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ईश्वर का वरिष्ठ राजकुमार ,यह मानव।

27 जुलाई 2022 का ज्ञानप्रसाद – ईश्वर का वरिष्ठ राजकुमार ,यह मानव।

आज का ज्ञानप्रसाद परम पूज्य गुरुदेव के रचित साहित्य की सहायता लेते हुए, अपने विचारों को शामिल  करते हुए तैयार किया है। विषय बहुत ही साधारण सा है, हम सब इससे परिचित हैं लेकिन फिर भी हम निवेदन करेंगें कि इसे अंत तक अवश्य पढ़ें और अपने विचार कमैंट्स में अवश्य लिखें। कमेंटस द्वारा बहुत ही नवीन ज्ञानप्रसार हो रहा है। कल वाले लेख पर संजना बेटी का कमेंट उसकी आयु की तुलना में  हम वरिष्ठों को बहुत बड़ा मार्गदर्शन दे रहा है।  जिन्होंने ने भी इस कमेंट को पढ़ा है अवश्य ही प्रेरित हुए होंगें।  जो पढ़ने से वंचित रह गए उनके लिए सप्ताह के अंत वाले स्पेशल सेगमेंट में प्रकाशित कर देंगें। और भी बहुत ज्ञानवर्धक कमेंट आये हैं जो हमने save किये हैं।  आने वाले weekend segments में बहुत कुछ जानने को मिलेगा।  शांतिवन की  वीडियोस तो अपलोड होंगीं ही लेकिन कुछ महत्वपूर्ण बातों की चर्चा भी होगी। कल 25 जुलाई को Renison University College में  चिन्मय जी के लेक्चर का बाद पूछे गए प्रश्न  बहुत ही रोचक हैं।  उन्हें हमने उसी  समय रिकॉर्ड कर लिया था। यह प्रश्न हमें कई बार पूछे गए हैं , आप इनके उत्तरों की प्रतीक्षा कीजिये और हम शुरू करते हैं आज का ज्ञानप्रसाद। 

हमारी अनुपस्थिति ने जो सहकर्मी कमैंट्स में हमारी भूमिका निभा रहे हैं उनका  ह्रदय से धन्यवाद् करते हैं। चिन्मय जी कल रात की फ्लाइट से वापिस भारत जा रहे हैं लेकिन हमें बहुत सारे  कंटेंट और ज्ञान से कृतार्थ कर गए हैं जो कई दिनों तक प्रसारित होता रहेगा। 

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मित्रो! भगवान बहुत ज्यादा थक गए हैं ।उनकी  इच्छा है कि हमारे प्रिय बेटे मनुष्य, यदि इस दुनिया को सुंदर बनाते, तो आनंद  आ जाता। भगवान को सहभागी और सहयोगी की आवश्यकता थी। इसलिए भगवान ने हमें  बनाया था। उन्होंने हमें बिल्कुल  अपने नक्शे के अनुसार बड़े ही परिश्रम से अपने जैसा बनाया था। भगवान के पास गीली मिट्टी थी उन्होंने एक कुम्हार की तरह  उस मिट्टी को पहले तो लम्बा कर दिया और सांप बना दिया।  भगवान् कहने  लगे यह तो मज़ा नहीं आया,उसी मिट्टी  को फिर उन्होंने गोल मटोल कर दिया और  कछुआ बना दिया, मेंढ़क बना दिया। इस प्रकार भगवान् कई तरह की calculations करते रहे , permutations- combinations करते रहे तब कहीं बड़े परिश्रम के उपरांत भगवान ने इस मानव को  बनाया।  लेकिन मानव को बनाते-बनाते भगवान् के तो पसीने ही छूट गए, उनकी सारी  एनर्जी, सारी ताकत और बहुत सारा समय बीत गया। इस सब के पीछे  भगवान् का केवल एक ही उद्देश्य था, और वह उद्देश्य था “इस दुनिया को सुंदर बनाना।” मानव  शरीर का एक-एक कण, जिसमें मस्तिष्क, हृदय, आँखें आदि सभी अंग बने,भगवान् ने एक ऐसी रचना की जिसका उदाहरण आज तक विश्व में कहीं  भी देखने को नहीं मिलता। मानव शरीर जैसा शरीर किसी का नहीं है। इसीलिए अक्सर कहा जाता है – Human beings are the finest creation of God. 

परम पूज्य गुरुदेव  जब हिमालय गए, तो नंदनवन का फोटो खींचकर अपने साथ लाए। फोटो तो 2-dimensional थी , केवल  लंबाई-चौड़ाई  (आजकल तो 3D,4D इत्यादि भी हैं) ही , परंतु गहराई का पता नहीं लग सका तथा जो फोटो खींचा था, वह पीले रंग का आया था। उसे देखकर गुरुदेव ने  सोचा कि यह कैसे हो सकता है। फोटो का रंग तो इस प्रकार का नहीं होना चाहिए था । नंदनवन  तो हरा मखमली था, गुरुदेव ने उसे उठाकर फेंक दिया। यह सब तो लेन्स का कमाल था। गुरुदेव कहते हैं यही कमाल है हमारी अपनी आँख के लेंस का ,और एक नहीं, दो दो लेंस का। उन लेंस से हम जैसा चाहें देख सकते हैं ,यह हमारी दृष्टि पर आधारित है।   ऐसी है उस दिव्य पुरुष की दृष्टि जिसके शिष्य होने का हमें गर्व और सौभाग्य प्राप्त हुआ है।    

 भगवान् ने हमें  कितनी  सुंदर आँखें प्रदान की हैं और कितने sophisticated, high quality  लेन्स की बनी हैं। इस कैमरे से तो वास्तविक फोटो खींची जा सकती है। इतना बेशकीमती शरीर तथा भगवान का ऐसा अनुदान किसी प्राणी को नहीं मिला है। हमें बनाने में भगवान् ने  इतनी उदारता क्यों बरती? यह प्रश्न हम सबके  सामने है। बहुतों को पता भी होगा लेकिन फिर भी यह एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय है। हमें विचार करना चाहिए कि भगवान ने  मानव की रचना करते समय हमारे favour में ऐसा पक्षपात क्यों किया? अगर अन्य प्राणियों में सोचने का, विचार करने का मादा  रहा होता, वे भगवान के सामने उपस्थित हो जाते और  अपनी फरियाद सुनाते तो मानव को जेल की सज़ा हो सकती थी। भगवान्  ने  उन्हें यह अनुदान क्यों नहीं दिए ? इस पक्षपात के जुर्म  में भगवान को अगर अदालत   में बुलाया जाता, तो वह तो कांपते हुए, डरे -सहमे आते। जब उनसे  इस पक्षपात का कारण  पूछा जाता, तो वह कहते  कि मनुष्य को हमने विशेष चीजें किसी विशेष उद्देश्य से दी हैं , ऐसे उद्देश्य जिनसे इस संसार का कार्य हो सके। यह विशेष चीज़ें  इसलिए नहीं दीं  कि वह इनका दुरूपयोग करे, सम्पदाओं को अपनी  मौजमस्ती के लिए नष्ट करे। हमने तो विश्व  को सुंदर बनाने के लिए, इसे सजाने सँवारने के लिए मानव की रचना की। यह हमारा बड़ा बेटा है,हमारा  राजकुमार है। यही कारण है कि हमने  उसे अपनी राजगद्दी दे दी और सारी जिम्मेदारी सौंपी थी। ज़िम्मेदारी देने का उद्देश्य था  कि वह हमारा सहयोग करेगा। भगवान् कहते हैं कि हमने  एक  बहुत बड़ा स्वप्न  देखा था।  हमने स्वप्न देखा था कि यह मानव  हमारा बड़ा बच्चा है, वरिष्ठ राजकुमार है, जो इस दुनिया को सुन्दर बनाता हुआ चला जाएगा। 

लेकिन इस  अभागे को, बेहूदे को मैं क्या कहूँ, इसने मेरे साथ विश्वासघात किया है। यह धूर्त  घूम-घाम कर वहीं आ गया, जहाँ से चला था। वह कुत्ते की योनि से, बंदर की योनि से, सुअर की योनि से आया था और निम्नकोटि के चिंतन, विचार होने के कारण फिर से उसी योनि में चला गया। उसे निम्न कोटि के प्राणियों की तरह पेट और प्रजनन  की बात तो  याद है लेकिन बाकी बातें तो वह भूल सा ही गया। इस अभागे को एक बात समझ में नहीं आई  कि जब मैंने छोटे से छोटे प्राणी के लिए पेट भरने की व्यवस्था की है, तो क्या अपने  सर्वप्रिय पुत्र “मनुष्य” के लिए पेट भरने  का प्रबंध नहीं करूँगा परंतु हाय रे अभागे मनुष्य तू इन अनुदानों का मूल्य न पहचान  सका। तू  अपने उद्देश्य को ही  भूल गया और  कहने लग पड़ा  कि मैं अपनी  ही अकल से कमाऊँगा, बहुत धनअर्जन करूँगा, मौज से रहूँगा। लेकिन तुझे इस मौज का पता ही नहीं चला,तू इसी में धंसता गया ,इसी मृगतृष्णा में भटकता रहा,इसी भंवर में डूबता गया और इस दौड़ में ,इस रेस में तूने इस सुन्दर भव्य सृष्टि का सर्वनाश कर दिया। भगवान् कहते हैं कि  घोड़ा, हाथी, भैंस आदि जानवर मनुष्य से अधिक  खाते हैं और उनका पेट भर भी  जाता है, परंतु इस अभागे मनुष्य का पेट भाई से, बाप से, बीबी से भी नहीं भरता है। हाय रे! अभागा यह मनुष्य, पेट की खातिर बरबाद हो गया। भगवान भी मनुष्य का जन्म देकर बहुत चिंतित हैं  कि हमने यह क्या कर डाला। मनुष्य को इतनी शक्तियाँ, विभूतियाँ देकर भेजा था लेकिन इसने सब बरबाद करके रख दिया। गुरुदेव कहते हैं कि  भगवान की इस चिंता को हमने समझा, इस पीड़ा को हमने समझा और हमने निश्चय कर लिया कि अब हम इन्हें ठीक करेंगे। कैसे ? 

मनुष्य के पास बुद्धिबल है, हम उस बल का ठीक से प्रयोग करेंगे। दुनिया में  खुशी, आनंद,उल्लास का वातावरण पैदा करेंगे। अभी तो यह मानव  पेट-प्रजनन में लगा है। गुरुदेव हमसे पूछते हैं कि क्या हमें अपनी संस्कृति, धर्म आदि का ज्ञान है ? यां फिर केवल पेट प्रजनन ही सबसे बड़ा उद्देश्य है ?

भगवान ने हमें  बहुत ही  प्यार से पैदा किया,पाला पोसा और बड़ा किया कि शायद यह भगवान् के  काम आ सके  उनका  सहयोगी बनेगा तथा इस संसार को सुंदर बनाएगा, परंतु इसने तो उसकी सारी की सारी इच्छाओं पर पानी फेर दिया । यह वहीं जा पहुँचा है, जहाँ अन्य चौरासी लाख योनियों के प्राणी रहते हैं। इसने भगवान की नाक में दम कर रखा है। गुरुदेव कहते हैं कि हमने भगवान से प्रार्थना की-” हे प्रभु! इसे इस बार माफ कर दीजिए। अगर भविष्य में किसी को  इंसान  बनाएं  तो उसे ठोंक-बजाकर देख लेना। हमने भगवान से प्रार्थना की कि भगवान  पहले उससे पूछ लेना कि क्या उसे इंसान का, मनुष्य  जन्म चाहिए।  अगर मनुष्य का जन्म चाहिए, तो दो रुपये के कागज पर हस्ताक्षर करा लेना और बता देना कि अमुक-अमुक लक्ष्य हैं। अगर तुम्हें  मंजूर हो तो जीवन देना, वरना नहीं । यदि ईश्वर के लक्ष्यों को पूरा कर सको तो मनुष्य अन्यथा बंदर, कुत्ते की योनि में भेज देना । तुम्हारे लिए मनुष्य का जीवन पाना  तथा जीना  संभव नहीं है। 

गुरुदेव हमें अपना जीवनक्रम बदलने के लिए कहते हैं।  गुरुदेव कहते हैं की हम उस भगवान के बड़े बेटे हैं  जो बड़े ही  उदार, दयालु, कृपा का सागर तथा सर्वसंपन्न हैं । भगवान अपने लिए कुछ नहीं चाहते। वह केवल दूसरों के लिए जिंदा रहते हैं।  गुरुदेव हमें जीवनक्रम बदलने को इसलिए कह रहे हैं ताकि हमें चौरासी लाख योनियों के चक्र में न पड़ना पड़े। लेकिन हम  तो केवल मंत्र ही  सीखना चाहते हैं,चमत्कार देखना चाहते हैं। आप चौरासी लाख योनियों का शरीर देखिए। आप अच्छे कर्म नहीं करेंगें तो आपको गधे की योनि स्वीकार करनी पड़ेगी। आप पर ईंट लादी जायेंगीं, वज़न  के मारे  पैर ज़ख़्मी हो जायेंगें,पैर लड़खड़ाने लगेंगे।आप कहेंगे कि आचार्य जी हम तो मन्नलाल सेठ हैं। हम इस योनि में कैसे जाएँगे। आपने अच्छा कर्म नहीं किया, तो आपको जाना ही होगा।  गुरुदेव कहते हैं कि  हमने शानदार जीवन जिया है तथा प्रसन्नता के साथ विदा होने को बैठे हैं कि  भगवान को सही उत्तर देंगे। आप भगवान को क्या जवाब देंगे। आप तो अपनी जिंदगी भर रोते रहे एवं मरने के बाद भी रोते रहेंगे। आप कहेंगें कि हमारा जीवन तालाब की तरह हो गया है। हमारा आधार कमजोर है। अगर अभी हमें लकवा हो जाए, तो हम कहीं के नहीं रह जायेंगें। हमारा तालाब सूख जाएगा, हमारी उन्नति का आधार समाप्त हो जायेगा । हमारे पास ज्ञान तो बहुत  है परन्तु हमारे मस्तिष्क का चिंतन खराब है और उल्टी दिशा में ही चलता है। हमारे पास सम्पति तो बहुत है परन्तु गलत जगह प्रयोग होती है। हम यही सोचते रहते हैं कि अगर कल को अकाल पड़ जाए तो सारी सम्पति स्वाहा हो जाएगी  जिसके कारण इस सम्पति के लिए  हमारा लोभ है, मोह है,अहंकार है  जो हमें कुछ भी अच्छा नहीं करने देते।  यह डर और चिंता हमें हर समय खाय जाती है। जब उस परमपिता ,सर्वशक्तिमान परमात्मा के साथ रिश्ता जोड़ लिया, उन्ही हो समर्पित कर दिया तो फिर वह जीवन की गाड़ी के आगे-आगे इस प्रकार चलेंगें जैसे मलिका विक्टोरिया के आगे पायलट जीपें या मोटर बाइक चलाते जाते  हैं।

इन्ही शब्दों के साथ अपनी लेखनी को आज के लिए विराम देते हैं और आप देखिये 24 आहुति संकल्प सूची। हर बार की तरह आज का लेख भी बहुत ध्यान से तैयार किया गया है, फिर भी अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिए क्षमा प्रार्थी है। सूर्य की प्रथम किरण आपके जीवन को ऊर्जावान बनाये जिससे आप गुरुकार्य में और भी शक्ति उढ़ेल सकें।

24 आहुति संकल्प सूची:

(1)सरविन्द कुमार (29  ), (2)अरुण वर्मा- 25,(3) संजना कुमारी-24,(4) संध्या कुमार-26  और (5) प्रेरणा कुमारी-36  अंक प्राप्त कर रही हैं।  प्रेरणा बिटिया प्रथम स्थान पाकर गोल्ड मैडल विजेता हैं। बिटिया को हमारी बधाई। युवा शक्ति को नमन। जय गुरुदेव


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