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डेमनिया बाबा की अमर कथा पार्ट 2 

4 मार्च 2022 का ज्ञानप्रसाद – डेमनिया बाबा की अमर कथा पार्ट 2 

आज का ज्ञानप्रसाद बहुत ही संक्षिप्त है- केवल दो ही पन्नों का। डेमनिया बाबा की अमर कथा को आगे बढ़ाते हुए हम देखेंगें कि हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने कैसे एक आदिवासी भक्त की झोंपड़ी में ज्वार की मोटी रोटी और मूंग की दाल खा कर भक्त की भावना का सम्मान किया। सच में यह तो शबरी,सुदामा और विदुर के प्रसंग जैसा ही एक प्रसंग है। 

लेख तो विस्तार में आप पढेंगें ही लेकिन उससे पहले हम अपने दो समर्पित सहकर्मियों के कमैंट्स की चर्चा कर लें। कल वाले लेख को जहाँ आदरणीय रेनू श्रीवास्तव जी ने एक चलचित्र के मार्मिक दृश्य की संज्ञा दी है वहीँ आदरणीय अरुण वर्मा जी ने 400 शब्दों का भारी भरकम कमेंट करते हुए लेख के अल्पविराम को टीवी सीरियल के “कल देखिये” indication से तड़प और जिज्ञासा बढ़ाने की भावना व्यक्त की है। इसी तरह के और भी अनेकों कमेंट हैं जो ऑनलाइन ज्ञानरथ में रूचि दर्शाते हुए कमैंट्स- काउंटर कमैंट्स की प्रबल प्रथा पर स्टैम्प लगा रहे हैं। हाँ कमैंट्स की गिनती कई बार ऊपर नीचे होती रहती है, लेकिन नए सहकर्मियों के कमेंट उत्साहवर्धन में सहायता करते हैं। जब कमेंट की बात कर ही रहे हैं तो आशीष बेटे का कमेंट भी शेयर कर लें जो उन्होंने कल के शुभरात्रि सन्देश के लिए किया था : “शुभ रात्रि🙏🏻1-2 दिन से बार बार यह अवसाद हो raha tha ki mere sath wale job change karke higher package le rahe hai mai kya karu kaise dhan sanchay karu.. Par ab thik hai fir se santosh hai mann ki chanchalata kam hui 🙏🏻 ” प्रेरणा बिटिया से कल बात हो हो रही थी कि ऑनलाइन ज्ञानरथ के माध्यम से अगर किसी एक को भी मार्गदर्शन मिलता हो, सुखद नींद में सहायता मिलती हो, स्ट्रेस कम करने में सहायता मिलती हो, प्रतिभा प्रोत्साहित होती हो तो हम समझें कि हम सही मार्ग पर चल रहे हैं। 

आज के 24 आहुति संकल्प में केवल दो समर्पित सहकर्मी अरुण वर्मा जी और सरविन्द पाल जी 36 और 34 अंक प्राप्त करते हुए bracketed हैं, दो अंकों का फर्क ही तो है। दोनों ही गोल्ड मैडल विजेता हैं, हमारी व्यक्तिगत एवं सामूहिक बधाई, शुभकामना स्वीकार करें। 

कल वाला सम्पूर्ण ज्ञानप्रसाद अपने सहकर्मियों का ही होगा जिसमें उनकी प्रतिभाओं का प्रचार-प्रसार, फ़ोन कॉल्स, मैसेज, अनुभूतियों, गतिविधियों इत्यादि का सर्वेक्षण किया जायेगा। निवेदन है कि कमेंट करके बताएं कि “सप्ताह में एक दिन केवल सहकर्मियों के लिए” जैसा प्रोग्राम कैसा रहेगा। 

तो इसी रिपोर्ट कार्ड के साथ प्रस्तुत है आज का दिव्य ज्ञानप्रसाद। 

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सभी परिजन गुरुदेव के दर्शन कर तृप्त हो गए। गुरुदेव के भोजन की व्यवस्था परिजनों ने अलग से एक सेठजी के यहाँ राजमार्ग पर एक पक्के मकान में रखी थी किंतु भक्तवत्सल गुरुवर तेज कदम बढ़ाते हुए डेमनिया की झोंपडी पर पहुँच गए व कहने लगे कि जो बना है, वही खा लूंगा। बता, क्या बनाया है मेरे लिए। कहाँ खिलाएँ कहाँ बिठाएँ-असमंजस में पड़ा डेमनिया कभी इधर भागे कभी उधर । इतने में डेमनिया की पत्नी ज्वार की मोटी रोटो, मूंग की दाल व दही एल्युमीनियम की थाली में परोस कर लाई। गुरुदेव ने पूरा भोजन चाव से खाया व कहने लगे कि मेरी कई जन्मों की भूख तृप्त हो गई। पिछली बार की तेरे साथ भोजन करने की आकांक्षा पूरी हो गई। साथ में उन्होंने दो-तीन कौर डेमनिया को भी खिलाए। यह दृश्य देख उपस्थित समुदाय धन्य हो गया। सुना तो था कि भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। यह भी सुना था कि सुदामा के चावल व विदुर के केले के छिलके भगवान कृष्ण ने खाए थे पर इस युग के श्रीराम ने उसी परम्परा को निभाकर यह सिद्ध कर दिया कि दुनिया में कोई ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा नहीं है। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं। उन्हें तो बस वही भावना चाहिए। भोजन कर सभी को आशीर्वाद देकर गुरुदेव आगे बढ़ गए व भविष्य की ओर संकेत कर गए कि आगे चलकर इस केंद्र का और भी विस्तार होगा।

त्याग-समर्पण की गाथा तो कइयों की है। ढेरों व्यक्तियों ने अपने साधन गुरुवर को दिए हैं. पर डेमनिया के त्याग व समर्पण का आज मूल्यांकन करें तो वह करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से भी अधिक है। उस छोटे-से शक्तिपीठ से कार्य कर डेमनिया ने सैकड़ों आदिवासी बंधुओं के जीवन को बदल दिया। शराब, भाँग, गाँजा, तंबाकू आदि व्यसनों को छुड़ाने का उसने अभियान चलाया। पढ़ा लिखा न होने पर भी वह उन्हीं की भाषा में प्रवचन भी करता है, जो सभी के गले उतरते चले जाते हैं। वह यज्ञकर्मकांड भी संपन्न करा लेता है। उसकी पत्नी, बच्चे, भाई, बहुएँ शांतिकुंज के एक माह के युगशिल्पी सत्रों में भाग ले चुके हैं। पूरा परिवार मिशन के प्रचार-प्रसार में अहर्निश लगा हुआ है।

डेमनिया अपने जाति बंधुओं में मांसाहार छुड़ाने के लिए ऐसे तर्क देता है कि लोग उसकी बात सुनकर मांस खाना भी छोड़ देते हैं। वह कहता है कि मनुष्य योनि में आने से पहले हम चौरासी लाख योनियों में भटकते हैं। हम जिस मुर्गे या बकरे को मारकर खा रहे हैं, हो सकता है कि उस योनि में हमारा कोई पूर्वज हो। क्या हम अपने पूर्वजों को मारकर खा सकते हैं ? यह प्रश्न वह सभी से पूछता है। फिर खुद ही जवाब देता है, कदापि नहीं। इस मार्मिक तर्क को सुन निमाड़ के आदिवासी क्षेत्र के बहुत से व्यक्तियों ने मांसाहार छोड़ दिया है।

यही नहीं, डेमनिया भाई ने बलिप्रथा बंद करा दी एवं शराब का ठेका बंद करा दिया। अब गाँव में आस-पास कहीं भी देशी शराब कोई नहीं पीता। हाँ गैर आदिवासी तथाकथित प्रगतिशीलों से उसकी झड़प होती रहती है, जो विदेशी शराब के नाम पर वहाँ नशे का व्यापार फैलाना चाहते रहते हैं। 

डेमनिया गाँव का सरपंच भी रहा है। मिशन से जुड़ने के बाद उसकी प्रतिष्ठा भी बढ़ी है साथ ही ईष्र्यालु भी। एक बार किसी कार्यक्रम को संपन्न कराने वह सपरिवार गाँव से बाहर गए थे, तो किसी ने घर में आग लगा दी। कपास की फसल जो घर में रखी थी, उसे काफी नुकसान पहुँचा। हज़ारों का नुकसान हुआ, पर डेमनिया पर विदेह (देह से विरक्त) की तरह इसका कोई प्रभाव न पड़ा। उसने कहा, जो भी था गायत्री माता व यज्ञ पिता का दिया था, उन्हीं के पास चला गया। हाँ, यह अवश्य हुआ कि जिसने यह काम किया था, उसे प्रभु ने स्वयं दंड दे दिया।

डेमनिया व्यावहारिक अध्यात्मवाद से परिपूर्ण व्यक्तित्व का नाम है। वैसा ही सादा रहन-सहन। ठंढ हो या तेज धूप, वह वैसे ही पैदल नंगे पाँव चलता है। पीली धोती कुरता ही पहनता है।आज भी स्वयं अपने खेत में परिश्रम करता है। जन जागरण के लिए उसने कार्यकर्ताओं की कई टोलियाँ प्रशिक्षित की हैं, जो बैलगाड़ी-पदयात्रा द्वारा सुदूर दुर्गम जंगलों तक जाती हैं। प्रलोभनवश जिन्होंने धर्मांतरण कर लिया था, उन भाइयों को भी उसने पुनः यज्ञ पिता-गायत्री माता से जोड़ा है। वह प्रत्येक ऋषि पंचमी पर सामूहिक यज्ञोपवीत परिवर्तन का आयोजन करता है जिसमें ढेरों आदिवासी भाई-बहन एकत्र होते हैं। जिस गाँव में चोरी करके घर चलाने वाले लोग रहते थे, उन्हें भी पट्टा दिलाकर खेती कराके उसने स्वावलंबी बना दिया। भूमि सुधार, उन्नत कृषि, जलागम विकास की योजनाओं को व वृक्षारोपण अभियान को डेमनिया ने गति दी है। इस भक्त के बारे में जितना कहा जाए कम है। सच है गुरुकृपा जिस पर होती है, उस पर सभी अनुदान बरसते हैं। ऐसे हैं हमारे डेमनिया भाई।

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव आज का लेख भी बड़े ही ध्यानपूर्वक तैयार किया गया है, फिर भी अगर कोई त्रुटि रह गयी हो तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

इति श्री 

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