वेदमाता,देवमाता,विश्वमाता माँ गायत्री से सम्बंधित साहित्य को समर्पित ज्ञानकोष

ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्म दिवस को समर्पित, वर्ष 2026 के  दूसरे चरण का दसवां  लेख- आद सरविन्द पाल जी की प्रस्तुति 

आज का लेख अखंड ज्योति जनवरी 2025 के अंक में  “पावन योजना है गृहस्थ धर्म” शीर्षक से प्रकाशित हुए लेख पर आधारित है। प्रकाशित हुए सारे लेख को दो-तीन बार पढ़ने पर भी “गृहस्थ धर्म” की परिभाषा को जानने की जिज्ञासा शांत न हुई। आशंका तो अवश्य थी कि “गृहस्थ आश्रम” ही “गृहस्थ धर्म” होगा लेकिन आशंका का निवारण किये बिना हमें चैन कैसे आना था। हमारी रिसर्च से निवारण हुई आशंका आदरपूर्वक निम्नलिखित प्रस्तुत है:    

हिंदू धर्म में 25 से 50 वर्ष की आयु के बीच वैवाहिक जीवन के माध्यम से परिवार, समाज और धर्म के प्रति कर्तव्यों का पालन करने को “गृहस्थ धर्म/गृहस्थ आश्रम” कहा गया है। आज के युग के सम्बन्ध में 25 और 50 वर्ष की आयु का कांसेप्ट ही ख़तम हुआ दिखता  है। मानव-जीवन के चार आश्रमों में सबसे महत्वपूर्ण गृहस्थ आश्रम ही है, जो सदाचार, न्यायपूर्ण धनार्जन, परिवार का पालन-पोषण, अतिथि सत्कार और समाज सेवा (दान) पर बल  देता है। 

आइए देख लें कि गृहस्थ धर्म के क्या-क्या कर्तव्य हैं और हमारे समेत, पाठकों में से कौन-कौन इनका पालन कर रहा है, आज का ज्ञानप्रसाद लेख हमें ईमानदारी से स्वयं का मूल्यांकन (Self-assessment) करने का स्वर्ण अवसर दे रहा है।

-नैतिक जीवन और संतोष: धर्म, अर्थ और काम (उपभोग) के बीच संतुलन रखते हुए, “जो उपलब्ध हो उसमें संतोष” के साथ जीना, अर्थात “जो  प्राप्त है वही पर्याप्त है” के सिद्धांत का पालन करना। क्या यह सिद्धांत केवल लिखने,पढ़ने और प्रचार करने के लिए ही है? यदि नहीं है तो फिर भागदौड़ किस बात की है, चादर देख के पाँव पसारने वाली वर्षों पुरानी  बात क्यों समझ में नहीं आ रही। 

परिवार का पालन: माता-पिता, पत्नी/पति, और संतानों के प्रति जिम्मेदारियों को पूरा करना। बुज़र्ग वृद्धाश्रमों में पड़े हुए हैं,पति-पत्नी में तलाक हो रहे हैं, संतान बाग़ी हुई जा रही है, क्या यही है गृहस्थ धर्म?

-समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य: ईमानदारी से धन कमाना, अतिथियों का सत्कार करना और दान करना (अन्नदान, विद्यादान), ऑनलाइन ज्ञानरथ गायत्री परिवार के मंच से बार-बार ज्ञानदान की बात की जा रही है क्योंकि इस दान से बड़ा कोई दान नहीं है। क्या गुरुदेव के वचनों का पालन हो रहा है?

भगवान का स्मरण: सांसारिक कार्यों (खेती, नौकरी, व्यापार) के साथ ईश्वर का स्मरण करना ही परम धर्म है।

-तीव्रता से बचना: मोहमाया में अत्यधिक लिप्त न होकर, शरीर की नश्वरता को याद रखना। पाठक कहेंगें कि मोहमाया ने तो पशुओं तक को नहीं छोड़ा हुआ है, लेकिन यहाँ “अत्यधिक” की बात हो रही है। मोहमाया,लालच जैसे दुव्यसनों ने तो मनुष्य का अपने जीवन का उद्देश्य ही भुला दिया है।  

-नैतिक नियम: पराई स्त्री या पुरुष से संबंध न रखना (परस्त्री/पुरुष गमन वर्जित)। इस पॉइन्ट के बारे में तो क्या ही कहा जाये, बलात्कार आदि ने जिस तरह समाज को खोखला किया हुआ है उससे  भला कौन अपरिचित है। 

क्या विधाता ने इस उद्देश्य के लिए इस धरती पर भेजा था ?भेजा था बागवान बना कर और मनुष्य बन बैठा मालिक !!!

कल भी लेख का शुभारम्भ निम्नलिखित सन्देश से किया था आज फिर उसी को दोहराने का मन कर रहा है :  

समस्त विश्व में त्राहि-त्राहि मची हुई है, ऐसे में विश्व शांति के लिए कामना करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उससे भी ऊपर यदि शांतिपाठ का अर्थ समझकर, अंतर्मन से सच्ची प्रार्थना की जाए तो भगवान इतने निष्ठुर नहीं हैं कि गिलहरी जैसे हमारे योगदान को नज़रअंदाज कर दें, बूँद बूँद से ही  तो तालाब भरते हैं।  

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में,  नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए  

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परम पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि “जिसे हम गृहस्थ जीवन कहते हैं, वह एक बहुत ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वसुलभ पावन योजना है।” इस दिव्य परिवार में मनुष्य के कल्याण का विषय अधिक जागरूकता से निभ पाता है लेकिन इसे इस प्रकार समझा जाए कि आबादी बढ़ाने के  दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि समाज को एक संगठित रूप देने, नए मनुष्यों के निर्माण करने के लिए “गृहस्थ धर्म” की आवश्यकता पड़ती है। 

हमारे पूर्वज इसे मानव सभ्यता का एक अत्यंत उपयुक्त व महत्वपूर्ण अंग मानते थे। उनके अनुसार यह  पावन योजना भावी  पीढ़ी को सुसंस्कृत करने का साधन है तथा इसमें निहित तत्व मानव को त्याग का संदेश देते हैं। परिवारजनों को देश-धर्म-संस्कृति के प्रति श्रद्धा-विश्वास और समर्पण के साथ अधिक जागरूक कर उसे एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए  प्रेरित किया जाता है। लेकिन यह अभिकल्पना तभी सार्थक हो पाती है, जब सही मायनों में “गृहस्थ धर्म” का  सुचारु रूप से पालन किया जाए। 

दो परिवारों के मिलन को गृहस्थ कहते हैं। इस मिलन का उद्देश्य क्या है ? एक नई पीढ़ी का  सृजन !! यह सृजन किस लिए ? श्रेष्ठ व महान दिव्य ज्ञान से ओत-प्रोत दिव्य आत्माओं के  धरती पर अवतरण के लिए !! इस उद्देश्य के पीछे छिपे कारण को समझने पर मालुम पड़ता है कि  

गृहस्थ की परंपरा का यही आधार है, लेकिन लोगों ने इसे क्या से क्या  बना दिया। उनके अनुसार गृहस्थ का अर्थ होता है परिवार बढ़ाना, अपनी सुख-सुविधाओं की खातिर समाज के व्यापक वर्ग की अनदेखी करना और स्वयं को पूर्ण रूप से अपने “एकाकी परिवार” को ही समर्पित कर देना। 

यह समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि  ईश्वर ने हमें केवल अपने परिवार के  पालन पोषण के लिए ही इस धरती पर नहीं भेजा है। पुरातन समय से भारत वसुधैव कुटुंब की बात करता आ रहा है जिसका अर्थ है सारी  वसुधा ही एक कुटंब है तो फिर विश्व-परिवार के लिए निर्धारित मूल कर्त्तव्यों की पूर्ति न करना सरासर गलत व अवैधानिक है। 

आज का गृहस्थ जीवन दुराचार, असंगत नीति-व्यवहार आदि दुर्गणों से इस प्रकार ग्रस्त है कि व्यक्ति नीच से नीच  आचरण करता हुआ अपने जीवन को नरक की विभीषिका में धकेलता जा रहा है। 

मनुष्य ने  गृहस्थ को ठीक से  समझा ही नहीं और ऐसे महान उद्देश्य के प्रति लापरवाही बरती जिसका दुष्परिणाम मनुष्य स्वयं भुगत रहा है। जिन परिस्थितियों को मनुष्य आज झेल रहा है उसका सबसे बड़ा कारण “अज्ञानता” ही है। उच्च डिग्रियां तो अनेकों लिए बैठे हैं, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां  भी चला रहे हैं लेकिन सही ज्ञान से वंचित हैं। गृहस्थ क्या था और क्या हो गया।  ऋषि-मुनियों द्वारा आरोपित व्यवस्था का सत्यानाश कर मनुष्य पतन का भागी तो बना ही लेकिन उसने उत्थानपरक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की दिशा में  कोई सार्थक पहल न की। परिणाम सबके सामने आँखें फाड़े खड़ा है, आज के मनुष्य का सबसे  बड़ा दुर्भाग्य यही है।

जीवन तभी महान बनता है जब हम सब गृहस्थ जीवन और धर्म के आदर्शों को अपना पाते हैं, उसे अपनी उन्नति व प्रगति का साधन बना कर अपने को पवित्र कार्यों एवं उद्देश्यनिष्ठ प्रयोजनों के लिए  संयुक्त रूप से समर्पित कर पाते हैं। 

मानवीय व्यवहार की रूपरेखा, जिसमें मनुष्य  को समाज के साथ आदान-प्रदान व सहयोग का अवसर मिलता है, व्यक्ति अपने एकांगीपन से दूर हटकर स्वयं को कर्त्तव्यनिष्ठ बुद्धि के साथ श्रेष्ठ व महान दिव्य कार्यों हेतु समर्पित करता है, सही मायनों में इसी को गृहस्थ क्या गया है, इसी को परिवार कहा गया है।  इन दिव्य कर्तव्यों का पालन करते हुए मनुष्य स्वयं  में संतोष का अनुभव करता है और दूसरों की उन्नति व प्रगति में सहायक बनकर एक श्रेष्ठ समाज के गठन में सहभागी होता है। गृहस्थ एक ऐसा पावन कृत्य है, जिसकी महत्ता और स्वरूप को समझा जा सके तो साक्षात् कायाकल्प होने में कोई देरी नहीं लगती। लेकिन यह केवल कहने, सुनने, पढ़ने,पढ़ाने  की बातें नहीं हैं,  दीक्षा लेते समय पंडित जी के पीछे तोते के भांति रटने मात्र की बातें  नहीं हैं। इस उद्देश्य के  लिए ऐसे लोगों का होना जो विवेक-बुद्धि से सोचें, कर्त्तव्य का पालन करें एवं अपनेआप को समाज के व्यापक हित प्रयोजन में लगाएं, अति आवश्यक है। 

इसी मंच से बार-बार मानवीय मूल्यों के पालन का स्मरण कराया जाता है ताकि ऐसा न हो कि इन्हें भूलते हुए हम स्वयं को ही भूल जाएँ। नवयुग के संविधान का एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ने पर बहुत ही सरलता से समझ आ सकता है कि दैनिक ज्ञानप्रसाद इन्हीं सूत्रों को लेकर आगे बढ़ रहा है। पढ़ना और पालन करना दो अलग-अलग पहलू हैं, इस मंच से इसी बात को चीख-चीख कर बताने का प्रयास रहता है।  

जो लोग गृहस्थ आश्रम  का पालन कर सकते हैं, वही एक श्रेष्ठ जीवन जीकर जाते हैं। जो इस सुअवसर से चूक जाते हैं उन्हें “धरती माता पर बोझ” जैसी संज्ञा का सामना करना पड़ता है । जिन्हें विवाह निभाना नहीं आता वोह  विवाह किए हुए बैठे हैं। विवाह की उपयोगिता तभी सिद्ध होती है, जब यह मनुष्य को उसके मूल वैभव का ज्ञान हो। मनुष्य को चाहिए कि वह  सारे संसार के कल्याण की सोचे और उसी अनुसार अपनी नीति अपनाए, व्यक्तिगत हित से अधिक समष्टि सत्ता को समझे  एवं जीवन में श्रेष्ठ आदर्शों का पालन करते हुए  लघु से महान बनते हुए  श्रेष्ठता को प्राप्त हो। 

परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए ऐसा जीवन ही जीने योग्य है, जो कि स्वयं से अधिक संसार के हितार्थ नियोजित हो। इसके अतिरिक्त गृहस्थ परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि हम सब एक बनकर रहें। चाहे जो कुछ हो, हमारे बीच का प्रेम और सहकार सदा बना रहे एवं हम जीवन के उज्जवल पथ पर पूर्ण गति से अग्रसर हों। इसके अतिरिक्त जो भी नीति-व्यवहार स्त्री-पुरुष के बीच होता है, वह अपनेआप में संतुलित हो और उसके द्वारा संतति-निर्माण एवं अन्यों को परस्पर अनुग्रह का लाभ मिल सके। 

यही आदर्श गृहस्थ जीवन की परिकल्पना है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सबके मन में गृहस्थ के पुण्य-प्रयोजन के प्रति श्रद्धा-विश्वास और समर्पण के साथ आदर और सम्मान हो, हम सभी को समान दृष्टि से देखें और लोक-कल्याणमय दृष्टिकोण अपनाकर अपने को इस धरती एवं संपूर्ण विश्व-ब्रह्मांड के मानव समाज के ऋण से उऋण करें। स्त्री-पुरुष के प्रति हमारी ममता एवं करुणा झलके, प्रेम से अपना जीवन बसाएं तथा दूसरों को अनुग्रह का पात्र बनाएं। यही गृहस्थ परंपरा है एवं इसकी सम्माननीय स्थिति तभी है, जब हम जिम्मेदारीपूर्वक इसके निर्वहन को कदम बढ़ाएं। परिवार टूटते और बिखरते तभी हैं, जब हम एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त नहीं करते बल्कि  स्वयं में ही उलझे  रहते हैं। 

हमारे महान पूर्वज कहते हैं कि गृहस्थ जीवन तभी सफल है, जब उसे किसी आदर्श सुपात्र द्वारा पूर्ण निश्चिंतता से निबाहने की सोची जाए, उसे अपने व्यक्तिगत हित से बढ़कर श्रेष्ठ समाज के गठन का माध्यम बनाया जाए एवं गृहस्थ जीवन के नियमों द्वारा पवित्र व महान जीवन जीने का सोचा जाये। यही सच्चा गृहस्थ धर्म है, युगधर्म है। 

धन्यवाद, जय गुरुदेव 

आज के ज्ञानप्रसाद लेख से आद सरविन्द पाल जी की लेख श्रृंखला का समापन होता है, इस समयदान,ज्ञानदान, श्रमदान के लिए भाई साहिब का धन्यवाद् करते हैं। 

कल हमारी बेटी संजना की प्रस्तुति से परमपूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जीवन को समर्पित इस दिव्य लेख श्रृंखला का समापन हो जायेगा। 


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