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हमारे गुरुदेव के कुछ अनुकरणीय सन्देश – उनकी पुस्तकों से

बच्चे अपने माँ बाप से बहुत कुछ चाहते हैं अच्छे कपडे ,अच्छे जूते, अच्छा खाना ,अच्छे खिलोने , अच्छा बिस्तर ,अच्छा घर इत्यादि इत्यादि -the list goes on and on। यह बात तो अटल सत्य है ,हर कोई इसको मानता भी है और सदियों से इसको निभा भी रहा है। पर माँ बाप बच्चों से कुछ न चाहें ऐसी बात भी तो नहीं हैं। माता पिता बच्चों के लिए अगर इतने साधन उपलब्ध करवाते हैं तो यह भी आशा करते हैं कि उन साधनो का प्रयोग ठीक से करें। माता पिता ने बिस्तर देकर अपना दाइत्व तो पूरा कर दिया परन्तु बच्चे को बिस्तर पर मल – मूत्र त्याग न करना उसका दाइत्व है। जब तक बच्चा छोटा है ,समझ नहीं है तब तक तो माँ उसके साथ -साथ साये की तरह चलती है ,ऊँगली पकड़ कर चलने में सहायता भी करती है ,वह गिरता भी है ,गिरने से रक्त भी बहता है ,फिर भी उठने में सहायता भी करती है इसी बात को बच्चे दिन -प्रतिदिन अपने माता पिता से सीखते रहते हैं। ज्यों ज्यों बच्चा बड़ा होता है माता पिता की आशा भी साथ – साथ चलती रहती है । हमारे सहकर्मी इस बात से भली भांति अवगत हैं कि हम जब आशा की बात कर रहे हैं तो किसी भौतिक आशा की बात नहीं कर रहे। माता पिता का व्यक्तित्व ही ऐसा है कि वह अपना सबकुछ आखिरी दम तक देने की प्रवृति रखते हैं। सारा जीवन भर वह जो कुछ भी प्राप्त करते हैं अपने बच्चों के नाम वसीयत के रूप में बाँट कर अपनी अगली यात्रा पर ( परलोक ) चले जाते हैं। और कोई विकल्प भी तो नहीं है। माता पिता बच्चों को नहीं देंगें तो और किसको देंगें। हमारे सहकर्मी इस बात से भी भली भांति परिचित हैं कि वसीयत में क्या कुछ शामिल किया जाता है। वसीयत को अंग्रेजी में will कहते हैं और विरासत को heritage यां legacy कहते हैं। विरासत में मिलने वाले संस्कार ,चरित्र ,व्यव्हार इत्यादि का भी उतना ही रोल है जितना वसीयत का है ,शायद उससे से अधिक ही है। अगर वसीयत में अच्छा व्यापार मिल जाता है लेकिन उसका पोषण करने के लिए , उसको सँभालने की समर्था नहीं है , परिश्रम के संस्कार नहीं हैं तो व्यापार असफल हो कर गर्त में गिरने में अधिक देर नहीं लगती। आज के इस भागदौड़ और आधुनिकरण के युग में भी अनेकों परिवार हमें मिलते हैं जिनसे केवल बात करने से ही उनकी बैकग्राउंड का प्रतिबिम्भ दर्शित हो जाता है

परमपूज्य गुरुदेव ने भी अपनी पुस्तक ” हमारी वसीयत और विरासत ” में इसी तरह की भावना की आशा की है। ग्वाल बाल की सेना ,रीछ वानरों का योगदान गोवर्धन उठाने में एवं रामसेतु की रचना केवल ग्रंथों की कहानियां नहीं हैं ,इनमें गूढ़ दर्शन ( philosophy छिपा हुआ है। गुरुदेव ने भी अपने बच्चों से ऐसी ही आशा की है। नव-निर्माण ,युग-निर्माण ,मनुष्य में देवत्व का उदय ,21 वीं शताब्दी उज्व्वल भविष्य के उत्तरदायित्व को वहन करना अकेले हम का कार्य कभी भी संभव नहीं हो सकता। हमारे ऊपर हमारे गुरु ,हमारे मार्गदर्शक का निर्देश और संरक्षण तो है ही लेकिन यह सब के मिलजुल कर करने का सामूहिक प्रयास है। अकेले कोई भी ,कुछ भी करने में असमर्थ है। इस विशाल गायत्री परिवार के हर सदस्य का ,हमारे हर बच्चे का , बाल -परिवार के प्रत्येक बच्चे का योगदान अति आवश्यक है।

गुरुदेव ने समयदान और अंशदान पर अत्यंत ज़ोर दिया है। यहाँ तक कि उन्होंने एक मुट्ठी अनाज और एक आना प्रीतिदिन के योगदान का भी सुझाव दिया है। इस अंशदान के साथ- साथ गुरुदेव ने अपने प्रवचनों में समयदान की परिभाषा को समझाया है। दिन के 24 घंटों में से घर गृहस्थी के कार्यों ,नौकरी के और बाकि के कार्यों को करते हुए समयदान के लिए कुछ घंटे निकालना कोई कठिन है।

गुरुदेव प्रायः कहते हैं –

” हमें अपने बच्चों के बारे में क्या करना है ,इस उत्तरदायित्व का हर पल ख्याल रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है एक बात बिलकुल स्मरण रखने योग्य है -हमारी आकांक्षा और आवश्कयता को भुला न दिया जाए। यह कहने की बात ही नहीं है कि हमारा और आपका चेतना का सम्बन्ध है। हमने तो कई बार इस बात को दोहराया है – तू मेरा काम कर , मैं तेरे हर कार्य की ज़िम्मेवारी लेता हूँ। हमारे परिवार का हर कोई सदस्य बहुत बड़ा काम करने में समर्थ है ,छोटेपन का तो उसने केवल मुखौटा ही पहन रखा है उस मुखौटे को उतारने की ही देर है। मुखौटा उतारते ही उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। इसका उदाहरण तो हमारे सहकर्मियों ने कई बार देखा होगा। सामान्य से दिखने वाले परिजन कितने महान कार्य कर सकते हैं। यह तथ्य बिलकुल अविश्वसनीय है। सामूहिक प्रयास का उदाहरण अश्वमेध यज्ञों की विशालताऔर सफलता साक्षी है। हमारे यहाँ इधर कनाडा में भी वार्षिक गायत्री यज्ञ और अन्य कार्यक्रम इतनी सफलता से सम्पन होते हैं तो सभी का एक ही भाव होता है -समूहिक पुरषार्थ और गुरुदेव का संरक्षण।

गुरुदेव कहते हैं

” हमारे मार्गदर्शक ने एक ही झटके में क्षुद्रता ( low thinking ) का आवरण उतार कर महानता का परिधान पहना दिया था। हमारा तो कायाकल्प हो गया था। इस कायाकल्प में मात्र इतना ही हुआ कि लोभ और मोह के कीचड़ से बाहर निकल कर आ गए। जो -जो सत्य परामर्श दिए गए ,जिन -जिन महान आत्मायों के आग्रह पूरे करने का आश्वासन माँगा गया सब शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा है। एकाकी चलने का आत्मविश्वास और आदर्शों को भगवान मान कर कदम बढ़ाये गए। इसका परिणाम एक दम सामने आना आरम्भ हो गया। अब कभी भी एकाकी होने का आभास नहीं हुआ ,साधनहीन यां उपेक्षित ( उदासीन ) स्थिति का आभास ही नहीं हुआ। सत्य को अपनाने की देर भर ही थी कि असत्य का अँधेरा अपनेआप ही छटता चला गया। हमारा अपने बच्चों से यही अनुरोध है कि हमारी जीवन यात्रा को घटनाक्रम की दृष्टि से नहीं वरन निरीक्षिक / पर्यवेक्षक की दृष्टि से पढ़ा जाना चाहिए। निरीक्षक का अर्थ यही है कि हमने अपने जीवन का पूर्ण तौर से निरीक्षण किया है ,पूर्ण रूप से साधना की है। आध्यात्म को अपनाते हुए ऋषि परम्परा को अपनाने की दिशा में हमारे कदम बढ़ते ही गए। हमारा ऐसा मानना है कि आंतरिक पवित्रता और बहिरंग प्रखरता ( तीव्रता ) का जितना अधिक समन्वय होगा वह मनुष्य उतना ही दैवी विभूतियों से लाभांवित होगा।

हम अपने सहकर्मियों की सुविधा के लिए इन सभी टेक्निकल शब्दों के सिंपल अर्थ ढूंढ – ढूंढ कर इसको आसान बना रहे हैं क्योंकि गुरुदेव के साहित्य को ,गुरुदेव की जीवनी को समझना कोई सामान्य बात नहीं है।

आंतरिक और बहिरंग को थोड़ा डिटेल में देखें तो लगेगा कि साधना आंतरिक शुद्धि के बिना संभव ही नहीं है। नहा धो कर ,स्वच्छ आसान पर बैठ कर ,पूजा स्थली में सफाई और अच्छी धूप बत्ती जलाना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है आंतरिक शुद्धि ,आपके अन्तः करण की शुद्धि ,आपकी आत्मा की शुद्धि। गुरुदेव जब साधना से सिद्धि की बात करते हैं तो भगवत प्राप्ति के लिए आंतरिक शुद्धि एक पासपोर्ट और visa का काम करता है।

गुरुदेव आगे फिर कहते हैं :
” कहने को तो हमारे परिवार का नाम ,गायत्री परिवार है ,इसके सदस्यों का रजिस्टर भी रखा गया है। समयदान ,अंशदान ,जीवनदान इत्यादि का अनुबंध भो है लेकिन वास्तविकता कुछ इससे अधिक ही है। जो हमें आज तक समझ आया है और जो हम प्रतिक्षण अनुभव करते हैं वह है जन्म -जन्मांतरों से संग्रहित आत्मीयता। इस आत्मीयता के पीछे गुदगुदी उत्पन्न करने वाली अनेकानेक घटनाएं हमें स्मरण हैं। हमारे बच्चे इन घटनाओं को स्मरण रखें य न रखें फिर भी वे विश्वास करते हैं कि हम सब एक मज़बूत डोरी से बंधे हुए हैं वह डोरी जिसका नाम है -आत्मीयता -। यह आत्मीयता की डोरी अधिक से अधिक मज़बूत होती जाती है। यह समर्पण की डोरी ही इस विशाल गायत्री परिवार को एक सूत्र में बांधे रखी है। इस विवरण का जीता जागता उदाहरण गुरुदेव के सहकर्मी जिन्हे हम कई बार मिल चुके हैं और आज के युग के परिजन सब इस आत्मीयता के प्रतीक हैं। कईं बार तो आश्चर्य होता है कि गायत्री परिजन जिनकी एक नियत पीली वेशभूषा है ,व्यक्तित्व भी कुछ उदाहरणीय ही है। गुरुदेव जब मथुरा छोड़ कर शांतिकुंज आ रहे थे तो उन्होंने अपने बच्चों के ,परिजनों के चयन के ऊपर एक बहुत ही प्रेरणादायक बात कही थी उसका संक्षिप्त वर्णन कुछ ऐसा है :

जब मथुरा में बरसात की ऋतु आती है तो सब कुछ जल मग्न हो जाता है। नगर की गलियों और नालियों में कूड़ा- कर्कट बह रहा होता है। गरीब लोग उन नालियों में से हाथ डाल- डाल कर कुछ ढूंढ रहे होते हैं। कई बार उन्हें कुछ मूल्यवान सोना ,चांदी ,हीरे इत्यादि भी मिल जाते हैं। ठीक उसी प्रकार हमने भी परिजनों को इतना परिश्रम करके ढूंढा है। हमारे लिए ऐसे परिजन कितने मूल्यवान हैं हमसे बेहतर कौन जान सकता है।

ऑनलाइन ज्ञानरथ के सहकर्मियों ने अनेकों बार शांतिकुंज जाने, श्रेध्य डॉक्टर साहिब से मिलने ,श्रद्धेय जीजी से मिलने के लिए मार्गदर्शन माँगा है। अगर वह आज वाला लेख अच्छे से अध्ययन कर लें तो उनका समाधान अपनेआप होने का सम्भावना है।

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हमारे पूज्य गुरुदेव का प्रकृति से स्नेह – रोते हुए पर्वत

हमारे पूज्य गुरुदेव का प्रकृति से स्नेह -आज हम गुरुदेव द्वारा लिखित बहुचर्चित पुस्तक ” सुनसान के सहचर ” में से एक दृश्य वर्णित करने का प्रयास करेंगें। गायत्री परिवार का शायद ही कोई परिजन होगा जिसने इस पुस्तक का अध्यन न किया हो और उन पलों को गुरुदेव के साथ -साथ हिमालय के बर्फीले पहाड़ों में जिया न हो। हम आज प्रयास करेंगें कि जिस प्रकार गुरुदेव ने अपने सहचरों के साथ स्नेहपूर्वक सानिध्य का आनंद उठाया वही भावना हम आपके ह्रदय तक उतारें। गुरुदेव की हिमालय यात्रा में उनके सहचर नदियां ,झरने ,फूल ,वृक्ष ,पर्वत ,बकरियां ,भेड़ें ,गगन ,गगन में सितारे इत्यादि सब उस परमपिता की ही कलाकृति ही तो हैं। इनके साथ हमारा स्नेह और सनिध्य होना स्वाभाविक है।

आगे चलने से पहले हम यह कहना चाहेंगें कि गुरुदेव के सारे साहित्य का मूल्य इतना कम है कि आपको विश्वास ही न हो। 119 पन्नों की पुस्तक ” सुनसान के सहचर ” का मूल्य केवल 15 रुपए है , चाय के एक कप के मूल्य से भी कम। Companion in solitude शीर्षक से यह पुस्तक इंग्लिश में भी उपलब्ध है। पिछले वर्ष हमने मथुरा की युग निर्माण योजना के प्रेस की कुछ videos शूट की थीं। कभी समय हुआ तो आपको अवगत करायेंगें कि करोड़ों रुपयों की मशीनों पर इतनी कम मूल्य वाली पुस्तकें कैसे छप रही हैं ,सारे process हमने एक एक करके ,पूरी बारीकी से शूट किये था।

गुरुदेव ने सामने पर्वत देखे , उन पर कुछ जल रुका पड़ा था। जल ऊपर से बर्फ के पिघलने के कारण पर्वत की दरारों में से रिस कर बूँद -बूँद बन कर नीचे टपक रहा था। हिमालय में ऐसे दृश्य अक्सर देखने में मिलते हैं। इधर उधर से धूल- मिटटी उड़ कर इन गीले पर्वतों पर चिपक जाती है। इस सारी क्रिया से कई जगहों पर हरी घास भी उग जाती है। गुरुदेव ने इस रिसते जल को अपनी भावना के अनुसार “आंसूं की बूँदें ” कहा। कहने लगे पर्वत रो रहे हैं। पर्वतों में हरी नरम ,कोमल घास को काई कहते हैं। गुरुदेव ने काई को आँखों में होने वाला कीचड़ की संज्ञा दी।

गुरुदेव अपनी कल्पना में जाये जा रहे थे। पर्वत से पूछने लगे -रो क्यों रहे हो भाई ,कई स्थानों पर तो उनके आंसू पोंछे भी । लेकिन वह पर्वत है ,पत्थर का बना हुआ पत्थर का दिल ,क्या उत्तर देता ,बोल थोड़े सकता था । परन्तु कल्पना रानी ने तो ज़िद लगाई थी , रोने का कारण जानने के लिए गुरुदेव की कल्पना कहने लगी –

अरे पर्वत राज तुम्हे क्या कष्ट है ,आंसू क्यों बहा रहे हो ? तुम तो बनश्री से लदे पड़े हो। सारी सम्पदा के मालिक हो ,स्थिर बैठे हो ,कोई भागदौड़ नहीं ,कोई चिंता नहीं ,बैठे बैठे आनंद के दिन व्यतीत करते हो ,इतना सब कुछ होते हुए भी रोते हो ,क्या बात है ?

पत्थर का पहाड़ अकड़ कर खड़ा था ,परन्तु फिर भी बोला और अपनी व्यथा कहने लगा :

बोला मेरे दिल का दर्द तुम्हें क्या मालूम? मैं बहुत ही ऊँचा हूँ ,वनश्री से लदा हूँ।,निश्चिन्त बैठा रहता हूँ। देखने को मेरे पास सब कुछ है, पर निष्क्रिय- निश्चेष्ट जीवन भी क्या कोई जीवन है। जिसमे गति नही, संघर्ष नहीं, आशा नहीं, स्कूर्ति नहीं, वह जीवित होते हुए भी मृतक के समान है। सक्रियता में ही आनन्द है। । इसे केवल अनजान लोग ही आराम और आनन्द कह सकते हैं। इस दृष्टि से क्रीड़ापन में जो जितना खेल लेता है,वह अपने को उतना ही तरो- ताजा और प्रफुल्लित अनुभव करता है। सुस्त तो कई बार अपनी भावनाओं के वशीभूत होकर हत्या करने की भी सोच लेता है

इस सृष्टि के सभी पुत्र प्रगति के पथ पर उल्लास भरे सैनिकों की तरह कदम पर कदम एक ही ताल से अपने जूतों को ठोकते हुए ,मोर्चे पर मोर्चा पार करते चले जाते हैं। दूसरी ओर मैं हूँ जो सारी सम्पदाएँ अपने पेट में छिपाए मौज की छान रहा हूँ। कल्पना बेटी तुम मुझे सेठ कह सकती हो, अमीर कह सकती हो भाग्यवान कह सकती हो पर हूँ तो मैं निष्क्रिय ही। निष्क्रिय का अर्थ हमारे पाठक जानते ही होंगें -इंग्लिश में defunct / unusable होता है । संसार की सेवा में अपने पुरुषार्थ का परिचय देकर लोग अपना नाम इतिहास में अमर कर रहे हैं , कीर्तिवान् बन रहे हैं, अपने प्रयत्न का फल दूसरे को उठाते देखकर गर्व अनुभव कर रहे हैं। पर मैं हूँ जो अपना वैभव अपने तक ही समेटे बैठा हूँ। इस आत्मग्लानि ( inferiorty complex ) से यदि मुझे रोना आता है, आँखो में आँसू बरसते और कीचड़ निकलते हैं तो उसमें अनुचित ही क्या है?

मेरी नन्ही- सी कल्पना ने पर्वतराज से बातें कर ली समाधान भी पा लिया, पर वह अभी भी खिन्न ही थी। बहुत देर तक यही सोचती रही,कैसा अच्छा होता यदि इतना बड़ा पर्वत अपने टुकड़े- टुकड़े करके अनेकों भवनों, सड़कों, पुलों के बनाने में खप सका होता। तब भले ही वह इतना बड़ा न रहता, सम्भव है ऐसा करने से उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता लेकिन तब वह वस्तुत: धन्य हो जाता। ऐसा करने से उसका बड़प्पन सार्थक हुआ होता। इन परिस्थितियों से वंचित रहने पर यदि पर्वतराज अपने को अभागा मानता है और अपने दुर्भाग्य को धिक्कारता हुआ सिर धुनकर रोता है तो उसके रोने का कारण तो है ही।

गुरुदेव ने अपने साहित्य में कई स्थानों पर तप का महत्व कितनी ही बार समझाया है। हम उस पर्वत की तरह निष्क्रिय जीवन व्यतीत करना चाहते हैं यां die in harness वाले असूल को अपनाना है। आज का युग ऐसा युग है जिसमें जो कोई कुछ भी करना चाहे कर सकता है केवल इच्छा शक्ति की ज़रूरत है ,साधन अपने आप बनते चले जाते हैं।

तो मित्रो कल्पना दीदी और पर्वत राज की नोकझोंक को यही विराम देते हैं इस आशा के साथ कि आप को अवश्य प्रेरणा मिली होगी ।

जय गुरुदेव

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पूज्यवर कैलाश मानसरोवर क्षेत्र में

29 जुलाई 2020 का ज्ञानप्रसाद
चेतना की शिखर यात्रा 2

आज का लेख केवल दो पन्नों का है क्योंकि आज ” गुरुदेव की हिमालय यात्रा ” का पूर्णविराम हो रहा है। तो आइये चलते हैं गुरु देव के साथ साथ ।

गुरुदेव ने मानसरोवर झील के तट पर बैठ कर कुछ देर ध्यान किया और फिर परिक्रमा भी की। एक परिक्रमा में लगभग 3 घंटे लगते हैं। गुरुदेव देख रहे थे कि हंस मोती खा रहे हैं कि नहीं। हंस मोती तो खाते दिखे नहीं लेकिन कुछ चुन -चुन कर अवश्य कुछ खा रहे थे। भावार्थ तो फिर भी यही बनता है कि हंस इतना बुद्धिमान है कि चुन -चुन कर खा रहा है। उसे विदित है कि मानसरोवर झील में से मछली खानी है या वनस्पति। निर्मल चेतना शुद्ध और सत्य को ही ग्रहण करती है, शेष को नकार देती है। कैलाश पर्वत मानसरोवर से दिखाई तो देता है लेकिन इतना पास भी नहीं है। यह हम इसलिए कह रहे हैं कि गूगल सर्च से अलग -अलग परिणाम आए तो हमने इस दूरी को अपने सूझवान पाठकों पर ही छोड़ दिया। शिवलिंग के आकार का प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण कैलाश पर्वत एक आध्यात्मिक स्रोत होने के कारण पुरातन काल से ही हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। इस के आसपास छाय पर्वतों की संख्या 16 है। 16 पंखुड़ियों वाले कमल के बीच विराट शिवलिंग एक अद्भुत दृश्य दिखते हैं। आप इस दृश्य के satellite image गूगल से देख सकते हैं। शिवलिंग आकार वाला कैलाश पर्वत सबसे ऊँचा है और काले पतथर का बना हुआ है और आस पास की 16 पंखुड़ियां लाल और मटमैले पतथर की हैं। कैलाश पर्वत की परिक्रमा करना अपने में एक महत्व लिए हुए है। गुरुदेव को परिक्रमा करते कुछ तिब्बती मिले। उनमें से कइयों की आयु 60 वर्ष के लगभग होगी, उनमें से एक ने गुरुदेव को पूछा – आप भारतीय हैं ? हमारे गुरु को आपने क्या दर्ज़ा दिया हुआ है ? उनदिनों तिब्बत से लामा लोग भारत आया करते थे। चीन ने तिब्बत की सभ्यता में घुसपैठ की और उसका परिणाम हम आज भी देख रहे हैं। उस वृद्ध ने फिर पूछा – बताओ न ,आप तो अपने आदि गुरु को प्रणाम करने जा रहे हो। हमारे लामा भी तो कैलाश के ही रूप हैं। गुरुदेव ने कहा –

” कोई भी गुरु तिब्बत या भारत का होने कारण पूजनीय नहीं होता। यह नियति का विधान भी हो सकता है। अगर हम एक ही दिशा में प्रगति करते रहें और दूसरी दिशा की उपेक्षा करें तो प्रकृति का उल्लंघन कर रहे हैं। तिब्बत के शासकों और धर्मगुरुओं ने चेतना के क्षेत्र में तो बहुत प्रगति की परन्तु लौकिक पक्ष छोड़ दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि व्यवाहरिक जगत में वह कमज़ोर हो गया। उसकी प्रगति एकांगी हो गयी और इसी का दंड तिब्बत को भुगतना पड़ा। ”

गुरुदेव का तर्क सुनकर वह वृद्ध आशान्वित हुआ। उसने फिर पूछा – क्या तिब्बत को अपना गौरव फिर से वापिस मिल सकेगा ?

गुरुदेव कहने लगे :

” कोई भी जाति हमेशा एक ही दशा में नहीं रहती , जाति ही क्यों ,व्यक्ति यां इस प्रकृति का कोई भी घटक हमेशा एक जैसा नहीं रहता। उत्थान और पतन दोनों ही स्थितियां सभी के जीवन में आती हैं। ”

यह सुनकर वह वृद्ध तिब्बती गुरुदेव के समक्ष नतमस्तक हो गया। गुरुदेव उससे छोटी आयु के थे और न ही कोई योगी ,सन्यासी लग रहे थे। उसने फिर एक और जिज्ञासा व्यक्त की। कहने लगा – भगवान शिव का दिव्यधाम कैलाश क्या यही है ? यह कह कर वह वृद्ध करबद्ध मुद्रा में गुरुदेव के सामने खड़ा हो गया। गुरुदेव ने उस पर एक दृष्टि डाली और कहने लगे ;

” जिस लोक को भगवान शिव का दिव्यधाम कहते हैं वह तो अपार्थिव ( अलौकिक ) है। उसका कोई रूप थोड़े ही है। इसी तरह अयोध्या भगवान राम और ब्रजधाम भगवान कृष्ण के प्रतिरूप हैं। ”

हम अपने पाठकों को आग्रह करेंगें कि वह इसके बारे में डिटेल से मनन करें क्योंकि त्रुटिपूर्ण या अधूरी धारणा प्रायः गलत निष्कर्ष ही निकालती है।

कैलाश पर्वत की परिक्रमा अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ दिनों में ही पूरी होती है। इसके शिखर पर जाने का दुःसाहस तो अभी तक किसी ने नहीं किया। लगभग 22000 फुट ऊँचे शिखर तक पहुँचने के लिए डेढ़ मील सीधी चढ़ाई है। तिब्बत में होने के कारण गुरुदेव को विचार आया कि अदिबद्री की और रुख किया जाये। बौद्ध सम्प्रदाय के धूलिंग मठ और अदिबद्री का आपस में कुछ सम्बन्ध तो है लेकिन इस पुस्तक ” चेतना की शिखर यात्रा 2 ” में बहुत ही संक्षिप्त वर्णन है। हाँ इतना वर्णन अवश्य है कि लगभग 1500 वर्ष पूर्व बद्रिकाश्रम धूलिंग मठ में ही था।

तो मित्रो हम गुरुदेव की इस वाली हिमालय यात्रा को यहीं पर पूर्ण विराम देते हैं।

इस लेख को मिला कर हमने कुल 9 लेख ऑनलाइन ज्ञानरथ के माध्यम से आपके समक्ष प्रस्तुत किये। लगभग 40 पन्नों ,12000 अक्षरों के यह लेख हमने अपने विवेक और सहकर्मियों की सहायता से घोर चिंतन ,मनन और रिसर्च से तैयार किये। अनगनित वीडियो देखीं ,कई परिजनों से सम्पर्क करके गुरुदेव क्र बारे में जानने का प्रयास किया। इन लेखों द्वारा जिन्होंने भी दादा गुरु, उदासीन बाबा , निखिल , महावीर स्वामी ,सत्यानन्द , बौद्ध परिजन ,संदेशवाहक ,प्रतिनिधि के सानिध्य में हुए वार्तालाप का आनंद प्राप्त किया वह सब अत्यंत सौभाग्यशाली हैं। जो इस सौभाग्य से वंचित रह गए उनके लिए यह सारे लेख हमारे You Tube चैनल के कम्युनिटी सेक्शन में सुरक्षित हैं। हमारी वेबसाइट में भी यह लेख उपलब्ध हैं। दोनों प्लेटफॉर्म पर और भी कई लेख और जानकारी मिल सकती है। अगर किसी कारण कोई प्रॉब्लम आती है तो आप हमें ईमेल भी कर सकते हैं यां अपना फ़ोन नंबर भेज सकते हैं।
जय गुरुदेव

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पूज्यवर कैलाश मानसरोवर के क्षेत्र में

27 जुलाई 2020 का ज्ञान प्रसाद
चेतना की शिखर यात्रा 2

8 आज के लेख को हमने दादा गुरु द्वारा दर्शाये गए विराट स्वरुप में सम्माहित विश्व की समीक्षा , गुरु -शिष्य समर्पण और विश्वभर में फैले गायत्री परिवार का मार्गदर्शन करने के निर्देश को आधार बनाया है । लगभग 6 दशक पूर्व दिए गए निर्देशों का आज 2020 में भी पूर्णरूप से पालन किया जा रहा। गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य गुरुदेव के निर्देश का पालन करना अपना कर्तव्य ही नहीं अपना धर्म समझता है।

तो आइये सुनें उस दिव्य गुरु -शिष्य वार्तालाप को :

जब मार्गदर्शक सत्ता ने गुरुदेव के सिर से अपना हाथ हटाया तो गुरुदेव बिल्कुल मौन होकर दादा गुरु को टकटकी लगा कर देख रहे थे। कोई प्रश्न और जिज्ञासा नहीं ,केवल तृप्ति और शांति का भाव था। दादा गुरु कहने लगे :

” यह जो दिव्य रूप आपने देखा है वह परमसत्ता है जो अपनी अनंत भुजाओं से समस्त लोकों को आलिंगन कर रही है। अपने लाखों हाथों से वह इस सृष्टि का निर्माण कर रही है ,पोषण कर रही है और संहार भी इन्ही भुजाओं से होता है। सूर्य और चन्द्रमा जैसे उस परमसत्ता के नेत्रों में एक साथ भस्म कर देने वाला तेज और दाहक ताप को शांत करने वाली सौम्य शीतलता प्रदान करने की क्षमता है। कल -कल बहते झरनों का मधुर संगीत और उनके सहित वेगवती नदियों की धाराएं उस परमसत्ता के ही स्फुलिंग ( sparks ) हैं। ”

दादा गुरु थोड़ा रुककर मौन हुए तो गुरुदेव ने जिज्ञासा भरे नेत्रों से नतमस्तक होकर उनके चरणों की ओर देखा ,जैसे पूछ रहे हों अब आगे क्या आदेश है। दादा गुरु कहने लगे :

” सर्वशास्त्रमयी मंत्र जिसने तुम्हारी चेतना को इस शिखर तक पहुँचाया है , उसके माध्यम से इस विराट विश्व की, विशाल पुरष की आराधना करो। विश्वरूप परमसत्ता के रोम -रोम को इन अक्षरों से सजाओ। “

गुरुदेव फिर नतमस्तक हुए ,यह उनकी आज्ञा शिरोधार्य करने का प्रतीक था। दादा गुरु फिर कहने लगे :

” महाकाल एक बार फिर अवांछनीय को नष्ट करने का संकेत कर चुका है। इस नष्ट और ध्वंस से जो स्थान रिक्त होगा उसे भरने के लिए सृजन की देवी गौरी तैयार हो गयी है। जाओ और जागृत आत्माओं को नियंता के इस सन्देश से अवगत कराओ। ” ( गायत्री परिवार का दिव्य सन्देश )

इस सारी लीला और संदेशों के बीच गुरुदेव को याद ही नहीं रहा कि आषाढ़ का शुक्ल पक्ष आरम्भ हुए दो सप्ताह हो गए हैं और आज गुरु पूर्णिमा की वेला है। आकाश में पूर्णचन्द्र खिल हुआ था। बिना किसी पूजा ,उपचार और कर्मकांड सम्पन्न किए गुरुदेव ने मार्गसत्ता के समक्ष आत्मनिवेदन किया। निवेदन यह था कि सारी रात्रि आप के सानिध्य में व्यतीत करनी है। इसके लिए कोई शब्दों का उपयोग तो नहीं किया परन्तु मार्गदर्शक सत्ता ने इस निवेदन को पढ़ लिया। कहने लगे :

” एक रात्रि क्यों ? यह चेतना तो सम्पूर्ण जीवन तुम्हे प्रतिनिधित्व प्रदान करता रहेगा। यहाँ से मिलने वाले सभी निर्देशों का समर्पण भाव से पालन करना ही तुम्हारी गुरुपूर्णिमा की दक्षिणा है।

जब दादा गुरु ने ” यह चेतना ” का सम्बोधन किया था तो अपनी ओर संकेत किया था। अब का निर्देश तो यही था कि अभी कुछ समय हिमालय में ही व्यतीत करना है। मन में बिल्कुल शांति और आश्वासन का भाव था। आगे की यात्रा के लिए कोई मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं थी ,चाहे कोई पता नहीं था , आगे कहाँ जाना है। संवाद और सम्पर्क यहीं पर समाप्त हुआ और दादा गुरु यहाँ से प्रस्थान कर गए।

हमारे पाठकों को गुरु -शिष्य समर्पण के स्तर का आभास तो अवश्य ही हो गया होगा। ऐसे कठिन कार्यपालक ( hard task master ) होते थे प्राचीन शिक्षक। और इसी कारण शिष्य की योग्यता भी चरम स्तर की होती थी। इसका अर्थ यह कदापि नहीं निकलता कि आज के शिष्य में किसी प्रकार कि कमी है। विधि का विधान अटल है , ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा जब हम देख रहे हैं कि गुरु -शिष्य का मिलन गुरु पूर्णिमा के पावन दिवस को हो रहा है। हम तो यही विश्वास करेंगें कि गुरुदेव के साथ मिलन दादा गुरु ने ही नियत किया होगा। एक बार और – गायत्री उपासना का निर्देश गुरुदेव ने अक्षर -ब -अक्षर पालन करके विश्व भर में गायत्री साधकों को मार्गदर्शन दिया है।

दादा गुरु के जाने के उपरांत गुरुदेव ने कैलाश मानसरोवर की ओर प्रस्थान किया। रास्ता देखा नहीं था ,न किसी से poocha जा सकता था। वहां कोई था भी तो नहीं। दादा गुरु ने तो अंतरात्मा से इस तरफ जाने का निर्देश दिया था। तापस ऋषि तो चले गए थे ,हवन कुंड भी ठन्डे हो चुके थे। तपोवन से जो प्रतिनिधि साथ आए थे उन्होंने ज़्यादा बात तो की नहीं थी पर इतना शायद कहा था राक्षसताल ( आगे चल कर इस झील के बारे में बताएंगें ) होते हुए मानसरोवर पहुंचा जा सकता है। यह रास्ता करीब 50 मील दूर है परन्तु है दुष्कर। कोई संकेत नहीं ,यह भी पता नहीं किस दिशा में जाना है। दादा गुरु ने भी कोई संकेत नहीं दिया था। इसी उधेड़बुन में गुरुदेव उसी दिशा में चल पड़े जिस तरफ दादा गुरु गए थे।

इस तरफ जा रहे थे तो लगा कि रास्ता भटक गए हैं किसी ने कहा तो नहीं ,मन में ही ऐसा प्रबोध उठा। गुरुदेव तिब्बत की सीमा तक पहुँच गए थे,लेकिन यह नहीं पता कि कहाँ पर हैं। कुछ दूर चलते हुए इक्का -दुक्का युवक दिखाई दिए। यहाँ तक पहुँचने में प्रबल सामर्थ्य होना चाहिए ,पर कैसे पहुँच गए ,यह तो दादा गुरु का सामर्थ्य ही है। उनसे पूछा-कैलाश मानसरोवर जाना है ,क्या ठीक जा रहे हैं ? उन्होंने कहा -नहीं आप कैलाश मानसरोवर से अलग रास्ते की तरफ निकल गए हैं। यह मार्ग थोड़ा भिन्न है पर इस रास्ते से भी आप कैलाश मानसरोवर पहुँच सकते हैं।

तिब्बत का ज्ञानगंज:

गुरुदेव इन युवकों की बातें अनमने मन से सुन रहे थे ,जैसे कुछ समझ ही न आ रहा हो। युवकों ने कहा -आप इस क्षेत्र में कैसे आ गए हैं ,यह एक सिद्ध क्षेत्र है। यहाँ हर किसी का प्रवेश नहीं हो सकता। जो ऋषि सत्ताएं इस प्रदेश की व्यवस्था कर रही हैं वहीँ आमंत्रित करती हैं। जिन्हे वह आमंत्रित करती हैं वहीँ यहाँ पहुँच सकते हैं और कोई कदापि नहीं। वे युवक इसी प्रदेश के निवासी थे और उन्होंने अपना परिचय
” ज्ञानगंज के योगाश्रम के साधक ” के रूप में दिया। ज्ञानगंज योगाश्रम का उल्लेख और स्थानों पर भी आया है। योग साधना के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ चुके यतियों के अनुसार यह क्षेत्र लोकोत्तर साधना स्थली है। यहाँ निवास करने वाले योगी और परमहंस स्तर की चेतना दूसरे साधकों की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। मध्यकाल में महृषि महातपा के शिष्य स्वामी ज्ञानानंद ने सिद्धयोगियों के लिए यह क्षेत्र तीर्थ की तरह बनाया हुआ है। उन युवा साधकों की चर्चा करते -करते गुरुदेव ज्ञानगंज आश्रम की सीमा में पहुंचे। उन्ही ने बताया कि महातपा की आयु लगभग 1500 वर्ष है। किसी भी तरह की आवश्यकतायें उन्हें नहीं होती ,वे दिव्य देहधारी होते हैं ,किसी भी स्थान पर वे किसी भी गति से जा सकते हैं। आश्रम के कई साधकों की आयु 150 वर्ष के भी अधिक है। यहाँ पहुँचने के कई मार्ग हैं परन्तु गुरुदेव भूलते -भूलते दो माह बाद पहुंचे थे।

हमारे सहकर्मियों ने पहले वाले लेख में ज्ञानगंज को जानने की जिज्ञासा जताई थी , हमने तो इसको व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ दिया था। इस तरह के सिद्धाश्रम विभिन्न नामों से कई जगह पर हैं। ज्ञानगंज के रहस्य पर कई तरह की पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं ,कई तरह की वीडियो बन चुकी हैं ,सिद्ध करने के कई तरह के क्लेम ( claim ) आ चुके हैं। यहाँ तक कि अमरीकन राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट से लेकर हिटलर तक जिसने अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास किया था कहीं न कहीं ज्ञानगंज के साथ जुड़े हुए थे। रूज़वेल्ट ने तो अपने गुप्त वेकेशन (vacation ) स्थान का नाम ही शांगरिला रख दिया था। US नेवी के एयरक्राफ्ट का नाम भी शांगरिला है। इधर टोरंटो में तो एक लक्ज़री होटल का नाम भी शांगरिला है। शांगरिला ( शंबाला ) का अर्थ ” धरती का स्वर्ग ” है। आज तक सभी के प्रयास कुछ भी पक्का कहने में असमर्थ ही साबित हुए हैं। हम अपने व्यक्तिगत भाव केवल इतना ही कह कर विराम करेंगें कि ज्ञानगंज या किसी और सिद्धाश्रम को अध्ययन करना अतयंत मनोरंजक है लेकिन इस मनोरंजन की आंधी में हमारे लक्ष्य का खो जाना स्वाभाविक है। तो इसलिए एकबार फिर हम अपने पाठकों से यह निर्णय उन्ही पर छोडने की अनुमति से आगे बढ़ रहे हैं।

राक्षसताल और मानसरोवर झील :

चेतना की शिखर यात्रा 2 में वर्णित गुरुदेव राक्षसताल के मार्ग से कैलाश मानसरोवर पहुंचे थे। कैलाश पर्वत ( ग्लेशियर ) पर विराजमान भगवान भोले नाथ जहाँ हम सबको दिव्यता प्रदान करते हैं ,वहीँ मानसरोवर झील एक दिव्य वातावरण देकर मानवता का पोषण करती है। पौराणिक ग्रंथों के आधार पर मानसरोवर झील का विचार सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी के मन में सबसे पहले आया था। मानसरोवर का शाब्दिक अर्थ मानस -सरोवर है यानि मन का सरोवर। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का दायां हाथ गिरा था ,झील के बाहिर एक शिला को उसीका रूप मान कर पूजा जाता है। राक्षसताल मानसरोवर के पास ही दूसरी झील है। इसे रावणताल भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है की रावण ने भगवान भोले नाथ की भक्ति करके इसी झील में अपने शीश अर्पण किये थे। पौराणिक मान्यताओं के साथ -साथ हम वैज्ञानिक तथ्यों को नज़रअंदाज तो नहीं कर सकते। Geology के वैज्ञानिकों के मुताबिक राक्षसताल और मानसरोवर दोनों एक ही झीलें थीं और धरती के हलचल से अलग हो गयीं। मानसरोवर का जल मीठा परन्तु राक्षसताल का जल खारा है समुद्र तल से 15000 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह पौराणिक और आधुनिक masterpiece साधकों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। चार सम्प्रदाओं -हिन्दू ,जैन ,बौद्ध और बोन धर्म या बॉन धर्म ( तिब्बत ) में इस क्षेत्र की बहुत अधिक मान्यता है।

हम आज का ज्ञानप्रसाद यहीं पर समाप्त करने की अनुमति लेते हैं। गुरुदेव की यात्रा के साथ- साथ हम उस क्षेत्र की जानकारी देना भी अपना कर्तव्य मानते हैं। आशा है हमारे सहकर्मी इन लेखों को पहले की तरह विश्व भर में पहुंचाएंगें और गुरुदेव के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगें।

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गुरुदेव और दादा गुरु का मिलन -कैलाश मानसरोवर के रास्ते में

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सिद्ध पुरष संत कीना राम जी की कथा :
सत्यानंद जी के साथ चर्चा के उपरांत गुरुदेव और प्रतिनिधि कलाप ग्राम से बाहर आ गए और आगे की यात्रा पर निकल पड़े। प्रतिनिधि इस अगम्य हिमालय मार्ग से परिचित दिखते थे। कहीं बहुत ऊंचाई और फिर एक दम उतराई। गौरीशंकर के पास पहुँचते ही सामने बर्फ ही बर्फ दिखाई देने लगी। सामने बर्फ की एक गुफा दिखाई दी। उसमें हर -हर महादेव की ध्वनि आ रही थी । यह ध्वनि किसी के मुंह से निकली जप साधना की ध्वनि नहीं लग रही थी। लग रहा था जैसे कोई स्नान कर रहा हो। गुरुदेव ने हैरानगी से पूछा -इस गुफा के भीतर कोई झरना है क्या ? लगता है कोई तपस्वी स्नान कर रहा हो। प्रतिनिधि कहने लगे – यह तपोनिष्ठ विभूति बाबा कीना राम जी हैं। प्रतक्ष्य जगत से उपराम (recess or break ) होने के उपरांत वह इसी सिद्ध क्षेत्र में रमण कर रहे हैं । बाबा कीना राम जी ने अघोर सम्प्रदाय को जन्म दिया और अघोरचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। उत्तर प्रदेश के चंदौली ग्राम में 1601 में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कीना राम जी निसंतान दम्पति के घर अवतरित हुए। अघोर सम्प्रदाय में अघोर चतुर्दशी का बहुत महत्व है। तो आईये गुरुदेव की यात्रा को विराम देकर सिद्ध पुरष संत कीना राम जी के बारे में जाने।
400 वर्ष पूर्व उनका जन्म बिल्कुल असाधारण था। जन्म के तीन दिन बाद तक बालक कीना राम ने न माँ का स्तनपान किया और न ही प्रथम रोना रोये। इससे सभी बहुत घबराए। तीसरे दिन तीन तपस्वी साधु ,ब्रह्म ,विष्णु ,महेश के रूप में उनके घर आये और बालक कीना को बांहों में लेकर उनके कान में कुछ फूँक मारी, बच्चे ने एकदम रोना आरम्भ कर दिया। यह देख कर सभी तो अति हर्ष हुआ। इनके बाल्यकाल की कई घटनाएं प्रचलित हैं लेकिन हम सभी का विवरण दें तो गुरुदेव का यात्रा बीच में ही रह जाएगी। अगर पाठक चाहें तो गूगल सर्च करके और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। उनदिनों बालविवाह तो बहुत ही आम था। केवल 12 वर्ष की आयु में विवाह तो हो गया लेकिन गौना तीन वर्ष उपरांत होना निश्चित हुआ। गौना वाले दिन से एक दिन पूर्व कानीराम जी ने माँ से दूध और भात माँगा। माँ ने मना किया ,कहा दही भात खा लो ,कीना राम जी नहीं माने। माँ को दूध भात ही देना पड़ा। अगले दिन जब गौने के लिए जाने लगे तो समाचार आया कि पत्नी का निधन हो गया है। माँ रोने लगी और कीना राम को कोसते हुए बोली -मैं समझ गयी थी कि कुछ अशुभ होने वाला है ,यात्रा के समय कोई दूध भात खाता है क्या ? कीना राम ने कहा -नहीं माँ मैंने तो दूध भात तुम्हारी बहु के मरने के उपरांत ही खाया था। विश्वास नहीं है तो किसी से पूछ लो। वह तो कल शाम को ही मर गयी थी ,मैंने तो दूध भात रात को खाया है। बात सारे गांव में फैल गयी कि बहु के स्वर्गवास की सूचना कीना राम जी को कैसे पता चला। पुनर्विवाह की बात चली लेकिन उनको तो वैराग्य ही भाता था ,बचपन से ही विरक्त रहते थे ,घर से भाग गए। घुमते -घमाते गाज़ीपुर पहुंचे। इस नगर में रामानुजी सम्प्रदाय के संत शिवराम जी रहते थे। कीनाराम जी ने उनके पास साधना की इच्छा जताई। शिवराम जी मान गए और उन्हें अपने पास रख लिया। गुरु की सेवा और भक्ति भजन उनकी दिनचर्या थी। कुछ समय उपरांत कीना राम जी ने दीक्षा के लिए कहा तो शिवराम जी ने मना कर दिया। कुछ दिन बाद फिर अनुरोध किया तो फिर मना कर दिया। आखिरकार कई दिन साधना के बाद गुरुजी मान ही गए और कहने लगे -आओ गंगा किनारे चलते हैं वहां तुम्हे दीक्षा देंगें। रास्ते में शिवराम जी ने अपना कमंडल ,आसन इत्यादि कीना राम जी को देते हुए कहा -तुम यह सब लेकर गंगा किनारे चलो मैं आता हूँ। गुरुदेव की सामग्री लेकर कीना राम जी जाकर माँ गंगा किनारे बैठ गए। उन्होंने देखा कि माँ गंगा की लहरें उनके पांव को छू रही हैं। उन्होंने आचमन किया और वहां से उठ कर थोड़ा ऊपर जाकर बैठ गए। देखते हैं गंगा वहां पर भी उनके पांव को छूने लगी। यह दृश्य देख कर कीना राम जी हक्के बक्के रह गए। दूर पीछे खड़े संत शिवराम जी ने भी देखा और उन्हें लगा कि कीना राम अवश्य ही असाधारण व्यक्ति हैं। यह एक विलक्षण घटना थी ,स्नान के उपरांत शिवराम जी उन्हें एक मंदिर में ले गए और दीक्षा दी। इसके बाद कीना राम जी प्रचंड साधना में डूब गए और गुरु के प्रेरणा से हिमालय में आ गए।
दादा गुरु से मिलन की घड़ी :
गुरुदेव और प्रतिनिधि साथ -साथ इस बर्फानी प्रदेश में चल रहे थे। गुरुदेव के मन में प्रश्न आया कि पिछली बार तो दादा गुरु नंदनवन में मिल गए थे परन्तु इस बार तो इन घुमावदार पहाड़ों की यात्रा करवा रहे हैं। प्रतिनिधि ने गुरुदेव के मन को भांप लिया। उन्होंने कहा – इस प्रदेश और ऋषि सत्ताओं का परिचय करवाने के लिए ही मुझे नंदनवन से यहाँ तक भेजा है। प्रतिनिधि चुपचाप साथ चल रहे थे । कुछ देर बाद उन्होंने संकेत कर के गुरुदेव को रुकने को कहा और स्वच्छ शिला देख कर उसके ऊपर बैठ जाने को कहा और बिना कुछ कहे दूसरी दिशा में चले गए। कुछ ही मिंट में वापस आये और हाथ में कुछ फल थे। गुरुदेव को देते हुए कहा -ये फल खा लो बहुत देर से कुछ खाया नहीं है ,भूख लगी होगी। उनके याद दिलाते ही गुरुदेव को भूख का अनुभव हुआ। स्मरण हुआ कि कलाप ग्राम पहुँचने से पहले कुछ कंदमूल लिए थे। प्रतिनिधि ने सेब जैसा यह फल देने के बाद कहा -मैं अब विदा लूँगा , दादा गुरु यहाँ से आगे का मार्ग दिखाएंगें।
यह सुनकर मन में एकदम उल्लास फूटा ,उत्सुकता भरा रोमांच हुआ। 30 वर्ष पुराना अनुभव एकदम जाग्रत हो उठा। उस समय प्रतिनिधि ने कहा था कहीं दूर मत जाना। अगर जाना भी पड़े तो केवल एक योजन तक ही जाना। गुरुदेव पिछली यात्रा की स्मृतियों में डूबे हुए थे कि दादा गुरु की पुकार सुनाई दी ,नाम लेकर पुकारा था, साथ ही उठ कर चलने को भी कहा। गुरुदेव मार्गदर्शक सत्ता को देखकर उठ खड़े हुए और पीछे- पीछे चल दिए। गुरुदेव ने सावधान किया कि यहाँ से जो भी शक्तियां अर्जित करेंगें उन्हें अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए कभी मत प्रयोग करना। यह केवल उनलोगों के कर्मबंध काटने के लिए होंगीं जिनकी चेतना में दैवी उभार आया है और जो आने वाले दिनों में युग प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन शक्तियों का उपयोग उनके लिए उन्हें बताये बिना करना है।
दादा गुरु के साथ चलते हुए गुरुदेव को अपना शरीर बिल्कुल निरभार ( weightless ) ,एकदम रुई की तरह लग रहा था। मार्गदर्शक सत्ता का शरीर तो बिल्कुल एक प्रकाश की लौ के रूप जैसे दिखाई दे रही था । गुरुदेव का शरीर भी एक लौ की तरह था पर इसको स्पर्श किया जा सकता था। गुरुदेव ने अपने शरीर को स्पर्श करके चैक भी किया। अगर शरीर हल्का हो तो गुर्त्वाकर्षण ( gravity ) का प्रभाव उतना नहीं पड़ता और अपनी इच्छा से किसी भी वेग से यात्रा की जा सकती है। यही कारण है कि चाँद की सतह पर अंतरिक्ष यात्री उड़ते हुए दिखाई देते हैं। इसी कारण यात्रा बहुत ही सहज हो रही थी। आधे घण्टे में ही 100 मील से अधिक क्षेत्र की यात्रा हो गयी। इस बार तो कुछ- कुछ सिद्ध योगी भी साधना करते हुए दिखे। गुरुदेव के मन में विचार आया कि इस एकांत ,निर्जन स्थान पर साधना क्यों कर रहे हैं। यह लोग संसार में भी तो जाकर साधना कर सकते हैं ,वहां प्रलोभन भी होगा और परीक्षा भी होगी। दादा गुरु ने गुरुदेव की विचार तरंग पकड़ ली। कहा कुछ नहीं ,केवल एक बार दृष्टि भर डाली और गुरुदेव को उत्तर मिल गया। उत्तर आया –
” इन सिद्ध योगियों को अपने लिए साधना की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं तो मोक्ष के द्वार पर पहुँच चुके हैं। जगत कल्याण के लिए यहाँ पर तप अनुष्ठान कर रहे हैं “
हमारे पाठकों को गुरुदेव और दादा गुरुदेव के बीच वायरलेस कनेक्शन का आभास हो गया होगा ,यह आत्मा का संबंध है , अगर हम भी इस तरह का सम्बन्ध बनाना चाहते हैं तो हमें भी गुरुदेव जैसा समर्पण दिखाना पड़ेगा। अगर समर्पण है तो गुरु अपने शिष्य को लेने ठीक उसी प्रकार स्वयं भागते हुए आते है जैसे दादा गुरु 1926 की वसंत को आंवलखेड़ा की उस कोठरी में आए थे।
गुरुदेव ने दादा गुरु को आदरपूर्वक निहारा। दादा गुरु ने गुरुदेव को नीचे बैठने को कहा। गुरुदेव बैठ गए ,दादा गुरु भी सामने बैठ गए। गुरुदेव ने इधर -उधर देखा , कोई उचस्थान न दिखाई दिया ,उन्हें लग रहा था कि दादा गुरु को उन से ऊँचे स्थान पर होना चाहिए। उन्होंने अपने कंधे से अंगवस्त्र उतारा और बिछाते हुए दादा गुरु को उस पर बैठ जाने को कहा। शिष्य का मन रखने के लिए दादा गुरु उस आसन पर बैठ गए लेकिन कहने लगे :
” गुरु और शिष्य में कोई अंतर नहीं है ,केवल कक्षा का ही अंतर होता है। गुरु जिस वृक्ष का पका हुआ फल होता है शिष्य उसी वृक्ष की कच्ची और हरी टहनी है। दोनों एक ही सत्ता के समतुल्य अंग हैं। “
यह उद्भोधन सुनकर गुरुदेव ने कहा ,
” यह वक्तव्य आपकी ओर से आया है ,आप आराध्य हैं आप कह सकते हैं परन्तु मैं तो शिष्य के अधिकार से ही बोल सकता हूँ। मुझे अपने श्रीचरणों में बना रहने दीजिये “
दादा गुरु ने सामने पूर्व दिशा की ओर संकेत किया और गुरुदेव ने जब उस ओर देखा तो सामने घाटी में कई तापस जप ,तप और ध्यान में लगे हुए थे। क्षेत्र में चौबीस यज्ञ कुंड बने थे। उनमें यज्ञधूम्र उठ रहा था, अग्नि शिखाएं उठ रही थीं जैसे कि अभी कुछ समय पूर्व ही साधक अग्निहोत्र करके उठे हों। अग्नि शिखाएं स्वर्मिण आभा लिए हुए थीं। उन पर नील आभा छाई हुई थी। कुछ कुंडों पर अभी भी आहुतियां दी जा रहीं थीं। जप तप करते जो सन्यासी दिखाई दिए उनमें कुछ नए थे। शरीर की अवस्था से उनकी आयु 30 से 80 वर्ष के बीच लगती थी। कुछ सन्यासियों को गुरुदेव पहचानने का प्रयास करने लगे। एक को तो पहचान भी लिया। गुरुदेव ने स्मरण किया ,15 वर्ष पूर्व रामेश्वरम में गायत्री महायज्ञ में गुरुदेव का समर्थन करने आए थे। स्थानीय लोगों का विरोध शांत करने गुरुदेव के पक्ष में लोगों को संगठित करने आए थे। उन्ही के कारण स्थानीय पुरातन -पंथी पंडितों को बाहुबल से हस्तक्षेप करने का साहस नहीं हुआ था। उसने एक दृष्टि गुरुदेव की तरफ देखा और पहचान लिया और अगले ही पल अग्निहोत्र कर्म में लग गया। दादा गुरु ने गुरुदेव की ओर देखा और कहने लगे :
“हाँ हाँ ,यह वही साधक है जिसने रामेश्वरम में तुम्हारी सहायता की थी। तुम अभी और भी संतों को पहचानोगे जो तुम्हारी सहायता करने आयेंगें “
यज्ञ कर रहे कुछ ऋषियों को सहस्र कुंडीय गायत्री महायज्ञ में देखा था। पूर्व दिशा में सूर्य भगवन अपनी स्वर्मिण आभा प्रकट करने लगे और सविता देव बर्फ पर अपनी किरणे बिखेरते हुए क्षितिज पर चढ़ आए। गुरुदेव ने उठकर सविता देव को प्रणाम किया ,गुरुवंदना करते हुए खड़े हो गए। दादा गुरु ने गुरुदेव को अपने पास आकर बैठने का संकेत किया। गुरुदेव बैठ गए तो दादा गुरु ने अपना दाहिना हाथ उठाया और उसका अंगूठा धीरे से भँवों (eyebrows ) के मध्य लगाया और उँगलियाँ बालों में फेरीं। इतना करते ही गुरुदेव की ऑंखें मूंदने लगीं और भीतर कोई और ही जगत दिखाई देने लगा। ऐसा लगा की कोई आकृति उभर रही है जो धीरे धीरे विस्तृत होती जा रही थी और फिर विराट रूप धारण कर लिया। यह आकृति बहुत डरावनी थी लेकिन बहुत ही प्रिय लग रही थी। अगर इस आकृति की तुलना हम अपने आस -पास के जगत के साथ करें तो इसमें सब कुछ दिखाई दे रहा था। लगता था उस दृश्य में अग्नि ,सूर्य ,पृथ्वी ,गृह। नक्षत्र ,अपने आप दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसा दृश्य था जैसे कि तीनो लोक इसमें समा गए हों। इस रूप के बाहिर अनेकों ऋषि ,योगी ,देवता ,दानव ,विद्वान और योद्धा हाथ जोड़ कर स्तुति करते खड़े थे। उस विराट स्वरूप को देखते हुए बाहिर से कुछ रूप थर -थर कांपते अंदर जा रहे हैं और कुछ उड़ते हुए दिख रहे हैं। उस स्वरुप का हमारे आस पास के ब्रह्माण्ड की तरह विस्तार हो रहा है ,कहीं कोई अवकाश था ही नहीं। ठीक ब्रह्माण्ड की भांति इस में मधुर ,दिव्य ,आकर्षक ,विकराल,भयावह ,भीषण और अलैकिक सब कुछ था। फिर लगा कि सब कुछ सिमट रहा है , सिकुड़ते -सिकुड़ते सब लुप्त हो गया है ,तिरोहित ( अदृश्य ) हो गया है। तिरोहित होते ही गुरुदेव ने देखा कि दादा गुरु खड़े हैं ,उन्होंने कपाल और शीश से अपना हाथ हटा लिया है। गुरुदेव के पास कोई प्रश्न ,कोई जिज्ञासा नहीं थी ,वह पूर्ण रूप से तृप्त और शांत दिखाई दे रहे थे।
हम यहाँ थोड़ा रुक कर अपने पाठकों की इस विराट स्वरुप की अनुभूति को और परिपक्व करने के लिए बी आर चोपड़ा जी के बहुचर्चित टीवी सीरियल महाभारत में चित्रित किये गए विराट स्वरुप के साथ जोड़ना चाहते हैं। भगवान कृष्ण ने जब अर्जुन को रण भूमि में विराट रूप के दर्शन करवाए थे तो कुछ इस तरह की ही पिक्चर बनी थी। अर्जुन को भी भगवान ने दिव्य चक्षु ( नेत्र ) प्रदान किये थे तभी तो वह दिव्य स्वरुप का आनंद उठा सका था और उसने भी यही कहा था -मैं तृप्त हो गया हूँ। हमने इन अक्षरों के माध्यम से , अपनी लेखनी से चुन -चुन कर अक्षरों का चयन करके आप के लिए ऐसा दृश्य चित्रित करने का प्रयास किया है कि आपको,सभी को भी दिव्यता की अनुभूति हो। जिस तरह दर्शकों ने टीवी सीरियल के उस एपिसोड को बार -बार रिवाइंड कर -कर के विराट स्वरुप का आनंद लिया था ठीक उसी तरह आप इन पंक्तियों को भी बार -बार पढ़ने को बाधित होंगें ऐसा हमारा विश्वास है। और जितनी प्रसन्नता चोपड़ा साहिब को हुई थी उससे कहीं अधिक हम भी अनुभव कर रहे हैं।
आज के लेख को हम यहीं पर विराम देने की अनुमति ले रहे हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि कोई भी लेख 3 पृष्ठों से अधिक और 2000 -2500 अक्षरों से अधिक न हो। यह लिमिट हमने अपने पाठकों व्यस्तता को ध्यान में रख कर बनाई है क्योंकि लेखों को केवल पढ़ने का उदेश्य नहीं है ,इनको अपने ह्रदय में उतारने का उदेश्य है। इन लेखों को पढ़ने से आपको ऐसे आनंद की अनुभूति होनी चाहिए कि आप उस छोटे से बच्चे की भांति अपनी प्रसन्नता भाग -भाग कर सभी को वर्णन करें जब उसे 100 में से 100 अंक प्राप्त होते हैं। ऐसा होना चाहिए आपका संकल्प और समर्पण।
जय गुरुदेव To be continued .
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