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सात समुन्द्र पार से अपने परिजनों के साथ वार्तालाप 

16 अक्टूबर 2021 का ज्ञानप्रसाद:  सात समुन्द्र पार से अपने परिजनों के साथ वार्तालाप 

आज का ज्ञानप्रसाद लिखते समय इतनी जटिलता महसूस हो रही है  कि समझ नहीं आ रहा  कि  कहाँ से शुरू करें, कैसे सारी  बातों को compile करें कि ऐसा  लगे जैसे हम आप सबके बीच में  ही बैठ कर एक रोचक सी चर्चा कर रहे हैं। 

तो चलो करते हैं प्रयास ,देखते है परमपूज्य गुरुदेव कैसे हमारी लेखनी को दिशा देते हैं।

1.सबसे पहले आओ सब  सामूहिक तौर पे अपने दो सहकर्मियों बहिनों  को बधाई दें। एक बहिन जी से तो आप  भलीभांति परिचित हैं-  निशा  भारद्वाज जी।  इनकी बेटी प्रीती भारद्वाज को ECE  इंजीनियरिंग में एडमिशन मिल गयी है , हम सब परिवारजन परमपूज्य गुरुदेव से बेटी के उज्जवल भविष्य के लिए प्रार्थना करते हैं और  अपनी शुभकामना  भेजते हैं जिसे माँ -बेटी स्वीकार करके अपने भाई बहिनों को कृतार्थ करें। दूसरी  बहिन जी -मृदुला श्रीवास्तव -ऑनलाइन ज्ञानरथ के व्हाट्सप्प ग्रुप से बहुत ही समर्पित और नियमितता से हमारे साथ जुडी हैं। इनकी छोटी बेटी निष्ठां श्रीवास्त्व का गाल ब्लैडर का ऑपरेशन परमपूज्य गुरुदेव की कृपा से सफलता से सम्पन्न हुआ। हमारा ऑनलाइन ज्ञानरथ परिवार श्रीवास्तव परिवार को बधाई भेज कर स्वीकार करने का निवेदन करता है। आज प्रातः नींद खुलते ही  जब बहिन जी का  यह मैसेज देखा तो फ़ोन करके कुशल मंगल जानने की जिज्ञासा  हुई। लगभग 25  मिंट बात करके, सारी  स्थिति जानकार, हृदय तृप्त हो गया। परमपूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करते हैं कि हम अपने परिजनों में इसी तरह अपनत्व की भावना जागृत करते रहें  और हर किसी का  हमारे  ह्रदय में  वास हो । 

2.  नंबर दो पर एक ऐसा विषय है जिसका उत्तर हम  कई बार दे चुके हैं ,आज फिर रिपीट कर रहे हैं। हमारे लेखों को यूट्यूब से शेयर करने का विषय। हम पूर्णतया सहमत हैं कि यूट्यूब से यह लेख शेयर करने का कोई प्रावधान नहीं है।  हमारी वेबसाइट (ब्लॉग ) पर सारे लेख मौजूद हैं ,हमारे जीमेल अकाउंट , फेसबुक अकाउंट , twitter पर भी सारे के सारे लेख  उपलब्ध हैं ,जहाँ  से आसानी से शेयर किये जा सकते हैं।  अक्सर हमसे  हमारे फ़ोन नंबर की मांग की जाती है लेकिन हम चाहेंगें कि न तो अपना फ़ोन नंबर य आपका फ़ोन नंबर publically शेयर किया जाये। यूट्यूब जैसे open प्लेटफॉर्म पर नंबर शेयर करना कोई safe बात नहीं है। इसका केवल एक ही विकल्प है ,जो सभी ने प्रयोग किया है और वह है -अपना फ़ोन नंबर हमारे ईमेल पर भेजना और फिर उस फ़ोन नंबर को  अपने ग्रुप में add कर लेना। आशा करते हैं अपने  सहकर्मियों की शंकाओं का निवारण करने में हम सफल हो पाएं हैं। 

3.  ऑनलाइन ज्ञानरथ के स्तम्भों का पालन जिस श्रद्धा और अनुशासन के साथ किया जा रहा है उसके लिए सभी सहकर्मी धन्यवाद् के पात्र हैं।  राधा त्रिखा हमारी भाभी जी ने घर से बाहिर होने के बावजूद कमेंट किया। कुसुम  त्रिपाठी  बहिन जी ने भी  भोजपुर  आरा स्थित गायत्री शक्तिपीठ में लेख पढ़कर कमेंट किया। अत्यंत प्रसन्नता होती है ,हमारे बच्चे ,प्रेरणा बिटिया ,पिंकी बिटिया ,धीरप अगर कहीं जा रहे होते हैं तो हमें मैसेज करके सूचित कर देते हैं कि आज व्यस्तता बहुत है , इसी प्रकार हमारे भाई बहिन भी यह अनुशासन बनाये रखे हैं।  सुमन लता बहिन जी ने तो इस ज्ञानरथ को ज्ञान पाठशाला का ही नाम तो दिया है। हमें उनका विचार बहुत ही उत्तम लगा कि सहकर्मियों के विचारों से परिचित होने से और भी गति से ज्ञान -प्रचार प्रसार होगा।  

कर्म और भाग्य के विषय पर इतनी Brain-storming चर्चा हुई है कि हम कुछ चुने हुए कमेंट आपके समक्ष रख रहे हैं ,इन्हे पढ़कर और भी clarity हो सकती है।       

Renu Srivastava

Renu Srivasta

अब बात यह है कि भाग्य और कर्म में बड़ा कौन?

तो मेरे अनुसार दोनों एक दूसरे का पूरक है।सिर्फ भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।कहा जाता है कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है।परिश्रम और अपने कर्म से इन्सान अपना भाग्य बदल सकता है।संस्कृत की एक पंक्ति मुझे याद है कि…..

“नाहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगः।” जिस प्रकार सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं ही प्रवेश नहीं करता है, उसी प्रकार कार्य परिश्रम से ही सफल होते हैं, इच्छाओं से नहीं I

आपने भी उदाहरण देकर लिखा ही है।कर्म के अनुसार ही भाग्य निर्धारित होता है पर अच्छे कर्म करने से बुरे कर्म के प्रभाव को कम किया जाता है।आपने भगवान राम और कृष्ण का भी उदाहरण दिया ही है।कंस और रावण की मुक्ति भी भगवान के हाथों होनी थी जिस कारण उनका बध भगवान के हाथो हुआ। ग्यान रथ के माध्यम से सबको लाभ अवश्य प्राप्त हो रहा है जो न ले रहे हों उनका दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।महत्वपूर्ण लेख के लिये आप धन्यवाद के पात्र हैं अपना अमूल्य समय निकालकर लेख compile कर ग्यानरथ में फिर से लिखने का महत्वपूर्ण कार्य करते है।माँ गायत्री सभी को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें। सिर्फ मंत्र जपने से कुछ नहीं मिलेगा जब तक अर्थ समझ में न आ जाये। फल की चिन्ता किये बिना निष्काम कर्म करें फल स्वयं निर्धारित हो जायेगा। जय माँ गायत्री।

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Suman Lata

Suman Lata

जय गुरुदेव

भाग्य और कर्म का दूसरा भाग भी अत्यंत उपयोगी है।भाग्य का ही दूसरा नाम कर्म है।आपने बिल्कुल सही कहा है ,इन दोनों विषयों पर प्रत्येक व्यक्ति अपने बुद्धि से विवेक के अनुसार तर्क देता है।इस विषय पर तर्क वितर्क पुराने समय से चले आ रहे हैं और आने वाले समय तक चलने वाले हैं।भाग्य कर्म का ही दूसरा नाम है, क्योंकि भाग्य को पाने के लिए भी तो कर्म करना ही पड़ता है।निष्क्रिय व्यक्ति का भाग्य भी सहायी नहीं होता। “ऐसे ही सम सामयिक विषयों की आवश्यकता है ग्यान पाठशाला में,जिससे अपने सहकर्मी परिजनों के विचारों से परिचित होने का अवसर प्राप्त होता है।”

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Mridula srivastava 

भैया जी प्रणाम, 

आज के लेख में आपने सौ प्रतिशत सत्य कहा है। कर्म  से भाग्य बदलने में देर नहीं लगती। 

गुरुदेव पे विश्वास रख कर आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर होगा। जीवन के कष्ट, बाधाएं, कठिनाई सब दूर होने लगती हैं। कहते हैं कि जहाँ चाह, वहाँ राह। अच्छी सोच के साथ, अच्छे कर्म

जीवन की दिशा बदल देते हैं। आपने साधु और चोर का सटीक उदाहरण दिया है। 

आपके लेख हमेशा ही प्रेरणा देने वाले होते हैं  । समाज से जुड़े टॉपिक पर तो कॉमेंट लिखा जा सकता है, लेकिन गायत्री मंत्र का वर्णन आसान नहींं इसलिए मैं निःशब्द थी। पढ़ने से ज्यादा अनुभव ही, वर्णन किया जा सकता है। मैं तो साधारण इंसान मुझे अनुभव ही नहीं  । 

“आपके लेख जीने की प्रेरणा देने वाले होते है। बस गुरु देव के प्रति श्रद्धा बढ़ाते हैं। भैया जी आप पूर्णतः सफल हैं ब्रेन वाश करने में। इससे अधिक क्या खुशी होगी।“

 जय गुरुदेव 

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Vidushi Banta

Vidushi Banta

इस लेख मे कर्म भाग्य परिश्रम अवसर भरोसा सभी के उधारण देकर आपने बहुत ही उत्तम विचार पाठको के सम्मुख रखे है। कर्म अच्छे करते रहो। हर किसी के जीवन मे अवसर तो आते ही है उस अवसर को यदि हमने अपनी सूझ भूझ से संभाल लिया तो यही अवसर अच्छे भाग्य मे बदल जाता है। परिश्रम के द्वारा ही हम सफलता के द्वार तक पहुंच पाते हैं चाहे वो कोई सा भी क्षेत्र हो। कई बार ऐसा होता है कि मनुष्य कर्म भी अच्छे करता है परिश्रम भी करता है परन्तु उसे सफलता नहींमिल पाती इसे हम उसके प्रारब्ध कह सकते है।ईश्वर में दृढ विश्वास हो तो आगे का मार्ग भी प्रशस्त होता जाता है। “नियत नियति नियंता” यही हमारे जीवन को निर्धारित करते हैं।

आप का गुरु जी के प्रति दृढ विश्वाश ही आपके ह्रदय को स्पन्दित करता हैऔर आप अपनी भावनाओं को सभीके समक्ष लेख के रूप मे सभी को जीवन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का सुवसर प्रदान करताहै। बहुत बहुत धन्यवाद। त्रुटि के लिए क्षमा करना। जय माँ गायत्री।

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 Sadhna Singh

 भाई साहब माफ कर दिजिए मुझे मैं कल और आज का कोई कमेंट नहीं लिखी है भाई साहब मैं कंफ्यूज हूं कि यह कर्म और भाग्य आखिर है क्या ऐ ईश्वर खोज क्या है गुरुदेव का लिखा हुआ इतना लेख, वांग्मय, अखंड ज्योति और बहुत सारी पुस्तक पढ़ना  सब लोग से मिलना जुलना बातचीत करना अपने इतनी लंबी जिंदगी का अनुभव यही बताता है कि सब कुछ ईश्वर पर निर्भर है।  मुझे कभी-कभी सोच ही लगता है मैं पागल हो जाओगी इतने लोग सब तकलीफ में है मानसिक तकलीफ से गुजर रहे हैं फिर भी गलतियों पर गलतियां करते रहते आखिर यह सब प्रेरणा कहां से आती यह कर्म और भाग्य ही तो है। 

अरुण :जब आप दूसरों की पीड़ा के बारे में ऐसा सोचना आरम्भ कर देते हैं तो अवश्य ही उस परमसत्ता के बहु ही करीब आ जाते हो ,ऐसा हमारा अटूट विश्वास है 

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सरविन्द  कुमार पाल 

इससे हम सबको बहुत बड़ी प्रेरणा मिलने की सम्भावना है और हम सब पाठकगण व सहकर्मी भाई बहनों ने  अंतरात्मा की गहराई में पहुँच कर अनुभव किया कि कर्म और भाग्य की तुलना में कर्म ही प्रधान है।  भाग्य की उत्पत्ति कर्म से होती है , लेकिन कुछ लोग भाग्य पर भरोसा करते हैं जिन्हें भाग्यवादी कहते हैं ऐसे लोगों की अज्ञानता के कारण उनका जीवन अधूरा होता है और जो कर्मवादी होते हैं वह कर्म पर भरोसा करते हैं।  जिसने कर्म को वरीयता देते हुए भगवान पर भरोसा किया है व भगवान के बताए मार्ग पर चला है  वही जीवन में सफल हुआ है। उसी ने  सुख-शांति का जीवन जीकर वास्तविक आनंदानुभूति का अनुभव किया है और वही परमानंद को प्राप्त हुआ है।  “कल और आज का लेख हम सबको बार-बार पढ़ने की आवश्यकता है जिससे हम सबका कायाकल्प होकर जीवन कृतार्थ हो और हम सबका दृष्टिकोण व दिशा बदले और आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त हो”

Arunkumar Verma 

एक किसान अपने एक भैंस  के जरिये जीवन यापन कर रहा था उससे दुध निकालकर  बेचता और थोड़ा बहुत अपने लिए रख लेता, उसी के घर के रास्ते से एक ब्राह्मण देवता अपने शिष्य के साथ जा रहे थे, तो अंधेरा होने के कारण वे दोनों उस किसान के पास गये, किसान ने ब्राह्मण देवता को देखते ही दंडवत प्रणाम किया और उनके आदर सत्कार करते हुए उसने अपने घर में रुकने का आग्रह करने लगा, तो दोनों गुरु शिष्य रूक गये, रात को खाना खाने के बाद जब सोने गये तो तबेला में एक भैंस देखा, इसे देखते ही गुरु जी अपने शिष्य से बोले कि आज रात को यहाँ से निकल चलते हैं और जाने से पहले इस भैंस को पत्थर गिराकर मार डालते हैं शिष्य को कुछ समझ में नहीं आया, उन्होंने वैसा ही किया, और आधी रात को ही चले गए, जब कुछ दिन बीता तो उनके शिष्य एक सफल व्यक्ति बन गया था तो उसके मन में जिज्ञासा पैदा हुईं कि चलो चलते हैं उस किसान के पास कुछ सहायता करते हैं, जब शिष्य वहाँ पहूँचा तो देखा कि उस किसान का तो घर ही नहीं है वहाँ एक शानदार आलिशान बंगला बना हुआ है यह देखकर शिष्य वहाँ से चलने लगा जैसे ही अपनी गाड़ी घुमाई वैसे ही किसान आता हुआ दिखाई दिया, शिष्य उससे मिला, किसान ने सारी घटना बताई कि आप लोग को जाने के बाद मेरे भैंस पर पत्थर गिरने से उसकी मौत हो गई, उसके बाद मैं जंगल में जाकर लकड़ी काटकर और उसे बेचकर अपना घर चलाने लगा इससे मुनाफा हुई और हमने अपने खेत में सेब का पेड़ लगाया और सेब के फल का बहुत बड़ा व्यापारी बन गया, यह सब उस भैंस के मरने के वजह से हुआ।  हम सभी के साथ भी कहीं ना कहीं इसी तरह की कोई भैंस बंधी है जो सफलता को रोककर रखे हुए है।  तो दोस्तों हमें भी कुछ मालूम नहीं है कि आगे क्या होगा, लेकिन गुरुदेव को सब पता है कि मेरे बच्चे को कहाँ ले जाना है। 

जय गुरुदेव 

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