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गायत्री महामंत्र की शक्ति पर लेखों की श्रृंखला – पार्ट -1

2 जनवरी 2021 का ज्ञान प्रसाद 

गायत्री मंत्र और प्राणशक्ति – पार्ट 1

31 दिसंबर 2020 के अपडेट में हमने ऑनलाइन ज्ञानरथ के  सहकर्मियों से गायत्री मंत्र पर आधारित कुछ लेख लिखने की बात की थी।  इस अपडेट पर बहुत से परिजनों से कमेंट भी आए  और बहुतों ने इन लेखों में अपनी उत्सुकता भी व्यक्त की।  यह लेख इतने विस्तृत और जानकारी से भरपूर हैं कि  इनमें से ज्ञानरथ के लिए सरल भाषा में ,संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना एक बड़ा ही challenging  कार्य है  और हमें challenge  बहुत ही पसंद है।  तो प्रस्तुत है इसी शृंखला का प्रथम लेख :

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गायत्री मंत्र के शब्दार्थ में से प्रकट है कि यह मनुष्य में सन्निहितअंदर पहले से मौजूद  प्राण तत्व का अभिवर्धन ( बढ़ाना ),  करने की विद्या है। ‘गय’ अर्थात प्राण। ‘त्री’ अर्थात त्राण करने वाली, जो प्राणों का  परित्राण ( बचाव ), उद्धार, संरक्षण करे वही है  गायत्री मन्त्र । मंत्र शब्द का अर्थ है – मनन, विज्ञान, विद्या। मन्त्रों से अक्सर हमें विद्या की, ज्ञान की एवं सोचने की शक्ति मिलती है तो अगर हम गायत्री मन्त्र को विद्या कह दें तो शायद गलत न हो    

गायत्री मंत्र का अर्थ है  “ प्राणों का परित्राण करने की विद्या।”     

अब सोचने वाला प्रश्न है कि  प्राणों का बचाव कैसे होगा , प्राणों  का अभिवर्धन कैसे होगा।  क्या कभी ऐसा हो सकता है कि  हम प्रतिदिन कुछ  एक माला गायत्री मन्त्र की फेर लें तो हमारे प्राणों का बढ़ावा हो जायेगा ,हम अधिक प्राणवान हो जायेंगें ,हम अधिक शक्तिशाली ,बुद्धिमान ,सूझवान इत्यादि ,इत्यादि हो जायेंगें।  शायद  ऐसा हो सकता हो पर इतना सरल नहीं है। 

यहाँ पर जिस प्राण की यां  प्राणशक्ति ( Life -force  Energy ) की बात कर रहे हैं असल में हमारी जान ही है।  इसीलिए  हम कहते हैं कि यह भाई साहिब बहुत ही प्राणवान  हैं , जानदार हैं।  लगातार कार्य करते रहते हैं ,कभी थकने का नाम तक नहीं लेते। और जब यह प्राण शक्ति कम हो जाती है हम बीमार हो जाते हैं ,आलस्य आ जाता है और अंत में मृत्यु हो जाती है।  तब हम कहते हैं इन  बेचारे भाई साहिब के प्राण पखेरू उड़ गए यां इन भाई साहिब की जान निकल गयी। प्राण-शक्ति की न्यूनता होने पर प्राणी समुचित पराक्रम कर सकने में असमर्थ रहता है और उसे अधूरी मंजिल में ही निराश एवं असफल हो जाना पड़ता है।  चाहे भौतिक क्षेत्र  हो यां  आध्यात्मिक – दोनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट सफलता के लिए आवश्यक सामर्थ्य की जरूरत पड़ती है। इसके बिना प्रयोजन को पूर्ण कर सकना, लक्ष्य को प्राप्त कर सकना असंभव है। इसलिये कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए आवश्यक साधन जुटाना आवश्यक होता है।  भौतिक उपकरणों की अपेक्षा व्यक्तित्व की प्रखरता एवं ओजस्विता ( उज्जवलता ) कहीं अधिक आवश्यक है। साधनों का उपयोग करने के लिये भी  तो शौर्य, साहस और संतुलन चाहिये। बढ़िया बन्दूक हाथ में हो पर मन में  घबराहट भरी रहे तो वह बेचारी बन्दूक क्या करेगी? चलेगी ही नहीं, चल भी गई तो निशाना ठीक नहीं लगेगा, दुश्मन सहज ही उससे इस बन्दूक को छीन कर उल्टा आक्रमण कर बैठेगा। इसके विपरीत साहसी लोग छत पर पड़ी ईंटों से और लाठियों से डाकुओं का मुकाबला कर लेते हैं। “ साहस वालों की ईश्वर सहायता करते  हैं”  यह उक्ति निरर्थक नहीं है। इसीलिए  तो कहा  गया है – 

“God  helps  those  who  help  themselves”  

सच तो यही है कि समस्त सफलताओं के मूल में प्राण शक्ति ही साहस, जीवट, दृढ़ता, लगन, तत्परता की प्रमुख भूमिका सम्पादन करती है और यह सभी विभूतियाँ प्राण-शक्ति सहचारी हैं। प्राण ही वह तेज है जो दीपक के तेल की तरह मनुष्य के नेत्रों में, वाणी में, गतिविधियों में, भाव-भंगिमाओं में, बुद्धि में, विचारों में प्रकाश बन कर चमकता है। क्या कोई दीपक तेल के बिना जल सकता है और उससे भी बढ़कर जब तक दीपक में तेल है तब तक वह  जलेगा। तेल  समाप्त होते ही दीपक बुझ जाता है।  इसी प्रकार जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक जीवन गतिशील है। मानव जीवन की वास्तविक शक्ति यही है। इस एक ही विशेषता के होने पर अन्यान्य अनुकूलताएं तथा सुविधाएं स्वयमेव उत्पन्न, एकत्रित एवं आकर्षित होती चली जाती हैं। जिसके पास यह विभूति नहीं उस दुर्बल व्यक्तित्व वाले की संपत्तियों को दूसरे बलवान लोग अपहरण कर ले जाते हैं। घोड़ा अनाड़ी सवार को पटक देता है। कमजोर की संपदा-जर, जोरू, जमीन दूसरे के अधिकार में चली जाती है।

जिसमें संरक्षण की सामर्थ्य नहीं वह उपार्जित सम्पदाओं को भी अपने पास बनाये नहीं रख सकता।

विभूतियाँ दुर्बल के पास नहीं रहतीं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विचारशील लोगों को अपनी समर्थता- प्राण शक्ति बनाये रखने तथा बढ़ाने के लिए भौतिक (Physical ) एवं आध्यात्मिक( spiritual ) प्रयत्न करने पड़ते हैं। भौतिक प्रयत्नों में अच्छा पौष्टिक भोजन खाना ,व्यायाम करना, अच्छी नींद लेना इत्यादि हैं। आध्यात्मिक प्रयत्नों में प्राण शक्ति के अभिवर्धन की सर्वोच्च प्रक्रिया “गायत्री उपासना” को माना गया है। उसका नामकरण इसी आधार पर हुआ है।

  1. शरीर में प्राण शक्ति ही निरोगता, दीर्घ-जीवन, पुष्टि एवं लावण्य के रूप में चमकती है। 
  2. मन में वही बद्धिमता, मेधा, प्रज्ञा के रूप में प्रतिष्ठित रहती है। 
  3. शौर्य, साहस, निष्ठा, दृढ़ता, लगन, संयम, सहृदयता, सज्जनता, दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता के रूप में उस प्राण शक्ति की ही स्थिति आँकी जाती है। 
  4. व्यक्तित्व की समग्र तेजस्विता का आधार यह प्राण ही हैं।    

शास्त्रकारों ने प्राण  की महिमा को मुक्त कण्ठ ( बेधडक़ ) से गाया है और मानव  को  इस  प्राणशक्ति का  परिचय कराते हुए बताया है कि वे इस शक्ति-स्रोत को कभी भी न भूले। आखिर मानव है तो उस परमपिता का ही अंश ,उसी की  सर्वोत्तम रचना।  रचनाकर ने उसी को यह अभूतपूर्ण कार्य सौंपा है।  कौन सा कार्य ?  इस प्राणशक्ति के  भाण्डागार ( warehouse or Godown )   के संरक्षण का कार्य।  मानव को  यह तथ्य  ध्यान में रखने के लिए कहा गया है कि  यदि जीवन लक्ष्य में सफलता प्राप्त करनी हो तो इस तत्व ( प्राण ) को उपार्जित, विकसित करने का प्रयत्न करें। प्राणवान बनें और अपनी विभिन्न शक्तियों में प्रखरता उत्पन्न होने के कारण पग-पग पर अदभुत सफलतायें- सिद्धियाँ मिलने का चमत्कार देखें।

जिस  प्राणशक्ति की हम बात कर रहे हैं केवल physical  strength ही न समझी जाये।  इसमें विवेक का बहुत बड़ा योगदान है अगर physical  strength  ही  प्राणशक्ति का मापदंड है तो मानव से अधिक  शक्तिशाली कितने ही और प्राणी हैं। लेकिन केवल मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसने  evolution की कार्यप्रणाली से ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति की संज्ञा प्राप्त की है।   

प्राण की कमी  ही समस्त विपत्तियों का, अभावों और शोक-संतापों का कारण है। दुर्बल पर हर दिशा से आक्रमण होता है। भाग्य भी उसका साथ नहीं देता और मृत-लाश पर जैसे चील- कौए दौड़ पड़ते हैं वैसे ही दुर्बल मनुष्य पर विपत्तियाँ टूट पड़ती हैं। इसलिये हर बुद्धिमान को प्राण का आश्रय लेना ही चाहिये।  

केवल  व्यक्ति का व्यक्तित्व ही नहीं, इस सृष्टि का कण-कण इस प्राण शक्ति की ज्योति से ज्योतिर्मय हो रहा है। जहाँ जितना जीवन है, प्रकाश है, उत्साह है, आनन्द है, सौंदर्य है, वहाँ उतनी ही प्राण की मात्रा विद्यमान समझनी चाहिये। उत्पादन शक्ति और किसी में नहीं केवल प्राण में ही है। जो भी प्रादुर्भाव, सृजन, आविष्कार, निर्माण, विकास-क्रम चल रहा है, उसके मूल में यही परब्रह्म की परम चेतना काम करती है। जड़ पंचतत्वों (भूमि, गगन, वायु, अग्नि, जल)  के चैतन्य की तरह सक्रिय रहने का आधार यह प्राण ही है। परमाणु उसी से सामर्थ्य ग्रहण करते हैं और उसी की प्रेरणा से अपनी धुरी तथा कक्षा में भ्रमण करते हैं। विश्व ब्रह्मांड के समस्त ग्रह, नक्षत्रों की गतिविधियाँ इसी प्रेरणा शक्ति से प्रेरित हैं।यह विश्वव्यापी प्राण शक्ति जहाँ जितनी अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती है, वहाँ उतनी ही सजीवता ( तेज़ी,फुर्ती)  दिखाई देने लगती है। मनुष्य में इस प्राण तत्व का बाहुल्य ही उसे अन्य प्राणियों से अधिक विचारवान, बुद्धिमान, गुणवान, सामर्थ्यवान एवं सुसभ्य बना सका है। अगर इस महान शक्ति-पुञ्ज का  उपयोग  केवल भौतिक उपयोग करने तक ही सीमित रह जाय तो केवल शरीरिक  यात्रा ही संभव हो सकती है और अधिकाँश मानव पशुओं की तरह केवल सामान्य जीवन  ही जी सकते हैं। पर यदि उसे अध्यात्म विज्ञान ( Scientific  spirituality ) के माध्यम से अधिक मात्रा में बढ़ाया जा सके तो गई-गुजरी स्थिति से ऊंचे उठ कर उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना संभव हो सकता है।  

Scientific  spirituality आज के युग का बहुत ही common  टॉपिक है। आज के प्रतक्ष्यवाद युग में किसी भी कार्यप्रणाली पर विश्वास करने के लिए तथ्य देने  के बावजूद प्रतक्ष्य प्रमाण अत्यंत आवश्यक है।   Everyone needs a proof for everything  

स्वर्ग और नर्क की परिभाषा :

 गई-गुजरी आध्यात्मिक एवं भौतिक परिस्थितियों में पड़े रहना, मानव-जीवन में मिल सकने वाले आनंद- उल्लास से वंचित रहना, मनोविकारों और उनकी दुखद प्रतिक्रियाओं से विविध विधि कष्ट-क्लेश सहते रहना – यही तो नरक है। देखा जाता है कि इस धरती पर रहने वाले अधिकाँश मानव  नरक की यातनाएं सहते हुए ही समय बिताते हैं। आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण सभी महत्वपूर्ण सफलताओं से वंचित रहते हैं। हो सकता है ऐसे लोगों में धन -वैभव की कोई भी कमी न हो, समाज में  उच्च प्रतिष्ठा हो लेकिन अंतःकरण की दुर्बलता और अशांति से ग्रस्त ऐसा मानव कितना सुखी है हम सब भली प्रकार जानते हैं। कितने प्रतिशत मानव यह कहने में समर्थ हैं कि “ हम स्वर्ग के वासी हैं”

इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्राण- तत्व का सम्पादन करना आवश्यक है। सम्पादन कोें इंग्लिश में एडिटिंग कहते हैं I जैसे किसी पुस्तक की एडिटिंग।  लेकिन यहाँ हम प्राण-तत्व की एडिटिंग कर हैं। प्राण को ठीक- ठाक  करके ,अच्छी प्रकार प्रस्तुत करना।  Books or articles are edited before presentation ,just as we edit our lekhs many times before presenting before you .

 क्या है यह प्राणशक्ति और गायत्री मन्त्र से कैसे इस प्राण शक्ति का अभिसिंचन होता है , आइये देखें। एक बार फिर हम इस महामंत्र का हिंदी अनुवाद देखें :  

उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे। अर्थात् ‘सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के प्रसिद्ध  तेज का (हम) ध्यान करते हैं, वे परमात्मा हमारी बुद्धि को (सत् की ओर) प्रेरित करें।

उस प्राणस्वरूप ,देवस्वरूप परमात्मा को अपने अंतःकरण में धारण करें  जो हमारी बुद्धि  को सन्मार्ग में प्रेरित करे 

परमात्मा को प्राणस्वरूप कहा  गया है।  सच में यह परमात्मा ही है जो  हमारे  अंतःकरण में विराजमान हैं और हमें शक्ति ,प्राणशक्ति प्रदान कर रहे हैं।  उसी शक्ति से हमारे शरीर की सब क्रियाएं चल रही हैं।  खाना ,पीना, सोना ,जागना ,चलना ,भागना ,पढ़ना ,लिखना ,सोचना ,समझना इत्यादि इत्यादि।  कोई भी ऐसी क्रिया नहीं जो इस प्राणशक्ति के बिना चल सकती है।  यह कोई अंधविश्वास नहीं है  गूढ़ विज्ञान है।  अगर हम अपने शरीर को ब्रह्माण्ड  का ही जीता जगता स्वरूप समझें तो शायद गलत न हो क्योंकि जिस प्रकार  ब्रह्माण्ड  अनंत है इसी प्रकार हमारा  

शरीर भी अनंत है।  अनंत का अर्थ है जिसका कोई अंत न हो।  अगर मोटे  तौर पर हम ब्रह्माण्ड को समझना चाहें तो ऐसा कह सकते हैं  हमारे आस पास जो कुछ भी है  ब्रह्माण्ड है और हमारी उपस्थिति इस अनंत अथाह सागर में एक छोटे से कण से भी कम है। इस अथाह सागर में डूब कर ,उस परमपिता परमात्मा   के साथ एकरूप होने की प्रक्रिया को  प्राण -प्रक्रिया  का नाम दिया गया है। यह प्राण शक्ति के अभिसिंचन की प्रथम सीढ़ी है। इसके बाद ध्यान, प्राणायाम आदि  बाकि की कठिन  साधनायें आती हैं। 

To  be  continued ,  क्रमशः जारी 

परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी के श्री चरणों में समर्पित

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