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परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा लेख 7-आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको देखना ( contd)

9 जून  2021 का ज्ञान प्रसाद : “आत्मवत् सर्वभूतेषु – अपने समान सबको  देखना” (contd )

लेख नंबर 7 आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए इतनी प्रसन्नता हो रही है कि जिसे शब्दों में बयान करना सम्भव नहीं हैं।  लेख नंबर 6 ,7  और 8 (आने वाला )बहुत ही  ध्यान से  पढ़ने की  आवश्यकता है।  यह इसलिए  कि अगर आप जीवन की जटिल समस्यायों का समाधान  ढूंढ रहे हैं  तो पहले इस जगत के सभी जीव जंतुओं ,प्राणियों का दुःख अपना समझें ,उन्हें भी अपने समान समझें ,यहाँ तक कि वातावरण की   उसी प्रकार रक्षा करें जैसे हम अपनी चिंता करते हैं। इसी एक उदाहरण के साथ चलते  हैं  आज के लेख की ओर क्योंकि हमने परमपूज्य  गुरुदेव को सुनना है न की मुझे। 

विश्व-मानव की  पीड़ा  अपनी पीड़ा :

ये प्रश्न निरन्तर मन में उठते रहे । बुद्धिमानी, चतुरता, समझ- कुछ भी तो यहाँ कम नहीं है । लोग एक से एक बढ़कर कला-कौशल उपस्थित करते हैं और एक से एक बढ़कर चातुर्य-चमत्कार का परिचय देते हैं, पर इतना क्यों समझ नहीं पाते कि दुष्टता और निकृष्टता का पल्ला पकड़ कर वे जो पाने की आशा करते हैं, वह मृग-तृष्णा ही बनकर रह जाएगा, केवल पतन और सन्ताप ही हाथ लगेगा । मानवीय बुद्धिमत्ता में यदि एक कड़ी और जुड़ गई होती, समझदारी ने इतनाऔर निर्देश किया होता कि ईमान को साबित और सौजन्य को विकसित किए रहना मानवीय गौरव के अनुरूप और प्रगति के लिए आवश्यक है, तो इस संसार की स्थिति कुछ दूसरी ही होती है । फिर सब सुख शान्ति का जीवन जी रहे होते । किसी को किसी पर अविश्वास, सन्देह न करना पड़ता और किसी के द्वारा ठगा, सताया न जाता । तब यहाँ दुःख-दारिद्र्य का अतापता भी न मिलता, सर्वत्र सुख-शान्ति की सुरभि फैली अनुभव होती।

समझदार मनुष्य इतना नासमझ क्यों, जो पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख होता है, इतनी मोटी बात को भी मानने के लिए तैयार नहीं होता ।

इतिहास और अनुभव का प्रत्येक अंकन अपने गर्भ में यह छिपाये बैठा है कि अनीति अपनाकर स्वार्थ, संकीर्णता से आबद्ध रहकर हर किसी को पतन और संताप ही हाथ लगा है । उदात्त और निर्मल हुए बिना किसी ने भी शान्ति नहीं पाई है । सम्मान और उत्कर्ष की सिद्धि किसी को भी आदर्शवादी रीति-नीति अपनाये बिना नहीं मिली है । कुटिलता सात पर्दे भेद कर अपनी पोल आप खोलती रहती है, यह हम पग-पग पर देखते हैं, फिर भी न जाने क्यों यही सोचते रहते हैं कि हम संसार की आँखों में धूल झोंककर अपनी धूर्तता को छिपाये रहेंगे । कोई हमारी दुरभिसन्धियों की गन्ध न पा सकेगा और लुक-छिपकर आँख-मिचौनी का खेल सदा खेला जाता रहेगा । यह सोचने वाले लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि 

हजारों आँख से देखने, हजारों कानों से सुनने और हजारों पकड़ से पकड़ने वाला विश्वात्मा किसी की भी धूर्तता पर पर्दा नहीं पड़ा रहने देता । वस्तुस्थिति प्रकट होकर रहती है और दुष्टता छत पर चढ़कर अपनी कलई आप खोलती और अपनी दुरभिसन्धि आप बखानती है । 

यह सनातन सत्य और पुरातन तथ्य लोग समझ सके होते और अशुभ का अवलम्बन करने पर जो दुर्गति होती है, उसे अनुभव कर सके होते तो क्यों सन्मार्ग का राजपथ छोड़कर कांटे भरे  कुमार्ग पर भटकते? और क्यों रोते-बिलखते इस सुर दुर्लभ मानव-जीवन को सड़ी हुई लाश की तरह ढोते, घसीटते ?

दर्बुद्धि का कैसा जाल-जंजाल बिखरा पड़ा है और उसमें कितने निरीह प्राणी-करुण चीत्कार करते हुए फँसे जकड़े पड़े हैं, यह दयनीय दुर्दशा अपने लिए मर्मान्तक पीड़ा का कारण बन गई । आत्मवत् सर्वभूतेषु की साधना ने विश्व-मानव की इस पीड़ा को अपनी पीड़ा बना दिया, लगने लगा मानो अपने ही हाथ-पाँवों को कोई ऐंठ-मरोड़ और जला रहा हो ।

 “सबमें अपना आत्मा पिरोया हुआ है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए हैं”

 गीता का यह ज्ञान जहाँ तक पढ़ने-सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्त:करण में प्रवेश प्राप्त करे, तो स्थिति दूसरी ही हो जाती है । अपने अंग-अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित-बेचैन करता है, अपने स्त्री, पुत्रों की पीड़ा जैसे अपना चित्त विचलित करती है, ठीक वैसे ही आत्मविस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दु:ख अपना ही दु:ख है और व्यथित-पीड़ितों की वेदना अपने को ही नोंचती-कचोटती है ।

 जीवन के अंतिम  अध्याय  तक करुणा यथावत बनी  रही :

पीड़ित मानवता की, विश्वात्मा की, व्यक्ति और समाज की व्यथा-वेदना अपने भीतर उठने और बेचैन करने लगी । आँख, डाढ ( दांत ) और पेट के दर्द से बेचैन मनुष्य व्याकुल फिरता है कि किस प्रकार-किस उपाय से इस कष्ट से छुटकारा पाया जाए ? क्या किया जाए ? कहाँ जाया जाए? की हलचल मन में उठती है और जो सम्भव है उसे करने के लिए क्षण भर का विलम्ब न करने की आतुरता व्यग्र होती है । अपना मन भी ठीक ऐसा ही बना रहा । 

दुर्घटना में हाथ-पैर टूटे बच्चे को अस्पताल ले दौड़ने की आतुरता में माँ अपने बुखार-जुकाम को भूल जाती है और बच्चे को संकट में से बचाने के लिए बेचैन हो उठती है । लगभग अपनी मनोदशा ऐसी ही तब से लेकर अद्यावधि चली आई है। अपने सुख-साधन जुटाने की फुरसत किसे है ? विलासिता की सामग्री जहर-सी लगती है, विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आई तो आत्म-ग्लानि ने उस क्षुद्रता को धिक्कारा, जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती है । भूख से तड़प कर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर माता कैसे अपना भरा पेट और भरे ? दर्द से कराहते बालक से मुंह मोड़कर पिता कैसे ताश-शतरंज का साज सजाये? ऐसा कोई निष्ठुर ही कर सकता है । आत्मवत् सर्वभूतेषु की संवेदना जैसे ही प्रखर हुई, निष्ठुरता उसी में गल-जलकर नष्ट हो गई । जी में केवल करुणा ही शेष रह गई, वही अब तक जीवन के इस अन्तिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है । उसमें कमी रत्ती भर भी नहीं हुई वरन् दिन-दिन बढ़ोत्तरी ही होती गई।

सुना है कि आत्म-ज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं । अपने लिए ऐसा आत्म-ज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है । ऐसा आत्म-ज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं इसमें पूरा-पूरा सन्देह है । 

क्रमशः जारी : To be continued जय गुरुदेव 

कामना करते हैं कि आज प्रातः आँख खोलते ही सूर्य की पहली किरण आपको ऊर्जा प्रदान करे और आपका  आने वाला दिन सुखमय हो। धन्यवाद्

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