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दो गुरु-शिष्यों के मार्मिक ( दिल को छू जाने वाले ) संस्मरण

20 अक्टूबर 2020 का ज्ञानप्रसाद

आज का ज्ञान प्रसाद थोड़ा लम्बा अवश्य है लेकिन है बहुत ही प्रेरणा दायक और शिक्षाप्रद। लेख में दो अलग -अलग संस्मरण वर्णित किये गए हैं। पहला संस्मरण परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत जी की आसाम यात्रा यात्रा को वर्णित करता है। यात्रा के दौरान घटित परिस्थितियों से मिली शिक्षा का वर्णन अति सुन्दर है। दूसरे संस्मरण में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकनन्द का वार्तालाप बहुत ही मार्मिक है। मार्मिक का अर्थ touching दिल को छू जाने वाला होता है। इतने सम्पन्न ,समृद्ध परिवार की कभी ऐसी दशा हो जाएगी कि दाने -दाने के मोहताज हो जायेंगें। उनके पिता जी कोलकाता हाई कोर्ट में attorney थे। रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को जगत गुरु बना दिया और परमपूज्य गुरुदेव ने पंडित लीलापत शर्मा जिम का काया कल्प कर दिया। वह स्वयं कहते थे ” गुरुदेव ने हमें क्या से क्या बना दिया “

विवेकानंद जी वाला संस्मरण हमारे सहकर्मी आदरणीय जसोदा सिंघानिया जी द्वारा भेजा गया था। आशा करते है कि इस पुरषार्थ से बाकि के सहकर्मियों को भी प्रेरणा मिलेगी। आप सब बहुत ही सूझवान है। हम आपको आपके द्वारा लिखे हुए संस्मरण ,लेख ,अनुभूतिआँ ऑडियो ,वीडियो हमें भेजने के लिए आमंत्रित करते हैं। हम अपने चैनल पर और सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर कर सकते हैं


तो आईये ज्ञानगंगा में डुबकी लगाएं और धन्य हो जाएँ।


गुरुदेव के साथ आसाम यात्रा

एक बार गुरुदेव ने लीलापत जी को कहा :

” बेटा आसाम चलना है । उधर मिशन का विस्तार बिलकुल नहीं है ।”

उस समय आसाम के लिए मथुरा से बरौनी स्टेशन जाना पड़ता था । मथुरा से बरौनी पहुँचने के लिए एक दिन तथा एक रात लगती है । यह पटना से आगे है । वहाँ से आसाम के लिए दो दिन दो रात लगते हैं । आसाम जाने के लिए उस समय मथुरा से तीन दिन तीन रात का समय लगता था ।

लीलापत जी ने कहा:

” जहाँ भी जाने की आज्ञा होगी, चले जाएँगे ।”

तो सुनिए गुरुदेव और लीलापत जी के संवाद :

माता जी ने रास्ते में खाने के लिए चना मुरमुरा रख दिए थे । रास्ते में जब भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने चना मुरमुरा खोलकर हमको दिए, हमने चना मुरमुरा खा लिए परन्तु, हमारा पेट नहीं भरा । हमने समझा कहीं अन्य जगह जहाँ अच्छा भोजन मिलेगा गुरुदेव वहीं पर भोजन कराएंगे, परन्तु गुरुदेव ने रास्ते में कहीं भी भोजन नहीं कराया । शाम को भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने फिर चना मुरमुरा हमको दिए और स्वयं ने भी ले लिए । हमने चना मुरमुरा खाये, गुरुदेव से कुछ नहीं कह सके, परन्तु हमको रात भर नींद नहीं आई भूख लग रही थी । हमने सोचा अगर आसाम तक चना मुरमुरा ही गुरुदेव खिलाते रहे तब तो हमारे प्राण ही निकल जाएंगे । दूसरे दिन जब भोजन का समय हुआ तब गुरुदेव ने चना मुरमुरा फिर हमको दे दिए । हमने गुरुदेव को मना कर दिया और कहा गुरुदेव हमको रात भर भूख के मारे नींद नहीं आई । भोजन बगैर हम नहीं रह सकते । गुरुदेव ने कहा-बेटा अगला स्टेशन आएगा वहीं से पूड़ी ले लेना । अगला स्टेशन आया तब गुरुदेव ने कहा-जा बेटा पूड़ी ले आ । हम पूड़ी लेकर आए सब्जी भी साथ में थी उसमें प्याज भी पड़ी हुई थी जब हम भोजन करने लगे तब उस सब्जी में प्याज थी । हमने कहा-गुरुदेव इस सब्जी में तो प्याज डाली है रूखी पूड़ी खाना कठिन है । गुरुदेव ने कहा-बेटा चाय वाला डिब्बे में चाय बेच रहा है, उससे चाय ले लो, पूड़ी खाने में आसानी रहेगी । हमने चाय ली और उसके सहारे से पूड़ी खाई । हमने सोचा तीन दिन तीन रात में तो हमारे प्राण ही निकल जाएंगे । गुरुदेव के साथ बड़े बुरे फंस गए । हमने कहा-गुरुदेव जितने भी गुरु महात्मा हैं मिठाई फल दूध रबड़ी रस मलाई खाते हैं और चेलों को भी खिलाते हैं परन्तु आप चना मुरमुरा खा रहे हैं और हमको भी खिला रहे हैं इसका क्या रहस्य है ? गुरुदेव ने कहा-

    " बेटा जिसकी जीभ पर काबू नहीं जो मीठा, पूड़ी-कचौड़ी, पकौड़ी, फल दिन भर खाते हैं वे अध्यात्मवादी हैं ही नहीं । अध्यात्मवादी को सबसे पहले जीभ को ठीक करना पड़ता है । यह जीभ ही ताड़का है पूतना है । इससे मंत्र का जाप करते हैं । जब जीभ ही ठीक नहीं है तब जो मंत्र जप करेंगे वह कैसे सफल होगा । जब बन्दूक सही नहीं है तब कारतूस क्या करेगा । जीवन बंदूक है मंत्र-जप कारतूस है । शेर को मारने के लिए बढ़िया बन्दूक चाहिए । ऋद्धि-सिद्धि पाने  के लिए जीवन को ठीक करना पड़ता है । जो भी मंत्र जप करते हैं वे मरी हुई जीभ से जप करते हैं । इससे उनका मंत्र जप करना अनुष्ठान करना सफल नहीं होता है । मिर्च मसाले मीठा कचौड़ी पकौड़ी खाने से पेट भी खराब रहता है और आदमी बीमार रहता है । सबसे पहले जीभ को ठीक  करना पड़ता है। सबसे पहला संयम जीभ का संयम है । प्रत्येक व्यक्ति जप तो करता है, परन्तु उनकी जीभ काबू में नहीं होती, इसीलिए उनको मंत्र की सिद्धि नहीं होती । हमने यह शिक्षण जीवन में ग्रहण किया । इसी कारण हमारा स्वास्थ बिल्कुल ठीक है । इतनी उम्र  पहुंचकर भी हम अपने आपको जवान और स्वस्थ महसूस करते हैं । अगर किसी को अपना स्वास्थ ठीक रखना है और सौ
वर्ष जीना है तो सबसे पहले जीभ को काबू में करना पड़ेगा । जिसकी जीभ काबू में नहीं होती उसकामंत्र कभी सफल नहीं होगा । चाहे रात दिन जप करता रहे । मंत्र के चमत्कार देखने हैं तो जीभ को ठीक करना पड़ेगा । गुरुदेव ने चौबीस वर्ष तक गाय को जौ खिलाकर उसके गोबर से जो जौ निकले उनकी रोटी छाछ में मिलाकर खाते रहे तब उनका गायत्री मंत्र सिद्ध हुआ । गुरुदेव ने मंत्र सिद्धि का रहस्य हमको बतलाया । जो गायत्री मंत्र की सिद्धि चाहते हैं उनको जीभ को काबू में रखना पड़ेगा । " 

आसाम के दौरे में गुरुदेव से जीव पर काबू रखने की बात ही होती रही । गुरुदेव ने कहा-अगर कोई व्यक्ति स्वादेन्द्रिय पर काबू कर ले तो उसका सारी इंद्रियों पर काबू हो जाता है । गुरुदेव ने कहा-जो इंद्रिय सबसे अधिक परेशान करती है वह स्वाद इंद्रिय है और दूसरी कामेन्द्रिय । दोनों पर काबू करने पर गुरुदेव ने कहा-सारी इंद्रियों पर काबू हो जाता है । अब आसाम का स्टेशन तिनसुकिया आने लगा तब गुरुदेव ने कहा-सामान संभालो स्टेशन आ रहा है । हमने सारा सामान इकट्ठा कर लिया स्टेशन पर उतर गए । उस समय आसाम में कोई शाखा नहीं थी । एक धर्मशाला में ठहरे या किसी भाई के घर ठहरे थे ठीक याद नहीं है । रात भर हमको मच्छर काटते रहे । रात भर नींद नहीं आई ।सुबह गुरुदेव ने स्नान कर लिया । तब हमने गुरुदेव से कहा –

गुरुदेव युग निर्माण होगा या नहीं होगा यह हमको मालूम नहीं, परन्तु हमारा तो युग निर्माण हो गया । गुरुदेव ने कहा-क्या बात है बेटा बतला । हमने कहा रात भर मच्छरों ने सोने ही नहीं दिया है । अगर हम यहाँ तीन चार दिन रहे तो बीमार पड़ जाएँगे । । गुरुदेव ने कहा-बेटा इसका इलाज हम तुमको रात को सोते समय बतला देंगे । गुरुदेव ने हमसे कहा बेटा बाहर जा और एक दो आदमी ला उनसे कार्यक्रम के संबंध में कुछ बात करेंगे उन्हें अपना उद्देश्य बताएँगे । आठ दस भाइयों को लेकर हम आए । गुरुदेव उनसे बात करते रहे । पहले स्वास्थ्य के विषय में बच्चों परिवार, दुकान नौकरी सबके बारे में उनसे पूछते रहे फिर मिशन की बातें उनसे करने लगे । दिन भर वहाँ जिनको हम लाते थे उनसे बातें करते रहे ।

रात को सोने का समय आया तब हमने गुरुदेव से कहा-गुरुदेव मच्छरों ने तो अभी से हम पर वार करना शुरू कर दिया है इनका इलाज बताएँ । गुरुदेव ने कहा-बेटा तेरे पास चादर है इससे चारों तरफ बदन को ढक कर सो जा, सिर्फ थोड़ी सी आँखें ही खुली रहें । हमने कहा-अगर हम गुरुदेव के साथ एक माह दौरे पर रहे तब हम बीमार हो जाएंगे। हमने गुरुदेव से कहा-गुरुदेव हम जब अध्यात्मवादियों को, कथावाचक, महात्माओं, प्रवचनकर्ताओं को देखते हैं तो उनके खाने की अलग व्यवस्था होती है । प्रवचन जो करते हैं उनको गरम हलुआ खिलाते हैं जिससे गला ठीक रहे । भोजन में पूड़ी, मिठाई, सब्जी आदि चीजें होती हैं और ठहरने को अलग मकान । जो सबसे बड़ा पूंजीपति होता है जिसके मकान में सब साधन होते हैं उनके यहाँ सबको ठहराया जाता है । सोने का अलग तथा मिलने वालों का अलग कमरा होता है और चरण छूने वालों की लाइन लगी रहती है । दो तीन घंटे सुबह चरण छूने का ही कार्यक्रम चलता है । हम तो समझते थे कि हम भी ऐसे अध्यात्मादी बनेंगे पर आपने तो हमारा कचूमर ही निकाल दिया । गुरुदेव ने कहा-

” बेटा जो शारीरिक सुख सुविधाओं को देखते हैं उसको केवल शरीर ही दीखता रहता है । वह उसकी पूर्ति में ही लगा रहता है । ऐसे धर्माचार्य जो होते हैं वो अध्यात्मवादी नहीं होते । वे सब शरीर को ही भोजन कराते हैं उसी का ही ध्यान रखते हैं । शरीर का मालिक आत्मा है उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। इस समय यह परम्परा सी बन गई है कि गुरु के बाद जो उसका चेला होता है उसको गद्दी पर बिठा देते हैं । उसने कभी त्याग बलिदान किया या नहीं, वह अध्यात्म को जानता है या नहीं । जो व्यक्ति अध्यात्म से कोसों दूर है उनको अध्यात्म का पता नहीं है और वे गद्दी पा जाते हैं । अध्यात्मवादी शरीर का ध्यान नहीं आत्मा का ध्यान रखता है उसको भोजन कराता है । आत्मा का भोजन स्वाध्याय है । तुझे मालूम है कि रेल में सारे रास्ते हम पुस्तक पढ़ते आते हैं । व्यक्ति की आत्मा मर गई है । तभी तो अध्यात्म की ऐसी हालत हो गई है । कुछ प्रवचन कुछ मंत्र याद कर लिए हैं उनको ही कहते रहते हैं और अपने अहम् की पूर्ति करते रहते हैं । बेटा अध्यात्मवादी उसको कहते हैं जो अपने लिए कम से कम खर्च करता है और दूसरों की उदारता पूर्वक सहायता करता रहता है । अपने शरीर का नहीं आत्मा का ध्यान रखता है । “

गुरुदेव के आसाम के दौरे से हमको जो शिक्षण मिला,जहाँ तक हो सका अपने जीवन में धारण किया । यही कारण है कि हमको अध्यात्म का पूरा-पूरा लाभ मिला । कोई भी व्यक्ति उनके शिक्षण को अपना कर अध्यात्म का पूरा-पूरा लाभ उठा सकता है।


  • गुरू क्या है * यह लेख जसोदा सिंघानिया जी द्वारा भेजा गया था।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी कैंसर रोग से पीड़ित थे। उन्हें खाँसी बहुत आती थी और वे खाना भी नहीं खा सकते थे। स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु जी की हालत से बहुत चिंतित थे।

एक दिन की बात है स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने विवेकानंद जी को अपने पास बुलाया और बोले –

“नरेंद्र, तुझे वो दिन याद है, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था ? तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था। परंतु अपनी माँ से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खा लिया है, ताकि तेरी गरीब माँ थोड़े बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई* *को परोस दें। हैं न ?”

नरेंद्र ने रोते-रोते हाँ में सर हिला दिया।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस फिर बोले – “यहां मेरे पास मंदिर आता, तो अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा पहन लेता। परन्तु मैं भी झट जान जाता कि तेरा शरीर क्षुधाग्रस्त है। और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, माखन-मिश्री खिलाता था। है ना ?”

नरेंद्र ने सुबकते हुए गर्दन हिलाई।

अब रामकृष्ण परमहंस फिर मुस्कुराए और प्रश्न पूछा – “कैसे जान लेता था मैं यह बात ? कभी सोचा है तूने ?”

नरेन्द्र सिर उठाकर परमहंस को देखने लगे।

“बता न, मैं तेरी आंतरिक स्थिति को कैसे जान लेता था ?”

नरेंद्र – “क्योंकि आप अंतर्यामी हैं गुरुदेव”।

राम कृष्ण परमहंस – “अंतर्यामी, अंतर्यामी किसे कहते हैं ?”

नरेंद्र – “जो सबके अंदर की जाने” !!

परमहंस – “कोई अंदर की कब जान सकता है ?”

नरेंद्र – “जब वह स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।”

परमहंस – “अर्थात मैं तेरे अंदर भी बैठा हूँ। हूँ ना ?”

नरेंद्र – “जी बिल्कुल। आप मेरे हृदय में समाये हुए हैं।”

परमहंस – “तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूँ। हर दुःख दर्द पहचान लेता हूँ। तेरी भूख का अहसास कर लेता हूँ, तो क्या तेरी तृप्ति मुझ तक नहीं पहुँचती होगी ?”

नरेंद्र – “तृप्ति ?”

परमहंस – “हाँ तृप्ति! जब तू भोजन करता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वो मुझे तृप्त नहीं करती होगी ? अरे पगले, गुरु अंतर्यामी है, अंतर्जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्यों के भीतर बैठा सब कुछ भोगता है। मैं एक नहीं हज़ारों मुखों से खाता हूँ।”

याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कहीं है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही, तब भी जीऊंगा, तेरे माध्यम से जीऊंगा। मैं तुझमें रहूँगा।

गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुः गुरुः देवो महेश्वरः
गुरुर्साक्षात परब्रह्मः तस्मै श्री गुरुवे नमः

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मध्य प्रदेश के छोटे से गांव ” करनी ” का प्रेरणादायक यज्ञ

ऑनलाइन ज्ञानरथ के समर्पित सहकर्मियों को सुप्रभात एवं शुभदिन

17 अक्टूबर 2020 का ज्ञानप्रसाद

आज का लेख है तो बहुत ही छोटा सा परन्तु इसमें बहुत ही ज्ञान छुपा है। आशा है आप सभी इस लेख को पढ़कर अपने जीवन में उतारेंगे और अपने आस पास के परिजनों में शेयर करके उन्हें भी ऑनलाइन ज्ञानरथ के लेखों से अवगत करवायेंगें ताकि उनके जीवन भी यज्ञमयी बने। हम सबने गुरुदेव के साहित्य में कई बार सुना होगा – अपने जीवन को यज्ञमयी बनायें। जब आप इस लेख को पढेंगें तो यज्ञमयी बनाने का अर्थ समझ आ जाना चाहिए।

मध्य प्रदेश के छोटे से गांव ” करनी ” का प्रेरणादायक यज्ञ – बहिनों का सहयोग सराहनीय रहा

बात मध्य प्रदेश के एक छोटे से रमली नमक गांव की है। इस गांव की जनसँख्या 2011 की जनगणना के अनुसार केवल 1800 है। केवल 400 घरों वाला यह छोटा सा गांव गुरुदेव ने क्यों चुना और क्यों लीलापत जी को यहाँ यज्ञ कराने के लिए भेजा अपनेआप में ही एक प्रश्न है। देखने वाली बात है की इस गांव की महिलाओं ने किस प्रकार एक उदाहरण स्थापित किया – अन्नपूर्णा का भोजनालय। आपको उत्सुकता हो रही होगी ऐसा क्या कर दिया इस छोटे से गांव की महिलाओं ने जो इतना उदाहरणीय बन गया। यह केवल लीलापत जी की प्रेरणा ही थी जिसके कारण हम यह कहानी पढ़ रहे हैं।

तो आप पढ़िए इस गांव की महिलाओं के पुरषार्थ के बारे में और हम फिर लौट कर आते हैं


एक बार गुरुदेव ने लीलापत जी को पाँच कुण्डीय यज्ञ में ग्राम रमली भेजा । वहाँ की पालवाच्छादित यज्ञशाला
बहुत ही यादगार थी। पेड़ों के खंभे थे और उनके पत्तों से यज्ञशाला ढकी हुई थी । बड़ा ही शानदार यज्ञ हुआ । आसपास के गाँवों की बड़ी भारी भीड़ इकट्ठी हो गई। यज्ञ प्रवचन में शाम हो गई । अंधेरा हो गया । रमली ग्राम के आस पास के गांवों की जनता भी वहीं ठहर गई । वहाँ के यज्ञ के प्रबंधकों ने शाम के भोजन की व्यवस्था नहीं की थी क्योंकि कार्यक्रम दोपहर को ही समाप्त होना था, परन्तु आस पास के गाँवों से आशा से अधिक लोग आ गए थे जिससे कार्यक्रम शाम तक चलाना पड़ा और आस पास से आए हुए लोगों को रात्रि विश्राम के लिए रमली में ही रुकना पड़ा । अचानक रुकी इस भीड़ को देखकर वहाँ के कार्यकर्ता भयभीत हुए कि इनके भोजन का इन्तजाम यकायक कैसे करेंगे, कौन इतना भोजन इतने कम समय में बनाएगा । यह समस्या लीलापत जी के पास रखी गई । उन्होंने कहा- सारे गाँव की बहनें अपने -अपने घरों से भोजन बनाने के बर्तन तथा भोजन सामग्री लेकर आएँ । जो भी सब्जी हो उसे लेकर आएं और आटा भी साथ लाएँ तथा खेतों के पत्थरों से चूल्हा बनाकर भोजन तैयार करें। दूसरे गांवों के जो लोग आए हैं उनको भोजन कराएँ । जिसके घर में जो भी आटा दाल सब्जी थी लेकर आए और भोजन बनाना आरंभ किया। कुछ बहनें घरों में चक्की से आटा पीसने लगीं । थोड़ी ही देर में भोजन बनकर तैयार हो गया, वहाँ के भाई बहिनों का उत्साह देखकर लीलापत जी और बाकि सभी नतमस्तक हो गए । ऐसा यज्ञ किसी ने आज तक नहीं देखा था । दो दिन तक ऐसा ही क्रम चला । कहीं मक्की की रोटी बन रही थी, कहीं गेहूं की, कहीं बाजरे की और कहीं तिनाजे की रोटी बन रही थी । जिसके घर में दलिया था, वो दलिया बनाकर खिला रहे थे। उस यज्ञ में चंदा इकट्ठा नहीं हुआ था सारे गाँव के श्रम और सहयोग से यज्ञ सफल हुआ ।

आगे चलने से पहले हम आपके साथ एक बात शेयर करना चाहते हैं। यह बात इस छोटे से गांव की है लेकिन ठीक इसी तरह हमारे कनाडा में भी जब गायत्री परिवार द्वारा किसी कार्यक्रम का आयोजन होता है तो महिलाएं इसी तरह किचन का पूरा कण्ट्रोल संभालती है। आने वालों को कुछ भी पता नहीं होता खाना कहां से आता है ,कौन बनाता है ,कैसे एक -एक आइटम पूरे systematically उपलब्ध होती है। हम तो हमेशा ही इन महिलाओं को नतमस्तक होते हैं और हमने तो इनको अपने ह्रदय में अन्नपूर्णा के विशेषण से सुशोभित भी कर दिया है। वैसे तो गायत्री परिवार के हर सँस्थान में माता जी का चौका प्रचलित है लेकिन अगर कोई परिजन इसको प्रतक्ष्य देखने का इच्छुक हो तो शांतिकुंज जा सकता है।

तो आइये आगे चलें :

वापस लौटकर जब लीलापत जी ने गुरुदेव को यज्ञ के बारे में बताया तो गुरुदेव बोले

” हम ऐसे ही यज्ञ चाहते हैं ।”

गुरुदेव का मन कम खर्च वाले यज्ञ करने का रहता था । गुरुदेव यज्ञों में अधिक खर्च करना पसंद नहीं करते थे । यदि कोई यज्ञों में अधिक खर्च करता था तो गुरुदेव उससे बहुत नाराज होते थे । गुरुदेव कहते थे यज्ञ से हम शिक्षण देते हैं कि हमें जीवन कैसे जीना चाहिए । जो कुछ अपने पास है उसमें से समाज को भी कुछ देना चाहिए । ठीक उसी प्रकार जैसे यज्ञाग्नि में जो कुछ डालते हैं वह अपने पास नहीं रखती है , वायुभूत बनाकर सारे संसार में वितरण कर देती है। यही है यज्ञमयी जीवन। यज्ञों के विषय में गुरुदेव कहते हैं :

” जो व्यक्ति यज्ञ करता है और कर्मकांड को ही महत्व देता है, परन्तु उसके शिक्षण को ग्रहण नहीं करता , वह चाहे जितना मर्ज़ी अधिक खर्च करे और कितना ही बड़ा यज्ञ करे उससे समाज को कोई लाभ नहीं होगा । धर्माचार्यों ने यज्ञ को इतना खर्चीला बना रखा है कि यज्ञ में अनाप-शनाप रुपया खर्च कराते हैं । यह उचित नहीं है । हम कम से कम खर्च में यज्ञ कराना चाहते हैं ।

” यज्ञ के साथ ज्ञान-यज्ञ अनिवार्य है । जो यज्ञ के साथ ज्ञान-यज्ञ नहीं करता वह समाज को भ्रमित करता है और अपने अहंकार की पूर्ति करता है । ज्ञान यज्ञ का अर्थ है ज्ञान का विस्तार ,ठीक उसी तरह जैसे हम सब समर्पण से ज्ञान रथ चला कर ज्ञान का प्रसार कर रहे हैं। यज्ञ कम से कम खर्च में होने चाहिए । “

गुरुदेव ने आगे कहा

” रमली वालों ने यज्ञ के महत्व को समझा उनको हमारा पूर्ण आशीर्वाद है । बेटा ऐसे ही यज्ञ कराना । खर्चीले यज्ञों का विरोध करना।”।
गुरुदेव ने तो यज्ञों में दक्षिणा की प्रथा भी एक अद्भुत तरीके से चलाई थी। रूपए पैसे की जगह यज्ञ में एक बुराई छोड़ने और एक अच्छाई अपनाने का संकल्प लिया जाता है। यही है गुरुदेव की दक्षिणा।

सभी सहकर्मियों को आश्विन नवरात्रि की हार्दिक शुभकामना। कोरोना संकट के समाधान एवं आप सबके परिवार की सुरक्षा की कामना करते हुए आज के ज्ञान प्रसाद को विराम।

जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव के बारे में एक ह्रदय विदारक लेख

14 अक्टूबर 2020 का ज्ञानप्रसाद

मित्रो आज का लेख बहुत ही ह्रदय विदारक है। हमने यह लेख अखंड ज्योति अगस्त 1990 के स्पेशल अंक पर आधारित किया है। 2 जून 1990 को गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद ब्रह्मवर्चस के कार्यकर्ताओं द्वारा सम्पादित 200 पृष्ठों वाला यह स्पेशल अंक अपने में एक अविस्मरणीय अंक है। हमने कुछ एक पन्नों को ही उल्ट -पुलट कर देखा तो रहा नहीं गया। ह्रदय में एक दम जिज्ञासा हुई कि जिस भावना में हम गुज़र रहे हैं अपने सहकर्मियों को ,ऑनलाइन ज्ञानरथ के निष्ठावान परिजनों को भी साथ लिया जाये और उस वेदना को ,उस टीस को ,उस स्नेह को साथ -साथ हृदयंगम किया जाये।

तो आओ चलें शांतिकुंज गुरुदेव के कक्ष में :

1 – सुव्यवस्था

शाम का समय था गुरुदेव शान्ति कुँज में अपने कमरे में बैठे व्यवस्था आदि कार्यों के संदर्भ में गोष्ठी कर रहे थे। इसी बीच बरसात के कारण बिजली बंद हो गई। शाम अधिक हो जाने के कारण और कुछ घने बादलों के कारण कमरे में घना अँधेरा सा हो गया। बैठे हुए लोगों में से कुछ प्रकाश के लिए लैम्प आदि की व्यवस्था के लिए उठने ही वाले थे कि तनिक तीखी आवाज में गुरुदेव स्वयं उठते हुए बोले,

” तनिक बैठे रहो , उठना नहीं। तुम्हें क्या पता कौन सी चीज कहाँ रखी है। मैं अपनी हर चीज यथा स्थान रखता हूँ।”

ऐसा कहते हुए उन्होंने लैम्प जलाया और एक मन्द प्रकाश में वार्तालाप पुनः शुरू हो गया। सभी लोग गुरुदेव की
ओर देखने लगे कि कहाँ चेतना की उच्चतम भूमि पर निवास और कहाँ इन छोटी-छोटी चीजों की ऐसी सुव्यवस्था? इन दोनों बातों का एकीकरण विरले ही ऐसे ही महापुरषों के जीवन में मिल सकता है।

ऐसे हैं हमारे गुरुदेव


2 – एक ही दिन में स्वाहिली भाषा सीखी :

1972 में परमपूज्य गुरुदेव ईस्ट अफ्रीका जाने के लिए समुंद्री जहाज़ से यात्रा कर रहे थे। उद्देश्य एक ही था – सभ्यता के अहम में ग्रस्त लोगों द्वारा तिरस्कृत अपमानित समुदाय को गले लगाना। वहाँ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बीज छिड़कना। समुद्री यात्रा अनभ्यासी के लिए कम कष्टकर नहीं होती। पर उनका लेखन, चिन्तन तथा अन्य दैनिक कार्य यथावत चलते थे। इसी बीच पता चला कि उनके गन्तव्य स्थान के कुछ व्यक्ति उसी जहाज़ में यात्रा कर रहे है। बस सीखने की वृत्ति ने गुरुदेव को प्रोत्साहित किया कि क्यों न पहुंचने से पहले वहाँ की भाषा सीख ली जाय। उमंग उत्साह में बदली और गुरुदेव ने सीखना शुरू कर दिया । ठीक 1 दिन में उन्होंने स्वाहिली नाम से जानी जाने वाली भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया। सिखाने वाले स्वयं दंग थे। यों तो प्रसिद्ध भाषाविद सर विलियम जोन्स ने भी कलकत्ता के पण्डितों से वेदों का अध्यन किया और संस्कृत सीखी थी पर जिस तीव्र गति से गुरुदेव ने विदेशी भाषा सीखी वह अद्भुत थी। सीखने की वृत्ति के इसी वरदान के बल पर उन्होंने वहाँ पहुँच कर सारे वार्तालाप उन्हीं की भाषा में करके सभी को चकित कर दिया।

ईस्ट अफ्रीका यात्रा पर कुछ समय पहले हमने कई लेख लिखे थे। उन लेखों में से एक का लिंक हम यहाँ दे रहे हैं

https://life2health.org/2020/06/20/2145/

इन लेखों को लिखने की प्रेरणा हमें आदरणीय विद्या परिहार जी से मिली थी। यह वही विद्या परिहार हैं जिनके घर गुरुदेव नैरोबी केन्या में रहे थे। पाठकों के लिए हमने इसी सन्दर्भ में एक वीडियो भी अपलोड की है जिसमें विद्या जी गुरुदेव की इस यात्रा के बारे में बता रहे हैं। आप इस वीडियो को हमारे चैनल पर देख सकते हैं और गुरुदेव के चरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर अपना जीवन सफल बना सकते हैं।


3 – तपोभूमि मथुरा से प्रस्थान एवं महाप्रयाण

एक ओर तो इतना स्नेह, इतना प्यार, अन्तःकरण मक्खन के समान नजर आता है कि अभी पिघल जायेगा और दूसरी ओर इतनी निर्मोहिता कि स्वयं का दिल कड़ा करके गुरुदेव ने अपनी क्रियास्थली, कर्मभूमि ( मथुरा ) से मोह की डोरी एक झटके से तोड़ डाली थी। इसका उदाहरण भगवान कृष्ण द्वारा बृज की गोपियों का बुलावा भेजने पर इंकार करना और न आना ही हो सकता है।

क्या यह साधारण मानव के बस की बात है ? संभवतः नहीं।

जून 1971 में जब गुरुदेव ने मथुरा से विदाई ली तब जो अभिव्यक्ति उनकी रही, वह बार -बार स्मरण किये जाने योग्य है। गुरुदेव आत्मीय जनों को, हमको, आप सबको अपने अंग-अवयव ( body parts ) कहते थे, कदापि अपनी पार्थिव काया ( physical body ) के चले जाने पर शोक न कर के, मोहमाया के बंधन से परे , श्रद्धा भाव से कर्त्तव्य में जुटा रहने को कह गये हैं। पहले तो शरीर मथुरा से हरिद्वार होता हुआ हिमालय गया था और संभावना पूरी थी कि पुनः दर्शन होंगे। लेकिन अपने ह्रदय को इतना पक्का करके गुरुदेव ने मथुरा की भूमि छोड़ी थी कि फिर कभी उसकी ओर मुड़कर न देखा। शक्तिपीठों कि देख रेख के लिए गुरुदेव चार बार आगरा आए लेकिन परिजनों के कहने के बावजूद मथुरा नहीं गए। उन्हें पूरी तरह विश्वास था कि पंडित लीलापत जी के संरक्षण में गायत्री तपोभूमि पूरी तरह सुरक्षित है। इससे भी ऊपर दादा गुरु के निर्देश को उन्होंने सदैव शिरोधार्य ही माना। गुरुदेव कई बार लिख चुके हैं कि हमारे गुरु जैसे -जैसे, जो -जो कुछ हमसे करवाते गए हम बिना किसी प्रश्न के, बिना किसी प्रतिक्रिया के और बगैर किसी आनाकानी के करते रहे।

परन्तु महाप्रयाण से केवल एक मास पहले ही बोले गए शब्द स्मरण करके ऑंखें भर जाती हैं। इन शब्दों में भी अपनत्व और स्नेह की भावना छुपी हुई है। जो लोग शांतिकुंज जा चुके हैं उन्होंने यज्ञशाला के बाहर परमपूज्य गुरुदेव और वंदनीय माता जी के अंतिम सन्देशों वाले बोर्ड अवश्य ही देखे होंगें। कुछ इस तरह का सन्देश देते हैं यह दोनों बोर्ड।

“पार्थिव काया से मोह न करना। हमें तो गायत्री जयन्ती को जाना ही है। तुम सबको हमारा काम आगे बढ़ाना है।”

हम सब अपने मन को लाख समझा लें कि गुरुदेव एवं माता जी सूक्ष्म रूप से हमारे मध्य विद्यमान है, पर मन का मोह तो मोह ही है। अगर वे कठोर-हृदय रहे होते व परिजनों से इतनी आत्मीयता न जोड़ी होती तो संभवतः मन को कठोर किया भी जा सकता था। किंतु जिसने इतनी स्नेहवर्षा की हो कि सामने वाले को अपने स्पर्श मात्र से, वाणी के वचनों मात्र से अंदर से हिला कर रख दिया हो उसकी पार्थिव देह के महाप्रयाण पर क्या यह हृदय इतना कठोर हो जाय कि उनकी उन मधुर स्मृतियों को ही भुला बैठे। संभवतः हमारे स्थान पर पूज्य गुरुदेव भी रहें होते तो उनका अन्तःकरण में भी ऐसा ही आभास होता जैसा हम पर हो रहा है।

पर किया क्या जाय?

हमें तो वोह पंक्तियाँ भी याद आती हैं जो उन्होंने अप्रैल 1971 की अखंड ज्योति पत्रिका में लिखी थीं। 1971 में तपोभूमि मथुरा से विदाई और 1990 में महाप्रयाण से एक माह पूर्व की पंक्तियों में लगभग एक ही तरह की अभिव्यक्ति थी।

गुरुदेव लिखते हैं :

” हम अपनी कमजोरी को छिपाते नहीं। हमारा अन्तःकरण अति भावुक ओर मोह ममता से भरा पड़ा है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है, मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वहीं जा पहुँचता है। स्नेह की , सद्भाव की, प्रेम और ममता की मधुरिमा हमें ठीक उसी प्रकार भाती है जैसे शहद में लिपटी मक्खी। शहद में सने हुए परों के कारण मक्खी की उस स्थिति को छोड़ने की रत्ती भर भी इच्छा नहीं होती। लाखों परिजनों का जिनका स्नेह, सद्भाव हमें मिला है हम उनके लिए हज़ार शरीर धारण कर,हज़ार कल्प तक कार्य करते रहेंगें।
प्रेमी के लिए मिलन का आनन्द बड़ा सुखद होता है पर बिछुड़ने का दर्द उसे मर्माहत (fast heartbeat) करके ही रख देता है। वही जान सकता है कि प्रियजनों के बिछुड़ने की घड़ी कितनी मर्मान्तक और हतप्रभ कर देने वाली होती है। लगता है कोई उसका कलेजा ही चीर कर निकाल लिये जाता है। भगवान ने न जाने हमें क्यों स्नेहसिक्त अन्तःकरण देकर भेजा जिसके कारण हमें जहाँ प्रिय पात्रों के मिलन की थोड़ी सी हर्षोल्लास भरी घड़ियाँ उपलब्ध होती हैं वहीँ उससे अधिक वियोग- बिछुड़न के बारम्बार निकलने वाले आँसू बहाने पड़ते हैं। इन दिनों हमारी मनोभूमि इसी दयनीय स्थिति में पहुँच गयी है। मिशन के भविष्य की बात एक ओर उठाकर रख भी दें तो भी प्रियजनों से बिछोह सदा के लिए हमें कष्टकर बन कर शूल (sharp pain ) रूप में चुभ रहा है।”

परिजन इन पंक्तियों पर ध्यान दें। कितना निश्छल स्नेहसिक्त अन्तःकरण था उस सत्ता का कि उन्होंने जिन से नाता जोड़ा, उन्हें वह अंत तक याद करते रहे । जिन्होंने 60 वर्ष का जन संपर्क व लोकमंगल के लिए शरीर-यज्ञ किया कितनी वेदना के साथ उन्होंने जाने की बात कही होगी। 1990 में महाप्रयाण के समय उनके भीतर कितनी पीड़ा रही होगी, कितनी मर्मान्तक वेदना उन्हें टीस दे रही होगी। हम तो इसकी केवल कल्पना ही कर सकते हैं । किंतु महापुरुषों की लीला अपरम्पार है । पूज्यवर श्रीकृष्ण की तरह ही नीति परुष थे। यदि वे लोकमंगल के लिए तिल-तिल कर अपनी आहुति देकर जाते समय तक परिजनों को याद भी करते हैं तो उनके उज्वल भविष्य के निर्माण की बात करते हैं। अपनी मुक्ति की बात को एक तरफ रख एक सौ दस वर्ष और सूक्ष्म एवं कारण शरीर रूप में हमारे बीच विद्यमान रहने की बात कह गये हैं। उन पर विश्वास कर हमें भी अपनेआप को उसी स्तर की दृढ़ता से विकसित करना होगा। वह शक्ति जो हमारे अंतःकरण में गुरुदेव की उपस्थिति का संकेत सतत दे रही है हमें निर्देश दे रही है कि :

हमें गुरुदेव का स्वप्न साकार करना है। मोह से परे उठ कर हमें लोकमंगल का, विद्या विस्तार का लक्ष्य पूरित करना है। नए युग का निर्माण करना है। 21वीं सदी उज्वल भविष्य गुरुदेव का सपना साकार करके दिखाना है।

अगर यह याद रहा तो आंसू रुकेंगें ही ,अवश्य रुकेंगे

जय गुरुदेव

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जब गुरुदेव ने लीलापत जी को कामधेनु का दूध पिलाया

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों को हमारा नमन एवं आभार
12 अक्टूबर 2020


मित्रो ,आज का ज्ञान प्रसाद एक छोटा सा संस्मरण है लेकिन है इतना मार्मिक कि हमारे मस्तिष्क की खिड़कियां खोल दे और हम सोचने पर विवश हो जाएँ कि क्या सचमुच हमारे गुरुदेव ऐसे थे। हम तो पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि गुरुदेव ने ऐसा ही साधारण, एक साधारण भारतीय का जीवन व्यतीत किया। मार्मिक संस्मरण का अर्थ होता है ऐसे यादगार पल जो आपके अंतःकरण को छू जाएँ। आज का यह संस्मरण परमपूज्य गुरुदेव और पंडित लीलापत शर्मा जी के बीच का वार्तालाप है और ” पूज्य गुरुदेव के मार्मिक सस्मरण ” नामक पुस्तक में से लिया गया है। गायत्री तपोभूमि मथुरा स्थित युग निर्माण योजना प्रेस द्वारा प्रकाशित १८५ पृष्ठों की यह पुस्तक एक अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक में पूज्यवर और पंडित लीलापत शर्मा जी के वोह पल अंकित किये गए हैं जिनका एक- एक अक्षर हर गायत्री साधक के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। लीलापत जी द्वारा लिखित इस पुस्तक का मूल्य ( 2010 के अनुसार ) केवल 35 रूपए है हम तो यही आग्रह करेंगें कि आप भी इस पुस्तक को लेकर पढ़ें। internet archive नामक वेबसाइट पर यह पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है।


तो आईये चलें आज के ज्ञान प्रसाद की तरफ – लीलापत जी और गुरुदेव के बीच वार्तालाप

कामधेनु का दूध

एक दिन हम ( लीलापत जी ) छ:-सात भाइयों के साथ कोसी किसी काम से आए थे । कोसी कलां नामक यह नगर मथुरा से 45 किलोमीटर दूर है। उनको हम मथुरा लेकर आए । हमने उनसे कहा-गुरुदेव के दर्शन करके चलेंगे । वह सब राजी हो गए । हम गुरुदेव के पास बैठे थे तभी माता जी हम सबके लिए एक-एक गिलास दूध लेकर आई।
हमने माता जी से कहा,
” माता जी हम तो दूध नहीं पिएंगे । हमारे पेट में गैस बनती है।”
तब हमारा वजन भी भारी था । दूध के लिए हमने मना किया ।

गुरुदेव बोले,

” बेटा दूध पीले यह नुकसान नहीं करेगा । यह दूध कामधेनु का दूध है ।”

हमने कहा, ” कामधेनु गाय का दूध है तब तो हम अवश्य पिएँगे ।”

गुरुदेव ने कहा,

” बेटा, कामधेनु गाय के तुझे दर्शन कराएँ ? “

हमने कहा, ” अवश्य ही हम कामधेनु गाय के दर्शन करेंगे ।”

गुरुदेव ने रसोई के पास एक पीतल का घड़ा रखा था, इशारा करके कहा-

” वह कामधेनु है ।”

हमने कहा, “यह तो घड़ा है , गाय कहाँ है ? “

गुरुदेव ने कहा,

” बेटा हम आधा सेर दूध मंगाते हैं और २०० रुपये माहवार में अपना खर्च चलाते हैं। पाँच व्यक्ति हैं । ताई (गुरुदेव की माता जी) भी उस समय थीं । बेटा सात आदमी तुम हो और पाँच आदमी हम हैं , कुल १२ आदमी हैं और आधा सेर दूध है । माता जी घड़े का पानी मिलाकर चीनी मिलाकर तुमको पिला रही हैं । यह कैसे गैस पैदा करेगा? “

हमको बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि

” जिनको सारा देश गुरु मानता है वह मात्र दो सौ रुपये माहवार में घर का खर्चा चलाता है। हम सब पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ा।”

गुरुदेव ने कहा :

” बेटा ब्राह्मण उसे कहते हैं जो कम से कम में अपना खर्च चलाता है। अपने लिए सुख सुविधा कम रखता है और दूसरे की सुख सुविधा का ध्यान रखता है । “

हमको बड़ी शर्म आई, एक हम ब्राह्मण जो अनाप शनाप खर्च करते हैं और अपने को ब्राह्मण कहते हैं ।

हमने कहा, ” गुरुदेव क्या दान नहीं आता है ? “

गुरुदेव ने कहा,

“बेटा दान का पैसा खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। “

हमने गुरुदेव में सच्चे ब्राह्मण के दर्शन किए और अपने को धन्य माना।

ज़रा विचार कीजिये – ऐसा था गुरुदेव का व्यक्तित्व

जय गुरुदेव

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परमपूज्य गुरुदेव और लीलापत शर्मा जी के पत्रों पर आधारित लेख


दिनांक ७-४-६२

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला । नवरात्रि के आपके कार्यक्रम का समाचार पढ़कर प्रसन्नता हुई । सामूहिक आयोजनों से धर्म चेतना बढ़ती है । आत्मशांति के लिए एकान्त साधना और धर्म सेवा के लिए सामूहिक कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है । नवरात्रि का आपका कार्यक्रम सफलता पूर्वक सम्पन्न हो ऐसी कामना है ।

कलम और वाणी ही केवल हमारी है और जो कुछ भी है दैवी है । हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति किसी के अन्तःकरण तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं । यह शक्ति तो केवल ईश्वरीय शक्ति में है । हमारी वाणी में घुलकर जब तक वह काम करेगी तभी तक उसका प्रभाव रहेगा । आपको यह सब पसंद आता है इसका कारण आपका उच्च आत्मिक स्तर ही है। कुशल समाचार भेजते रहा करो । माता जी आप सबको आशीर्वाद लिखाती हैं ।

१३ को पंजाब मेल से ग्वालियर जावेंगे । वहां से रेल द्वारा भिण्ड जाने का कार्यक्रम है । भिण्ड १४ को रहेंगे । १५ को प्रातः वहां से चल कर ग्वालियर से पंजाब मेल या जनता से झाँसी जावेंगे । झाँसी १६ को रहेंगे । १६ की रात को पैसेंजर से वापिस मथुरा चले आवेंगे ।

श्रीराम शर्मा


दिनांक १२-८-६७

हमारे आत्मस्वरूप,

पत्र मिला | आप इधर जो कार्य कर रहे हैं उससे अति प्रसन्नता होती है । ऐसे ही प्रयत्न और पुरुषार्थ से नये निर्माण के सपने साकार होंगे।

आप इधर काम से निवृत्त होकर जब मथुरा आवेंगे तभी आगे का प्रोग्राम बनेगा । आपके परामर्श से ही आगे की गतिविधियों का निर्धारण होगा। आशा है आपके प्रयत्न से दुकान का कुछ काम जमा होगा |

आप कब मथुरा आ रहे हैं सो लिखें । उधर से निवृत्त होकर ही आना ठीक रहेगा । घर में सबको हमारा आशीर्वाद और माता जी का स्नेह कहें ।

श्रीराम शर्मा


ऑनलाइन ज्ञानरथ के साधकों को हमारा वंदन एवं आभार

१० अक्टूबर २०२० का ज्ञानप्रसाद

आज १० अक्टूबर का ज्ञान प्रसाद आपके समक्ष प्रस्तुत करते अत्यंत हर्ष हो रहा है। पिछले दो दिन से हमारा प्रयास उस वीडियो को बनाने में लगा रहा जो हमने स्वयं गायत्री तपोभूमि मथुरा में जाकर बनाई थी। आप पूछेंगें कि केवल १२ मिंट की वीडियो को बनाने में दो दिन लग गए, लोग तो एक -एक घंटे में कितनी ही वीडियो अपलोड किये जा रहे हैं। यहाँ आता है हमारे गुरुदेव का मार्गदर्शन। जैसा गुरुदेव निर्देश दे रहे हैं वैसा हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। जो भी काम हम करते हैं इतनी श्रद्धा और निष्ठां के साथ सम्पन्न करते हैं कि हमारी आत्मिक शांति तभी होती है जब हमारे परिजन संतुष्ट होते हैं। आप सबके कमेंट इस तथ्य के साक्षी हैं कि आपको हमारा कार्य पसंद आ रहा है। दिन प्रतिदिन नए परिजन ज्ञानरथ में समिल्लित हो रहे हैं और वह भी आपके पुरषार्थ का ही परिणाम है। जिन परिजनों ने अपनी दिनचर्या ही बना ली है कि एक नियत समय पर हमें कमेंट भेजना ही है उनको हमारा नमन एवं ह्रदय से आभार।

इस भूमिका के साथ चलते हैं परमपूज्य गुरुदेव एवं आदरणीय लीलापत जी के दो और पत्रों के ऊपर चर्चा। आज के लेख में दो पत्र : 7 अप्रैल 1962 और 12 अगस्त 1967 के समिल्लित किये हैं। अगस्त वाला पत्र तो शायद ” पत्र पाथेय ” पुस्तक का अंतिम पत्र था। लेकिन अगर हम इन दोनों पत्रों की शैली और भाषा देखें तो आत्मीयता और स्नेह इस प्रकार झलक रहा है जिसके लिए अक्षर कम पड़ जाते हैं। गुरुदेव ने लीलापत जी को ऐसा शिक्षण प्रदान किया और पल -पल पर ,कदम कदम पर मार्गदर्शन देते रहे जो हम सबके लिए एक अभूतपूर्व उदाहरण है। लीलापत जी की गुरुभक्ति भी हमें प्रेरणा देती है तभी तो वंदनीय माता जी एवं गुरुदेव उनको अपना बड़ा बेटा
मानते थे।

ग्वालियर डिस्ट्रिक्ट में स्थित डबरा नगर शुगर मिल के लिए प्रसिद्ध है और लीलापत जी उसमें कार्य करते थे। गुरुदेव के साथ सम्पर्क में आने के समय मिल एसोसिएशन के प्रेजिडेंट भी थे।जब गुरुदेव ग्वालियर ,झाँसी ,भिंड इत्यादि क्षत्रों में अपने कार्यक्रम करते तो लीलापत जी के व्यक्तित्व का लाभ मिलता और मिल कर्मचारी काफी सहयोग देते। गुरुदेव ने लीलापत जी के अंदर समर्पण की भावना देख ली थी और उन्हें मथुरा तो लेकर आना ही चाहते थे लेकिन पारिवारिक और मिल की ज़िम्मेदारिआं आड़े आ रही थीं। 1962 वाले पत्र में एकांत साधना और धर्म सेवा पर गुरुदेव ने जो पंक्ति लिखी है उस पर चर्चा करना इस लेख के प्राण हैं :

” आत्मशांति के लिए एकान्त साधना और धर्म सेवा के लिए सामूहिक कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है “

हम सब कभी न कभी अकेले बैठ कर कुछ न कुछ पढ़ते हैं और जो पढ़ते हैं उसके बारे में सोचते हैं ,मनन करते हैं ,विश्लेषण करते हैं और कई बार किसी निर्णय तक भी पहुँच जाते हैं। इसी चिंतन-मनन से हमारी कुछ धारणा ( viewpoint ) भी बन जाती है। अब हम पर ,केवल हम पर ही निर्भर करता है कि जो हम पढ़ रहे हैं उससे हमें आत्मिक शांति मिल रही यां आत्मिक अशांति। जब हम यह कह रहे हैं कि केवल हम पर ही निर्भर है तो यह सही है – यह सही इस लिए है कि हमारा ही चयन है , हमने ही चुना है कि हमने क्या पढ़ना है। गीता उपदेश भी इसी मार्ग की तरफ लेकर जाता है :

” आंखें है तो देखेंगीं ही ,कान है तो सुनेंगें ही लेकिन क्या देखना ,क्या सुनना , इसका चयन तो हमने ही करना है “

शायद यही कारण था कि लीलापत जी कई -कई घंटों इन पत्रों के अक्षरों को ,उनकी बनावट को और अक्षरों की शैली को देखते रहते थे। इन अक्षरों में वह गुरुदेव को ढूंढ़ते थे। – वाह रे समर्पण और श्रद्धा। इसी से उन्होंने आत्म परिष्कार किया।

तो अब आती है धर्म सेवा की बात। गायत्री परिवार की सेवा के लिए ही तो इतने बड़े- बड़े सामूहिक यज्ञों का आयोजन होता रहा है ,108 कुंडीय यज्ञ ,सहस्र कुंडीय यज्ञ इत्यादि ,इत्यादि। इन आयोजनों में गीत -संगीत का महत्व तो है ही , उद्बोधन से participants को नई ऊर्जा ,मार्गदर्शन के साथ -साथ सेवा तो अवश्य ही होती है। इसी सेवा को क्रियान्वित करने के लिए हर वर्ष श्रद्धेय डॉक्टर साहिब , चिन्मय भाई साहिब अपनी टोली के साथ अमरीका -कनाडा के दौरे लगाते हैं। भारत में तो ऐसे आयोजनों की गणना ही नहीं की जा सकती। आज कल COVID -19 के प्रतिबंधों के कारण ज़ूम मीटिंग्स हो रही हैं। सम्पर्क स्थापित करना और उसको कायम रखना अत्यंत आवश्यक है। हम भी संपर्क की आवशयकता पर कई बार कह चुके हैं। जो परिजन ज्ञानरथ से शुरू से जुड़े हुए हैं उनका लेख पढ़ने के लिए आभार तो है ही लेकिन जो सुझाव और मार्गदर्शन उनके द्वारा हमें मिला है उसकी भी कोई तुलना नहीं है।

हमारे परिजन देख रहे होंगें कि इतने छोटे पत्रों में कितनी philosophy छिपी हुई है। यह कोई ऐसा वैसा साहित्य नहीं है इसमें दैवी शक्ति सम्माहित है। गुरुदेव खुद 1962 वाले पत्र में लिख रहे हैं :

” कलम और वाणी ही केवल हमारी है और जो कुछ भी है दैवी है । हमारे जैसे तुच्छ व्यक्ति किसी के अन्तःकरण तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं । यह शक्ति तो केवल ईश्वरीय शक्ति में है । हमारी वाणी में घुलकर जब तक वह काम करेगी तभी तक उसका प्रभाव रहेगा । आपको यह सब पसंद आता है इसका कारण आपका उच्च आत्मिक स्तर ही है।”

इतना down -to – earth व्यक्तित्व केवल हमारे गुरुदेव का ही हो सकता है। इतने बड़े ,विशाल गायत्री परिवार के
जन्म -दाता, संचालक अपने आपको तुच्छ व्यक्ति कह रहे हैं और सारे का सारा श्रेय उस परमपिता परमात्मा ,दैवी शक्ति को दे रहे हैं। तुच्छ के प्रायवाची अक्षर petty , humble हो सकते हैं। लीलापत जी को इन्ही पत्रों से प्रेरणा मिली होगी और उनके जीवंत शिष्य बन गए।

क्या हम ऐसा समर्पण और संकल्प दिखा सकते हैं ? अवश्य ,अवश्य – आइये हम सब इकठे हो कर सामूहिक नमन करें और आज का लेख को यहीं विराम दें।

कमेंट करके अवश्य बताएं कि लेख कैसे लग रहे हैं अतः सुझावों का सदैव स्वागत है।

जय गुरुदेव

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