3 फ़रवरी 2026 का ज्ञानप्रसाद
जब भी हम किसी नई लेख श्रृंखला का शुभारम्भ करते हैं तो उसकी भूमिका का अवश्य वर्णन करते हैं लेकिन इस बार तो एक नन्हें शिशु का भांति बार-बार कहे जा रहे थे “गुरुदेव यह पाठ आप हमें पहले पढ़ा चुके हैं।” लेकिन गुरुदेव मान ही नहीं रहे थे, कहे जा रहे थे कि बेटा इन बातों का ज़िकर पहले अवश्य ही आया होगा लेकिन किसी अन्य संदर्भ में होगा। हमने तो 25 जनवरी 2023 वाला लेख भी दिखा दिया लेकिन गुरुदेव फिर भी नहीं माने। पूछने लगे, बेटे उसमें “माथा पच्ची निरर्थक नहीं गयी”, “तपने और तपाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?”, “हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े थे”, “आने वाले जीवन का उत्सर्ग”, “अपने को बदल क्यों न दें?” जैसे टॉपिक्स की चर्चा कहाँ हुई थी। अपनी शंकित प्रवृति के कारण हम कहाँ मानने वाले थे, आरम्भ होने वाली लेख श्रृंखला के 19 लेख पढ़ने शुरू कर दिए, एक बार नहीं, कई बार देखे , पन्नें पलटे तो समझ आ गया कि गुरु तो गुरु ही है, फिज़ूल की बहस लगाई हुई थी। लेकिन साथिओं को बताना चाहते हैं कि गुरु के साथ ऐसी बहस करने में अपना ही आनंद है।
तो साथिओ, निष्कर्ष यही निकलता है कि आज आरम्भ हो रही लेख श्रृंखला, अखंड ज्योति के अप्रैल 1990 वाले अंक में विशेष लेख माला शीर्षक के अंतर्गत 19 Subheadings में प्रकाशित हुई थी। इस लेखमाला का प्रथम लेख “इस बार का वसंत पर्व एवं उसकी उपलब्धियां” बिल्कुल ऐसा ही चरितार्थ हो रहा है जैसे एक पिता इस संसार से विदा लेने से पहले अपने बच्चों को बुलाकर वोह सीक्रेट एवं उपदेश देना चाहता है जिनसे वोह सारी उम्र, जीवन की भागदौड़ के कारण, वंचित रहे।
इस लेख श्रृंखला को पूज्यवर की बहुचर्चित रचना “हमारी वसीयत और विरासत” कहना गलत न होगा।
इतनी बड़ी भूमिका लिखने के बाद यह लिखना भी गलत न होगा कि गुरुदेव ने स्वयं ही यह सारा कंटेंट हमारे हाथ में थमा दिया, हमारा प्रयास तो तभी सफल समझा जायेगा जब आने वाले लेख पाठकों को जन्मघुंटी का आभास दे पायेंगें, सारी बीमारियां दूर कर पायेंगें ।
तो चलते हैं विश्वशांति की कामना के साथ आज के ज्ञानप्रसाद लेख का अमृतपान करते हैं :
ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात शान्ति: कीजिये प्रभु ! त्रिभुवन में, जल में, थल में और गगन में,अन्तरिक्ष में, अग्नि – पवन में, औषधियों, वनस्पतियों, वन और उपवन में,सकल विश्व में अवचेतन में,शान्ति राष्ट्र-निर्माण और सृजन में, नगर , ग्राम और भवन में प्रत्येक जीव के तन, मन और जगत के कण – कण में, शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए ! शान्ति कीजिए
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गुरुदेव बता रहे हैं कि उन्होंने 1990 के वसंत के बाद विराम क्यों ले लिया था।
-लम्बी मंजिल लगातार चल कर पार नहीं की जाती। बीच में सुस्ताने के लिए विराम भी देना पड़ता है। रेलगाड़ी जंक्शन पर खड़ी होती हैं। पुराने मुसाफिर उतारे जाते हैं, नए मुसाफिर चढ़ाये जाते हैं, ईंधन भरा जाता है, सफाई वगैरह की जाती है, पैंट्री में खाना ,ड्रिंक्स आदि लोड किये जाते है।
-अलग-अलग देशों में फाइनेंसियल वर्ष की अवधि अलग-अलग होती है। किसी देश में तो जनवरी से दिसंबर होती है तो भारत जैसे देश में (जहाँ तक हमें स्मरण हो रहा है) मार्च से मार्च ही फाइनेंसियल ईयर होता था। 1 अप्रैल को नए रजिस्टर लगाए जाते थे, पुराना हिसाब-किताब जाँचा जाता है और नया बजट बनता है।
-माता के गर्भ में पल रहा भ्रूण 9 माह में अंग प्रत्यंगों को इस योग्य बना लेता है कि आगे वाले जीवन में उन अंगों से काम लिया जा सके जा सके।
-किसान हर वर्ष नई फसल बोने और काटने का क्रम जारी रखता है, हर फसल के बीच धरती माँ को आराम देने के लिए बिना कोई फसल बोये भी छोड़ देता है।
-फौजियों की टुकड़ी भी कूच के समय में बीच-बीच में सुस्ताती हैं।
यह कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि कोई भी कृत्य लगातार नहीं होता, हर किसी के बीच में विराम के क्रम होता ही है।
हमारे जीवन के ब्रह्मकमल की एक फुलवारी 80 वर्ष के बाद अपनी मंजिल का एक विराम लेने का निर्णय कर चुकी है। अब नयी योजना के अनुरूप नयी शक्ति संग्रह करके नया प्रयास आरम्भ किया जाना है।
यह “विराम प्रत्यावर्तन” किया जाना लगभग तय ही है। यह “विराम प्रत्यावर्तन” लगभग वैसा ही है जैसे वयोवृद्ध शरीर को त्याग कर नये शिशु का नया जन्म होता है और नये नाम से सम्बोधन किया जाता है। “नवसृजन की सन्धिवेला” में भी लगभग ऐसा ही हो रहा है। विराम की अवधि 80 वर्ष रहे तो कोई अचम्भे वाली बात नहीं है। नवसृजन अभियान तथा उसके लिए नियमित रूप से काम करने वाले व्यक्ति के सम्बन्ध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है।
सभी को तो नहीं लेकिन हमारे साथ जुड़े हुए लोगों को इस विराम के संकेत की पहले से ही जानकारी थी। इसलिए उन लोगों में भूतकाल के आश्चर्यजनक रहस्यों और भविष्य के अभूतपूर्व निर्धारणों के सम्बन्ध में और अधिक जानने की उत्सुकता एवं जिज्ञासा उभरी। समय रहते इन लोगों ने आमने सामने पूछताछ करने की आतुरता प्रदर्शित की। 1990 के वसंत से कई महीने पहले ही आत्मीयजनों के हरिद्वार आने का ताँता सा लग गया। आगमन का उद्देश्य वह लाभ उठाने का था जो किसी बड़े व्यवसायी के कारोबार में शेयर होल्डर बन जाने वालों को सहज ही मिलने लगता है। अनुसंधान-अन्वेषण भी एक कारण हो सकता है। आने वालों की जिज्ञासा हमारे जीवन से सम्बंधित रहस्यों को जानना भी हो सकती है।
जो भी हो पिछले छः महीने इसी ऊहापोह में बीते हैं। इस बीच शांतिकुंज में इतने अधिक प्रज्ञापुत्रों का आगमन हुआ जितना कि इस आश्रम के निर्माण से लेकर अब तक के पूर्व वर्षों में कभी भी नहीं हुआ। परिजनों के आगमन से भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिज्ञासुओं ने आग्रहपूर्वक वह सब कुछ उगलवा लिया जो जिसे आज तक रहस्यमय समझा जाता रहा। महत्वपूर्ण स्थानान्तरों के अवसर पर सहज सौम्यता कुछ बताने के लिए बाधित तो करती ही है लेकिन फिर भी विचार आता है कि चलते समय तो गोपनीयता का, आश्चर्य- असमंजस का समाधान कर ही दिया जाय।
सो इतनी दूर से आये अतिथिओं ने ऐसा बहुत कुछ पूछा और हमने बताया जिनका अनेकों लोगों को अनुभव भी नहीं था । ऐसा समझा गया कि जो नहीं आ सके, उन्हें भी उस रहस्यमयी चर्चाओं की जानकारी प्राप्त करने से वंचित न रहना पड़े। यह विचार करते हुए आवश्यक रहस्यों को जानकार व्यक्तियों में लिपिबद्ध कर देना उचित समझा गया ताकि उपयोगी जानकारी से वे लोग भी वंचित न रहें जो अब तक न सही, अगले दिनों संपर्क में आएंगें और अतीत के संबंध में उपयोगी जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुक होंगे।
गुरुदेव इस रहस्योद्घाटन में छिपे कारण के बारे में बता रहे हैं कि सुनने/जानने वालों का भी लाभ सन्निहित है, ऐसा लाभ जो सफल लोगों (महामानवों) के सहचरों को सहज मिलता रहता है।
सभी को अनुमान था कि इस तंत्र की प्रायः सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों का प्रथम दिन वसंत पंचमी ही होता आया है । सो उस मुहूर्त को विशेष महत्व देने वाले आगन्तुकों की संख्या निश्चय ही पहले दिनों की अपेक्षा निश्चित रूप से अधिक रहेगी। हुआ भी ठीक ऐसा ही। मिशन के साथ जुड़े हुए परिजन इस वसन्त पर्व पर इतनी अधिक संख्या में आये जितने कि विगत दस वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं आये थे। आश्रम की परिधि और आगन्तुकों के लिए साधनों की तुलनात्मक दृष्टि से कमी होने के कारण शांतिकुंज के आश्रमवासी, आजीवन समयदानी इस आपत्तिकालीन समस्या से निपटने में जुट गये। भूमि न मिल सकी तो हमारे पास जितना स्थान था उसे बहुमंजिला और सघन बनाया गया। लगभग सारा काम श्रमदान से हुआ और जितनों के लिए जगह थी उससे प्रायः ढाई-तीन गुना के लिए जगह बना दी गई। भोजन व्यवस्था के लिए बड़े आधुनिक यंत्र-उपकरण नये सिरे से लगाये गये और ऊपरी मंजिल पर बने भोजनालय से नीचे खाद्य पदार्थ लाने के लिए एक गुड्स लिफ्ट को फिट किया गया। इतना कुछ करने के बावजूद असुविधा रहने की आशंका थी लेकिन ठीक उसी तरह से काम चल ही गया जैसे ईश्वर पर आश्रित लोगों का चल जाया करता है।
इस बार का वसंत पर्व न केवल आयोजन की दृष्टि से बल्कि स्वजनों के साथ आत्मीयता भरे परामर्श देने की दृष्टि से भी अनुपम रहा। लोगों ने इतना कुछ ऐसा पाया जिसकी आशा या संभावना बहुत ही कम लोगों को रही होगी।
सुनना अधिक कहना कम, करना-अधिक बताना कम, सिखाना कम-सीखना अधिक जिनकी जीवन शैली रही हो, वे इतने गंभीर प्रसंगों को इतनी सरलतापूर्वक बता देंगे इस स्थिति का प्रावधान पाकर आगन्तुकों में से अधिकांश को भारी संतोष हुआ।
प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं की झड़ी लगी रही। इतने अधिक परिजनों को एक व्यक्ति इतना कुछ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से बता सकता हैं, यह प्रसंग भी अपनेआप में अद्भुत रहा।
अधिकांश जिज्ञासुओं ने एक जिज्ञासा प्रधान रूप से प्रकट कि एक साधन रहित व्यक्ति, अकेले ही, सीमित समय में इतने भारी और व्यापक काम कैसे कर सकता है, इसका रहस्य बचा है? पूछने वालों को उन सर्वविदित बातों का तो पता ही था जो कानों से सुनी और आँखों से देखी गई हैं।
मूल प्रश्न था युगचेतना उभारने वाला इतना साहित्य कैसे सृजा गया? उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन प्रसार कैसे सम्पन्न हुआ? इतना बड़ा परिवार कैसे संगठित हो गया, जिसमें पाँच लाख पंजीकृत और इससे पाँच गुना अधिक सामयिक स्तर पर सम्मिलित उच्चस्तरीय व्यक्तियों का समुदाय किस प्रकार जुड़ता चला गया और साथ चलता रहा? एक व्यक्ति के तत्त्वावधान में 2400 आश्रम-देवालय कैसे बन सके? शांतिकुंज,ब्रह्मवर्चस्,तपोभूमि मथुरा जैसे बहुमुखी सेवाकार्य में संलग्न संरचनाओं की इतनी सुव्यवस्था कैसे बन सकी? सुधारात्मक और सृजनात्मक आन्दोलन की देशव्यापी विश्व-व्यापी व्यवस्था कैसे बन गई? “रोता आये हँसता जाये” वाला उपक्रम अनवरत रूप से कैसे चलता रहा? आदि-आदि ऐसे विदित अगणित क्रिया-कलाप इन 80 वर्षों में घटित हुए हैं जिनकी इतने सुचारु रूप से चलने की सूत्र संचालक जैसे एक नगण्य एवं साधारण से व्यक्तित्व से आशा की नहीं जा सकती, फिर भी वे कैसे सम्पन्न होते चले गए? जड़ी बूटी चिकित्सा पर आधारित आयुर्वेद की नयी सिरे से शोध कैसे बन पड़ी व मनोरोगों के निवारण और मनोबल के संवर्द्धन की ब्रह्मवर्चस प्रक्रिया कैसे चलती रही? सात पत्रिकाओं का सम्पादन अकेले प्रयास से कैसे चल पड़ा? लाखों शिक्षार्थी हर वर्ष प्रशिक्षण पाने से किस प्रकार लाभान्वित होते रहे? सृजनात्मक आन्दोलनों को इतनी गति कैसे मिल सकी जितनी कि अनेकानेक संगठन और समुदाय भी नहीं उपलब्ध कर पाते हैं ?
साथिओ, इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें कल तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
जय गुरुदेव, धन्यवाद
