अपनी आत्मा का तिरस्कार मत कीजिये 

परमपूज्य गुरुदेव की दिव्य पुस्तिका “धर्म की सदृढ़ धारणा” पर आधारित श्रंखला का द्वितीय लेख जिसे आदरणीय संध्या कुमार जी की लेखनी सुशोभित कर रही है आपके समक्ष प्रस्तुत है । हमने अपनी सद्बुद्धि (अल्प बुद्धि ?) से यत्र-तत्र संशोधन कर इस लेख को रोचक बनाने का प्रयास किया है, आपके कमैंट्स इस बात के साक्षी हैं आप इस कठिन लेख शृंखला में भी डूब चुके हैं। 

 रेणु श्रीवास्तव जी का आज का कमेंट भी quote करने योग्य है। बहिन जी लिखती हैं: 

धर्म की परिभाषा जानने के लिये इसे बहुत गहराई से समझना होगा।गुरुदेव आगे यह भी कहते हैं कि धर्म का मूल तत्त्व सत् पर आधारित है। सही परिभाषा जानने में शायद पूरी जिन्दगी बीत जाये पर जितना समझ पाये उसे समझकर कार्यान्वित करें। 

इन्ही शब्दों के साथ आज के लेख को समझने का प्रयास करते हैं। 

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अवतारी महापुरुष जिस किसी जमाने में हुए हैं उन्होंने उस समय की परिस्थितियों का, देश, काल, पात्र का बहुत ध्यान रखा हैं। अरब देश में जिस समय हज़रत मुहम्मद साहब हुए थे उस समय वहाँ के निवासी अनेक स्त्रियाँ रखते थे, उन्हें जब चाहे रखते,जब चाहे निकाल देते थे, जब सन्तान बढ़ती और उसका पालन पोषण न कर पाते तो निर्दयता पूर्वक बच्चों को मार-मार कर फेंक देते, उपयोगी और अनुपयोगी पशुओं की अंधाधुंध हत्या कर देते थे। उन्हें धीरे-धीरे सुधारने के लिये, समय के साथ साथ परिस्थितियां बदलती गयीं और एक व्यक्ति को चार स्त्रियां रखने की, बालकों को न मारने की, जीव हत्या न करने की शिक्षा दी गयी ।अब एक व्यक्ति को चार स्त्रियां रखने की आवश्यकता नहीं। देखने में वह शिक्षा अनावश्यक हो गयी पर उसके मूल में छुपा हुआ सत्य ज्यों का त्यों आवश्यक है । “अपनी आवश्यकताओं को घटाओ, भोगों को कम करो।” यह सन्देश उस शिक्षा के मूल में था, वह उद्देश्य करोड़ों वर्षों में भी परिवर्तित न होगा।

आप गंभीरता पूर्वक धर्मतत्व पर दृष्टिपात कीजिये और धर्म के उन नियम व्यवस्थाओं में कौन सी पवित्र और शाश्वत भावना काम कर रही है उसे ढूंढ निकालिए | सत्य शाश्वत है, eternal है ,अनादिकाल से चलता आ रहा है और कायदे, कानून, विचार व्यवस्था परिवर्तनशील है। जैसे यह अटल सत्य है कि सूर्य पूर्व से उदय होता लेकिन कई बार बादलों से घिरे होने के कारण कम दिखाई देता है। बादलों की इस स्थिति के कारण हम आकाश में सूर्य को किसी और दिशा में तो ढूंढना नहीं शुरू कर देते। जब हम ऐसे अटल सत्य को हृदयंगम करने का प्रयास करते हैं तो धर्मों का आपसी विरोध दूर हो जाता है। हम इस बात पर सहमत होना आरम्भ कर देते हैं कि और सभी धर्म सत्य हैं, तब यह दृष्टिगोचर होने लगता है कि सब धर्म एक ही नींव पर टिके हुए हैं।

विभिन्न धर्मों में, यहाँ तक कि एक ही धर्म के विभिन्न सम्प्रदाओं में उठ रहे गतिरोध के देखते हुए परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि आप जिस किसी भी सम्प्रदाय से निकट सम्पर्क रखते हैं उसका सूक्ष्म दृष्टि से, निष्पक्ष दृष्टि से, निष्पक्ष परीक्षक की भ्रांति, खरे आलोचक की भांति निरीक्षण कीजिये। निस्सन्देह उसमें बहुत-सी बातें बहुत ही उत्तम होंगी क्योंकि हर सम्प्रदाय धर्म का सहारा लेकर खड़ा हुआ है। उसमें कुछ अच्छाई अवश्य ही होनी चाहिए । किन्तु यह भी निश्चय है कि समय की प्रगति के साथ उसमें कुछ न कुछ उपयोगिता कम अवश्य आई होगी । यदि आप इन unusable बातों को मोहवश छाती से लगाये फिरेगें तो आप, अपना बहुत बड़ा अहित करेंगे। इसके लिए एक बहुत ही सटीक उदाहरण दे सकते हैं। 

दो दिन पूर्व जो भोजन तैयार किया था वह बहुत ही पवित्र, उत्तम, स्वास्थ्य कारक था, परन्तु दो दिन पुराना हो जाने के कारण वह बासी हो जाता है। उसमें बदबू आने लगीं, स्वाद रहित एवं हानिकारक हो जाता है। यदि हम उस बासी भोजन को मोह वश ग्रहण करेंगे तो अवश्य ही अपने को रोगी बना लेगें।

कितनी विडंबना है कि दो दिन पुराना भोजन करने से हमें रोगी होने का डर है लेकिन सदियों पुरानी प्रथाओं, रीति रिवाज़ों को अपनी छाती से लगाए रखने में कोई डर नहीं है बल्कि गर्व है। 

साम्प्रदायिक अनुपयोगी रीति-रिवाजों की परीक्षा कीजिये और उनका वैसे ही परित्याग कर दीजिये जैसे मरे हुए कुत्ते की लाश को घर से विदा कर देते हैं। ज़रा ध्यान दीजिये हम साम्प्रदायिक रीति रिवाज़ों की बात कर रहे हैं न कि शाश्वत सत्य की। यह एक ऐसा सत्य है जो अनंत है ,अनादि काल से चला आ रहा है और कभी भी झुठलाया नहीं जा सकता। पिछला कल बीत गया । अपनी बहुत सी आवश्यकता अनावश्यकताओं को वह अपने साथ समेट ले गया । आज तो हमें आज की समस्याओं पर विचार करना है। एक ऐसी उपयोगी एवं नयी व्यवस्था का निर्माण करना है जो आज के लिए हो। किसी एक समय में एक रिवाज उत्तम था, लेकिन क्या वह रिवाज़ सदा उत्तम रहेगा ? कदापि नहीं। कोई समय था नरमेध यज्ञ होते थे परन्तु आज कौन रिपीट कर रहा है ? आदिम युग में मनुष्य के पूर्वज दिगम्बर (नंगे) रहते थे पर आज तो सभी को कपड़ों की आवश्यकता होती है। उस युग में तो पत्थरों के रगड़ने से आग पैदा की जाती थी इसीलिये कोई दियासलाई का बहिष्कार नहीं कर देता । अमुक नगर से अमुक नगर को पहिले पक्की सड़क न थी पर आज बन गयी है तो उस पर चलना पाप थोड़े ही कहा जायगा । गुरुदेव कह रहे हैं कि आप अपनी बुद्धि को डिब्बी में बंद करके भूतकाल की हर बात के अन्धविश्वासी मत बन जाइए अन्यथा अपने जीवन को दारुण दुःखों में फँसा लोगे। बन्द गड्ढे का पानी बदबूदार हो जाता है। कहीं आपका भी हाल बदबूदार पानी जैसा न हो जाए। विवेक और बुद्धि की बात तो हम रोज़ ही कर रहे हैं। हम तो यहाँ तक भी कहते हैं कि Brain का जितना अधिक प्रयोग किया जाये, उतना अधिक fertile होता है। We have to use our brain as much as we can, we have not to save it for the next generation. 

रुढ़ियों के पोंगापन्थी के गले में बन्द पड़ी हुई बुद्धि में सड़न आ जाती है और उसकी दुर्गन्ध से पास पड़ोसियों का सिर फटने लगता है । आवश्यकता है अपने दिमाग की खिड़कियां खोलने की, ताज़ा ठंडी वायु अंदर लाने की, आवश्यकता है अपनी चेतना को सदैव स्वच्छ रखने की। जिस प्रकार घर के कूड़े को प्रतिदिन साफ किया जाता है ठीक उसी प्रकार धर्म साधना के लिये अनुपयोगी रीति रिवाजों की सदैव सफाई करते रहना चाहिए । उनके स्थान पर वर्तमान समय के लिए जिन प्रथाओं की आवश्यकता है उनकी आधारशिला आरोपित करने के लिये साहसपूर्वक आगे कदम बढ़ाया जाना चाहिए।

पुरातन जंजालों से भरे हुए मत-मतान्तरों की ओर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनमें से बहुत सी वस्तुएं समय से पीछे हो जाने के कारण निरुपयोगी हो गई हैं, उनसे चिपके रहने का अर्थ यह होगा कि हमने अपने हाथ-पाँव बाँध कर अपने को अन्धेरी कोठरी में बंद कर लिया है। किसी भी धर्म ग्रंथ, सम्प्रदाय या अवतार का अनादर करना ठीक नहीं है भले ही आज उनके कई अंश निरुपयोगी हो गये हैं, पर एक समय उन्ही अंशों ने सामाजिक सन्तुलन ठीक रखने के लिये सराहनीय कार्य किये थे।सभी धर्म-ग्रंथों संप्रदायों और अवतारों का आदर करना ही बुद्धिमानी है।जिस किसी भी ग्रन्थ से कोई बातें ऐसी प्रतीत हो जिनकी उपयोगिता अब भी बनी हुई है उन्हें ग्रहण करके शेष को अस्वीकार करना ही बुद्धिमानी है।

नीचे लिखी पंक्तियों को बहुत ही ध्यान से पढ़ कर अंतर्मन में उतारने की आवश्यकता है:

सत् धर्म का संदेश है, कि हे ईश्वर के प्राणप्रिय राजकुमार और राजकुमारी, हे सच्चिदानन्द आत्माओ, हे नवीन युग के निष्कलंक अग्रदूतों, अपने अन्त:करण में ज्योति पैदा करो, अपने हृदयों के कुसंस्कारों को मथ कर निरन्तर धोते रहो और निर्मल बनाते रहो, ठीक उसी प्रकार जैसे दही को मथ कर माखन अलग हो जाता है और नीचे बच जाती है केवल छाछ। अपने अंतःकरण में पवित्रता, निर्मलता और स्वच्छन्दता को प्रतिक्षण स्थान देते रहना चाहिए, इसी से ब्रह्मत्व जाग्रत होता है, ऋषित्व उदय होता है। जब यह स्थिति आ जाती है तो ईश्वर की वाणी स्वयं ही अन्तरात्मा का मार्गदर्शन करती हुई और बताती है कि इस युग का धर्म क्या है ? जब अनंत सत् धर्म को स्वीकार करने की स्थिति आ जाती है तो नाना प्रकार के जंजालों से भरी हुई पुस्तकों की ओर ताकने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सृष्टि के आदि में जब सत् धर्म का उदय हुआ था तो जीवों का मार्गदर्शन उनकी अन्तरात्मा में बैठे हुए परमात्मा ने किया था। इसी को “वेद या आकाशवाणी” कहा जाता है । आप पुस्तकों की गुलामी छोड़िये और आकाशवाणी की ओर दृष्टिपात कीजिये । जब गुरुदेव पुस्तकों की गुलामी की बात कर रहे हैं तो इसका अर्थ कतई न समझा जाये कि वह स्वाध्याय के विरोधी हैं। आपकी अन्तरात्मा स्वतन्त्र है, ज्ञानवान है और प्रकाश स्वरुप है । वह आपको आपकी स्थिति के अनुकूल ठीक-ठीक मार्ग बता सकती है । यह मत सोचिये कि आप तुच्छ, अल्प और असहाय प्राणी हैं और आपको अन्धे को तरह किसी की उंगली पकड़ कर ले चलने वाले की जरूरत है । ऐसा विचार करना आत्मा के ईश्वरीय अंश का तिरस्कार करना होगा। परमपिता परमात्मा ने धर्म और अधर्म का निर्णय करने के लिये हमें सद्बुद्धि प्रदान की है। इस सद्बुद्धि का निष्पक्ष और निर्भय होकर उपयोग करना ही समझदारी है। परमपूज्य गुरुदेव कह रहे हैं कि ऐसा कभी नहीं कहना चाहिए कि हमारी बुद्धि अल्प है, हमारा ज्ञान थोड़ा है । हो सकता है कि अक्षर ज्ञान की दृष्टि से आप पीछे हों, परन्तु सद्बुद्धि तो ईश्वर ने सबको दी है। वह आपके पास भी कम नहीं है । दीनता की भावना को आश्रय देकर आत्मा का तिरस्कार मत कीजिये । अपनी सद्बुद्धि पर विश्वास करिये और उसी की सहायता से आज के लिये उपयोगी रीति रिवाजों को स्वीकार कीजिये, यही सच्चा धर्म है।

इन पक्तियों को लिखते समय हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि परमपूज्य गुरुदेव हमारा कान पकड़ कर हमें डांट रहे हैं क्योंकि हम अक्सर “अल्प बुद्धि” शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। इस डांट के बाद केवल सद्बुद्धि का ही प्रयोग करेंगें नहीं तो आत्मा का तिरस्कार हो जायेगा।

 To be continued:

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण के साथ यह ज्ञानप्रसाद आपको ऊर्जा प्रदान करे और आप सारा दिन सुखमय रहें । हर लेख की भांति यह लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

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24 आहुति संकल्प 

12 अप्रैल 2022 के ज्ञानप्रसाद के अमृतपान उपरांत 4 समर्पित सहकर्मियों ने 24 आहुति संकल्प पूर्ण किया है, यह समर्पित सहकर्मी निम्नलिखित हैं :

(1)अरुण वर्मा -37 , (2 ) संध्या कुमार -31,(3) सरविन्द कुमार -37,(4 ) राज कुमारी कौरव -26 

अरुण वर्मा जी और सरविन्द कुमार जी दोनों ही गोल्ड मेडल विजेता हैं जो हम सबकी बधाई के पात्र हैं। सभी सहकर्मी अपनी अपनी समर्था और समय के अनुसार expectation से ऊपर ही कार्य कर रहे हैं जिन्हे हम हृदय से नमन करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। धन्यवाद्


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