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कलाप ग्राम जहाँ काया न पहुँच पाए -परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा

कलाप उत्तराखंड के ऊपरी गढ़वाल क्षेत्र का एक गाँव है। 7,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित, यह गांव देवदार (चीढ़ ) के जंगलों के बीच बसा है। यह ऊंचाई लगभग हिमाचल प्रदेश स्थित शिमला जितनी है परन्तु शिमला जैसा विकास इस गांव में सोचना भी शायद कठिन हो, सुपिन नदी यहाँ की मुख्य नदी है जो टोंस नदी से होकर यमुना नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है। कलाप ग्राम उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 210 किमी और नई दिल्ली से 450 किमी दूर है। निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा देहरादून है। कलाप के लिए कोई भी डायरेक्ट बस सर्विस नहीं है। निकटतम शहर नेटवर तक पहुंचने में देहरादून से कार से 6 घंटे या बस से 10 घंटे लगते हैं। नेटवर से कलाप पहुँचने का केवल पैदल ही मार्ग है जिसमें लगभग 4 -5 घंटे लगते हैं और सीधी पहाड़ी चढाई है।
कलाप गांव और उसके आसपास के गांव महाभारत की पौराणिक कथाओं में डूबे हुए हैं। कलाप का मुख्य मंदिर कौरवों के साथ लड़ने वाले योद्धा कर्ण को समर्पित है। कर्ण की मूर्ति को इस क्षेत्र के विभिन्न गांवों के बीच लेकर जाया जाता है । जब मूर्ति को एक गांव से में ले जाया जाता है, तो इसे “कर्ण महाराज उत्सव” के रूप में मनाया जाता है। कलाप में पिछला उत्सव 2014 में था, और यह एक दशक से अधिक समय के बाद ही फिर से होगा
जनवरी में इस गाँव में हमेशा ही पांडव नृत्य होता है । इस नृत्य रूप में महाभारत की विभिन्न कहानियों का अभिनय किया जाता है।आपको जीने, खाने और पहनने के लिए जो कुछ भी चाहिए वह कलाप में बनाया जाता है। यह जीवन का एक अनूठा तरीका है, जो दूरस्थ स्थान की कठोरता से लगाया जाता है।

24 मई 2021 का ज्ञानप्रसाद- भारत का सबसे दूरस्थ( सबसे दूर ) गांव- कलाप
आज के लेख में हमने एक नवीन प्रयास किया है। इस लेख के साथ ही एक वीडियो लिंक दे रहे हैं जिसमें आप कलाप क्षेत्र की खूबसूरत फोटो देखेंगें। देखते हैं यह प्रयास कैसा रहता है।


हमारे पाठक हमारी निष्ठा से भली भांति परिचित हैं कि हम कोई भी कार्य अधूरा नहीं छोड़ते हैं। इस लेख को पूरा करने में हमें कितनी ही न्यूज़ रिपोर्ट्स पढ़नी पड़ी, वीडियो देखनी पड़ीं ,नक़्शे देखने पड़ें। इतने प्रयास के उपरांत भी हो सकता है कोई त्रुटि रह गयी हो ,हम क्षमा प्रार्थी हैं। ऐसे लेखों का चित्रण करना और अपने पाठकों के ह्रदय तक पहुंचना कोई आसान कार्य नहीं है। शायद वीडियो के द्वारा बताना अधिक लाभकारी हो ,अगर हमारे पाठकों का निर्देश /सुझाव रहा तो गुरुदेव के इस जीवन पर कुछ वीडियोस बनाने का प्रयास करेंगें।

परमपूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा :

गुरुदेव को तपोवन में नए गुरुभाई का सानिध्य प्राप्त हुआ। इन्ही प्रतिनिधि से मालूम हुआ था कि गुरुदेव इस बार कैलाश मानसरोवर ( तिब्बत ) के मार्ग में मिलेंगें गुरुदेव बहुत ही प्रसन्न हुए कि इस बार इन गुरुभाई से हिमालय के बारे में बहुत सी जानकारी मिलेगी। इन नए प्रतिनिधि ने भी कुछ अधिक बात नहीं की। गुरुदेव ने कहा अपने व्यक्तिगत के बारे में चाहे कुछ न बताएं परन्तु दादा गुरु की अनुभूति का तो कुछ बताएं। आप तो बहुत ही भाग्यशाली हैं कि आपको उनका सानिध्य प्रायःमिलता रहा है। मुझे तो दो -तीन दिन से अधिक कभी भी उनका सानिध्य प्राप्त नहीं हुआ। प्रतिनिधि ने गुरुदेव की बात का खंडन करते कहा- हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में साधना की अनुकूलता रहती है और यहाँ की दिव्यता सांसारिक मोह ,बंधन से दूर रहती है। उनका कहने का आशय था कि उनके लिए भी दादा गुरु का सानिध्य सुलभ नहीं रहा। हमारे गुरुदेव ने प्रतिनिधि ( सन्देशवाहक ) को कहा – आप गुरुदेव का सन्देश लेकर आए हैं और बहुत ही भाग्यशाली हैं। इस पर प्रतिनिधि कहने लगे :

” अगर यह बात है तो आप मुझसे और मेरे जैसे और हज़ारों शिष्यों की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं । आपको तो दादा गुरु ने लाखों, करोड़ों लोगों का संदेशवाहक चुना है “

चलते चलते सुमेरु पर्वत की सीमा पार हो गयी। सुमेरु पर्वत गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र उत्तराखंड में स्थित है। चौखंबा शिखर सामने दिखाई दे रहा था। चौखंबा का अर्थ चार पर्वत शिखर ,सच में ही है। आप भी गूगल में सर्च करके देख सकते हैं । हिमालय क्षेत्र में पर्वतों के शिखर ,सरोवर ,झरने इत्यादि की भरमार है। चौखंबा शिखर के पास से गुज़रते हुए कुछ झोंपड़िया दिखाई दीं। संदेशवाहक ने झोंपड़ियां देख कर कहा – सैंकड़ों वर्ष पूर्व यहाँ एक बहुत बड़ा गांव था। इस गांव का नाम “कलाप” है। इस गांव की सीमा एक तरफ हिमाचल प्रदेश से ,दूसरी तरफ उत्तराखंड से और तीसरी तरफ तिब्बत से मिलती है। यह गांव प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ महाभारत की जन्मस्थली है , इसी गांव में कौरव और पांडव समय व्यतीत कर चुके हैं। ध्रतराष्ट्र ने यहाँ आकर उग्र तप किया। यहाँ के निवासियों से इस तरह की कथाएं अक्सर सुनने को मिलती हैं। द्वापर युग केअंत में जब आसुरी संकट बढ़ने लगा तो सत्ता की होड़ में निति ,अनीति ,पुण्य, पाप ,धर्म ,अधर्म का भेदभाव भुलाया जाने लगा। स्वार्थ और आपाधापी ने मनुष्य को नरपिशाच बना दिया तो कलाप ग्राम में मुनियों का एक सत्र आयोजित हुआ। उस सत्र में नारद ,व्यास ,गौतम ,जमदग्नि आदि ने गहन विचार किया। ईश्वरीय चेतना को हस्तक्षेप करने और सृष्टि का संरक्षण ,पोषण करने वाली दिव्य चेतना को स्थूल रूप में व्यक्त होने के लिए बाधित किया गया।

आज कल तो इस गांव में केवल 500 लोग ही रहते हैं। विकास न होने के कारण और यहाँ पर कोई approach road न होने के कारण आज इस गांव को Forgotten Himalayan remote scenic village की संज्ञा दे दी है । हमारा दुर्भाग्य है कि इतने प्रसिद्ध ऐतिहासिक गांव को इस प्रकार की संज्ञा दे दी गयी है। अविकसितता का उदाहरण तो तब देखने में आया जब हम ऑनलाइन इस प्रदेश की रिसर्च कर रहे थे तो पाया कि सुपिन नदी के ऊपर लकड़ी का पुल टूट गया था और और निवासी इतने वेगपूर्ण नदी से अपनी जान को जोखिम में डाल कर पास की बस्तियों में आ जा रहे थे। 38 वर्षीय बंगलुरु निवासी फोटो जर्नलिस्ट आनंद संकर की 2013 में आरम्भ हुई कलाप ट्रस्ट नामक समाजिक आर्गेनाईजेशन ने इस गांव के विकास बारे में कुछ कार्य किया है। आप इस संस्था के बारे में इस वीडियो में देख से सकते हैं।

कलाप ग्राम जहाँ काया न पहुँच पाए :

प्रतिनिधि के साथ जब गुरुदेव ने इस गांव में प्रवेश किया तो तीव्र प्रकाश की अनुभूति हुई। चाहे यह दिन का समय था और सूर्य का प्रकाश पूरी तरह से आभायुक्त लेकिन उसके इलावा कुछ और ही अलौकिक आभास हुआ। ऐसे लग रहा था किसी स्वर्णनगरी में प्रवेश किया हो। गुलाब के फूलों की भीनी -भीनी सुगंध व्याप्त थी। लगता था जैसे किसी उद्यान में आ गए हों। उपवननुमा इस बस्ती में कहीं-कहीं हवन कुंड भी बने हुए थे। कुछ सन्यासियों को एक जगह बैठे देख कर गुरुदेव और संदेशवाहक रुके। उनमें से सबसे बुज़ुर्ग सन्यासी ने हाथ उठा कर गुरुदेव को आशीर्वाद दिया। उनका नाम सत्यानंद बताते हैं। वह कहने लगे- मैं पिछले 60 वर्ष से इधर ही रह रहा हूँ। महायोगी त्र्यम्बकं बाबा ने मुझे दीक्षI दी और साधना मार्ग की शेष यात्रा इधर ही पूरी करने के लिए कहा। तब से कलाप गांव छोड़ कर कहीं जाना ही नहीं हुआ। अपनी बात बीच में छोड़ कर सत्यानंद जी ने गुरुदेव से पूछा – आपने भागवत में कलाप गांव का उल्लेख तो पढ़ा ही होगा। गुरुदेव ने सिर हिला कर हाँ कहा। सत्यानंद जी फिर कहने लगे – इस प्रदेश में नारद जी आदि ऋषियों के आने का और सृष्टि के बारे में विचार करने का उल्लेख आता है। पृथ्वी पर जब भी कोई संकट आता है यां बड़े परिवर्तन आते हैं तो सिद्ध संत मिल कर बैठते हैं और सूक्ष्म जगत में संतुलन लाने पर विचार करते हैं। इस विचार शैली को को आज कल की भाषा में अगर “ऋषियों की पार्लियामेंट” कहें तो गलत नहीं होगा। सत्यानंद जी ने कहा -यह कोई अकेला स्थान नहीं है। ज्ञानगंज ,सिद्धाश्रम जैसे और भी कई केंद्र हैं। जिस प्रकार का आभास गुरुदेव को कलाप गांव में हुआ एक सिद्ध आत्मा को ही हो सकता है। और इस तरह के बाकि के सिद्ध क्षेत्रों में भी केवल सिद्धि प्राप्त किये साधक ही प्रवेश कर सकते हैं। YouTube पर इस संदर्भ में वीडियोस तो उपलब्ध हैं लेकिन उनकी प्रमाणिकता के बारे में कोई भी निर्णय हम अपने पाठकों पर ही छोड़ने की आज्ञा लेते हैं। यह हम इस लिए कह रहे हैं यह आभास व्यक्तिगत होते हैं। किसी एक को कुछ आभास हो सकता है किसी दूसरे को नहीं।

गायत्री माँ द्वारा सत्यानंद जी का मृत्यु योग टला :

सत्यानंद जी को बचपन से ही धुन सवार थी कि जीवन को परमसत्य की खोज में ही व्यतीत करना है। 13 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत हुआ ,तभी से नियमित रूप से गायत्री जप और पूजा पाठ में लग गए। यज्ञोपवीत संस्कार के डेढ़ वर्ष उपरांत उन्हें मलेरिआ बुखार आया , उन दिनों मलेरिआ का इलाज न होने कारण दशा इतनी बिगड़ गयी कि डॉक्टर ने बचने की आशा ही छोड़ दी। कह दिया कि रोगी जो चाहे खाने को दे दो ,जो उसकी इच्छा है उसे पूरा होने दो। परहेज़ और इलाज से कोई लाभ नहीं। घर के सभी लोग रोने लगे ,पीटने लगे। सत्यानंद अर्धचेतन अवस्था में थे। वे अपने जीवन से निराश हो गए थे। सिरहाने बैठी माँ भगवतगीता का पाठ सुनाने लगी। उस अवस्था में सत्यानंद जी ने अनुभव किया कि एक कन्या सिरहाने बैठी है और कह रही है आप चिंता न करें आपका मृत्यु योग टल गया है। कन्या सत्यानंद जी के सिर पर हाथ फेरती जा रही थी और थोड़ी देर बाद ही बुखार उतरना आरम्भ हो गया। घर वालों के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। डॉक्टर ने देखा तो उसकी भी आश्चर्य की सीमा न रही। सत्यानंद जी को बाद में बोध हुआ कि उनके सिर पर हाथ फेरने वाली कन्या कोई और नहीं बल्कि स्वयं वेदमाता गायत्री थीं। उसके उपरांत सत्यानंद जी ने पढ़ाई छोड़ दी और वैराग्य जागने के कारण हिमालय की ओर निकल गए। उनके गुरु त्र्यम्बकं बाबा ने कलाप ग्राम में ही दर्शन दिए और इधर ही साधना करने का निर्देश दिया।
हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगें कि यह बातें जो आज 2020 में कर रहे हैं लगभग 120 वर्ष पुरानी हैं क्योंकि सत्यानंद जी 60 वर्ष से कलाप ग्राम में थे ओर गुरुदेव को यह वर्णन 1958 में कर रहे थे। हमने इन तथ्यों की और सत्यानंद जी के बारे में ऑनलाइन रिसर्च की लेकिन कुछ भी प्राप्त न हुआ। इसी नाम के और कई entries appear हुईं लेकिन उनका इस लेख के साथ कोई भी सम्बन्ध न दिखा।
जय गुरुदेव
सूर्य भगवान की प्रथम किरण आपके आज के दिन में नया सवेरा ,नई ऊर्जा और नई उमंग लेकर आए। जय गुरुदेव परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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