कराते हैं, जिधर इच्छा होती है उधर भगाते हैं। नरक  केआठ दूतों को कई बार nessessary  evil  कहा  गया है।  इसका भावार्थ यह है कि  अगर इस संसार के जंजाल में रहना है तो दुनियादारी के लिए इन सभी के साथ ही जीवन काटना पड़ेगा। अगर बच्चे हैं तो मोह तो आएगा ही , अगर बच्चे की अच्छी नौकरी लग जाती है ,बच्चा सुख-समृद्धि प्राप्त कर लेता है तो गर्व तो आएगा ही , इस दुनियादारी की  रेस  में कामना तो होगी ही इत्यादि इत्यादि।  लेकिन यहाँ हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि  यह सब बातें व्यक्तिगत हैं।  कोई इन नरक के दूतों से अपने आप को बचा लेता है और कोई इसी में धंसता चला जाता है ,तब तक धंसता जाता है जब तक जीवन का अंत नहीं हो जाता। 

तो इस चर्चा को यहीं छोड़ते हुए प्राण – प्रक्रिया की ओर बढ़ते हैं। 

गायत्री की “प्राण प्रक्रिया” वह वैज्ञानिक पद्धति है जो साधक की उपरोक्त कठिनाइयों का हल और आवश्यकता की पूर्ति का साधन प्रस्तुत करती है। समर्थ साधक ही अपनी आन्तरिक क्षमता के द्वारा इस कठिन मार्ग पर देर तक,अन्त तक चलता रह सकता है। इसलिये एक आवश्यक साधन को माध्यम समझते हुए श्रेयार्थी की प्राण शक्ति सम्पादित करने की साधना पद्धति को अपनाना पड़ता है। इसी विधि व्याख्या का नाम प्राण-प्रक्रिया है। 

हमारा अनंत विश्व ब्रह्मांड :

हम यहाँ एक वीडियो लिंक दे रहे हैं इस वीडियो  में ब्रह्मांड के बारे  में बताया गया है।  इसको समझने के लिए विज्ञान की बैकग्राउंड तो चाहिए लेकिन साधारण लोग भी इस बात को जान सकते हैं कि  हमारा ब्रह्मांड कितना अनंत है। तो जहाँ हम अध्यात्म की बात कर रहे हैं  इसको समझने के लिए  विज्ञान के  उदाहरण भी देना उचित समझते हैं। https://youtu.be/xPDZah8dbK4

इस अनन्तः विश्व ब्रह्मांड में- समुद्र में भरे हुए जल की तरह सूक्ष्म रूप में वह अपेक्षित प्राण-शक्ति भरी पड़ी है। आकाश में वायु, ईथर, विद्युत, परमाणु जैसी भौतिक शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, इसे पदार्थ विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं। अध्यात्म विद्या के तत्वदर्शियों को पता है कि इस ब्रह्मांड में एक प्रचण्ड प्राण शक्ति व्याप्त है जिसे संस्कृत में ब्रह्म ऊष्मा’ और अंग्रेजी में लेटेन्ट हीट’ कहते हैं। लटेंट का  अर्थ होता है गुप्त अर्थार्त छुपा हुआ। 

इसी के प्रभाव और प्रकाश से संसार में विविध प्रकार की हलचलें और गतिविधियां दृष्टिगोचर होती हैं। परमाणु के इलेक्ट्रोन, प्रोट्रान, न्यूट्रोन आदि भाग इसी ऊष्मा से अपनी धुरी और कक्ष पर द्रुत गति से घूमते हैं। वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं में सजीवता इसी प्रभाव से परिलक्षित होती है। यह प्राण ही संसार का जीवन है। गायत्री का सविता देवता उस प्राण का प्रचण्डपुंज अपने में धारण किये हुए हैं।

गायत्री शब्द के अक्षरों का अर्थ- प्राण की संरक्षक अभिवर्धनी शक्ति है। यह महामंत्र उस महत्तत्व साधक में इस प्राण की मात्रा बढ़ाता है। जिस प्राणी में जितना आध्यात्मिक चुम्बकत्व ( spiritual  magnetism ) है वह उतनी ही अधिक मात्रा में इस महाप्राण को अपनी ओर आकर्षित कर उसे संग्रह कर सकता है। इस चुम्बकत्व का अभीष्ट मात्रा में उत्पादन गायत्री मंत्र की उपासना से होता है। जिन्होंने इस महाशक्ति का आश्रय-सान्निध्य लाभ किया है, उनमें प्राण शक्ति की मात्रा दिन-दिन बढ़ती चली गई है और वे इतना आत्म-बल सम्पादित कर सकते हैं जिसके आधार पर बाहरी  और आन्तरिक जीवन की समस्त कठिनाईयों  का निवारण और समस्त आवश्यकताओं का समाधान किया जा सके।

प्राण-प्रक्रिया के साधन विधानों को प्राणायाम कहते हैं। यों साधारणतया साँस की गहराई तक खींचने ( पूरक) रोके रहने (अन्तः कुम्भक) पूरी तरह बाहर निकालने (रेचक) और कुछ देर बिना साँस के रहने (बाह्य कुंभक) इस चार स्तर में बढ़ी हुई  प्रक्रिया को प्राणायाम कहा जाता है। संध्या उपासना के नित्य-कर्मों में इसी पद्धति का प्रयोग होता है। पर इतने मात्र से ही प्राणायाम को सीमा बद्ध नहीं मान लेना चाहिये। उसके प्रख्यात 84 प्रकार हैं। इसके अतिरिक्त भी अन्य ऐसे प्राण विधान हैं, जिनके माध्यम से शरीर के सूक्ष्म प्राण संस्थानों का जागरण होता है, वे विश्व-व्यापी प्राण शक्ति के साथ जोड़ने और उस संपर्क से अपने का अत्यधिक दिव्य सामर्थ्य सम्पन्न बनाने में समर्थ होते हैं।

मोटे तौर पर प्राणायाम श्वासोच्छवास की एक व्यायाम पद्धति है जिससे फेफड़े मजबूत होते, रक्त-संचार की व्यवस्था सुधारने से समग्र अरोग्य एवं दीर्घजीवन का लाभ मिलता है। शरीर विज्ञान के अनुसार हमारे दोनों फेफड़े साँस को अपने भीतर भरने के लिये वे यंत्र हैं जिनमें भरी हुई वायु समस्त शरीर में पहुँच कर ऑक्सीजन प्रदान करती है और विभिन्न अवयवों से उत्पन्न हुई मलीनता  को निकाल बाहर करती है। यह क्रिया ठीक तरह होती रहने से फेफड़े मजबूत बनते हैं और रक्त-शुद्धि का क्रम ठीक तरह चलता रहता है। पर देखा गया है कि लोग गहरी साँस लेने के आदी नहीं होते। वे उथली साँस लेते हैं, जिससे फेफड़ों का लगभग एक चौथाई ही काम करता है शेष तीन चौथाई लगभग निष्क्रिय पड़ा रहता है। शहद की मक्खी के छत्ते की तरह फेफड़ों में प्रायः 7 करोड़ 30 लाख स्पंज’ जैसी कोष्टक होते हैं। साधारण हल्की साँस लेने पर उनमें से लगभग 2 करोड़ में ही वायु पहुँचती है। शेष साढ़े पांच करोड़ का कोई उपयोग नहीं होता। इस निष्क्रिय पड़े हुए भाग में  गंदगी जमने लगती है और उसी में क्षय, (टी.वी.), खाँसी (कफ), सूजन (ब्रोंकाइटिस) आदि रागों के कीड़े जमा होकर चुपके-चुपके अपना विघातक कार्य करते रहते हैं। फेफड़े की कार्य पद्धति का अधूरापन रक्त-शुद्धि पर प्रभाव डालता है। हृदय कमजोर पड़ता है और फलस्वरूप अकाल मृत्यु का कोई-न-कोई बहाना  खड़ा होता है। डाक्टरों का कथन है कि प्रत्येक पाँच में से एक मौत फेफड़ों के रोग से होती है। 15 वर्ष से अधिक आयु में मरने वालों में से प्रत्येक तीन के पीछे एक मौत फेफड़ों के रोगों से होती है। अकाल, महामारी, युद्ध, दुर्घटना आदि से उतने मनुष्य नहीं मरते जितने फेफड़ों के रोगों से मरते हैं।  हमारे देश में औसतन प्रति मिनट एक व्यक्ति क्षय रोग से मरता है और उसका प्रधान कारण फेफड़ों की दुर्बलता ही होता है।

गहरे श्वासोच्छास लेने की साधारण प्राणायाम पद्धति को फेफड़ों का बढ़िया व्यायाम कहा जा सकता है  जिससे स्वास्थ्य सुधार और दीर्घ-जीवन की संभावना निश्चित रूप से बढ़ती है। विभिन्न रोगों का निवारण केवल विशेष प्रकार के प्राणायामों द्वारा किया जा सकता है। प्राण पद्धति अपने आप में सर्वांगपूर्ण आरोग्य संवर्धन एवं रोग निवारण की  सर्वांगपूर्ण पद्धति है। यदि कोई इस विज्ञान को ठीक तरह जान ले तो न केवल अपना बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य सुधार ले वरन् दूसरों को भी शारीरिक रोगों से मुक्त कर उन्हें सर्वांगपूर्ण सुधरे हुए स्वास्थ्य का आनन्द लाभ करा सकता है। इसीलिये प्रत्येक धर्म कार्य में, शुभ कार्य में, संध्या वन्दन के नित्यकर्म में, ‘प्राणायाम’ को एक आवश्यक धर्म-कृत्य के रूप से सम्मिलित किया गया है।

हमें यह भली-भांति समझ लेना चाहिये कि स्वास्थ्य लाभ तो प्राणायाम’ का अकिंचन-सा प्रारंभिक लाभ है। उससे वास्तविक लाभ मानसिक एवं आध्यात्मिक होता है। मनोविकारों के उद्वेग में प्राणायाम एक प्रकार का चमत्कारी प्रयोग है। चिन्ता, क्रोध, निराशा, भय, कामुकता, उद्वेग, आवेश आदि का समाधान उन प्रयोजनों के लिए निर्धारित प्राणायामों द्वारा सरलतापूर्वक किया जा सकता है। मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाने में, स्मरण शक्ति, कुशाग्रता, सूझ-बूझ, दूरदर्शिता, सूक्ष्म-निरीक्षण, धारणा, प्रज्ञा, मेधा आदि मानसिक विशेषताओं का अभिवर्धन प्राणायाम द्वारा किया जा सकता है। चंचल मन का विरोध, एकाग्रता साधन करने के लिए प्राणायाम की उपयोगिता अद्भुत है। आन्तरिक मलीनता को शुद्ध करने और अन्तःकरण में सतोगुणी सत्प्रवृत्तियों में अभिवर्धन का आध्यात्मिक प्रयोजन भी प्राणायाम से सिद्ध होता है। षट्-चक्र, वेधन, कुण्डलिनी जागरण एवं शरीर तथा मन में प्रसुप्त पड़े हुए अनेक सूक्ष्म-शक्ति संस्थानों का उन्नयन प्राण की प्रयोग प्रक्रियाओं पर ही निर्भर है। इनका विज्ञान एवं विधान अपने आप में एक सर्वांगपूर्ण शास्त्र है। प्राचीनकाल के तत्ववेत्ता इस विद्या को भली प्रकार जानते थे और विश्वव्यापी प्राण-तत्व को अपने अन्दर अभीष्ट मात्रा में धारण कर उन विभूतियों को प्राप्त करते थे जो ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से विख्यात हैं।

यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि साँस खींचना और छोड़ना ही प्राणायाम नहीं है। यह तो उसकी प्रारम्भिक परिपाटी है। आगे चल कर उसके अनेक प्रयोग और प्रकार बन जाते हैं। 84 प्राणायामों में के विधान एक-से-एक विलक्षण प्रकार के हैं। फिर कितने ही उनमें से मानसिक और आध्यात्मिक ही हैं, जिनमें साँस खींचने और छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उनमें प्राणशक्ति का आकर्षण एवं विकर्षण ही प्रधान रहता है। प्राण का संचय होने से समाधि लगती है और मनुष्य काल को वश करके मन चाही अवधि तक जीवित रह सकता है। वह जब  चाहे प्राण-त्याग उसी सरलता से कर सकता है जैसे मल-मूत्र विसर्जन किया जाता है। शरीर और मन प्राण की शक्ति से चलते हैं। प्राण पर नियंत्रण करने की विधि जानने वाला अपने शरीर और मन की प्रत्येक क्रिया पर नियंत्रण रख सकने की क्षमता से सुसम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के सभी विधि-विधान प्राणायाम  विद्या के अंतर्गत आते हैं। साँस खींचने-छोड़ने वाला- रेचक-पूरक कुम्भक-विधान तो उस महाप्राण विद्या का सब में प्रारंभ का एक हल्का-फुल्का शुभारंभ मात्र है।

गायत्री प्राण विद्या है। प्राण के साधन से हम शरीर, मन और आत्मा की दृष्टि से परिपुष्टि और समुन्नत बनते हैं। यह विकास क्रम हमारी अपूर्णताओं को क्रमशः दूर करते हुए पूर्णताओं से लाभान्वित करता है। अतः हम अपनी सम्पूर्ण अपूर्णताओं से छुटकारा पाकर पूर्णता प्राप्ति का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकने में सफल हो जाते हैं।

गायत्री उपासना का मध्यवर्ती मार्ग प्राण प्रक्रिया है। इससे वह समर्थता आती है जिसके बल पर ध्यान धारणा’ से सफलता प्राप्त की जा सके। बल के मूल्य पर ही इस संसार की विभिन्न सम्पत्तियाँ और विभूतियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। शरीर-बल, मनो-बल, आत्म-बल इन तीनों का अभिवर्धन धन, सम्पत्ति, इन्द्रिय भोग, यज्ञ, मैत्री, वर्चस्व, उल्लास आदि साँसारिक सुखों का सृजन करता है। इसी के द्वारा आत्म-कल्याण का जीवनोद्देश्य प्राप्त होता है। उसी के द्वारा बन्धन से मुक्ति का, मोक्ष का,  परम पुरुषार्थ सफलतापूर्वक सम्पन्न होता है। 

अतएव समग्र सफलता के लिये समग्र बलिष्ठता सम्पादित करनी पड़ती है और यह प्रयोजन गायत्री की प्राण विद्या द्वारा संपन्न हो सकता है। अतएव गायत्री शक्ति के आह्वान का विधान प्राणायाम हमारी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। 

क्रमशः  जारी  To  be  continued 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित 

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गायत्री महामंत्र की शक्ति पर लेखों की श्रृंखला – पार्ट -1

2 जनवरी 2021 का ज्ञान प्रसाद 

गायत्री मंत्र और प्राणशक्ति – पार्ट 1

31 दिसंबर 2020 के अपडेट में हमने ऑनलाइन ज्ञानरथ के  सहकर्मियों से गायत्री मंत्र पर आधारित कुछ लेख लिखने की बात की थी।  इस अपडेट पर बहुत से परिजनों से कमेंट भी आए  और बहुतों ने इन लेखों में अपनी उत्सुकता भी व्यक्त की।  यह लेख इतने विस्तृत और जानकारी से भरपूर हैं कि  इनमें से ज्ञानरथ के लिए सरल भाषा में ,संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना एक बड़ा ही challenging  कार्य है  और हमें challenge  बहुत ही पसंद है।  तो प्रस्तुत है इसी शृंखला का प्रथम लेख :

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गायत्री मंत्र के शब्दार्थ में से प्रकट है कि यह मनुष्य में सन्निहितअंदर पहले से मौजूद  प्राण तत्व का अभिवर्धन ( बढ़ाना ),  करने की विद्या है। ‘गय’ अर्थात प्राण। ‘त्री’ अर्थात त्राण करने वाली, जो प्राणों का  परित्राण ( बचाव ), उद्धार, संरक्षण करे वही है  गायत्री मन्त्र । मंत्र शब्द का अर्थ है – मनन, विज्ञान, विद्या। मन्त्रों से अक्सर हमें विद्या की, ज्ञान की एवं सोचने की शक्ति मिलती है तो अगर हम गायत्री मन्त्र को विद्या कह दें तो शायद गलत न हो    

गायत्री मंत्र का अर्थ है  “ प्राणों का परित्राण करने की विद्या।”     

अब सोचने वाला प्रश्न है कि  प्राणों का बचाव कैसे होगा , प्राणों  का अभिवर्धन कैसे होगा।  क्या कभी ऐसा हो सकता है कि  हम प्रतिदिन कुछ  एक माला गायत्री मन्त्र की फेर लें तो हमारे प्राणों का बढ़ावा हो जायेगा ,हम अधिक प्राणवान हो जायेंगें ,हम अधिक शक्तिशाली ,बुद्धिमान ,सूझवान इत्यादि ,इत्यादि हो जायेंगें।  शायद  ऐसा हो सकता हो पर इतना सरल नहीं है। 

यहाँ पर जिस प्राण की यां  प्राणशक्ति ( Life -force  Energy ) की बात कर रहे हैं असल में हमारी जान ही है।  इसीलिए  हम कहते हैं कि यह भाई साहिब बहुत ही प्राणवान  हैं , जानदार हैं।  लगातार कार्य करते रहते हैं ,कभी थकने का नाम तक नहीं लेते। और जब यह प्राण शक्ति कम हो जाती है हम बीमार हो जाते हैं ,आलस्य आ जाता है और अंत में मृत्यु हो जाती है।  तब हम कहते हैं इन  बेचारे भाई साहिब के प्राण पखेरू उड़ गए यां इन भाई साहिब की जान निकल गयी। प्राण-शक्ति की न्यूनता होने पर प्राणी समुचित पराक्रम कर सकने में असमर्थ रहता है और उसे अधूरी मंजिल में ही निराश एवं असफल हो जाना पड़ता है।  चाहे भौतिक क्षेत्र  हो यां  आध्यात्मिक – दोनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट सफलता के लिए आवश्यक सामर्थ्य की जरूरत पड़ती है। इसके बिना प्रयोजन को पूर्ण कर सकना, लक्ष्य को प्राप्त कर सकना असंभव है। इसलिये कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक साधन जुटाना आवश्यक होता है।  भौतिक उपकरणों की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रखरता एवं ओजस्विता ( उज्जवलता ) कहीं अधिक आवश्यक है। साधनों का उपयोग करने के लिये भी  तो शौर्य, साहस और संतुलन चाहिये। बढ़िया बन्दूक हाथ में हो पर मन में  घबराहट भरी रहे तो वह बेचारी बन्दूक क्या करेगी? चलेगी ही नहीं, चल भी गई तो निशाना ठीक नहीं लगेगा, दुश्मन सहज ही उससे इस बन्दूक को छीन कर उल्टा आक्रमण कर बैठेगा। इसके विपरीत साहसी लोग छत पर पड़ी ईंटों से और लाठियों से डाकुओं का मुकाबला कर लेते हैं। “ साहस वालों की ईश्वर सहायता करते  हैं”  यह उक्ति निरर्थक नहीं है। इसीलिए  तो कहा  गया है – 

“God  helps  those  who  help  themselves”  

सच तो यही है कि समस्त सफलताओं के मूल में प्राण शक्ति ही साहस, जीवट, दृढ़ता, लगन, तत्परता की प्रमुख भूमिका सम्पादन करती है और यह सभी विभूतियाँ प्राण-शक्ति सहचारी हैं। प्राण ही वह तेज है जो दीपक के तेल की तरह मनुष्य के नेत्रों में, वाणी में, गतिविधियों में, भाव-भंगिमाओं में, बुद्धि में, विचारों में प्रकाश बन कर चमकता है। क्या कोई दीपक तेल के बिना जल सकता है और उससे भी बढ़कर जब तक दीपक में तेल है तब तक वह  जलेगा। तेल  समाप्त होते ही दीपक बुझ जाता है।  इसी प्रकार जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक जीवन गतिशील है। मानव जीवन की वास्तविक शक्ति यही है। इस एक ही विशेषता के होने पर अन्यान्य अनुकूलताएं तथा सुविधाएं स्वयमेव उत्पन्न, एकत्रित एवं आकर्षित होती चली जाती हैं। जिसके पास यह विभूति नहीं उस दुर्बल व्यक्तित्व वाले की संपत्तियों को दूसरे बलवान लोग अपहरण कर ले जाते हैं। घोड़ा अनाड़ी सवार को पटक देता है। कमजोर की संपदा-जर, जोरू, जमीन दूसरे के अधिकार में चली जाती है।

जिसमें संरक्षण की सामर्थ्य नहीं वह उपार्जित सम्पदाओं को भी अपने पास बनाये नहीं रख सकता।

विभूतियाँ दुर्बल के पास नहीं रहतीं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विचारशील लोगों को अपनी समर्थता- प्राण शक्ति बनाये रखने तथा बढ़ाने के लिए भौतिक (Physical ) एवं आध्यात्मिक( spiritual ) प्रयत्न करने पड़ते हैं। भौतिक प्रयत्नों में अच्छा पौष्टिक भोजन खाना ,व्यायाम करना, अच्छी नींद लेना इत्यादि हैं। आध्यात्मिक प्रयत्नों में प्राण शक्ति के अभिवर्धन की सर्वोच्च प्रक्रिया “गायत्री उपासना” को माना गया है। उसका नामकरण इसी आधार पर हुआ है।

  1. शरीर में प्राण शक्ति ही निरोगता, दीर्घ-जीवन, पुष्टि एवं लावण्य के रूप में चमकती है। 
  2. मन में वही बद्धिमता, मेधा, प्रज्ञा के रूप में प्रतिष्ठित रहती है। 
  3. शौर्य, साहस, निष्ठा, दृढ़ता, लगन, संयम, सहृदयता, सज्जनता, दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता के रूप में उस प्राण शक्ति की ही स्थिति आँकी जाती है। 
  4. व्यक्तित्व की समग्र तेजस्विता का आधार यह प्राण ही हैं।    

शास्त्रकारों ने प्राण  की महिमा को मुक्त कण्ठ ( बेधडक़ ) से गाया है और मानव  को  इस  प्राणशक्ति का  परिचय कराते हुए बताया है कि वे इस शक्ति-स्रोत को कभी भी न भूले। आखिर मानव है तो उस परमपिता का ही अंश ,उसी की  सर्वोत्तम रचना।  रचनाकर ने उसी को यह अभूतपूर्ण कार्य सौंपा है।  कौन सा कार्य ?  इस प्राणशक्ति के  भाण्डागार ( warehouse or Godown )   के संरक्षण का कार्य।  मानव को  यह तथ्य  ध्यान में रखने के लिए कहा गया है कि  यदि जीवन लक्ष्य में सफलता प्राप्त करनी हो तो इस तत्व ( प्राण ) को उपार्जित, विकसित करने का प्रयत्न करें। प्राणवान बनें और अपनी विभिन्न शक्तियों में प्रखरता उत्पन्न होने के कारण पग-पग पर अदभुत सफलतायें- सिद्धियाँ मिलने का चमत्कार देखें।

जिस  प्राणशक्ति की हम बात कर रहे हैं केवल physical  strength ही न समझी जाये।  इसमें विवेक का बहुत बड़ा योगदान है अगर physical  strength  ही  प्राणशक्ति का मापदंड है तो मानव से अधिक  शक्तिशाली कितने ही और प्राणी हैं। लेकिन केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसने  evolution की कार्यप्रणाली से ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति की संज्ञा प्राप्त की है।   

प्राण की कमी  ही समस्त विपत्तियों का, अभावों और शोक-संतापों का कारण है। दुर्बल पर हर दिशा से आक्रमण होता है। भाग्य भी उसका साथ नहीं देता और मृत-लाश पर जैसे चील- कौए दौड़ पड़ते हैं वैसे ही दुर्बल मनुष्य पर विपत्तियाँ टूट पड़ती हैं। इसलिये हर बुद्धिमान को प्राण का आश्रय लेना ही चाहिये।  

केवल  व्यक्ति का व्यक्तित्व ही नहीं, इस सृष्टि का कण-कण इस प्राण शक्ति की ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहा है। जहाँ जितना जीवन है, प्रकाश है, उत्साह है, आनन्द है, सौंदर्य है, वहाँ उतनी ही प्राण की मात्रा विद्यमान समझनी चाहिये। उत्पादन शक्ति और किसी में नहीं केवल प्राण में ही है। जो भी प्रादुर्भाव, सृजन, आविष्कार, निर्माण, विकास-क्रम चल रहा है, उसके मूल में यही परब्रह्म की परम चेतना काम करती है। जड़ पंचतत्वों (भूमि, गगन, वायु, अग्नि, जल)  के चैतन्य की तरह सक्रिय रहने का आधार यह प्राण ही है। परमाणु उसी से सामर्थ्य ग्रहण करते हैं और उसी की प्रेरणा से अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। विश्व ब्रह्मांड के समस्त ग्रह, नक्षत्रों की गतिविधियाँ इसी प्रेरणा शक्ति से प्रेरित हैं।यह विश्वव्यापी प्राण शक्ति जहाँ जितनी अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती है, वहाँ उतनी ही सजीवता ( तेज़ी,फुर्ती)  दिखाई देने लगती है। मनुष्य में इस प्राण तत्व का बाहुल्य ही उसे अन्य प्राणियों से अधिक विचारवान, बुद्धिमान, गुणवान, सामर्थ्यवान एवं सुसभ्य बना सका है। अगर इस महान शक्ति-पुञ्ज का  उपयोग  केवल भौतिक उपयोग करने तक ही सीमित रह जाय तो केवल शरीरिक  यात्रा ही संभव हो सकती है और अधिकाँश मानव पशुओं की तरह केवल सामान्य जीवन  ही जी सकते हैं। पर यदि उसे अध्यात्म विज्ञान ( Scientific  spirituality ) के माध्यम से अधिक मात्रा में बढ़ाया जा सके तो गई-गुजरी स्थिति से ऊंचे उठ कर उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना संभव हो सकता है।  

Scientific  spirituality आज के युग का बहुत ही common  टॉपिक है। आज के प्रतक्ष्यवाद युग में किसी भी कार्यप्रणाली पर विश्वास करने के लिए तथ्य देने  के बावजूद प्रतक्ष्य प्रमाण अत्यंत आवश्यक है।   Everyone needs a proof for everything  

स्वर्ग और नर्क की परिभाषा :

 गई-गुजरी आध्यात्मिक एवं भौतिक परिस्थितियों में पड़े रहना, मानव-जीवन में मिल सकने वाले आनंद- उल्लास से वंचित रहना, मनोविकारों और उनकी दुखद प्रतिक्रियाओं से विविध विधि कष्ट-क्लेश सहते रहना – यही तो नरक है। देखा जाता है कि इस धरती पर रहने वाले अधिकाँश मानव  नरक की यातनाएं सहते हुए ही समय बिताते हैं। आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण सभी महत्वपूर्ण सफलताओं से वंचित रहते हैं। हो सकता है ऐसे लोगों में धन -वैभव की कोई भी कमी न हो, समाज में  उच्च प्रतिष्ठा हो लेकिन अंतःकरण की दुर्बलता और अशांति से ग्रस्त ऐसा मानव कितना सुखी है हम सब भली प्रकार जानते हैं। कितने प्रतिशत मानव यह कहने में समर्थ हैं कि “ हम स्वर्ग के वासी हैं”

इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्राण- तत्व का सम्पादन करना आवश्यक है। सम्पादन कोें इंग्लिश में एडिटिंग कहते हैं I जैसे किसी पुस्तक की एडिटिंग।  लेकिन यहाँ हम प्राण-तत्व की एडिटिंग कर हैं। प्राण को ठीक- ठाक  करके ,अच्छी प्रकार प्रस्तुत करना।  Books or articles are edited before presentation ,just as we edit our lekhs many times before presenting before you .

 क्या है यह प्राणशक्ति और गायत्री मन्त्र से कैसे इस प्राण शक्ति का अभिसिंचन होता है , आइये देखें। एक बार फिर हम इस महामंत्र का हिंदी अनुवाद देखें :  

उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। अर्थात् ‘सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के प्रसिद्ध  तेज का (हम) ध्यान करते हैं, वे परमात्मा हमारी बुद्धि को (सत् की ओर) प्रेरित करें।

उस प्राणस्वरूप ,देवस्वरूप परमात्मा को अपने अंतःकरण में धारण करें  जो हमारी बुद्धि  को सन्मार्ग में प्रेरित करे 

परमात्मा को प्राणस्वरूप कहा  गया है।  सच में यह परमात्मा ही है जो  हमारे  अंतःकरण में विराजमान हैं और हमें शक्ति ,प्राणशक्ति प्रदान कर रहे हैं।  उसी शक्ति से हमारे शरीर की सब क्रियाएं चल रही हैं।  खाना ,पीना, सोना ,जागना ,चलना ,भागना ,पढ़ना ,लिखना ,सोचना ,समझना इत्यादि इत्यादि।  कोई भी ऐसी क्रिया नहीं जो इस प्राणशक्ति के बिना चल सकती है।  यह कोई अंधविश्वास नहीं है  गूढ़ विज्ञान है।  अगर हम अपने शरीर को ब्रह्माण्ड  का ही जीता जगता स्वरूप समझें तो शायद गलत न हो क्योंकि जिस प्रकार  ब्रह्माण्ड  अनंत है इसी प्रकार हमारा  

शरीर भी अनंत है।  अनंत का अर्थ है जिसका कोई अंत न हो।  अगर मोटे  तौर पर हम ब्रह्माण्ड को समझना चाहें तो ऐसा कह सकते हैं  हमारे आस पास जो कुछ भी है  ब्रह्माण्ड है और हमारी उपस्थिति इस अनंत अथाह सागर में एक छोटे से कण से भी कम है। इस अथाह सागर में डूब कर ,उस परमपिता परमात्मा   के साथ एकरूप होने की प्रक्रिया को  प्राण -प्रक्रिया  का नाम दिया गया है। यह प्राण शक्ति के अभिसिंचन की प्रथम सीढ़ी है। इसके बाद ध्यान, प्राणायाम आदि  बाकि की कठिन  साधनायें आती हैं। 

To  be  continued ,  क्रमशः जारी 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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सजल श्रद्धा- प्रखर प्रज्ञा स्मारकों की उत्पति

ऑनलाइन ज्ञानरथ के समर्पित सहकर्मियों को हमारा हृदय से नमन अभिनंदन एवं आभार : आज का ज्ञान प्रसाद May 10,2020 चेतना की शिखर यात्रा 3 ”

सजल श्रद्धा- प्रखर प्रज्ञा स्मारकों की उत्पति “

8 नवंबर 1981 का दिन था । एक बहुत ही महत्वपूर्ण तिथि । देवउत्थान एकादशी – पौराणिक गाथाओं के अनुसार इस दिन भगवन विष्णु चार महीने की निद्रा से जागते हैं । चार महीने की नींद का अपना महत्त्व है । इस अवधि में सभी कार्य जैसे विवाह इत्यादि बंद होते हैं । इस दिन संध्या के समय गुरुदेव के पास चार पांच कार्यकर्त्ता बैठे थे । इनमें से दो बाहर के और बाकि शांतिकुंज के स्थाई जीवनदानी थे । चर्चा आगामी दिनों की योजना की चल रही थी । गुरुदेव ने सहसा ही कहा अगले दिनों हमें शांतिकुंज के ऋषिकेश रोड वाले गेट की तरफ दो छतरियां बनवानी हैं। कार्यकर्ता इस बात का आशय समझने के लिए सजग हो गए । गुरुदेव ने कहा : जब हम और हमारे बाद माता जी शरीर छोड़ देंगे तो हम लोगों के अवशेष इन छतरियों में स्थापित किये जायेंगें । हम लोग शांतिकुंज में ही निवास करेंगें । यह छतरियां हमारा स्थूल स्वरुप का प्रतिनिधित्व करेंगी I इतनी बात सुनते ही कार्यकर्ता सोचने लगे शायद गुरुदेव शरीर छोड़ने की योजना बना रहे हैं । सभी मन ही मन सोचने लगे गुरुदेव के बाद हम कैसे जियेंगें । कोई भी समस्या होती गुरुदेव से आकर कहते उनका निवारण हो जाता । अब कैसे होगा -इत्यादि इत्यादि – एक कार्यकर्त्ता बिलख बिलख रोने लगे । कार्यकर्ताओं को उदास देख कर गुरुदेव बोले:

“अरे मैं शरीर छोड़ने के बाद भी यहीं रहने की बात कर रहा हूँ । तुम लोग ऐसे दुखी हो रहे हो जैसे मैं अभी ही अपनी काया- माया समेट कर जा रहा हूँ ।”

गुरुदेव ने वार्ता की दिशा बदली और हलकी- फुल्की बातें करनी शुरू कीं।

गुरुदेव ने कहा

“अभी मैं कम से कम नौ वर्ष इधर हूँ । इन छतरियों के बारे में विशेष बात यह है कि यह हमारे जीते जी निर्मित हो रही हैं । विश्व में शायद कोई ही स्मारक ऐसा हो जो उस के जीते जी बना हो । लेकिन यह छतरियां स्मारक थोड़े है। यह हमारा निवास है । मरण ने बाद हमारे पार्थिव स्वरुप का निवास “

चर्चा यहीं पूरी हुई । इसके बाद गुरुदेव के बताए स्थान पर दो छतरियों का निर्माण शुरू हुआ । उसके निर्माण के लिए विभिन्न तीर्थों से जल -रज और आवश्यक शिलायें मंगाई गयीं जिन्हे छतरी के गर्भ में स्थापित किया गया ।निर्माण के दौरान प्रतिदिन गुरुदेव यहाँ आते और निरिक्षण करते । कभी कभार पथरों को छू कर भी देखते । जो परिजन वहां पे मौजूद होते उन्हें लगता गुरुदेव अपने दिव्य स्पर्श से उस सामग्री में प्राण चेतना का संचार कर रहे हैं ।1982 की वसंत पंचमी को वह स्मारक बन कर पूरा हो गया और उस समय गुरुदेव ने उसका नामकरण किया ” प्रखर प्रज्ञा -सजल श्रद्धा “I स्थापना के समय माता जी भी उपस्थित थीं । परिजनों में यह आशंका आ रही थी कि शायद गुरुदेव या माता जी अपनी लीला समेटने की तैयारी कर रहे हैं गुरुदेव ने उनका मन पढ़ लिया और कहने लगे :

“अब हमारी उपस्थिति को हमेशा के लिए सुनिश्चित मान लिया जाये, जो हमारे साथ अंतस से जुड़े हुए हैं उन्हें इस बात की सच्चाई का आभास आने वाले दिनों में और प्रगाढ़ महसूस होगा ।

जिस जगह स्थापना की गयी वहां पास ही कुछ वर्ष विशेष दिनों पर जैसे 26 जनवरी , 15 अगस्त को गुरुदेव ध्वजारोहण करते रहे । 1982 की वसंत पंचंमी को गुरुदेव ने वहीं ध्वजारोहण किया । उस दिन आयोजन स्थल पर अद्भुत शांति थी । उपस्थित परिजनों को लगा कि ध्यान या साधना जैसी अवस्था है । प्रातः 8 बजे का समय रहा होगा । सूर्योदय के समय, यज्ञ स्थलियों के पीछे से , पूर्व दिशा से सूर्य लालिमा समाधि स्थल को अरुणिम आभा से आवृत ( envelop of dawn glow ) । गुरुदेव और माता जी के हाथों से स्थापना संस्कार आरम्भ हुआ तो धुप आहिस्ता आहिस्ता सिमटने लगी । आकाश में बादल सिमटने लगे और बादलों ने बूंदाबांदी की लहर छोड़ दी ।लगता था गायत्री नगर में इंदर देव ने जैसे छिड़काव किया हो ।पवित्रीकरण की तरह हुई इस बूंदाबांदी के बाद आकाश कुछ ही मिनटों में साफ़ हो गया । वसंत की शीतल धूप फिर खिल उठी ।

समारोह सम्पन्न हुआ ।प्रणाम का दौर शुरू हुआ । गुरुदेव माता जी शांतिकुंज के मुख्य भवन में अखंड दीप के पास परिजनों से मिल रहे थे । इन स्मारकों की स्थापना के बाद परिजनों में कई तरह के प्रश्न उठ रहे थे पर सभी संकोच कर रहे थे पूछें तो कैसे पूंछें । इस असमंजस ने एक पुराने परिजन को बुरी तरह व्यथित कर दिया । वह इतना अधिक विचलित दिखाई दिए तो गुरुदेव ने पूछ ही लिया

“क्या बात है मोहन ,कुछ दिनों से बहुत अधिक परेशान दिखाई दे रहे हो ,मुझे बताओ क्या बात है ।”

मोहन ने कहा-

” गुरुदेव मैं क्या बताऊँ, आप अच्छी तरह जानते हो । “

तू इस परेशानी से उबरना चाहता है – गुरुदेव ने कहा ।

मोहन ने कहा -आप जैसा ठीक समझें ।

इसके बाद गुरुदेव ने कहा कि मथुरा छोड़ने से महीने पहले मैंने कहा था :

” मेरे मरने के बाद यह शरीर किसी प्रयोगशाला को सौंप दिया जायेI यहाँ जीवविज्ञान पढ़ने वाले विद्यार्थी इसे चीरें फाड़ें और शरीर के सम्बन्ध में अपना ज्ञान बढ़ाएं। इससे बाद शरीर के सभी अंग निकाल लिए जाएँ और उन्हें ज़रूरत मंदों के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया जाये । शरीर के वे हिस्से जो किसी काम न आयें उन्हें जंगल में फ़ेंक दिया जाये ताकि चील कौवे उनसे अपना उदर भरण कर लें ।”

यह कह कर गुरुदेव रुके और उन्होंने देखा कार्यकर्त्ता के चेहरे पर संतोष का भाव था कि गुरुदेव ने उनके मर्म को समझ लिया है ।

गुरुदेव कहने लगे –

“अब छतरियों कि स्थापना से तुम्हे लगेगा कि पहले की हुई बात और अखंड ज्योति में छपी उन घोषणाओं का क्या होगा ।लोग जब घोषणओं की तुलना करेंगें तो तुम्हारे गुरु के बारे में अपवाद फैलेगा। पर तुम्हे तो अपने गुरु पे विश्वास है न ।”

” हाँ गुरुदेव ” -कार्यकर्त्ता ने कहा । तो सुन।

गुरुदेव कहने लगे :

” विदाई से पहले जो घोषणायें की थीं वे अक्षरशः सही हुई हैं और जो बची हैं वे भी सही होंगी । यथासमय उन घटना क्रमों का साक्षात भी हो जायेगा ।यह शरीर वही नहीं है जो मथुरा छोड़ कर हरिद्वार आया था ।यहाँ से अपने गुरु के पास चला गया था । अभी के लिए इतना ही काफी है ।अगर कोई दुनियादार तुमसे पूछे तो कहना मेरे गुरु ने अपने आप को हज़ारों लाखों कार्यकर्ताओं में बाँट दिया है । कई आदिवासियों के शरीर चील कौओं के लिए जंगलों में छोड़ दिए गए हैं । तुम ऐसे लोगों के नाम ,निवास और परिचय अदि भी दे सकते हो पर ध्यान रखना जिनकी फितरत संदेह की हो उनको संतुष्ट करना कठिन होगा ।”

गुरुदेव ने इन कार्यकर्त्ता को एक प्राचीन ऋषि का नाम दिया । बाकि दुनिया के लिए यही नाम था लेकिन गुरुदेव मोहन नाम से ही पुकारते थे ।1990 में गुरुदेव के महाप्रयाण के उपरांत इन्होने मोहन नाम लिखना ही छोड़ दिया ।उनका कहना था कि इस नाम को पुकारने वाला ही जब चला गया तो इसे लिखने का क्या औचित्य । सजल श्रद्धा प्रखर प्रज्ञा के बारे में गुरुदेव ने एक और रहस्य बताया । हज़ारों वर्ष पूर्व राजा भागीरथ के पीछे- पीछे माँ गंगा जिस मार्ग से चली वह सजल श्रद्धा -प्रखर प्रज्ञा के नीचे से ही गुज़रता है ।भूगर्भ विज्ञानी भी इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं । गुरुदेव माता जी की समाधि के पास श्रद्धा सुमन अर्पित करते एवं ध्यान करते साधक अपने अनुभव कई बार अखंड ज्योति में प्रकाशित करवा चुके हैं । यह स्मारक अनवरत साधकों को मार्गदर्शन देते आ रहे हैं एवं गुरुदेव माता जी की अनुपस्थिति में अपने प्रश्नो का समाधान पाते जा रहे हैं ।

जय गुरुदेव

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गायत्री महामंत्र के विभिन्न साधना स्तर

27 दिसंबर 2020 का ज्ञानप्रसाद

प्रायः हमें कमेंट करके गायत्री साधना के बारे में प्रश्न किये जाते रहे हैं ,यह कब करनी चाहिए और इसका क्या विधान है। परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री साधना को अत्यंत सरल तरीके से इस लेख में वर्णन किया है आशा है ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों को इससे लाभ होगा और यह लाभ तभी पूर्ण समझा जाना चाहिए जब यह गुरुदेव के कथन अनुसार 5 से 25 और 25 से 625 परिजनों तक पहुंचे।

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सामान्य स्तरीय साधना

गायत्री महामन्त्र की सामान्य स्तरीय साधना स्नान, पूजन, जप आदि क्रिया-कलापों से आरंभ होती है। इस स्तर के साधक जब सामने आते हैं, तब उनकी मनोभूमि के अनुरूप यही बताया जाता है कि-

” वे शरीर और वस्त्रों को शुद्ध कर, पवित्र आसन बिछाये, जल और अग्नि का सान्निध्य लेकर बैठे। जल-पात्र पास में रख लें और अगरबत्ती या अग्नि जला लें। गायत्री माता की प्रतिमा, साकार होने पर चित्र के रूप में और निराकार होने पर दीपक के रूप में स्थापित कर लें जिससे माता का सान्निध्य प्राप्त होता रहे। पुष्प, गंध, अक्षत, नैवेद्य जल आदि से पूजा-अर्चा करें।

1.पवित्रीकरण, 2.आचमन, 3.शिखाबंधन, 4.प्राणायाम, 5.न्यास, 6. पृथ्वी पूजन – इन षट्-कर्मों से शरीर, मन और स्थान पवित्र करके माला की सहायता से जप आरंभ करें। ओंठ, जीभ चलते रहें पर ध्वनि इतनी मन्द हो कि पास बैठा हुआ व्यक्ति उसे ठीक तरह सुन-समझ न सके। जब जप पूरा हो जाये तो स्थापित जल-पात्र से सूर्य भगवान को अर्ध प्रदान करे। “

सामान्य साधना का इतना ही विधान है।

क्रिया-कृत्य में-कर्मकाण्ड में जब मन लगने लगे और यह विधि-विधान अभ्यास में आ जाए, उपासना में श्रद्धा स्थिर हो जाये और मन रुचि लेने लगे तब समझना चाहिए कि आरंभिक बाल-कक्षा पूरी हो गई और अब उच्चस्तरीय प्रौढ़ साधना की कक्षा में प्रवेश करने का समय आ गया।

प्रौढ़ साधना में भावना स्तर का विकास करना होता है। प्रथम साधना में व्यथा का अभ्यास-नियमितता का स्वभाव बनाना होता है। नियत समय-नियत संख्या-नियत विधि-व्यवस्था-यह तीन आधार प्राथमिक साधन के हैं। उनकाअभ्यास में ढाल लेना भी कोई कम महत्व की बात नहीं। देखा जाता है कि उपासना करने वाले का समय व्यवस्थित नहीं होता। आलस और गपशप में, व्यर्थ की बातों में समय गंवाते रहते हैं और उपासना के समय में घंटों का हेरफेर कर देते हैं।

औषधि सेवन का और व्यायाम का एक नियत समय होता है। नियत मात्रा, संख्या का भी ध्यान रखना होता है। कभी व्यायाम सवेरे, कभी दोपहर को, कभी रात को किया जाये- कभी 5 बैठक कभी 60 बैठक और कभी-कभी 200 लगाई जायें तो वह व्यायाम उपयोगी न हो सकेगा। इसी प्रकार औषधि-सेवन भी कभी रात में, कभी दिन में, कभी दो-पहर-कभी रत्ती भर, कभी तोला भर, कभी छटांक भर मात्रा खाई जाये तो उससे रोग निवृत्ति में कोई सहायता न मिलेगी।

प्रारंभिक साधकों को जप की चाल नियमित करने के लिए माला का आश्रय लेना पड़ता है। साधारणतया 1 घंटे में 10 माला की उच्चारण गति होनी चाहिए। इसमें थोड़ा अन्तर हो सकता है, पर बहुत अन्तर नहीं होना चाहिए। घड़ी और माला का तारतम्य मिलाकर जप की चाल को व्यवस्थित करना होता है। चाल तेज हो तो धीमी की जाये, धीमी हो तो उसमें तेजी लाई जाये। इस नियंत्रण में उच्चारण क्रम व्यवस्थित हो जाता है। सन्ध्याकाल जप के लिए नियत है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त का काल एक नियमित समय है। इसमें थोड़ा आगे-पीछे किया जा सकता है, पर बहुत अन्तर नहीं होना चाहिए। बात ऐसी नहीं कि अन्य काल में करने से कोई नरक को जायेगा या माता नाराज हो जायेगी। बात इतनी भर है कि समय नियत-नियमित होना चाहिए। नियमितता में बड़ी शक्ति है। जिस प्रकार चाय सिगरेट की अपने समय पर ‘भड़क’ उठती है, वैसी ही भड़क नियत समय पर उपासना के लिए उठने लगे तो समझना चाहिए कि उस क्रम व्यवस्था ने स्वभाव में स्थान प्राप्त कर लिया। नियत विधि व्यवस्था, नियत स्थान, नियत क्रम, नियत सरंजाम जुटाने के लिये जब हाथ नेत्र अभ्यस्त हो जायं तो समझना चाहिये कि प्रारंभिक कक्षा का साधना क्रम पूर्ण हो गया। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक पूर्वाभ्यास ही जारी रखना होता है। अनुभवी मार्ग-दर्शन, साधकों को तब तक इस प्राथमिक उपासना में ही लगाये रहते हैं जब तक वे समय, संख्या और व्यवस्था इन तीनों क्षेत्रों में नियमित नहीं हो जाते-कर्मकाण्ड-विधि विधान-साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।

उच्चस्तरीय साधना

उच्चस्तरीय साधना का प्रमुख प्रयोजन है, भावनात्मक विकास, विचारणा एवं चेतना का परिष्कार। इसके लिए आवश्यक कर्मकाण्ड विधि विधान जारी तो रहते हैं पर सारा जोर इस बात पर दिया जाता है कि तन्मयता एवं एकाग्रता बढ़े। आमतौर से साधकों का मन जहाँ-तहाँ भागता फिरता है, चित्त स्थिर नहीं रहता, उपासना के समय न जाने कहाँ-कहाँ के विचार आते हैं। यह स्थिति आत्मिक विकास में प्रथम बाधा है।

इस समस्या का समाधान:

इस समस्या का समाधान करने के लिए उच्चस्तरीय साधना में प्रथम प्रयत्न यह करना पड़ता है कि मन की एकाग्रता हो और हृदयगत तन्मयता बढ़े। यह प्रयोजन पूरा हो जाने पर तीन चौथाई मंजिल पूरी हुई समझनी चाहिए। उच्चस्तरीय साधना की सफलता पूर्वार्ध की क्रियाओं पर आधारित है। उत्तरार्ध में वे विशिष्ट साधनायें करनी पड़ती हैं जो 1. प्राण शक्ति की प्रखरता, 2. शारीरिक तपश्चरण, 3. मानसिक एकाग्रता, 4. भावनात्मक तन्मयता एवं 5. उग्र मनोबल के आधार पर विशिष्ट विधि-विधानों के साथ पूरी की जाती हैं।

आशा करते हैं पाठकों को उत्तरार्ध और पूर्वार्ध का ज्ञान होगा। फिर भी जिन्हें नहीं मालूम पूर्वार्ध first half और उत्तरार्ध second half होता है। उदाहरण के तौर पर 10 वर्ष की अवधि में पहले 5 वर्ष पूर्वार्ध हैं और अगले 5 उत्तरार्ध हैं

ऊपर वाली ऊंची भूमिकाएं अनायास ही नहीं आ जाती, उन्हें छलाँग मार कर प्राप्त नहीं किया जा सकता। छुटपुट कामयाबी की पूर्ति के लिए साधारण अनुष्ठान काम चलाऊ परिणाम उपस्थित कर देते हैं। यह एक प्रकार के सामाजिक उपचार हैं। दर्द बंद करने के लिये कोई नशीली औषधि तत्काल चमत्कारी लाभ दिखा सकती है। पर जिस दर्द को उसके कारणों समेत समूल नष्ट करना हो उसे स्वास्थ्य सुधार की सारी प्रक्रिया आहार बिहार के संशोधन सहित आरंभ करनी होगी और दीर्घ काल तक उस मंजिल पर सावधानी के साथ चलते रहना होगा। ठीक यही बात उपासना के संबंध में है। तात्कालिक संकट निवृत्ति के लिए कोई बीज मंत्र अनुष्ठान, यज्ञ या क्रिया कृत्य काम दें सकता है पर जिस आधार पर मानव जीवन को समग्र रूप में कृतकृत्य बनाया जा सके, ऐसी साधना जो मंजिल दर मंजिल चलने की ही हो सकती है केवल दूरदर्शी साधक ही धैर्यपूर्वक , श्रद्धापूर्वक इस आधार का अवलम्बन ( पालन ) करते हैं।

तीसरा ध्यान सविता ब्रह्म के गायत्री स्वरूप का दर्शन करने का है। प्रातःकाल जिस प्रकार संसार में अरुणिमा युक्त स्वर्णिमा आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य भर्ग ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं उसी प्रकार उस अनन्त आकाश की पूर्व दिशा में से ब्रह्म की महान शक्ति गायत्री का उदय होता है। उसके बीच अनुपम सौंदर्य से युक्त अलौकिक सौंदर्य की प्रतिमा जगद्धातृ गायत्री माता प्रकट होती है। वे हंसती-मुस्कराती अपनी ओर बढ़ती आ रही हैं। हम बालसुलभ किलकारियाँ लेते हुए उनकी ओर बढ़ते चले जाते हैं। दोनों माता-पुत्र आलिंगन आनन्द से आबद्ध होते हैं और अपनी ओर से असीम वात्सल्य की गंगा-यमुना प्रवाहित हो उठती है दोनों का संगम परम पावन तीर्थराज बन जाता है।

हमारे परिजनों में से अधिकाँश ऐसे हैं जिन्हें उपासना मार्ग पर चलते हुए कुछ समय हो गया। भले ही उनका क्रम व्यवस्थित न रहा हो, पर इस दिशा में उनके कुछ कदम जरूर उठे हैं। ऐसे लोग इस उच्चस्तरीय प्रशिक्षण के उपयुक्त होंगे। जिन्होंने एक कदम भी इस ओर नहीं उठाया है, उन्हें कुछ समय ( कम से कम तीन महीने ) अपनी उपासना प्रकृति व्यवस्थित करने में लगाने चाहिएं। देर से जो लोग उपासना करते चले आ रहे हैं पर जो अभी तक नियमित नहीं हो गये उन्हें भी गिनती भूल जाने पर नये सिरे से गिनने का क्रम आरंभ करना चाहिए। यदि लगन सच्ची है और इस मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प किया गया हो तो ‘नियमितता’ ( Regularity ) का प्रारंभिक अभ्यास तीन महीनों में भी पूरा हो सकता है।

It is just like reorientation before going back to job after a long break.

हर वस्तु समय पर अपना फल देती है। यों शुभ कार्य का प्रारंभ भी तत्काल आनंद उल्लास की एक किरण प्रदान करता है और सन्मार्ग पर चलने की प्रत्यक्ष अनुभूति नकद धर्म की तरह अविलम्ब होती है फिर भी किसी तथ्य के समुचित विकास में कुछ समय तो लगता ही है। आम के पेड़ पाँच वर्ष में फल देते हैं। उच्चस्तरीय साधना के परिपाक में इतना समय तो चाहिए ही।

शुभारंभ के लिए प्रत्येक गायत्री उपासक एक दिन का उपवास करे, दूध फल लेकर रहे। पूजा के पुराने उपकरणों को बदल कर नए सिरे से नवीन वस्तुएं सुसज्जित करें। जिनके घर में पूजास्थली न हो वे एक चौकी पर गायत्री माता का चित्र तथा पूजा के अन्य उपकरण सजा लें। स्थान ऐसा चुनें जहाँ कम से कम खटपट रहती हो और जिसे बार-बार बदलना न पड़े। बन पड़े तो उस दिन घी का अथवा तिल के तेल का अखण्ड दीपक एक दिन के लिये जलाया जाए। पुष्पों से पूजा स्थली सजाई जाए।

उस दिन सूर्योदय से पूर्व उठ कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूजास्थली पर शाँत चित्त से बैठें और मन ही मन इस प्रतिज्ञा को दैव प्रतिमा के सम्मुख दुहराएं कि-

” मैं नियमित और व्यवस्थित उपासना करूंगा। लकीर नहीं पीटूँगा I साधना से भावनाओं का समावेश कर के उसे सर्वांगपूर्ण बनाऊंगा। मेरी उपासना आत्मिक प्रगति में सार्थक रूप से सहायक हो ऐसा सच्चे मन से प्रयत्न करूंगा। माता मेरी इस प्रतिज्ञा को सफल बनाने में सहायता करे।” आधा घंटा इस संकल्प को ही मनन-चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं। अन्त में 24 आहुतियों का हवन किया जाए। यदि हवन का विधान न मालूम हो और संकल्प सामग्री न हो तो 24 घी की आहुतियाँ गायत्री मंत्र से दी जा सकती हैं। अन्त में आरती उतार ली जाये और सूर्य भगवान को जल का अर्ध दिया जाए।

उच्स्तरीय साधना में ध्यान प्रधान हो जायेगा और जप गौण। प्रारंभिक बाल कक्षा में अक्षर लिखना प्रधान कार्य रहता है और पुस्तक पढ़ना गौण माना जाता है उसी प्रकार नियमितता के प्रारंभिक अभ्यास की प्राथमिकता साधना में जप संख्या को प्रधानता दी जाती है। ध्यान के लिए थोड़ा-सा आधार इतना ही रहता है कि गायत्री माता का स्वरूप चित्र या प्रतिमा के रूप में सामने रखकर इसका दर्शन अधखुले नेत्रों से करते रहा जाये ताकि वह स्वरूप ध्यान का आधार बन सके। उच्चस्तरीय साधना में यह क्रम बदल जाता है। ऊंची कक्षाओं के छात्रों में पढ़ना अधिक होता है और लिखना कम। इसी प्रकार उच्चस्तरीय साधना में ध्यान को प्रमुखता देनी पड़ती है। जप को नित्य-कर्म की संज्ञा में रखकर उसे चालू तो रखा जाता है। समय भी उसी पर अधिक लगाया जाता है। इस स्तर की साधना में जप संख्या न्यूनतम एक माला (108 मंत्र) और अधिकतम 5 माला (540 मंत्र) पर्याप्त है। शेष जितना भी समय बचता हो ध्यान में लगाया जाना चाहिए।

ध्यान के लिए जितना समय निर्धारित किया जाये, उसका 1/3 वातावरण का 1/3 भाग उपासक का अपना और 1/3 भाग उपास्य का (गायत्री का ) ध्यान करने में लगाया जाए। साधारणतया आधा घंटा इसके लिए रह जाना चाहिए। इसमें से 10-10 मिनट प्रस्तुत तीनों ध्यान करने में लगायें।

प्रलय के समय बची हुई अनन्त जलराशि में कमल के पत्ते पर तैरते हुए बाल भगवान का चित्र बाजार में बिकता है। यह चित्र खरीद लेना चाहिए और उसी के अनुरूप अपनी स्थिति अनुभव करनी चाहिए।

पहला ध्यान

इस संसार के ऊपर नील आकाश और नीचे नील जल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। जो कुछ भी दृश्य पदार्थ इस संसार में थे वे इस प्रलय काल में ब्रह्म के भीतर तिरोहित हो गई। अब केवल अनन्त शून्य बना है जिनमें नीचे जल और ऊपर आकाश के अतिरिक्त और कोई वस्तु शेष नहीं। यह उपासना भूमिका के वातावरण का स्वरूप है।

दूसरा ध्यान जो एक तिहाई समय में किया जाता है, यह है कि मैं कमल पत्र पर पड़े हुए एक वर्षीय बालक की स्थिति में निश्चिन्त भाव से पड़ा क्रीड़ा-कल्लोल कर रहा हूँ। न किसी बात की चिन्ता है, न आकाँक्षा और न आवश्यकता। पूर्णतया निश्चिन्त, निर्भय, निर्द्वन्द्व, निष्काम जिस प्रकार छोटे बालक की मनोभूमि हुआ करती है, ठीक वैसी ही अपनी है। विचारणा का सीमित क्षेत्र एकाकीपन के उल्लास में ही सीमित है। चारों और उल्लास एवं आनन्द का वातावरण संव्याप्त है। मैं उसी की अनुभूति करता हुआ परिपूर्ण तृप्ति एवं सन्तुष्टि का आनन्द ले रहा हूँ।

माता और पुत्र के बीच क्रीड़ा कल्लोल भरा स्नेह-वात्सल्य का आदान प्रदान होता है। उसका पूरी तरह ध्यान ही नहीं भावना भूमिका से भी उतारना चाहिये। बच्चा माँ के बाल, नाक, कान आदि पकड़ने की चेष्टा करता है, मुँह नाक में अंगुली देता है, गोदी में ऊपर चढ़ने की चेष्टा करता है, हंसता मुस्कराता और अपने आनन्द की अनुभूति उछल-उछल कर प्रकट करता है वैसी ही स्थिति अपनी अनुभव करनी चाहिये। माता अपने बालक को पुचकारती है, उसके सिर पीठ पर हाथ फिराती है, गोदी में उठाती-छाती से लगाती दुलराती है, उछालती है वैसी ही चेष्टायें माता की ओर से प्रेम उल्लास के साथ हंसी मुसकान के साथ की जा रही है ऐसा ध्यान करना चाहिए।

स्मरण रहे केवल उपर्युक्त दृश्यों की कल्पना करने से ही काम न चलेगा वरन् प्रयत्न करना होगा कि वे भावनायें भी मन में उठें, जो ऐसे अवसर पर स्वाभाविक माता पुत्र के बीच उठती उठाती रहती हैं। दृश्य की कल्पना सरल है पर भाव की अनुभूति कठिन है। अपने स्तर को वयस्क व्यक्ति के रूप में अनुभव किया गया तो कठिनाई पड़ेगी किन्तु यदि सचमुच अपने को एक वर्ष के बालक की स्थिति में अनुभव किया गया, जिसके माता के स्नेह के अतिरिक्त और यदि कोई प्रिय वस्तु होती ही नहीं, तो फिर विभिन्न दिशाओं में बिखरी हुई अपनी भावनायें एकत्रित होकर उस असीम उल्लास भरी अनुभूति के रूप में उदय होंगी जो स्वभावतः हर माता और हर बालक के बीच में निश्चित रूप से उदय होती हैं।

प्रौढ़ता भुला कर शैशव ( infant ) का शरीर और भावना स्तर स्मरण कर सकना यदि संभव हो सका तो समझना चाहिये कि साधक ने एक बहुत बड़ी मंजिल पार कर ली।

मन प्रेम का गुलाम है। मन भागता है पर उसके भागने की दिशा अप्रिय से प्रिय भी होती है। जहाँ प्रिय वस्तु मिल जाती है वहाँ वह ठहर जाता है। प्रेम ही सर्वोपरि प्रिय है। जिससे भी अपना प्रेम हो जाए वह भले ही कुरूप या निरूप भी हो पर लगती परम प्रिय है। मन का स्वभाव प्रिय वस्तु के आस-पास मंडराते रहने का है। उपर्युक्त ध्यान साधना में गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत है। सर्वांग सुन्दर प्रेम की अधिष्ठात्री गायत्री माता का चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।

इस ध्यान धारणा में गायत्री माता को केवल एक नारी-मात्र नहीं माना जाता है। वरन् उसे सत् चित् आनन्द स्वरूप-समस्त सद्गुणों, सद्भावनाओं, सत्यप्रवृत्तियों का प्रतीक, ज्ञान-विज्ञान का प्रतिनिधि और शक्ति सामर्थ्य का स्रोत मानता है। प्रतिमा नारी की भले ही हो पर वस्तुतः वह ब्रह्म-चेतना क्रम दिव्य ज्योति बन कर ही-अनुभूति में उतरे।

जब माता के स्तन पान का ध्यान किया जाए तो यह भावना उठनी चाहिये कि यह दूध एक दिव्य प्राण है जो माता के वक्षःस्थल से निकल कर मेरे मुख द्वारा उदर में जा रहा है और वहाँ एक धवल विद्युत धारा बन कर शरीर के अंग प्रत्यंग, रोम-रोम में ही नहीं वरन् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, हृदय, अन्तःकरण, चेतना एवं आत्मा में समाविष्ट हो रहा है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोशों में समाये हुए अनेक रोग शाकों कषाय कल्मषों का निराकरण कर रहा। इस पय पान का प्रभाव एक कायाकल्प कर सकने वाली संजीवनी रसायन जैसा हो रहा है। मैं नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, अणु से विभु, क्षुद्र से महान और आत्मा से परमात्मा के रूप में विकसित हो रहा हूँ। ईश्वर के समस्त सद्गुण धीरे-धीरे व्यक्तित्व का अंग बन रहे हैं। मैं दु्रतगति से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मेरा आत्म-बल असाधारण रूप में प्रखर हो रहा है।

उपासना की समाप्ति

उपर्युक्त ध्यान करने के बाद उपासना समाप्त करनी चाहिये। आरती और सूर्य आदि के पश्चात यह साधना समाप्त हो जाती है। उत्तम तो यह है कि यह उपासना स्नान कर के, धुले वस्त्र पहन कर की जाए। इससे शरीर और मन हल्का रहने से मन ठीक तरह लगता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक दुर्बलता अथवा साधनों की असुविधा के कारण स्नान करने में असमर्थ हो तो इस कठिनाई के कारण उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं। हाथ पैर मुँह धोकर-यथा संभव वस्त्र आदि बदलकर भी साधना की जा सकती है। उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है। फिर ध्यान साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है। इसलिये शारीरिक शुद्धि की अधिकाधिक व्यवस्था तो की जाए पर उसे इतना अनिवार्य न बनाया जावे कि स्नान न हो सका तो साधना भी छोड़ दी जाए। रोगी, अपाहिज, जरा जीर्ण और असमर्थ व्यक्ति भी जिस साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है। मैले कुचैले गंदे शरीर समेत उत्पन्न हुये नवजात बछड़े की गाय अपनी जीभ से चाट कर उसे शुद्ध कर देती है तो क्या हमारी साध्य माता-स्नान न कर सकने जैसी आपत्तिकालीन असुविधा को क्षमा न कर सकेगी?

इति श्री

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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