वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

100 वर्षीय पुरातन “अखंड दीप” विवेक की आँख खोलने के लिए स्थापित किया गया था। 

अखंड दीप के प्राकट्य के 100 वर्ष को समर्पित तृतीय ज्ञानप्रसाद लेख 

लगभग 2400 शब्दों का,कल प्रकाशित हुआ ज्ञानप्रसाद लेख “दीपक के प्रकाश” से सम्बंधित था जिसमें प्रकाश का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण किया गया था। इस लेख के प्रकाशन के पीछे मुख्य उद्देश्य था कि पूजास्थली में रोज़ाना प्रज्वलित किये जाने वाले  नन्हें से दीपक में ऐसी क्या विशेषता है जो मनुष्य की विवेक की आँख खोलने की समर्था लिए हुए है। भांति-भांति के उदाहरणों का प्रयोग करके समझने का प्रयास किया गया था कि  क्या दादागुरु ने हमारे पूज्यश्री को केवल इतनी ही ड्यूटी दी थी कि तुम्हें इस दीपक को 24 वर्ष के लिए अनवरत जलाये रखना है,प्रतिदिन इस दीप में गौघृत डालना है ? क्या 15 वर्षीय बालक श्रीराम ने सोचा था कि  यह तो बहुत ही सरल कार्य? नहीं बिलकुल नहीं !!! उस बालक ने अखंड दीप के प्रकाश से विवेक की  आँख खोलकर समस्त विश्व को दिखा दिया कि समाज में पनप रही बलात्कार की घटनाएं, दूसरों का धन हथियाने, दूसरों की सम्पत्ति पर कब्ज़ा,देशों पर कब्ज़ा करने,ऊंचनीच की भावना से ऊपर उठकर, सभी को एक समान समझने की प्रवृति से व्यक्ति निर्माण,समाज निर्माण, युग निर्माण कैसे संभव हो सकता है। 

आज के लेख में दी गयी शिक्षा से यदि हमारी भी विवेक की आँख खुल पाती है,पाठकों की पूजास्थली के दीपक का प्रकाश अज्ञानता के धुंधलेपन को दूर कर सकता है तो सही अर्थों में दीप प्रज्वलन सार्थक होगा नहीं तो कोरी  औपचारकता ही रहेगी। 

आइए ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के गुरुकुल की गुरुकक्षा में, गुरुचरणों में संकल्पित होकर आज के गुरुज्ञान का अमृतपान करें,अपने जीवन को सफल बनायें, वर्षों से जमे दुर्गुणों को निर्मल अमृत से धो डालें। 

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मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः एक संस्कृत श्लोक है। इस श्लोक को अलग अलग भागों में देखें तो निम्नलिखित व्याख्या सामने आती है:

“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः” के Word meaning की ओर  जाएँ तो भारतीय फिलॉसॉफी, खासकर हिंदू धर्म में,समानता, सहानुभूति और प्रेम का एक महत्वपूर्ण संदेश है।  हर जीवित प्राणी, चाहे वह मनुष्य हो या कोई अन्य जीव,आत्मिक रूप से समान है और उसके साथ उसी सम्मान और सहानुभूति के साथ व्यवहार किया जाना चाहिए जैसे कि कोई अपनेआप से करता है।

गुरुदेव बता रहे  हैं:

साधना के पहले दो चरण “मातृवत् परदारेषु” और “परद्रव्येषु लोष्ठवत्”,समझते हुए उनके पालन करने का संकल्प लेने के साथ  

तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की किरणें फूट पड़ी।  “मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत्” की साधना अपने काय कलेवर तक ही सीमित न थी। दो आंखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख ने खोलकर उसे डरा कर भगा दिया। शरीर पर कड़े प्रतिबंध लगा दिये। जिन परिस्थितियों के बनने की आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी तो “दुष्ट व्यवहार” असंभव हो गया। मातृवत् परदारेषु की साधना बिना किसी अड़चन से ही हो गई। शरीर ने सदा हमारा साथ दिया। मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर गलत हरकतों से बाज आ गया। बाद में  तो वही मन अपना पूरा मित्र और सहयोगी बन गया। 

स्वेच्छा से गरीबी वरण कर लेने, आवश्यकताएं घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले जाने और संग्रह की भावना छोड़ने से “परद्रव्य (किसी दूसरे की वस्तु)” का आकर्षण ही चला गया। जिस किसी को भी बाँटने और देने का चस्का लग जाता है, जो उस अनुभूति का आनन्द लेने लगता है उसके लिए  संग्रह कर पाना असंभव हो जाता है। फिर तो एक ही भावना उभर कर सामने आती है: परद्रव्य का पाप किस प्रयोजन के लिए कमाया जाय? गरीबी का, सादगी का,अपरिग्रही ब्राह्मण जैसा जीवन अपने भीतर एक असाधारण आनन्द, संतोष और उल्लास भरा बैठा है, इसकी अनुभूति यदि लोगों को हो सकी होती तो शायद ही किसी का मन परद्रव्य की पाप पोटली सिर पर लादने को करता। 

गुरुदेव बताते हैं कि  हमारे लिए तो यह दिव्य अनुभूतियों का भण्डार अनायास ही हाथ लग गया। हमारे अंतःकरण में इस प्रवृति के आते ही अगला कदम बढ़ाने की मंजिल आती है। इसी अगली मंजिल को “आत्मवत् सर्वभूतेषु” अर्थात सभी को अपने समान देखना कहा गया है।

कहने और सुनने में यह शब्द मामूली से लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार,सदव्यवहार  की सीमा तक पहुँच कर बात पूरी हो गई दिखती है लेकिन इस फिलॉसॉफी  की सीमा अति विस्तृत है। उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्म सत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का यही मूर्त रूप है कि हम हर किसी प्राणी को अपना माने। अपने को दूसरों में और दूसरों को अपने में पिरोया हुआ, घुला हुआ अनुभव करें।

ऐसा मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रहता, स्वार्थी की परिधि में बंधे रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दुःख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते हैं मानो यह सब अपने नितान्त व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए किए जा रहे हों क्योंकि सभी अपने ही तो हैं। 

संसार में अनगणित  व्यक्ति पुण्यात्मा और सुखी है, सन्मार्ग पर चलते हुए और मानव जीवन को धन्य बनाते हुए अपना पराया कल्याण करते हैं। 

गुरुदेव बता रहे हैं कि यह देख सोचकर हमारे मन  को बड़ी साँत्वना होती है और लगता है सचमुच “यह दुनिया ईश्वर ने पवित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाई है।” यहाँ पुण्य और ज्ञान मौजूद है जिनका सहारा लेकर कोई भी आनन्द, उल्लास, शान्ति और सन्तोष की दिव्य उपलब्धियाँ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकता है। इस संसार में पुण्यात्मा, परोपकारी और आत्मावलम्बी व्यक्तियों का अभाव नहीं है। वे संख्या में कम भले ही हों लेकिन अपना प्रकाश तो अनवरत फैलाते ही हैं। 

इसी संदर्भ में हम अपने ज्ञानरथ परिवार के प्रति गर्व महसूस कर सकते हैं। गणना के हिसाब से देखें तो सभी सोशल मीडिया साइट्स पर लगभग एक लाख लोग हमसे जुड़े हुए है लेकिन निष्ठवान, नियमित, श्रद्धावान,निष्कामी,निस्वार्थी कुछ एक ही हैं, उँगलियों पर आसानी से गिने जा सकते है। ऐसे ही साथी रोज़ाना आँख खुलते ही ज्ञान के इस रथ को धक्का लगाना शुरू हो जाते हैं।     

गुरुदेव कहते हैं: धरती वीर-विहीन नहीं है। यहाँ नर-नारायण का अस्तित्व विद्यमान है । परमात्मा कितना महान्, उदार और दिव्य हो सकता है इसका परिचय उसके जैसी आत्माओं में देखा जा सकता  है जिन्होंने श्रेयपथ के संकल्प को अपने अंतर्मन में उतारा है और कांटों को तलुवों से रौंदते हुए लक्ष्य की ओर शान्ति, श्रद्धा एवं हिम्मत के साथ कदम बढ़ाए हैं। 

मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाले इन महामानवों का अस्तित्व ही समस्त जगत को इस योग्य बनाये हुए  है कि भगवान बार-बार नर तन धारण करके अवतार लेने के लिए ललचाये हैं। गुरुदेव कहते हैं कि आदर्शों की दुनिया में विचरण करने वाले और उत्कृष्टता की गतिविधियों को अवलम्बन बनाने वाले यह महामानव बाहिर  से अभावग्रस्त दिखते हुए भी अन्तरंग में कितने समृद्ध और सुखी रहते हैं यह देखकर हमारा चित्त भी पुलकित होने लगा। ऐसे महानुभावों की शान्ति हमारे अन्तःकरण को छूने लगी। 

गुरुदेव महाभारत की उस  कथा का रेफेरन्स देते हुए हमें समझाते हैं  जिसमें पुण्यात्मा युधिष्ठिर के कुछ समय के लिए नरक जाने पर वहाँ रहने वाले प्राणी आनन्द  विभोर हो गये थे। हमें अनुभव होता रहा कि जिन पुण्यात्माओं की स्मृति मात्र से अपने को संतोष और प्रकाश मिला वे स्वयं न जाने कितनी दिव्य अनुभूतियों का अनुभव करते होगे।

इस कुरूप दुनिया में जो कुछ सौंदर्य है वह इन पुण्यात्माओं का ही अनुदान है। असीम अस्थिरता से निरन्तर प्रेत पिशाचों जैसा हाहाकारी नृत्य करने वाले अणु परमाणुओं से बनी-भरी इस दुनिया में जो स्थिरता व शक्ति है वह इन पुण्यात्माओं द्वारा उत्पन्न की गई है। प्रलोभनों और आकर्षणों के जंजाल के बंधन काटकर जिन्होंने सृष्टि को सुरभित और शोभामय बनाने की ठान ली उनकी श्रद्धा ही इस धरती को धन्य बनाती रही है। जिनके पुण्य प्रयास लोकमंगल के लिए निरन्तर गतिशील रहे।  इच्छा होती रही इन नर-नारायणों के दर्शन और स्मरण करके पुण्यफल पाया जाय। जिन्होंने आत्मा को परमात्मा बना लिया, उन पुरुष पुरुषोतमों  में प्रत्यक्ष परमेश्वर की झाँकी करके लगता रहा, अभी भी ईश्वर साकार रूप में इस पृथ्वी पर निवास करते विचरते दिखते पड़ते हैं। इन पुण्यात्माओं का सान्निध्य प्राप्त करने में स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि सबसे अधिक आनन्द पाया जा सकता है। इस सच्चाई के अनुभवों ने कठिनाइयों से भरे जीवनक्रम के बीच इसी विश्व सौंदर्य का स्मरण कर उल्लसित रहा जा सका।

आत्मवत् सर्वभूतेषु की यह सुखोपलब्धि एकाँगी न रही, उसका दूसरा पक्ष भी सामने अड़ा खड़ा रहा। संसार में दुःख कम नहीं। कष्ट और क्लेश, शोक और सन्ताप,अभाव और दारिद्रय से अगणित व्यक्ति नारकीय यातनाएं भोग रहे हैं। समस्याएँ, चिंतायें और उलझने लोगों को खायी जा रही है। अन्याय और शोषण के कुचक्र में असंख्यों को बेतरह पिसना पड़ रहा है। दुर्बुद्धि ने सर्वत्र नारकीय वातावरण बना रखा है। अपराधों और पापों के दावानल में झुलसते, बिलखते, चीत्कार करते लोगों की नारकीय यातनाएं ऐसी हैं जिन्हें वह सब सहना पड़ता है उनका क्या कहा जाए। सुख, सुविधाओं की साधन सामग्री इस संसार में कम नहीं है, फिर भी दुःख और दैन्य के अतिरिक्त कही कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता। 

एक दूसरे को स्नेह सद्भाव का सहारा देकर व्यथा वेदनाओं से छुटकारा दिला सकते थे, प्रगति और समृद्धि की संभावना प्रस्तुत कर सकते थे लेकिन किया क्या जाय जब मनोभूमि ही बिगड़ गई हो, सब कुछ उलटा सोचा और अनुचित किया जा रहा हो तो विषवृक्ष बो कर अमृत फल पाने की आशा कैसे सफल होती ?

इसी चर्चा को कल वाले लेख में चालू रखने की योजना है। 

गुरुसेवक का नमन 

जय गुरुदेव 


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