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परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 1 

21  दिसंबर 2021 का ज्ञानप्रसाद – परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती -पार्ट 1 

18 दिसंबर वाले लेख में हमने अपने सहकर्मियों के साथ परमपूज्य गुरुदेव की हीरक जयंती (Diamond Jubilee )का ज़िक्र किया था। उस दिन से लेकर इस लेख के प्रकाशित होने तक हमने अखंड ज्योति के कितने ही लेख पढ़ दिए ,कितनी ही वीडियोस देख दीं ताकि हम आपके समक्ष कुछ ऐसा  कंटेंट ला सकें जो आपको बता सके कि हमारा गुरु कैसा है और अगर आपको विश्वास  होता है  तो आप औरों को बताने का संकल्प लें। आज से आरम्भ हो रही इस श्रृंखला में आने वाले लेख आपको इस संकल्प में मार्गदर्शन तो प्रदान कर  ही सकते हैं, साथ में  परमपूज्य गुरुदेव की वेदना का भी आभास भी दिला सकते हैं कि उनको अपने विशाल परिवार से, अपने बच्चों से क्या- क्या आशाएं  थीं। इन लेखों को पढ़ते  हुए आपको ऐसा भी आभास होगा कि जो बात गुरुदेव हमसे कह रहे हैं, लगभग वही बात हम आपको ऑनलाइन ज्ञानरथ के संदर्भ में भी कहते रहते हैं – कहें भी क्यों न, जिस प्रकार हमारे गुरुदेव का हम पर विशेष अधिकार है ठीक वैसे  ही अधिकार की अपेक्षा  हम अपने सहकर्मियों पर कर सकते हैं। 

तो चलें आज की ज्ञान पाठशाला  में:

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सूक्ष्मीकरण के दौरान परमपूज्य गुरुदेव की  हीरक जयंती:       

परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण अवधि के प्रथम वर्ष में अपनी हीरक जयंती  की घोषणा की थी। यह 1985 में मनाई गयी थी।  उसी की पूर्ववेला में गुरुदक्षिणा के रूप में उन्होंने 10000 हीरों की माला पहनने की बात कही थी।  उसके बाद अब 2021  में   36  वर्ष बीतने को आ रहे हैं, क्या हमने उनकी यह आकांशा पूरी की, क्या हम अभी भी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे  हो जाने के बावजूद  बहाने बना रहे हैं और बचने का प्रयास कर रहे हैं ।

साधारणतया  25 वें वर्ष में रजत जयन्ती, पचासवें वर्ष में स्वर्ण जयन्ती, पचहत्तरवें  वर्ष में हीरक जयन्ती और सौ वर्ष में शताब्दी मनाये जाने की परम्परा है। लोकाचार में विवाह के साठ वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती मनाते हैं पर गुरुदेव का अपने गुरु से हुए गठबंधन को  साठ वर्ष पूरे होने के कारण इस वर्ष को ही हीरक जयन्ती वर्ष माना जा रहा था । गुरुदेव  ने लिखा  कि अन्यत्र यह आयोजन हर्षोत्सवों के रूप में मनाये जाते हैं, पर अपनी दिशा धारा ऐसी है जिसमें उत्साह उत्पादन करने वाले उन कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिनसे  लोकरंजन होता है। कौन कौन से हैं यह कार्यक्रम -आगे चल के बताते हैं 

अखंड ज्योति अक्टूबर  1985 के अनुसार  गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण एकान्त साधना को प्रायः डेढ़ वर्ष हो चला था । इस बीच उनकी ढलती आयु और प्रचण्ड तपश्चर्या को देखते हुए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य बहुत अधिक नहीं लड़खड़ाया था । चेतना शरीर तो और भी अधिक बलिष्ठ, समर्थ एवं तेजस्वी हो गया था । उनकी संरक्षक शक्ति का प्रताप देखते हुए किसी  को भी कोई  चिन्ता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी । वे अनवरत क्रम से अपने मार्ग पर चल रहे थे । निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके ही रहेंगे, इतनी निश्चिन्तता हममें  रहनी ही चाहिए।

श्रावणी पर्व पर परमपूज्य गुरुदेव ने  एक अंगड़ाई ली । प्रज्ञामिशन की ओर ध्यान दिया  और भावनाशील परिजनों को भी उन्होंने  स्मरण किया । सभी के कुशल समाचार पूछे और मनःस्थिति एवं परिस्थिति का लेखा-जोखा लिया। साथ ही उनके उज्ज्वल भविष्य की संरचना का आश्वासन भी दिया । इसके अतिरिक्त परिजनों के प्रति निजी अभिव्यक्ति का  45 मिनट  का एक वीडियो  भी रिकॉर्ड करवाया । इस  वीडियो का 26 मिनट का एक भाग  यूट्यूब पर उपलब्ध है और हम इसे अलग से अपने चैनल पर अपलोड कर देंगें। 

इस वीडियो में परमपूज्य गुरुदेव कहते हैं कि  1985 का वर्ष हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष में हमें विशेष शक्ति मिली हुई है, हमारा एक बैच (Batch) बना हुआ है और हम चाहते हैं कि जो लोग हमसे घनिष्टता से जुड़े हैं, जो लोग शांतिकुंज नहीं आ सके हैं उन्हें इधर भेज दीजिये। आगामी वसंत पंचमी को हमारे 75 वर्ष पूरे हो जाने हैं, तब तक आ जाएँ तो अच्छा है। हमें आपके साथ, अपने  सहयोगियों के साथ बहुत महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। एक और बात गुरुदेव ने कही कि जीते जी हम अपने बारे में कुछ भी लिखना नहीं चाहते। हमारे जाने के बाद आप बताना कि  हमारा गुरु कैसा था ( है ) इसके उपरान्त वे अपनी प्रचण्ड साधना में फिर पहले की  भाँति लग गये। विश्व की विषम परिस्थिति का सन्तुलन बिठाने के लिए इससे कम ऊर्जा में काम चलने वाला भी नहीं है।

गुरुदेव ने हीरक जयंती के लिए  “अनिच्छा एवं अरुचि” क्यों व्यक्त की ?

अक्टूबर के अंक में ऐसा भी वर्णन है: यह गुरुदेव की हीरक जयन्ती का वर्ष है। इसमें प्रायः छ: महीने बीत चुके और लगभग इतने ही दिन शेष हैं। परमपूज्य गुरुदेव अपना प्रत्येक पर्व वसंत से ही गिनते थे, इस गणित से अक्टूबर माह तक लगभग छः माह  होते हैं।  यह शानदार वर्ष सभी परिजनों के लिए हर दृष्टि से सौभाग्य सूचक और उत्साहवर्धक है। सभी के मन में इस अवसर पर कुछ करने की उमंग है। साधारणतया हर्षोत्सवों पर धूमधाम भरे सज्जा सम्मेलन और यज्ञादि कर्मकाण्ड होते रहते हैं। इस संदर्भ में गुरुदेव ने आरम्भ में ही “अनिच्छा एवं अरुचि”   व्यक्त कर दी थी  और कहा कि इस महत्वपूर्ण बेला को इतने सस्ते में न निपटाया जाय। अगर किसी को कुछ  करना हो तो  वे कुछ ऐसा ठोस काम करें जिसका प्रभाव जन-मानव को  परिष्कृत करने के लक्ष्य की पूर्ति में महती भूमिका निभा सके और उसका प्रत्यक्ष दर्शन प्रेरणाप्रद स्वरूप में चिरकाल तक होता रहे।

शक्तिपीठों का निर्माण – “चेतना उभारने वाला लक्ष्य”

अधिक पूछने पर परमपूज्य गुरुदेव ने   कहा- हमारे जीवन के अनेकानेक कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण कार्य एक था- 24 प्रज्ञा पीठों का निर्माण। देवालयों की दृष्टि से वे भली प्रकार विनिर्मित हो गये हैं।  अनेकों का हमने स्वयं जाकर उद्घाटन भी किया। इमारतों की दृष्टि से मध्यवर्गी परिजनों का इतना साहस कोई  कम सराहनीय नहीं है। जिस प्रयोजन को  लिए आशाओं के साथ इन शक्तिपीठों का  निर्माण हुआ, उसके पीछे एक दूरगामी “चेतना उभारने वाला लक्ष्य” भी था। आशा कर ली गई थी कि प्रत्येक प्रज्ञापीठ स्थानीय क्षेत्र में नव जीवन का संचार ही नहीं करेगा, वरन् समीपवर्ती गांवों को भी अपनी सेवा परिधि में लेकर एक “मण्डल का केन्द्र” बनायेगा। शक्तिपीठों के  रचनात्मक प्रयत्नों से ट्यूबवैल जैसी उगी हुई हरितमा  दूर-दूर तक दिखाई देगी। वे विद्युत उत्पादक, जनरेटर बनकर अपने दायरे में आलोक वितरण करेंगे। प्राचीन काल में देवमन्दिर जनमानस में धर्मधारणा को गहराई तक प्रवेश कराते थे और लोकोपयोगी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में जान की बाज़ी लगाकर संलग्न रहते थे। उनके द्वारा उत्पन्न किया गया  लोक-सेवकों का  संगठन अनर्थ-अनौचित्यों के पैर नहीं जमने देता था । 

आशा  की गई थी प्रज्ञापीठें ऐसी ही हलचलों की केन्द्र बनकर रहेंगीं परन्तु  लगता है वस्तुस्थिति को और भावी जिम्मेदारी को समझे बिना ही उतावलेपन  में चन्दे के बल पर देवालय बन गये और कार्य समाप्त हुआ मान लिया गया। यही कारण है कि विनिर्मित प्रज्ञा पीठों में भाव-भरा जीवन संचार “नहीं” हो रहा है। परमपूज्य गुरुदेव ने इन विनिर्मित प्रज्ञापीठों( Manufactured Prgyapeeth ) को उत्पादित बालकों की संज्ञा देते हुए  और अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा:

“ऐसा लग रहा है कि इन बालकों को  पक्षाघात (PARALYSIS) जैसा होता दिख रहा है। वे चलते-फिरते हँसते-खेलते, बोलते-चलते नहीं दिखते।” 

ऐसी परिस्थिति को देखते हुए गुरुदेव ने अपनी  व्यथा व्यक्त की और कहा यह सब देख कर हमें  चोट लगती है। गुरुदेव ने निर्जीवता के माहौल के बदले जाने और सजीवता उत्पन्न होने की आशा व्यक्त की । वीडियो में परमपूज्य गुरुदेव यहाँ तक कह रहे हैं कि शक्तिपीठ हमारी छाती के ऊपर बना दिए हैं, ज्ञानरथ चलता नहीं है,पुजारी बना दिए हैं ,आते हैं आरती करके चले जाते हैं। हमें ख़ुशी है हमारे बच्चों ने  बहुत बड़े कार्य किये हैं   लेकिन बहुत कुछ और  करने को अभी बाकी है।  यह आपकी हीरक जयंती है जिसमें हम आपको तराश कर हीरा बनाना चाहते हैं, आप चाहें तो इसको हमारा अंतिम सन्देश समझ सकते हैं लेकिन हम कहना चाहते हैं कि आप हमारे जैसे बने तभी हमें प्रसन्नता होगी।

हीरक जयन्ती वर्ष में समारोह के लिए गुरुदेव ने इसलिए  मना  कर दिया था  कि यदि प्रदर्शन और हुल्लड़ कोई ठोस काम होने की भूमिका नहीं बना सकते तो उनके निमित्त किया गया श्रम और खर्चा गया धन निरर्थक है। इन निराशाजनक परिस्थितियों में भी एक आशा की नई किरण उनके मन में कौंध रही थी । उसी का आभास उन्होंने 1985 के   श्रावणी पर्व पर दिया था। वे चाहते थे कि  बन चुके प्रज्ञापीठों को हिलाते-जुलाते रखा  जाय ताकि उनकी मूच्छना हटे और प्राण चेतना के लक्षण प्रकट हों। साथ ही उनकी एक और इच्छा भी थी  कि 24 लाख के विशालकाय गायत्री  परिवार में से कम से कम दस हजार व्यक्ति ऐसे निकलें, जिन्हें “ईंट चूने से नहीं हाड़मांस से बने भावनाशील और क्रियाशील पीठ कहा जा सके जो सक्रिय भी हों और गतिशील भी।”

गाँधी जी के सत्याग्रही, महात्मा बुद्ध  के परिव्राजक (भ्रमण करते हुए भिक्षु ), विनोबा जी के  सर्वोदयी, भगवान राम  के रीछ-वानर और भगवान कृष्ण  के ग्वाल-बाल कोई बहुत बड़ी प्रतिभा और परिस्थिति के नहीं थे, पर जब उन्होंने एक केन्द्र के तत्वावधान में रहकर परमार्थ प्रयोजन में अपनेआप  को समर्पित कर दिया  तो उन्हें  इतना बड़ा श्रेय मिला जितना देवताओं को मिलता है।

1985 के अनुसार प्रज्ञापरिवार के पंजीकृत सदस्य प्रायः 24 लाख हैं। इनमें से मात्र दस हजार निकल कर अगली पंक्ति में आयें जिन्हें सच्चे अर्थों में युग शिल्पी, प्रज्ञापुत्र एवं व्रतधारी कहा जा सके। उन्हें घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चले जाने के लिए नहीं कहा जा रहा है बल्कि  आह्वान किया जा रहा है कि प्रतिदिन  न्यूनतम दो-चार घण्टे का समय एवं बीस पैसे प्रतिदिन  युगान्तरीय चेतना को गतिशील बनाने में संकल्पपूर्वक लगाते रहें। मात्र इतना करने से  ही वे उस पंक्ति में गिने जा सकने योग्य बन जायेंगे जैसों की  गुरुदेव ने इस बार आशा  की है। समय किसी के पास भी चौबीस घण्टे से कम नहीं। इसका सही विभाजन करके सही काम में लाते हुए सामान्य व्यक्ति महान कार्य कर गुजरते हैं जबकि व्यस्तता की गुहार लगाते हुए कितने ही अनगढ़ और आलसी अपना समय गंवाते हैं और उन समस्याओं को भी नहीं सुलझा पाते जिनकी आड़ में वे मानवी गरिमा को सार्थक करने वाले कार्यों से कतराते और आँख चुराते रहते हैं।

क्रमशः जारी -To be continued  

हर बार की तरह आज भी कामना करते हैं कि  प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद् जय गुरुदेव

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24 आहुति संकल्प सूची – 

प्रेरणा बिटिया द्वारा प्रकाशित दो आडियो बुक्स पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए  दो  महान दिव्य आत्माओं  ने 24 आहुति-संकल्प पूर्ण किया है। दोनों दिव्य आत्माओं “ (1) प्रेरणा कुमारी बेटी-24, (2) संध्या बहन जी-24” को आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की तरफ से बहुत-बहुत साधुवाद, शुभकामनाएँ एवं  हार्दिक बधाई हो। आनलाइन ज्ञान रथ परिवार की गुरुसत्ता से विनम्र प्रार्थना है कि इन दोनों पर जगत् जननी  माँ गायत्री   की असीम अनुकम्पा सदैव बरसती रहे। जय गुरुदेव


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